28/05/2023
श्री श्री १०८ श्री कृष्ण देव दास जी महाराज
धेरूख स्थान (उत्तर वारीपार)
साधु-स्मृति
आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व दरभंगा मण्डलान्तगर्त बहेड़ा थाने के नजदीक कमला नदी के उत्तर वारी पार धेरूख ग्राम में श्री श्री १०८ सनाथ दासजी महाराज स्थान बनाये। आप दो गुरुभाई थे। आपके गुरुभाई के नाम स्वामी श्री गोविन्द दासजी परमहंस था। जो हाटी स्थान के महन्त थे। आप दोनों गुरुभाई अनन्त श्री विभूषित स्वामी श्री मोहनदासजी महाराज के शिष्य थे। स्वामी भी सनाथ दासजी महाराज के शिष्य स्वामी श्री अमृतदासजी महाराज हुए। आप बड़े भक्तिमान पुरुष थे। घेरूख ग्राम में रहकर आपने निम्बार्क सम्प्रदाय का प्रचार किया और लोगों में भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति फैलाई। स्वामी श्री अमृत दासजी महाराज के शिष्य स्वामी श्री श्री १०८ फतूरी दासजी महाराज इस स्थान के महन्त हुए। जब स्वामी भी फतुरीदास जी महाराज वृद्ध हो गये तो उनके
शिष्य श्री श्री १०८ श्री कृष्णदेव दासजी महाराज इस स्थान के महन्त हुए। श्री श्री १०८ श्री स्वामी कृष्ण देव दासजी महाराज का जन्म मधेपुर थाना के पास मधुरा प्राम के मैथिल ब्राह्मण कुल में हुआ । सन् १९२६ साल में इनका यज्ञोपवीत हुआ। उस समय ये पाँच वर्ष के थे । यज्ञोपवीत के बाद निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुयायी श्री फतूरी दासजी महाराज से श्रीकृष्ण मन्त्र और विरक्त वैष्णवोचित वेषभूषा ग्रहण किये। उस दिन से ये घेरुख स्थान में रहने लगे। आप बाल ब्रह्मचारी साधु हुए। जिस समय आप धेरुख के महन्त हुए, उस समय उस स्थान में शालग्राम और नरसिंह भगवान् की पूजा होती थी। उसके बाद आपने १९८० ई. में उसी मन्दिर में भी राधाकृष्ण की स्थापना की, जो अत्यन्त सुन्दर मूर्ति हैं। उसके बाद १९८३ ई. में श्रीयुत स्वामी खखर बाबा के साथ तीर्थाटन में गये। और उसी साल से सिमरिया घाट में श्री श्री १०८ खखर बाबा के छाता के संचालन के लिये गंगा किनार में कार्तिक महीना में रहने लगे। जो आज तक चला आ रहा है। जिसमें इनका काफी सहयोग रहता था। स्वामी श्रीकृष्ण देवदास जी महाराज बड़े ही भजना नन्दी थे । अहर्निश श्रीराधा कृष्णचरणारविन्द में मन लगाये रहते थे।
आप श्री के पांच विरक्त शिष्य हुए जो क्रमसः श्री श्री १०८ श्री स्व. निरसन दास जी, स्व. सियाराम दास जी, स्व. मणिरामदास जी (मदन बाबा ) श्री श्याम दास जी और श्री राम ललित दास जी महाराज , आप ने श्री श्री १०८श्री राम ललित दास जी महराज को उत्तराधिकारी के रूप में मनोनीत किए जो सुचारू रूप से कार्य संभालने लगे।
संसारी ममता त्याग कर आप श्रीराधा कृष्णजी से ममता लगाये थे। ये बड़े ही उदार और परमार्थी थे। आप बड़े ही सुशील और शान्त थे। आपने निःसहाय लोगो को अपने साथ में लेकर तीर्थ कराया है। आपने तीर्थ में घूम घूम कर आनन्द पाये और दूसरों को भी बहुत सुख दिये हैं ये सर्व जन प्रिय थे। मालूम पड़ता है इनका न कोई शत्रु था और न कोई मित्र था । ठीक श्री मद्भगवद् गीता में भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र ने जो अर्जुन से अपने भक्त के लक्षण बताये हैं वे सब इनमें घटता था। जैसे:-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।
आप श्री १९९१ ई. में सालोक वास किए तदोपरान्त श्री श्री १०८ श्री राम ललित दास जी महराज महन्त हुए जो वर्तमान मे पदासीन है ।
#साधु_स्मृति
जय श्री राधेश्याम जी