Krishna kripa delhi

Krishna kripa delhi Hare Krishna

02/01/2026

श्री राधा नाम पुकारने से क्यों मर गए सभी निर्दोष जानवर भी🙏

एक बार कृष्ण भक्त श्रीधामा ने गोपियों से गुस्से में कहा क्यों लेते हो तुम उस राधा का नाम और जबरदस्ती जय श्री कृष्णा बोलने को बोला | कृष्णा नाम जैसे ही गोपियों ने पुकारा इसको सुनते ही सामान्य वृक्ष कल्प वृक्ष के समान चमकने लगे सूखे पुष्पों में भी जान आ गई | अब श्रीधामा एक कीड़े को देख गोपियों से बोले | केवल किट पर लक्ष्य कर राधे राधे बोलो | जैसे ही गोपियों ने राधे बोला किट उसी समय नष्ट हो गया | श्रीधामा ने गोपियों को एक उड़ती तितली को देख राधे बोलने को कहा, गोपियों ने जैसे ही राधा बोला वह तितली भी नष्ट हो गई | श्रीधामा खुश होते हुए बोले देखा कृष्ण तथा राधा नाम में अंतर , कृष्ण भक्ति का प्रतीक है तो वही राधा प्रेम , और प्रेम कभी भक्ति के सामने जीत नही सकता, भक्ति के सामने प्रेम मात्र भटकाओ है और कुछ नहीं | तभी वहां एक छोटी सी बच्ची अचानक गोपियों की भीड़ से बाहर आई और श्रीधामा का हाथ पकड़ बोली - मुझ पे लक्ष्य कर बोलो न राधा राधा, श्रीधामा बोले पर ऐसा करने से तुम भी नष्ट हो जाएगी | तो वह बच्ची बोली - मैं एक किट थी राधा नाम से मुझे उस योनि से मुक्ति मिली और तब में तितली बन खुले आसमान में उड़ने लगी | और फिर राधा नाम से द्वारा मुझे उस योनि से भी मुक्ति मिल गई और में मनुष्य रूप में हूं | 84 लाख योनियों के बाद मनुष्य रूप मिलता है और वो मात्र दो अक्षर के राधा नाम पुकारने से मुझे मिल गया |

तो पुकारिये मेरे साथ,,,
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे🙏

जय जय श्री राधे❤️🙏

02/01/2026

*भगवान कृष्ण की बाललीला का एक, दृष्टांत__*

मैया कन्हैया को घर के अन्दर ले गयीं और बोली- क्यों रे लाला तने बाबा के पूजा घर में से भगवान् मुंह में धर लिये, कन्हैया बोले- मैया, वो रोज घी में नहाते है, शहद में नहाते है ना, इसलिये मैंने सोचा मीठे होंगे तो मैंने मुंह में धर लिये, मैया बोली- लाला अब ऐसा मत करना वरना कान पक्कड़ के मारूंगी।

ऐसो ऊधम मचावे, अब तू इतनौ छोटौ थोड़े ही है, मैया नै लाला को स्नान करायौ और बोली, स्नान करके भगवान् की पूजा में जाना चाहिये, बिना स्नान किये भीतर नहीं जाते, स्नान कराके पीताम्बर पहनायौ, आज लाला की कमर में करधनी बांधी, चरणों में नुपुर बांध दिये, मोर पंख माथे पर बांध्यो, जैसे ही नूपुर बांधे, मैया अंगुली पकड़कर लाला को चलाने लगी तो ये तो ठुमका मारकर नाचने लगे।

मैया बोली- हे भगवान् ये नाचना कब सीख लिया, लाला की मैया ताली बजाने लगी और भूल गयी, सब कुछ विस्मृत हो गयी, मैया बहुत प्रसन्न है, "नाचे नंदलाला नचावें हरि की मैया, यशोदा तेरे भाग की कही न जाय" आप जरा देखो सज्जनों- साक्षात् परब्रह्म, "जग जाकी गोद में, सो यशोदा की गोद में" दुनियां जिसके इशारे पर नाचती है, वो यशोदा के इशारे पर नाच रहा है- भाईयों! थोड़े से छाछ व मक्खन के लिए गोपियां भगवान को नचां देती थी।

आपका ह्रदय ही सुंदर मंदिर है, ह्रदय रूपी मंदिर में परब्रह्म को नचाइयें, भाव से गायेंगे तो नाचेगा, यशोदाजी के भाव का दर्शन करें- लाला को कोई चीज अच्छी नहीं लगती,, मैया कभी दुशाला ओढ़तीं है, गोविन्द नहीं ओढ़तें, क्यों? क्योंकि उन्हें तो कारी कमरिया ही अच्छी लगती हैं, ऐसा सुन्दर गोपाल नृत्य करते हैं।

