Dharmik Bhakti Kathayein - धार्मिक भक्ति कथाएं

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Dharmik Bhakti Kathayein - धार्मिक भक्ति कथाएं श्री भक्ति ग्रुप मंदिर (छिन्दवाड़ा) मध्यप्रदेश की अनुपम प्रस्तुति "धार्मिक भक्ति कथाएं"

आप सभी भक्तों का "धार्मिक भक्ति कथाएं" ऑफिशियल धार्मिक फेसबुक पेज पर हार्दिक अभिनन्दन है। यहां आप सभी भक्तों को शास्त्रों एवं पुराणों पर आधारित सचित्र धार्मिक भक्ति कहानियां पठन हेतु प्राप्त होंगी।

श्री सूर्य-कवच ( आरोग्य एवम् विजय प्राप्त्यर्थ ) 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰अथ् विनियोग :-ॐ अस्य श्री सूर्य-कवचस्य ब्रह्मा ऋषि: , अनु...
15/08/2021

श्री सूर्य-कवच ( आरोग्य एवम् विजय प्राप्त्यर्थ )
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अथ् विनियोग :-

ॐ अस्य श्री सूर्य-कवचस्य ब्रह्मा ऋषि: , अनुष्टप् छन्दः , श्री सूर्यो देवता: । आरोग्य च विजय प्राप्त्यर्थं , अहम् , पुत्रो श्री , पौत्रो श्री ,गोत्रे जन्मौ , श्रीसूर्य-कवच-पाठे विनियोगः।

अर्थ एवं विधान :

(अपने शुद्ध दाएँ हाथ में आचमनी में जल भरकर लें , बाएँ हाथ से दायीं भुजा को स्पर्श करते हुए निम्न प्रकार से विनियोग करें )

"इस श्री सूर्य कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है एवं श्री सूर्य देवता हैं । आरोग्य एवम् विजय की प्राप्ति हेतु मैं - पुत्र श्री - पौत्र श्री --गोत्र में जन्मा हुआ~ श्री सूर्य -कवच के पाठ के निमित्त स्वयं को नियोजित करता हूँ "

ऐसा कहकर आचमनी के जल को~ हाथ को सीधा अर्थात् ऊपर की ओर रखते हुए ही~तीन बार थोड़ा-थोड़ा करके पृथ्वी पर छोड़ दें । उसके बाद निम्नलिखित श्री सूर्य कवच का अपने अभीष्ट अंगों को स्पर्श करते हुए जाप करें ।)

अथ् श्री सूर्य-कवचं :

(१) प्रणवो मे शिरं पातु , घृणि: मे पातु भालकं ।।
सूर्योsव्यान नयनद्वन्दम् , आदित्य कर्णयुग्मकं ।।

अर्थ :
मैं प्रणव को अपने शिर , घृणि को मस्तक , अव्यय सूर्य को दोनों नेत्रों एवम् आदित्य को दोनों कानों में धारण (प्रतिष्ठित) करता हूँ ।

(२) ह्रीं बीजम् मे मुखम् पातु , हृदयम् भुवनेश्वरी ।।
चंद्रबिम्बं विंशदाद्यम् पातु मे गुह्यदेशकम् ।।
शीर्षादि पादपर्यन्तम् सदा पातु वैवस्वतमनुत्तमः।।

अर्थ :
मेरे मुख में ह्रीं बीज , हृदय में भुवनेश्वरी , कँ खँ गँ घँ चँ छँ जँ झँ टँ ठँ डँ ढँ तँ थँ दँ धँ पँ फँ बँ भँ आदि मेरे गुह्यदेश में ~ और शिर से पैरों तक मनुश्रेष्ठ श्री वैवस्वत जी सदैव विराजमान रहें ।

विशेष :

शुद्ध सूती अथवा ऊनी आसन पर पूर्वाभिमुख होकर ~प्रातःकाल इस कवच का प्रतिदिन कम से कम एक बार जाप अवश्य करना चाहिए ।

।।ॐ नमामिःश्रीकृष्णादित्त्याय,परात्परब्रह्मणे च सद्गुरुदेवाय।।
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🙏🌺🙏 सौजन्य: Dharmik Bhakti Kathayein - धार्मिक भक्ति कथाएं By श्री भक्ति ग्रुप मंदिर 🙏🌺🙏
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(((( रूप अमृत के दर्शन ))))एक बार श्यामसुंदर सुंदर श्रृंगार करके, सुन्दर पीताम्बर पहनकर, रंगीन धातुओ से भांति-भांति के श...
15/08/2021

