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एकलव्य प्रभात शाखा,बिरौल RSS राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान - जापान का एक लड़का अपने छोटे भाई के अंतिम संस्कार के लिए लाइन में खड़ा है। एक इंटरव्यू में फो...
19/07/2021

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान -
जापान का एक लड़का अपने छोटे भाई के अंतिम संस्कार के लिए लाइन में खड़ा है।
एक इंटरव्यू में फोटोग्राफर बता रहा है कि बच्चा स्वयं को रोने से रोकने के लिए अपने होठों को इतनी जोर से दबाये हुए है कि उसके होठों से खून निकलकर नीचे गिरने लगता है। जब श्मशान का रखवाला उसका नंबर आने पर कहता है कि "जो बोझा तुमने अपनी पीठ पर ले रखा है वह मुझे दे दो" तो बच्चा कहता है "यह बोझा नहीं मेरा भाई है" और कहते हुए वहां से निकल जाता है।

जापान में आज भी यह तस्वीर शक्ति का प्रतीक मानी जाती है!

☆☆ 01 अप्रैल ☆☆      #जन्म_दिवस (दिनांक अनुसार ) #संघ_संस्थापक_डाॅ_हेडगेवारविश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय ...
01/04/2021

☆☆ 01 अप्रैल ☆☆
#जन्म_दिवस (दिनांक अनुसार )

#संघ_संस्थापक_डाॅ_हेडगेवार

विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आज कौन नहीं जानता ? भारत के कोने-कोने में इसकी शाखाएँ हैं। विश्व में जिस देश में भी हिन्दू रहते हैं, वहाँ किसी न किसी रूप में संघ का काम है। संघ के निर्माता #डाॅ_केशवराव_हेडगेवार_का_जन्म_01_अप्रैल_1889 ( #चैत्र_शुक्ल_प्रतिपदा, #वि_सम्वत्_1946) को नागपुर में हुआ था। इनके पिता श्री बलिराम हेडगेवार तथा माता श्रीमती रेवतीवाई थीं।

केशव जन्मजात देशभक्त थे। बचपन से ही उन्हें नगर में घूमते हुए अंग्रेज सैनिक, सीताबर्डी के किले पर फहराता अंग्रेजों का झण्डा यूनियन जैक तथा विद्यालय में गाया जाने वाला गीत ‘गाॅड सेव दि किंग’ बहुत बुरा लगता था। उन्होंने एक बार सुरंग खोदकर उस झंडे को उतारने की योजना भी बनाई; पर बालपन की यह योजना सफल नहीं हो पाई।

वे सोचते थे कि इतने बड़े देश पर पहले मुगलों ने और फिर सात समुन्दर पार से आये अंग्रेजों ने अधिकार कैसे कर लिया ? वे अपने अध्यापकों और अन्य बड़े लोगों से बार-बार यह प्रश्न पूछा करते थे। बहुत दिनों बाद उनकी समझ में यह आया कि भारत के रहने वाले हिन्दू असंगठित हैं। वे जाति, प्रान्त, भाषा, वर्ग, वर्ण आदि के नाम पर तो एकत्र हो जाते हैं; पर हिन्दू के नाम पर नहीं। भारत के राजाओं और जमीदारों में अपने वंश तथा राज्य का दुराभिमान तो है; पर देश का अभिमान नहीं। इसी कारण विदेशी आकर भारत को लूटते रहे और हम देखते रहे। यह सब सोचकर केशवराव ने स्वयं इस दिशा में कुछ काम करने का विचार किया।

उन दिनों देश की आजादी के लिए सब लोग संघर्षरत थे। स्वाधीनता के प्रेमी केशवराव भी उसमें कूद पड़े। उन्होंने कोलकाता में मैडिकल की पढ़ाई करते समय क्रान्तिकारियों के साथ और वहाँ से नागपुर लौटकर कांग्रेस के साथ काम किया। इसके बाद भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली।

