25/08/2025
वर्तमान समय में पूज्यपाद जगद्गुरु जी के एक साक्षात्कार को लेकर जो विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह नहीं किया जाना चाहिए था ।
पूज्य गुरुदेव ने स्पष्ट रूप से यह कह दिया है कि श्री प्रेमानंद जी से उन्हें किसी प्रकार की ईर्ष्या नहीं है । वे एक अच्छे नामजापक संत हैं , और भगवन्नाम जपने वाला हरेक व्यक्ति गुरुदेव की दृष्टि में सम्मान के योग्य होता है । अपने प्रवचनों में गुरुदेव बार - बार यह बात कहते हैं कि जो राम - कृष्ण को भजता है , वह चाहे जिस धर्म , वर्ण , अवस्था अथवा लिंग का हो , वह आदर के योग्य है । हम सालबेग को अपना मानते हैं , तो श्री प्रेमानंद महाराज जैसे नामजापक संत को पराया कैसे मान सकते हैं ! साक्षात्कार में पूज्य जगद्गुरु जी ने स्पष्ट कहा है कि अवस्था और धार्मिक व्यवस्था दोनों प्रकार से श्री प्रेमानंद जी उनके पुत्र के समान हैं । विचार कीजिए - पिता के मुँह से निकला वाक्य सद्यः कठोर प्रतीत होने पर भी उसके हृदय का भाव पुत्र के लिए कल्याणकारी ही होता है । जगद्गुरु सबके गुरु होते हैं , सारी प्रजा उनके लिए पुत्र के समान होती है । अतः , जिसप्रकार एक पिता अपनी संतान का अहित नहीं चाहता, उसीप्रकार किसी भी सनातनी का अहित पूज्य जगद्गुरु जी नहीं चाहते ।
आचार्य चाणक्य के अनुसार -
लालनाद् बहवो दोषास्ताडनाद् बहवो गुणाः ।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत् ॥
संतति और शिष्यों को वाणी के द्वारा निरंतर सचेत करते रहना चाहिए ।
सचिव बैद गुरु तीनि जो प्रिय बोलहिं भय आस।
राज, धर्म, तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।
गुरु शिष्य को प्रसन्न करने के लिए मीठा - मीठा बोलने लग जाए तो धर्म का नाश होना अवश्यंभावी है ।
अतः , अपनी वाणी के माध्यम से गुरुदेव समय - समय पर जनमानस को सचेत करते रहते हैं ।
सेवा , शिक्षा और संस्कार के माध्यम से गुरुदेव सनातनियों के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं । तुलसी पीठ में पधारने वाले हरेक संत की सेवा भोजन , आवास, वस्त्रादि के माध्यम से की जाती है ।
विद्यालय , विश्वविद्यालय, अपने ग्रंथों और प्रवचनों के माध्यम से गुरुदेव शिक्षा का प्रचार - प्रसार करते हैं ।
तथा , वैदिक मर्यादा का पालन करके तथा करवाके गुरुदेव संस्कारों का बीजारोपण जनसामान्य के अंतःकरण में करते रहते हैं ।
आज के समय में शास्त्रीय चिंतन का ह्रास होता देख गुरुदेव अत्यंत चिंतित होते हैं । वे वर्षों से बार - बार कहते आ रहे हैं कि मैं चमत्कार में नहीं बल्कि पुरुषार्थ पर विश्वास करता हूँ । इतनी अवस्था होने पर भी आज गुरुदेव की दिनचर्या का अधिकांश समय पढ़ने और पढ़ाने में व्यतीत होता है । धर्मशास्त्रों के अध्ययन में जनता की रुचि कैसे उत्पन्न हो , इसके लिए गुरुदेव सदा प्रयत्नशील रहते हैं । अतः , जो लोग इसे ईर्ष्या का नाम दे रहे हैं, उन्हें पुनः विचार करने की आवश्यकता है ।
मीडिया अपने लाभ के लिए निःस्वार्थ संतों को भी अपने स्वार्थसिद्धि का माध्यम बना लेती है । उनकी बातों को तोड़ - मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता है ताकि संतों पर लोगों की श्रद्धा समाप्त हो जाए और उनकी टीआरपी बढ़ती रहे । अतः , सचेत होने की आवश्यकता है । राम मंदिर के लिए गवाही देने की बात हो अथवा 200 से अधिक ग्रंथ लिखकर धर्म की महत्तम सेवा करने की बात , पूज्य गुरुदेव हरेक प्रकार से सनातनियों के लिए उपकारी ही सिद्ध हुए हैं । अतः , ऐसे महापुरुष के लिए ईर्ष्यालु , अहंकारी जैसे आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करना क्या उचित है ! घर के बड़े - बुजुर्ग कटु वाक्य कह भी दें , तो क्या बदले में उन्हें भी कटु वाक्य ही कहकर बदला लेना चाहिए ! सोचिएगा अवश्य ।