(((( रूप अमृत के दर्शन ))))
एक बार श्यामसुंदर सुंदर श्रृंगार करके, सुन्दर पीताम्बर पहनकर, रंगीन धातुओ से भांति-भांति के श्रीअंग पर आकृतियाँ बनाकर, खूब सजधज कर निकुज में गए।
तभी एक “किंकरी सखी” उस निकुंज में विराजमान थी...
राधा रानी जी की सेवा में अनेक प्रकार की सखियाँ है “किंकरी”, “मंजरी”, और “सहचरी” ये सब सखियों के यूथ है.
तो जैसे ही कृष्ण ने उस गोपी को देखा तो उसके पास आये...
भगवान का अभिप्राय यही था कि मैंने इतना सुन्दर श्रृंगार किया, गोपी मेरे इस रूप को देखे.
जैसे ही पास गए तो गोपी श्री कृष्ण को देखकर एक हाथ का घूँघट निकाल लेती है, और कहती है...
खबरदार! श्यामसुंदर! जो मेरे पास आये मेरे धर्म को भ्रष्ट मत करो.
भगवान को बड़ा आश्चर्य हुआ, बोले...
गोपी! ये तुम क्या कह रही हो? सभी धर्मो का, कर्मो का, फल, सार मेरा दर्शन है...
योगी यति हजारों वर्ष तप, ध्यान करते है, फिर भी मै उनको दर्शन तो क्या, ध्यान में भी नहीं आता...
और मै तुम्हे स्वयं चलकर दर्शन कराने आ गया, तो तुम कहती हो कि मेरा धर्म भ्रष्ट हो?
गोपी बोली.. देखो श्यामसुंदर! तुम हमारे आराध्य नहीं हो, हमारी आराध्या राधारानी जी हैं...
और जब तक किसी भी चीज का भोग उन्हें नहीं लगता तब तक वह वस्तु हम स्वीकार नहीं कर सकते, क्योकि हम “अमनिया” नहीं खाते...
इसलिए पहले आप राधारानी के पास जाओ, जब वे आपके इस रूपामृत का पान कर लेगी...
तब आप प्रसाद स्वरुप हो जायेगे, तब हम आपके रूप अमृत के दर्शन के अधिकारी हो जायेगे.
अभी राधा रानी जी ने आपके रूप के दर्शन किये नहीं, फिर हम कैसे कर सकते है.
सेवक तो प्रसाद ही पाता है.

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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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मृत्यु और मुक्ति क्या है?●   स्वार्थ परायण कर्मो छोड देने का नाम है कर्म बंधन से मुक्ति,,,●  स्वार्थ कर्म छोडकर, परमार्थ...
15/08/2021

मृत्यु और मुक्ति क्या है?

● स्वार्थ परायण कर्मो छोड देने का नाम है कर्म बंधन से मुक्ति,,,

● स्वार्थ कर्म छोडकर, परमार्थ कर्म करना ही है, कर्म बंधन से मुक्ति,,,

● शरीर के साथ जीवात्मा का संबंध छूटने का नाम है जीवात्मा की मुक्ति

● जीवात्मा की शरीर बंधन से मुक्ति को मृत्यु कहते है,,,

● मृत्यु के बाद जीवात्मा की गति उस ने किए कर्म अनुसार होती है,,, वो जीवात्मा ही जानता है,,,

गरुड़पुराण के अनुसार मृत्यु के आठ प्रहर तक जीवात्मा अपना जीवन मे किए हुए कर्मो देखता है, फिर ग्यारह दिन तक सूक्ष्म अद्रश्य शरीर मृत्यु स्थान पर रहता है, ( लोगो का एक शक यह है कि जहाँ मरता है वहाँ आत्मा रहती है तो मरनेवाले की उत्तरक्रिया का विधि विधान घर पर क्युँ ???

तो विधि विधान मे मंत्रो के द्वारा आत्मा को बुलाया जाता है, इस लिए मरे कहीं पर भी मगर विधि विधान घर पर कराया जाता है और परिवार भी पिंडदान विधि मे सामिल होने से उस के ऋण से मुक्त होते है )

मृत्यु के बारहवा दिन की विधि विधान के बाद उन की गति किस योनि मे हुई वो जानने के लिए, एक बडी थाली मे आटा रखकर, उस के उपर जालीदार ढक्कन लगाकर, एकांत मे रातभर रख देते है, तो सुबह वो थाली मे देखने से दो पगा, चो पगा जानवर पगला ( पैरो के निशान ) देखने मिलेगा,,, उसे देखकर माना जाते है कि वो किस योनि मे गया,,,

ज्योतिष के अनुसार भी जान सकते है, मृत्यु का समय पक्का होना चाहिए,,, ( ज्योतिष मे सच्चाई तभी होती है, जब किसी भी घटना का समय, तिथि, स्थल निश्चित हो,,, नाम राशि एक आश्वसन है,,, )

● मृत्युपानेवाले को लोकबोली मे स्वर्गवासी कहते है,,, मगर जीवात्मा का कर्म अनुसार ही गति होती है, तब कोई गेरंटी नही की मरनेवाला सवर्गवासी ही हो गया,,,, ( लगता है कि कुछ कर्महीन लोगो का जीवन को ही लोग नर्क समजते होंगे,,, तभी स्वर्गवासी हो गया ऐसा कहते होंगे,,, ह ह ह ह ह ह )

● कोई अंतेवासी हो गए कहते है,,,

● कोई शांत हो गए कहते है,,,

● कोई धार्मिकता का महत्व जोडकर, मृत्यु पानेवाले के लिए अलग अलग शब्द जोडते है,,,
िष्णु_उपासक_पंथ मे,,,

▪ संत का मृत्यु होने पर गौ लोकवासी हो गए कहते है अथवा वैकुंठवासी हो गए कहते है,,,
िव_उपासक_पंथ मे,,,

▪ साधु-संत मृत्यु होने पर शिवलोकवासी हो गये कहते है अथवा कैलाशवासी हो गए कहते है,,,

▪ योगी तपस्वी साधु का मृत्यु होने पर
ब्रह्मनिष्ठ हो गए कहते है,,,

▪ मगर कोई योगेश्वर साधु अखंड तपस्या करने जीन्दा समाधि लेता है तो उसे ब्रह्मलिन कहते है ।

यह पृथ्वि को शास्त्रो मे मृत्यु लोक कहा है,,, यह मृत्युलोक जीवात्मा की कर्म भूमि है,,, जन्म और मृत्यु के बीच मे रहा जीवन जीवात्मा का कर्मकाल है, अपने कर्मकाल मे चेतन-जागृत होकर कर्म करे, तो अपने कर्मो से जीवात्मा मुक्ति, बंधन या काल पर विजय पाकर सकता है, अरे ! अजर अमर भी हो सकता है ।

