02/09/2026
*जय भिक्षु जय महाश्रमण*
*ॐ अ. भी. रा. शि. को. नम:*
*तेरापंथ धर्मसंघ के नवमाचार्य*
*"श्री तुलसीगणी "*
*जीवन परिचय*
*दिनांक 02 सितम्बर 2026 , बुधवार*
*श्रृंखला ( आचार्य श्री तुलसीगणी -960 )*
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*फाल्गुन कृष्णा दूसरी द्वितीया (1 फरवरी) का मध्याह्न । गोठी जी की हवेली के हाॅल में साधु- साध्वियों की विशेष गोष्ठी का समायोजन । श्रावक- श्राविकाओं के प्रवेश पर पूर्ण पाबन्दी । मेरे आसपास मंत्री मुनि और मुनि चम्पालाल जी की अवस्थिति । सामने एक और साधु , दूसरी ओर साध्वियां । सबकी आकृतियों पर गंभीरता और उत्सुकता । एक भव्य और सुन्दर सीन । मैंने पूज्य गुरुदेव कालूगणी की स्तुति में लिखे गए गीत- जय कालू गुरुदेव का संगान कर गोष्ठी का प्रारम्भ किया । विगत नौ दिनों से चर्चित बोलों के सन्दर्भ में अपना निर्णायक वक्तव्य दिया, जो इस प्रकार है- 'साधु- साध्वियों ! आज मैं अपने जीवन के अड़तीस वर्षों की मधुर स्मृतियों से ओतप्रोत हो रहा हूं । इस जीवन के प्रथम ग्यारह वर्ष गृहस्थ अवस्था में बीते । उसके बाद ग्यारह वर्षों का समय पूज्य गुरुदेव की मंगलमय सन्निधि में व्यतीत हुआ । वह समय गुरु की असाधारण कृपा पाने का समय था । अध्ययन- अध्यापन का समय था । पूर्ण निश्चिन्तता का समय था । सुख और शान्ति का समय था । उसे मैं कभी स्मृतियों से ओझल नहीं कर पाता । कितना सुखद था वह समय ! रत्नाधिक साधुओं का मेरे प्रति कितना वात्सल्य था । वे मुझे कितनी प्रियता से शिक्षा देते थे ! छोटे साधु कितना विनम्र व्यवहार रखते थे ! मेरे साथी व सहपाठी साधु मुझे बहुत ऊंची दृष्टि से देखते थे । उस समय भी हम कभी-कभी धर्मसंघ के भविष्य के बारे में चिन्तन किया करते थे । गुरुदेव की मुझ पर जो कृपा थी, मैं उसे शब्दों में अभिव्यक्ति नहीं दे सकता । मैं जानता हूं कि वह कृपा नैसर्गिक थी, संस्कारजनित थी । मैंने कालूयशोविलास में इस विषय का एक पद्य लिखा है-*
*हो गुरु गुणगेहरा ! मैं मिहनदातार जो,*
*पल-पल छिन-छिन आजीवन गुरुवर ! रह्यो रे लोय ।*
*हो म्हारा शिरसेहरा ! आप जिसा दिलदार जो,*
*पामर नै अजरामर पद दे निर्वह्यो रे लोय ।।*
*बाईस वर्ष की अवस्था में पूज्य गुरुदेव ने धर्मसंघ का भार मुझे सौंप दिया । उस समय मुझे साधु- साध्वियों का पूरा सहयोग मिला । मंत्री मुनि के सक्रिय सहयोग को तो मैं कभी भूल ही नहीं सकता । मेरे शासनकाल के प्रारम्भिक कुछ वर्षों का समय शैक्षणिक विकास का समय था । उसमें कोई उतार- चढ़ाव नहीं आया । पर समय की गति सदा एक समान नहीं रहती । बीच में कुछ ऐसे प्रसंग भी आए, जिनको संभालने में मुझे बहुत सन्तुलित रहना पड़ा । विगत चार वर्षों का समय एक दृष्टि से उत्क्रान्ति का समय रहा । इस अवधि में एक लम्बी यात्रा हुई । यात्रा में अनेक प्रकार के अनुभव हुए । नए लोगों से उत्साहवर्धक सम्पर्क और अन्तरंग उथल-पुथल के कारण मानसिक द्वन्द्व की स्थिति बनी । इस समय की तुलना जयाचार्य के युग से की जा सकती है । उस समय संघ में एक क्रान्ति घटित हुई थी । साधु- संघ में तीव्र ऊहापोह हुआ था । चर्चाएं हुई थीं । उस परिस्थिति को जयाचार्य ने जिस ढंग से संभाला, मुझे भी कुछ-कुछ वैसा ही करना पड़ रहा है । मैं मानता हूं कि मैंने जो भी किया है, वह सिद्धान्त, मर्यादा और परम्परा के प्रतिकूल नहीं किया, फिर भी कुछ लोगों के मन संदिग्ध हो गए । सन्देह की स्थिति में उन्होंने जो काम किया, उसे मैं अक्षम्य मानता हूं ।*
*" ॐ अर्हम् "*
*तेरापंथ धर्मसंघ के नवमाचार्य "श्री तुलसीगणी" के जीवन परिचय की विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहिये जीवन परिचय की क्रमबद्ध श्रंखला.........."नवमाचार्य श्री तुलसीगणी"*
*क्रमश:------*
*👉🏻 "शासन समुद्र" एवं "मेरा जीवन : मेरा दर्शन" पुस्तक से साभार🙏🙏*
*लिखने में किसी भी प्रकार की त्रुटि रही हो तो मिच्छा मि दुक्कडं🙏🏻🙏🏻*
*🙏🏻प्रस्तुति: "जैन स्मारक" चूरू*