06/06/2022
'सामूहिकता' से हमारा अर्थ उस पवित्र आत्माओं के समूह से है जो आपस में एक-दूसरे को जानते हैं। इनका साथ एक जन्म का नहीं है, जन्मों-जन्मों का है। ये केवल शरीर से एकत्र नहीं हुए हैं, इनकी आत्माएँ भी जुड़ी हुई हैं, इनका समर्पण भी एक है, इनका परमात्मा का माध्यम भी एक है। ये वे छोटी-छोटी नदियाँ हैं जो एक ही बड़ी नदी में समाहित हो गई हैं। अब ये छोटी नदियाँ नहीं रहीं, बड़ी नदी का रूप ले चुकी हैं। इनके शरीर अलग-अलग हो सकते हैं, इनकी आत्मा एकरूप है। इन सबमें एक आत्मीय संबंध है। ये मोती नहीं हैं, मोतियों की माला हैं। इनके बीच सद्गुरुरूपी अदृश्य धागा है जो इन सभी आत्माओं को बाँधे हुए है।