भारत भूमि मे अजर अमर साधु संतो की कई जगह जीन्दा समाधि है ।

अपने प्राणो पर विजय पानेवाला ही अजर अमर हो सकता है, प्राण को आत्मा कहा गया है, तो प्राण को वायु भी कहा गया है । श्वास लेते है,,, वो वायु प्राण वायु है, श्वास छोडते है, वो वायु अपान ( अभोग्य ) वायु कहते है,,, योग सिध्ध महा पुरूष प्राणवायु को अपने योग से स्थिर कर देते है उर युगो तक जीवित रहते है । अपनी योग माया से सुक्ष्म शरीर से मायावी दुसरा स्वरूप से लोगो को दर्शन भी देते है । यह रहस्यमय होनेसे आप चमत्कार कहोगे,,, आत्मबल से यह होत है ।

योग्य गुरू से शीखकर यह क्रिया आप भी शीख सकते है,,, ( यहाँ यह कार्य के लिए सरकारी पेन्सन लेनेवाला और विध्यार्थी को गोखणपट्टी का टेन्सन देनेवाला शिक्षक नही चलता है, क्योकि शिक्षक शरीर को सुख दे सकता है, जब गुरू आत्मा को शांति देता है )

जीवात्मा का उध्धार के लिए सत्य सनातन धर्म के धर्मशास्त्रो मे कई मार्ग बताए है । मगर कर्महीन मनुष्य धर्म मे भी सरलता ढुँढता है, तभी तो कर्महीन लोगो की यहाँ कोई कमी भी नही है, ऐसा कर्महीन लोगो का जीवन ही नर्क समान होता है, तब ऐसा कर्महीन व्यक्ति का मृत्यु को कोई स्वर्गवासी कह भी दे तो कौन बुरा मानेगा,,,,,,,,,,,,ह ह ह ह ह ह,,,,,,,,,,

मृत्यु के बाद की गति को ( सामन्य मनुष्य ) कोई नही जानता है, सिर्फ सिर्फ मरनेवाला जीवात्मा ही जानता है,,, स्वार्थ परायण जीव स्वर्ग कैसे पा सकता है ???

स्वर्ग तो परमार्थ करनेवाले देवता पुरूषो के लिए होता है,,, परमार्थ करनेवाला जीव मृत्युलोक मे पूजनिय होता है, जो यहा पूजा जाता है, वहाँ भी पूजा जाता है, पूजाजानेवाला जीव देवता होता है, जिस का स्वर्ग मे स्वागत होता है ।

घर परिवार के लिए जीनेवाला, घर परिवार मे पूजा जाएगा, समाज के लिए जीनेवाला, समाज मे पूजा जाएगा, क्योकि वो सिर्फ घर परिवार के लिए या समाज के लिए जीया है,,, सूक्ष्म रूप से वो एक स्वार्थ पराणय जीवन है,,, क्योकि वो सब के लिए नही, समग्र के लिए नही, सभी के लिए नही जीया है,,, राजा और महाराजा सब के लिए, सभी के लिए, समग्र के लिए जीते है, तभी वो पूजनिय है ।

( महाराजा का अर्थ साधु- ब्राह्मण करना क्योकि धर्म की दिक्षा और शिक्षा लेकर वो धर्म-कर्म जाननेवाला होता है, राजा सदैव राजगुरू और राजगोर का सन्मान करता था,,, इन्ही महाराजाओ की आज्ञा सदैव मानता था )

नारी सदैव पूजनिय माना जाए क्योकि अपने माँ-बाप का घर परिवार का त्याग कर के दूसरो के लिए, परोपकार के लिए छोडकर जीवन व्यतित करती है, उन के स्वार्थ मे भी आंशिक परमार्थ है, त्यागी और परमार्थी होने के बाद भी उन का जीवन घर परिवार तक ही सीमित होता है । तब वो भी बंधन युक्त है ।

भारत भूमि चेतना की भूमि है, क्योकि यह भूमि मे अनेको जीन्दा समाधि है,,, इस भूमि को पवित्र रखना हमारा धर्म है,,,

पुराणो मे पढो,,, तो राक्षस खुन और हड्डिया जहाँ तहाँ फेककर देवताओ का कर्म नष्ट करते थे, आज भी ऐसा ही अपना धर्म नष्ट करने का प्रयास हो रहा है,,,

आज भी देव गुरू बृहस्पति द्वारा बताया हुआ दक्षिण मार्ग अहिंसक और पवित्रता का है, तो दूसरी तरफ दानव गुरू शुक्राचार्य द्वारा बताया हुआ वाममार्ग हिंसक और निंदनिय है । दौनो मार्ग धर्म का माने लैकिन अपना कुलधर्म को भूलकर नही,,,

भगवान श्री कृष्णने भी कहा है कि कैसा भी हो, मगर अपने कुल धर्म को हमे नही भूलना चाहिए,,, क्षत्रिय को क्षत्रिय का धर्म नही भूलना चाहिए,,, ब्राह्मण को, ब्राह्मणो का धर्म नही भूलना चाहिए,,, वैश्य को वैश्य का धर्म नही भूलना चाहिए,,, शुद्र को शुद्र का धर्म नही भूलना चाहिए,,,