सब विषयों पर खूब चिन्तन और मनन कर उन्होंने नागपुर में 1925 की विजयादशमी पर हिन्दुओं को संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। गृहस्थी के बन्धन में न पड़ते हुए उन्होंने पूरा समय इस हेतु ही समर्पित कर दिया। यद्यपि स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सक्रियता बनी रही तथा 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर वे एक वर्ष अकोला जेल में रहे।

उन दिनों प्रायः सभी संगठन धरने, प्रदर्शन, जुलूस, वार्षिकोत्सव जैसे कार्यक्रम करते थे; पर डा. हेडगेवार ने दैनिक शाखा नामक नई पद्धति का आविष्कार किया। शाखा में स्वयंसेवक प्रतिदिन एक घंटे के लिए एकत्र होते हैं। वे अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार कुछ खेलकूद और व्यायाम करते हैं। फिर देशभक्ति के गीत गाकर महापुरुषों की कथाएं सुनते और सुनाते हैं। अन्त में भारतमाता की प्रार्थना के साथ उस दिन की शाखा समाप्त होती है।

प्रारम्भ में लोगों ने इस शाखा पद्धति की हँसी उड़ायी; पर डा. हेडगेवार निर्विकार भाव से अपने काम में लगे रहे। उन्होंने बड़ों की बजाय छोटे बच्चों में काम प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे शाखाओं का विस्तार पहले महाराष्ट्र और फिर पूरे भारत में हो गया। अब डा. जी ने पूरे देश में प्रवास प्रारम्भ कर दिया। हर स्थान पर देशभक्त नागरिक और उत्साही युवक संघ से जुड़ने लगे।

डा. हेडगेवार अथक परिश्रम करते थे। इसका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर दिखायी देने लगा। अतः उन्होंने सब कार्यकर्ताओं से परामर्श कर श्री माधवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) को नया सरसंघचालक नियुक्त किया। 20 जून को उनकी रीढ़ की हड्डी का आॅपरेशन (लम्बर पंक्चर) किया गया; पर उससे भी बात नहीं बनी और अगले दिन 21 जून, 1940 को उन्होंने देह त्याग दी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हाटगाछी प्रभात शाखा एवं  एकलव्य प्रभात शाखा,बिरौल के  द्वारा हाटगाछी दुर्गा मंदिर प्रांगण में...
14/01/2021

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हाटगाछी प्रभात शाखा एवं एकलव्य प्रभात शाखा,बिरौल के द्वारा हाटगाछी दुर्गा मंदिर प्रांगण में मकर संक्रान्ति का कार्यक्रम किया गया, जिसमें छोटे छोटे स्वयंसेवकों के द्वारा योग, आसन,व्यायाम, नियुद्ध का प्रदर्शन किया गया, उसके बाद विभाग बौध्दिक शिक्षण प्रमुख मान्यवर भरत कुमार सिंह जी का बौध्दिक हुआ। मौके पर विभाग संपर्क प्रमुख श्री सनोज नायक जी,खंड कार्यवाह संजय जी, मंडल कार्यवाह दिव्यांशु जी, श्रीकान्त जी,लोकनाथ जी दीपक जी, शशिभूषण महतो जी आदि स्वयंसेवक मौजूद थे।

आज एकलव्य प्रभात शाखा, बिरौल के द्वारा राजेन्द्र सरस्वती शिशु मंदिर बिरौल में संघ स्थापना दिवस एवं शस्त्र  पूजन कार्यक्र...
21/10/2020

आज एकलव्य प्रभात शाखा, बिरौल के द्वारा राजेन्द्र सरस्वती शिशु मंदिर बिरौल में संघ स्थापना दिवस एवं शस्त्र पूजन कार्यक्रम किया गया, जिसमें सभी स्वयंसेवक में शस्त्रों की पूजा किया, कार्यक्रम का शुभारंभ जिला कार्यवाह सनोज नायक जी एंव प्रधानाचार्य भरत कुमार सिंह जी किए। कार्यक्रम में राजेन्द्र सरस्वती शिशु मंदिर बिरौल के प्रधानाचार्य भरत कुमार सिंह जी ने बौध्दिक दिए। कार्यक्रम में राकेश सिंह राणा,संजय सिंह, सुरेश यादव,अंगद जी,सुनील सिंह, प्रमोद सिंह, अरविंद जी,मानव जी,नटवर जी,विक्रम जी,शशिनाथ झा,मदन जी,हेमंत जी, सुनील जी आदी स्वयंसेवक उपस्थित थे।