शेष, महेश, गणेश, दिनेश, सुरेश हुं जाहि निरन्तर ध्यावैं।
ताहि अखण्ड अनन्त अनादि अछेध, अवैध सुवेद बतावै।।
नारद से शुक व्यास रळें पचिहारि कोउ पुनि पार न पावै।
ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै।।

कृष्ण चरित्र में जो यश प्रदान करे उसे यशोदा कहते हैं, एक और बात- राधारानी की माता का नाम क्या है? कीर्ति, और कृष्ण की माता का नाम है यशोदा, यदि आप व्याकरण के हिसाब से उसका शाब्दिक अर्थ देखें तो "कीर्तिः ददति इति कीर्तिदा" और "यशं ददति इति यशोदा" जो कीर्ति दे वो कीर्तिदा और जो यश देवे वो यशोदा, यश यानी कीर्ति और कीर्ति यानी यश।

राधा और कृष्ण दोनों की माताओं के नाम का अर्थ एक ही होता है, यदि लाला की लीलाओं में यशोदा यश प्रदान न करे तो गोविन्द को कौन जाने, गोविन्द को कौन पहचाने? ऐसा सुन्दर चरित्र है कृष्ण का, मैया जब नृत्य करा रही लाला को, दो ढाई वर्ष के कृष्ण है, रूनक-झुनक पायल बज रही, आज एक गोपी ने गोविन्द को नृत्य करते हुए देख लिया।

उस गोपी का नाम है श्रुतिरूपा, वेद के मंत्र गोपी बनकर आऐं है, गोपी का मन रूपी मयूर नाचने लगा, दौड़ी-दौड़ी गोपियों की मण्डली में गयीं, गोपियां बोली- क्या बात है? क्यों इतनी खुश हो रही हो? गोपी बोली- मैंने आज विचित्र दृश्य देखा, आश्चर्य देखा, गोपियां बोली, क्या देखा? बोली, गाय की धूल से धूसरित अंग वाला, वेदांत प्रतिपाध ब्रह्म आज यशोदा के आंगन में नाच रहा था।

श्रृणुसखि कौतुकमेकं नन्द निकेतांगणेमयादृष्टं।
गोधूलि धूसरितांगः नृत्यति वेदान्त सिद्धान्त।।

इस बात को सुनकर हजारों गोपियों के नैत्र नम हो गये और गोपियों ने मन में सोचा, हम गोविन्द का दर्शन कैसे करे? यशोदा बड़ी भाग्यशाली है, जिसके आंगन में कृष्ण नाचता है, पर लाला का हम दर्शन कैसे करें? अब सब विचार कर रही है, कैसे जायें दर्शन करने? सासूजी तो घर से जाने नहीं देती।

कोई-कोई सासूजी बड़ी खतरनाक होती है, स्वयं सब जगह चली जाती हैं, पर बहू को कहीं नहीं जाने देती, मैं तो हास्य-विनोद मैं कह रहा हूं, जो सास है वो बुरा न मानें।

देखे बिन कान्हा जब मन नाहिं माना,
इन आंखों से आज हमने ब्रह्म पहचाना है।
कृष्ण पद कमलों में मन को लगाना,
इन गोपियों का ताना ये उलाहना तो बहाना है।।

बहूओं,, ने सोचा कैसे भी कृष्ण का दर्शन करें, भले ही उलाहना,, के बहाने ही कृष्ण का दर्शन क्यों ना करना पड़े, कैसे करें? सासूजी सवेरे गयीं शिव मंदिर शिवजी को जल चढ़ाने, नयी-नयी बहूओं ने घर की जितनी भी मटकीयां थी, सारी फोड़ दीं सासूजी आयीं- बहू, ये मटकी कैसी फूटी पड़ी है, बोली, माताजी! नन्दजी के लाला आये और सारी मटकी फोड़कर चले गये।

सासूजी बोलो- अच्छा, वो नन्द के छोरा की इतनी हिम्मत की मेरे घर में आयकर मेरी मटकी फोड़कर चल्यो गयो, बहू, यदि मैं जाऊँगी तो बात ज्यादा बढ़ जायेगी, इसलिये तुम जाओ हमारी तरफ से यशोदा को उलाहना देकर आओ बड़ी खुशी की बात है, इस उलाहने के बहाने आज लाला के दर्शन तो हो जाऐंगे, इन गोपियों का ताना, ये उलाहना,, तो एक बहाना है।

|| जय श्री कृष्ण ||

02/01/2026

जब श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं।

इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।

जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

नारद- बालक तुम कौन हो ?

बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।

नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?

बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।

तब नारद ने ध्यान धर देखा। नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।

बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?

नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।

बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?

नारद- शनिदेव की महादशा।

इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।

नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।

ब्रह्मा जी से वरदान मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।

शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।

अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वरदान मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।

सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है

01/01/2026
25/12/2025

25 December तुलसी पूजन दिवस इस्कॉन रोहिणी द्वारा हरि नाम संकीर्तन का आयोजन

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