वाल्मिक ऋषि के वंश को आज भंगी समाज से जानते है, वो जीते जी भी किसी के शरीर मे प्रवेश करने की विद्या आज भी कोई कोई जानते है, नीति नियम पालनेवाला भंगी किसी के आंगन मे, घर मे भोजन नही पाएगा,,, यह बात क्या बताती है,,, यही की वो अपने कुलधर्म के कर्म को वफादार है,,,

भगवान श्री कुष्ण सरल रूप मे मृत्यु और पुनर्जन्म के बारे मे समझाते है, कि जो जिस को भजता है,वो उसी को पाता है और मृत्यु समये जो जिस का ध्यान धरता है, वो उसी को पाता है,,, मंदिर मे नित्य जाने का नियम इसलिए था, ताकी देवता के गुणो को गुरू मानकर हम हमारा धर्म भूल ना जाए,,, तभी तो मै बार बार यही सीखाता हुँ, कि जो मरना सीख गए, वो जीना सीख गए,,,

हरि ॐ तत् सत्
धर्म रक्षति रक्षितः
सनातनम् जयति शासनम्।

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क्यों श्री ठाकुर जी पुए खाने के लिए आधी रात को अधीर हो उठे......????भोर मंगल आरती होने से पहले असमय, भोग का समय नहीं है।...
15/08/2021

क्यों श्री ठाकुर जी पुए खाने के लिए आधी रात को अधीर हो उठे......????भोर मंगल आरती होने से पहले असमय, भोग का समय नहीं है। असमय श्री ठाकुर जी को भोग लगाकर संतुष्ट किया।

भोर मंगल आरती होने से पहले असमय, भोग का समय नहीं है। असमय श्री ठाकुर जी को भोग लगाकर संतुष्ट किया।
दो सूरदास हुए एक तो सूरदास जी श्रीनाथ जी के परम भक्त और एक हुए सूरदास मदन मोहन। बादशाह अकबर के सूबेदार थे। उत्तर प्रदेश में एक स्थान संडिला, वहाँ के सूबेदार मदनमोहन। सूरध्वज वैसे उनका नाम था। भक्त लोग उनको प्यार से सूरदास कहते थे। मदन मोहन जी के परम भक्त। बादशाह के दीवान लेकिन परम भक्त। श्री ठाकुर जी के रूप माधुरी की अनन्य मधुकर।

सतत् श्वास-श्वास से युगल का नाम जपते और बादशाह की नौकरी करते थे। एक बार संडिला के बाजार में गुड़ देखा। अब गुड़ देखते ही मन में आया कि इसका तो श्री ठाकुर जी को भोग लगना चाहिए। अब वृंदावन का जो ठाकुर है ना, वो राग और भोग का ठाकुर है। उसको रिझाने की विधि क्या है?

सुन्दर-सुन्दर भोग और सुन्दर-सुन्दर राग इसी से रीझते हैं। जैसे ही सुन्दर सा वो बड़ा नवीन गुड़ देखा, गुड़ देखते ही सूरदास जी के मन में आया कि ये तो श्री ठाकुर जी की सेवा में उपस्थित हो जाए। कोई मिष्ठान बने, कोई पकवान बने। ठाकुर जी को पाकर कितना सुख होगा। गुड़ बैलगाड़ियों पर लदवाकर वृंदावन भेजने लगे।

किसी ने कहा, जितने दिन में ये गुड़ वृंदावन पहुँचेगा और जितना धन आप इस गुड़ को वृंदावन पहुँचाने में खर्च करेंगे, उतने में तो वृंदावन में ही इससे 20 गुना अधिक गुड़ खरीद लिया जाएगा। इतना समय लगेगा। इतना धन आप व्यय करेंगे। इससे 20 गुना अधिक गुड़ खरीदा जा सकता है उस धन से, वहीं वृंदावन से।

सूरध्वज जी ने कहा, तुम ये बात नहीं समझोगे। एक बार रात के अंधेरे में एक व्यक्ति रेवड़ी खाता डोल रहा था। रेवड़ी छिटक कर हाथ से गिर पड़ी। अंधेरा, बेचारा गया, बत्ती ली, एक दीपक लिया, थोड़ा तेल खरीदा, फिर दीपक जलाया और बेचारा गली में वो रेवड़ी ढूंढ रहा है। किसी ने कहा कि बड़ा मूर्ख है।

इतना परिश्रम करता है। जितना रूपया ये दीपक, बात्ती, ये तेल इसे लाने में व्यय किया, इतना परिश्रम किया, उतने में तो वैसी 20 रेवड़ी और आ जाती तो कहने लगा तुम नहीं समझोगे। बोले ऐसी क्या खास बात थी उस रेवड़ी में? वो रेवड़ी मेरी प्रेमिका ने दी थी। तू क्या जाने उस रेवड़ी का स्वाद कैसा है? वो रेवड़ी मेरी प्रेमिका ने दी थी, उसका स्वाद ही कुछ और था इसीलिए उसे खोजने के लिए इतना परिश्रम कर रहा हूँ।

"गुलाम फरीद जहाँ नैन लगे फिर क्या गोरी और क्या काली"

प्रेमी की दुनिया अलग होती है और फिर ये प्रेम का पथ है। भगवद् रसिक, रसिक की बातें, रसिक बना कोई समझ सके ना। सूरध्वज जी ने कहा कि, तुम नहीं समझोगे कि इस गुड़ की महिमा क्या है? ये तो केवल रसिक शेखर श्याम सुन्दर जानते हैं। उसी समय बैल गाड़ियों में भरवाकर गुड़ भिजवाया। 20 दिन में वो गुड़ वहाँ संडिला से वृंदावन पहुँचा और जब वृंदावन पहुंचा तो श्री ठाकुर जी की शयन आरती हो चुकी थी। श्री ठाकुर जी का शयन हो चुका था।