सर संघचालक आदरणीय भागवत जी जमीन पर पंगत में बैठकर भोजन ग्रहण करते हुए संस्कार तो संघ से सीखनी चाहिएआदरणीय भागवत जी को जन...
11/09/2020

सर संघचालक आदरणीय भागवत जी जमीन पर पंगत में बैठकर भोजन ग्रहण करते हुए संस्कार तो संघ से सीखनी चाहिए

आदरणीय भागवत जी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं

30/08/2020

आज प्रकृति वंदन कार्यक्रम में *एकलव्य प्रभात शाखा,बिरौल* के स्वयंसेवक के द्वारा एक दर्जन से अधिक वृक्ष का वृक्षारोपण *हनुमंत सदन,बिरौल* के प्रांगण में किया गया। उसके बाद सभी स्वयंसेवक वृक्ष का धूप-दीप से पूजन कर पर्यावरण के रक्षा का संकल्प लिया। फिर सभी स्वयंसेवक माननीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी का बौद्धिक सुने।मौके पर राजेंद्र सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य भरत कुमार सिंह, मंडल कार्यवाह दिव्यांशु कुमार,पंकज जी,मानव जी, सुदर्शन जी,किशन जी,अभिजीत जी,ऋषिकेश जी,मृत्युंजय जी और नटवर जी उपस्थित थे।

आज प्रकृति वंदन कार्यक्रम में *एकलव्य प्रभात शाखा,बिरौल* के स्वयंसेवक के द्वारा एक दर्जन से अधिक वृक्ष का वृक्षारोपण *हन...
30/08/2020

आज प्रकृति वंदन कार्यक्रम में *एकलव्य प्रभात शाखा,बिरौल* के स्वयंसेवक के द्वारा एक दर्जन से अधिक वृक्ष का वृक्षारोपण *हनुमंत सदन,बिरौल* के प्रांगण में किया गया। उसके बाद सभी स्वयंसेवक वृक्ष का धूप-दीप से पूजन कर पर्यावरण के रक्षा का संकल्प लिया। फिर सभी स्वयंसेवक माननीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी का बौद्धिक सुने।मौके पर राजेंद्र सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य भरत कुमार सिंह, मंडल कार्यवाह दिव्यांशु कुमार,पंकज जी,मानव जी, सुदर्शन जी,किशन जी,अभिजीत जी,ऋषिकेश जी,मृत्युंजय जी और नटवर जी उपस्थित थे।

18 अगस्त/जन्म-दिवसअपराजेय नायक  : पेशवा बाजीरावछत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने भुजबल से एक विशाल भूभाग मुगलों से मुक्त करा...
18/08/2020

18 अगस्त/जन्म-दिवस

अपराजेय नायक : पेशवा बाजीराव

छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने भुजबल से एक विशाल भूभाग मुगलों से मुक्त करा लिया था। उनके बाद इस ‘स्वराज्य’ को सँभाले रखने में जिस वीर का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, उनका नाम था बाजीराव पेशवा।

बाजीराव का जन्म 18 अगस्त, 1700 को अपने ननिहाल ग्राम डुबेर में हुआ था। उनके दादा श्री विश्वनाथ भट्ट ने शिवाजी महाराज के साथ युद्धों में भाग लिया था। उनके पिता बालाजी विश्वनाथ छत्रपति शाहू जी महाराज के महामात्य (पेशवा) थे। उनकी वीरता के बल पर ही शाहू जी ने मुगलों तथा अन्य विरोधियों को मात देकर स्वराज्य का प्रभाव बढ़ाया था।

बाजीराव को बाल्यकाल से ही युद्ध एवं राजनीति प्रिय थी। जब वे छह वर्ष के थे, तब उनका उपनयन संस्कार हुआ। उस समय उन्हें अनेक उपहार मिले। जब उन्हें अपनी पसन्द का उपहार चुनने को कहा गया, तो उन्होंने तलवार को चुना। छत्रपति शाहू जी ने एक बार प्रसन्न होकर उन्हें मोतियों का कीमती हार दिया, तो उन्होंने इसके बदले अच्छे घोड़े की माँग की। घुड़साल में ले जाने पर उन्होंने सबसे तेज और अड़ियल घोड़ा चुना। यही नहीं, उस पर तुरन्त ही सवारी गाँठ कर उन्होंने अपने भावी जीवन के संकेत भी दे दिये।

चौदह वर्ष की अवस्था में बाजीराव प्रत्यक्ष युद्धों में जाने लगे। 5,000 फुट की खतरनाक ऊँचाई पर स्थित पाण्डवगढ़ किले पर पीछे से चढ़कर उन्होंने कब्जा किया। कुछ समय बाद पुर्तगालियों के विरुद्ध एक नौसैनिक अभियान में भी उनके कौशल का सबको परिचय मिला। इस पर शाहू जी ने इन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी। दो अप्रैल, 1720 को बाजीराव के पिता विश्वनाथ पेशवा के देहान्त के बाद शाहू जी ने 17 अपै्रल, 1720 को 20 वर्षीय तरुण बाजीराव को पेशवा बना दिया। बाजीराव ने पेशवा बनते ही सर्वप्रथम हैदराबाद के निजाम पर हमलाकर उसे धूल चटाई।

इसके बाद मालवा के दाऊदखान, उज्जैन के मुगल सरदार दयाबहादुर, गुजरात के मुश्ताक अली, चित्रदुर्ग के मुस्लिम अधिपति तथा श्रीरंगपट्टनम के सादुल्ला खाँ को पराजित कर बाजीराव ने सब ओर भगवा झण्डा फहरा दिया। इससे स्वराज्य की सीमा हैदराबाद से राजपूताने तक हो गयी। बाजीराव ने राणो जी शिन्दे, मल्हारराव होल्कर, उदा जी पँवार, चन्द्रो जी आंग्रे जैसे नवयुवकों को आगे बढ़ाकर कुशल सेनानायक बनाया।

पालखिण्ड के भीषण युद्ध में बाजीराव ने दिल्ली के बादशाह के वजीर निजामुल्मुल्क को धूल चटाई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रसिद्ध जर्मन सेनापति रोमेल को पराजित करने वाले अंग्रेज जनरल माण्टगोमरी ने इसकी गणना विश्व के सात श्रेष्ठतम युद्धों में की है। इसमें निजाम को सन्धि करने पर मजबूर होना पड़ा। इस युद्ध से बाजीराव की धाक पूरे भारत में फैल गयी। उन्होंने वयोवृद्ध छत्रसाल की मोहम्मद खाँ बंगश के विरुद्ध युद्ध में सहायता कर उन्हें बंगश की कैद से मुक्त कराया। तुर्क आक्रमणकारी नादिरशाह को दिल्ली लूटने के बाद जब बाजीराव के आने का समाचार मिला, तो वह वापस लौट गया।

सदा अपराजेय रहे बाजीराव अपनी घरेलू समस्याओं और महल की आन्तरिक राजनीति से बहुत परेशान रहते थे। जब वे नादिरशाह से दो-दो हाथ करने की अभिलाषा से दिल्ली जा रहे थे, तो मार्ग में नर्मदा के तट पर रावेरखेड़ी नामक स्थान पर गर्मी और उमस भरे मौसम में लू लगने से मात्र 40 वर्ष की अल्पायु में 28 अपै्रल, 1740 को उनका देहान्त हो गया। उनकी युद्धनीति का एक ही सूत्र था कि जड़ पर प्रहार करो, शाखाएं स्वयं ढह जाएंगी। पूना के शनिवार बाड़े में स्थित महल आज भी उनके शौर्य की याद दिलाता है।
* #हरदिनपावन*

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