श्री ठाकुर जी ने मन में विचार किया भाई सुबह तक तो हमसे प्रतीक्षा होगी नहीं। गुड़ पहुँचा है तो भोग अभी लगना चाहिए। क्या किया जाए? शयन हो चुका, ठाकुर को पौढ़ा दिया गया था शैय्या पर और यदि ये गुड़ पुजारी के हाथ लग गया तो वो तो इसे भण्डार में धरवा देगा। वो क्या जाने इस गुड़ की महिमा क्या है? उसके लिए तो क्या आया है? गुड़ आया है और ऐसा गुड़ भण्डार में पहले रखा है।

वो विचार करेगा जो वस्तु पहले रखी है, पहले भोग में उसे खर्च करना चाहिए। इसे बाद में खर्च करेंगे। श्री ठाकुर जी ने स्वप्न में पुजारी को आदेश दिया। सुनो अभी सूरध्वज के यहाँ से गुड़ आया है, पुआ बनाओ और हमें भोग लगाओ। पुजारी ने कहा कि आपकी सज्जा के पास इतना भोग रखा है। जाड़े के दिन अब आधी रात को किस प्रकार मैं रसोइये को बुलाऊँ, फिर पुआ बनवाऊँ और आपको भोग लगाऊँ।

यदि आपको पुआ पाने की इच्छा ही है तो सुबह तक प्रतीक्षा कर लीजिए। ठाकुर जी ने पुजारी से कहा तू बड़ा मूर्ख है। तुझे दिखाई नहीं पड़ता इस गुड़ की राह देखते-देखते मेरी आँखे सूज गई 20 दिन से मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ कि कब गुड़ आए और मैं भोग लगाऊँ और तू मुझे प्रतीक्षा करने के लिए कहता है।

मनमोहन की मनभावन वाणी सुनकर पुजारी का हृदय विचलित हो गया। दौड़कर गया, स्नान किया, रसोई में जाकर सब व्यवस्था कराई और भोर मंगल आरती होने से पहले असमय, भोग का समय नहीं है। असमय श्री ठाकुर जी को भोग लगाकर संतुष्ट किया।
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गोस्वामी तुलसीदास जयंती पर विशेष〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️जीवन परिचय〰️〰️〰️〰️〰️गोस्वामी तुलसीदास जी हिन्दी साहित्य के महान सन्त ...
15/08/2021

गोस्वामी तुलसीदास जयंती पर विशेष
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जीवन परिचय
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गोस्वामी तुलसीदास जी हिन्दी साहित्य के महान सन्त कवि थे, जिन्हें आदि काव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है। इनका जन्म स्थान विवादित है। वहीं हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को अधिकतर लोग तुलसीदास जी का जन्म उत्सव मनाते हैं।
ऐसे में इस वर्ष भी तुलसीदास जयंती रविवार, 15 अगस्त 2021 को मनाई जाएगी। इस बार इस दिन स्वतंत्रता दिवस होने के साथ ही सुबह 09:51 बजे तक ही सप्तमी रहने के चलते इसके बाद अष्टमी (मासिक दुर्गाष्टमी) लग जाएगी।

तुलसीदासजी का जन्म संवत 1589 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान बाँदा ज़िला) के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्याधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली की फटकार "लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ" सुननी पड़ी जिससे इनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनके गुरु बाबा नरहरिदास थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या में बीता।

तुलसीदास जी
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तुलसी का बचपन बड़े कष्टों में बीता। माता-पिता दोनों चल बसे और इन्हें भीख मांगकर अपना पेट पालना पड़ा था। इसी बीच इनका परिचय राम-भक्त साधुओं से हुआ और इन्हें ज्ञानार्जन का अनुपम अवसर मिल गया। पत्नी के व्यंग्यबाणों से विरक्त होने की लोकप्रचलित कथा को कोई प्रमाण नहीं मिलता। तुलसी भ्रमण करते रहे और इस प्रकार समाज की तत्कालीन स्थिति से इनका सीधा संपर्क हुआ। इसी दीर्घकालीन अनुभव और अध्ययन का परिणाम तुलसी की अमूल्य कृतियां हैं, जो उस समय के भारतीय समाज के लिए तो उन्नायक सिद्ध हुई ही, आज भी जीवन को मर्यादित करने के लिए उतनी ही उपयोगी हैं। तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 39 बताई जाती है। इनमें रामचरित मानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

शिष्य परम्परा
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गोस्वामीजी श्रीसम्प्रदाय के आचार्य रामानन्द की शिष्यपरम्परा में थे। इन्होंने समय को देखते हुए लोकभाषा में 'रामायण' लिखा। इसमें ब्याज से वर्णाश्रमधर्म, अवतारवाद, साकार उपासना, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण रक्षा, देवादि विविध योनियों का यथोचित सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का मण्डन और साथ ही उस समय के विधर्मी अत्याचारों और सामाजिक दोषों की एवं पन्थवाद की आलोचना की गयी है। गोस्वामीजी पन्थ व सम्प्रदाय चलाने के विरोधी थे। उन्होंने व्याज से भ्रातृप्रेम, स्वराज्य के सिद्धान्त , रामराज्य का आदर्श, अत्याचारों से बचने और शत्रु पर विजयी होने के उपाय; सभी राजनीतिक बातें खुले शब्दों में उस कड़ी जासूसी के जमाने में भी बतलायीं, परन्तु उन्हें राज्याश्रय प्राप्त न था। लोगों ने उनको समझा नहीं। रामचरितमानस का राजनीतिक उद्देश्य सिद्ध नहीं हो पाया। इसीलिए उन्होंने झुँझलाकर कहा:

गोस्वामी तुलसीदास
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"रामायण अनुहरत सिख, जग भई भारत रीति।
तुलसी काठहि को सुनै, कलि कुचालि पर प्रीति।"

आदर्श सन्त कवि
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उनकी यह अद्भुत पोथी इतनी लोकप्रिय है कि मूर्ख से लेकर महापण्डित तक के हाथों में आदर से स्थान पाती है। उस समय की सारी शंक्काओं का रामचरितमानस में उत्तर है। अकेले इस ग्रन्थ को लेकर यदि गोस्वामी तुलसीदास चाहते तो अपना अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली सम्प्रदाय चला सकते थे। यह एक सौभाग्य की बात है कि आज यही एक ग्रन्थ है, जो साम्प्रदायिकता की सीमाओं को लाँघकर सारे देश में व्यापक और सभी मत-मतान्तरों को पूर्णतया मान्य है। सबको एक सूत्र में ग्रंथित करने का जो काम पहले शंकराचार्य स्वामी ने किया, वही अपने युग में और उसके पीछे आज भी गोस्वामी तुलसीदास ने किया। रामचरितमानस की कथा का आरम्भ ही उन शंकाओं से होता है जो कबीरदास की साखी पर पुराने विचार वालों के मन में उठती हैं। तुलसीदासजी स्वामी रामानन्द की शिष्यपरम्परा में थे, जो रामानुजाचार्य के विशिष्टद्वैत सम्प्रदाय के अन्तर्भुक्त है। परन्तु गोस्वामीजी की प्रवृत्ति साम्प्रदायिक न थी। उनके ग्रन्थों में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का सुन्दर समन्वय पाया जाता है। इसी प्रकार वैष्णव, शैव, शाक्त आदि साम्प्रदायिक भावनाओं और पूजापद्धतियों का समन्वय भी उनकी रचनाओं में पाया जाता है। वे आदर्श समुच्चयवादी सन्त कवि थे।

प्रखर बुद्धि के स्वामी तुलसीदास जी
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श्री रामचरितमानस
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वैसे तो भगवान श्रीराम के जीवन का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है, लेकिन गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गई श्रीरामचरितमानस उन सभी ग्रंथों में अतुलनीय है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार संवत् 1633 के अगहन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को गोस्वामी तुलसीदास ने ये ग्रंथ संपूर्ण किया था।

भगवान शंकरजी की प्रेरणा से रामशैल पर रहने वाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्रीनरहर्यानन्द जी (नरहरि बाबा) ने इस बालक को ढूँढ़ निकाला और उसका नाम रामबोला रखा। उसे वे अयोध्या ले गये और वहाँ संवत्‌ 1561 माघ शुक्ल पंचमी शुक्रवार को उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कराया। बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद नरहरि स्वामी ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके रामबोला को राममन्त्र की दीक्षा दी और अयोध्या ही में रहकर उन्हें विद्याध्ययन कराने लगे। बालक रामबोला की बुद्धि बड़ी प्रखर थी। एक बार गुरुमुख से जो सुन लेते थे, उन्हें वह कंठस्थ हो जाता था। वहाँ से कुछ दिन बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों) पहुँचे। वहाँ श्री नरहरि जी ने तुलसीदास को रामचरित सुनाया। कुछ दिन बाद वह काशी चले आये। काशी में शेषसनातन जी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन किया। इधर उनकी लोकवासना कुछ जाग्रत्‌ हो उठी और अपने विद्यागुरु से आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमि को लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने देखा कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है। उन्होंने विधिपूर्वक अपने पिता आदि का श्राद्ध किया और वहीं रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे।

प्रसिद्धि
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इधर पण्डितों ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। वे दल बाँधकर तुलसीदास जी की निन्दा करने लगे और उस पुस्तक को नष्ट कर देने का प्रयत्न करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुराने के लिये दो चोर भेजे। चोरों ने जाकर देखा कि तुलसीदास जी की कुटी के आसपास दो वीर धनुषबाण लिये पहरा दे रहे हैं। वे बड़े ही सुन्दर श्याम और गौर वर्ण के थे। उनके दर्शन से चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गयी। उन्होंने उसी समय से चोरी करना छोड़ दिया और भजन में लग गये। तुलसीदास जी ने अपने लिये भगवान को कष्ट हुआ जान कुटी का सारा समान लुटा दिया, पुस्तक अपने मित्र टोडरमल के यहाँ रख दी। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी प्रति लिखी। उसी के आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की जाने लगीं। पुस्तक का प्रचार दिनों दिन बढ़ने लगा। इधर पण्डितों ने और कोई उपाय न देख श्रीमधुसूदन सरस्वती जी को उस पुस्तक को देखने की प्रेरणा की। श्रीमधुसूदन सरस्वती जी ने उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और उस पर यह सम्मति लिख दी-

आनन्दकानने ह्यास्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः।
कवितामञ्जरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥

तुलसीदास जी की मुख्य रचनाएँ
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अपने 126 वर्ष के दीर्घ जीवन-काल में तुलसीदास जी ने कुल 22 कृतियों की रचना की है जिनमें से पाँच बड़ी एवं छः मध्यम श्रेणी में आती हैं। इन्हें संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि का भी अवतार माना जाता है जो मूल आदिकाव्य रामायण के रचयिता थे।

तुलसीदास जी कृत रचना
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रामचरितमानस “रामचरित” (राम का चरित्र) तथा “मानस” (सरोवर) शब्दों के मेल से “रामचरितमानस” शब्द बना है। अतः रामचरितमानस का अर्थ है “राम के चरित्र का सरोवर”। सर्वसाधारण में यह “तुलसीकृत रामायण” के नाम से जाना जाता है तथा यह हिन्दू धर्म की महान काव्य रचना है।
दोहावली दोहावली में दोहा और सोरठा की कुल संख्या 573 है। इन दोहों में से अनेक दोहे तुलसीदास के अन्य ग्रंथों में भी मिलते हैं और उनसे लिये गये है।
कवितावली सोलहवीं शताब्दी में रची गयी कवितावली में श्री रामचन्द्र जी के इतिहास का वर्णन कवित्त, चौपाई, सवैया आदि छंदों में की गई है। रामचरितमानस के जैसे ही कवितावली में सात काण्ड हैं।
गीतावली गीतावली, जो कि सात काण्डों वाली एक और रचना है, में श्री रामचन्द्र जी की कृपालुता का वर्णन है। सम्पूर्ण पदावली राम-कथा तथा रामचरित से सम्बन्धित है। मुद्रित संग्रह में 328 पद हैं।
विनय पत्रिका विनय पत्रिका में 279 स्तुति गान हैं जिनमें से प्रथम 43 स्तुतियाँ विविध देवताओं की हैं और शेष रामचन्द्र जी की।
कृष्ण गीतावली कृष्ण गीतावली में श्रीकृष्ण जी 61 स्तुतियाँ है। कृष्ण की बाल्यावस्था और 'गोपी - उद्धव संवाद' के प्रसंग कवित्व व शैली की दृष्टि से अत्यधिक सुंदर हैं।
रामलला नहछू यह रचना सोहर छ्न्दों में है और राम के विवाह के अवसर के नहछू का वर्णन करती है। नहछू नख काटने एक रीति है, जो अवधी क्षेत्रों में विवाह और यज्ञोपवीत के पूर्व की जाती है।
वैराग्य संदीपनी यह चौपाई - दोहों में रची हुई है। दोहे और सोरठे 48 तथा चौपाई की चतुष्पदियाँ 14 हैं। इसका विषय नाम के अनुसार वैराग्योपदेश है।
रामाज्ञा प्रश्न रचना अवधी में है और तुलसीदास की प्रारम्भिक कृतियों में है। यह एक ऐसी रचना है, जो शुभाशुभ फल विचार के लिए रची गयी है किंतु यह फल-विचार तुलसीदास ने राम-कथा की सहायता से प्रस्तुत किया है।
जानकी मंगल इसमें गोस्वामी तुलसीदास जी ने आद्याशक्ति भगवती श्री जानकी जी तथा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के मंगलमय विवाहोत्सव का बहुत ही मधुर शब्दों में वर्णन किया है।
सतसई दोहों का एक संग्रह ग्रंथ है। इन दोहों में से अनेक दोहे 'दोहावली' की विभिन्न प्रतियों में तुलसीदास के अन्य ग्रंथों में भी मिलते हैं और उनसे लिये गये है।
पार्वती मंगल इसका विषय शिव - पार्वती विवाह है। 'जानकी मंगल' की भाँति यह भी सोहर और हरिगीतिका छन्दों में रची गयी है। इसमें सोहर की 148 द्विपदियाँ तथा 16 हरिगीतिकाएँ हैं। इसकी भाषा भी 'जानकी मंगल की भाँति अवधी है।
बरवै रामायण बरवै रामायण रचना के मुद्रित पाठ में स्फुट 69 बरवै हैं, जो 'कवितावली' की ही भांति सात काण्डों में विभाजित है।
हनुमान चालीसा इसमें प्रभु राम के महान् भक्त हनुमान के गुणों एवं कार्यों का चालीस (40) चौपाइयों में वर्णन है। यह अत्यन्त लघु रचना है जिसमें पवनपुत्र श्री हनुमान जी की सुन्दर स्तुति की गई है।

तुलसीदास जी का निधन
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तुलसीदास के सम्मान में जारी डाक टिकट
तुलसीदास जी जब काशी के विख्यात् घाट असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा, इसके पश्चात् उन्होंने अपनी अन्तिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया। संवत्‌ 1680 में श्रावण कृष्ण सप्तमी शनिवार को तुलसीदास जी ने "राम-राम" कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया।

तुलसीदास के निधन के संबंध में
निम्नलिखित दोहा बहुत प्रचलित है-
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संवत सोलह सौ असी ,असी गंग के तीर ।
श्रावण शुक्ला सप्तमी ,तुलसी तज्यो शरीर ।।

गोस्वामी तुलसीदास तथा श्रीरामचरितमानस के संबंंध में कुछ रोचक बातें
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1👉 गोस्वामी तुलसीदास का जन्म लेने के बाद बालक रोए नहीं बल्कि उनके मुख से राम का शब्द निकला। जन्म से ही उनके मुख में बत्तीस दांत थे। बाल्यवास्था में इनका नाम रामबोला था। काशी में शेषसनातनजी के पास रहकर तुलसीदासजी ने वेद-वेदांगों का अध्ययन किया।

2👉 संवत् 1583 में तुलसीदासजी का विवाह हुआ। वे अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे। एक बार जब उनकी पत्नी अपने मायके गईं तो पीछे-पीछे ये भी वहां पहुंच गए। पत्नी ने जब यह देखा तो उन्होंने तुलसीदासजी से कहा कि जितनी तुम्हारी मुझमें आसक्ति है, उससे आधी भी यदि भगवान में होती तो तुम्हारा कल्याण हो जाता। पत्नी की यह बात तुलसीदासजी को चुभ गई और उन्होंने गृहस्थ आश्रम त्याग दिया व साधुवेश धारण कर लिया।

3👉 एक रात जब तुलसीदासजी सो रहे थे तो उन्हें सपना आया। सपने में भगवान शंकर ने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषा में काव्य रचना करो। तुरंत ही तुलसीदासजी की नींद टूट गई और वे उठ कर बैठ गए। तभी वहां भगवान शिव और पार्वती प्रकट हुए और उन्होंने कहा- तुम अयोध्या में जाकर रहो और हिंदी में काव्य रचना करो। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान फलवती होगी। भगवान शिव की आज्ञा मानकर तुलसीदासजी अयोध्या आ गए।

4👉 संवत् 1631 को रामनवमी के दिन वैसा ही योग था जैसा त्रेतायुग में रामजन्म के समय था। उस दिन प्रात:काल तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारंभ की। दो वर्ष, सात महीने व छब्बीस दिन में ग्रंथ की समाप्ति हुई। संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाह के दिन इस ग्रंथ के सातों कांड पूर्ण हुए और भारतीय संस्कृति को श्रीरामचरितमानस के रूप में अमूल्य निधि प्राप्त हुई।

5👉 यह ग्रंथ लेकर तुलसीदासजी काशी गए। रात को तुलसीदासजी ने यह पुस्तक भगवान विश्वनाथ के मंदिर में रख दी। सुबह जब मंदिर के पट खुले तो उस पर लिखा था- सत्यं शिवं सुंदरम् और नीचे भगवान शंकर के हस्ताक्षर थे। उस समय उपस्थित लोगों ने सत्यं शिवं सुंदरम् की आवाज भी अपने कानों से सुनी।

6👉 अन्य पंडितों ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में तुलसीदासजी के प्रति ईष्र्या होने लगी। उन्होंने दो चोर श्रीरामचरितमानस को चुराने के लिए भेजे। चोर जब तुलसीदासजी की कुटिया के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि दो वीर पुरुष धनुष बाण लिए पहरा दे रहे हैं। वे बड़े ही सुंदर और गौर वर्ण के थे। उनके दर्शन से चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गई और वे भगवान भजन में लग गए।

7👉 एक बार पंडितों ने श्रीरामचरितमानस की परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने भगवान काशी विश्वनाथ के मंदिर में सामने सबसे ऊपर वेद, उनके नीचे शास्त्र, शास्त्रों के नीचे पुराण और सबसे नीचे श्रीरामचरितमानस ग्रंथ रख दिया। मंदिर बंद कर दिया गया। सुबह जब मंदिर खोला गया तो सभी ने देखा कि श्रीरामचरितमानस वेदों के ऊपर रखा हुआ है। यह देखकर पंडित लोग बहुत लज्जित हुए। उन्होंने तुलसीदासजी से क्षमा मांगी और श्रीरामचरितमानस के सर्वप्रमुख ग्रंथ माना।

8👉 इस ग्रंथ में रामलला के जीवन का जितना सुंदर वर्णन किया गया है उतना अन्य किसी ग्रंथ में पढऩे को नहीं मिलता। यही कारण है कि श्रीरामचरितमानस को सनातन धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है।

रामचरित मानस में कई ऐसी चौपाई भी तुलसीदास ने लिखी है जो विभिन्न परेशानियों के समय मनुष्य को सही रास्ता दिखाती है तथा उनका उचित निराकरण भी करती हैं।तुलसीदासजी तुलसीदासजी एक महान कवि थे। अपने जीवनकाल में तुलसीदास जी ने 12 ग्रंथ लिखे।

उन्हें संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। तुलसीदासजी को महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है। श्रीरामचरितमानस के बाद विनय पत्रिका तुलसीदासकृत एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य है।

ऐसा माना जाता है कि तुलसीदासजी ने हनुमान तथा राम-लक्ष्मण के साथ ही भगवान शिव-पार्वती के साक्षात दर्शन प्राप्त किए थे। इस संबंध में एक दोहा भी प्रचलित है-

"चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥"

भगवान श्रीराम की महिमा का वर्णन जिस प्रकार श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने किया है, वैसा वर्णन किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिलता। यही कारण है श्रीरामचरितमानस को हिंदू धर्म में बहुत ही पवित्र ग्रंथ माना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास को भी हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
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नारद का अभिमान एवं विश्वमोहिनी की कथा,,,,*नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥गिरिजा चकित भईं सुनि बानी। ना...
17/07/2021

नारद का अभिमान एवं विश्वमोहिनी की कथा,,,,

*नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥
गिरिजा चकित भईं सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानी॥

जब शिव जी ने पार्वती जी को बताया कि देवर्षि नारद ने श्री हरि (विष्णु) को शाप दिया था तो वे बड़ी चकित हुईं। और बोलीं, “नारद जी तो विष्णुभक्त और अत्यन्त ज्ञानी हैं। फिर उन्होंने भगवान को शाप किस कारण से दिया?”

शिव जी न हँस कर कहा, “इस संसार में न तो कोई ज्ञानी है और न मूर्ख। श्री रघुनाथ जी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है। मैं तुम्हें नारद जी की कथा सुनाता हूँ। हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी।
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उस गुफा के निकट ही गंगा जी बहती थीं। वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यन्त सुहावनी लगी। वहाँ पर के पर्वत, नदी और वन को देख कर उनके हृदय में लक्ष्मीकान्त विष्णु जी की भक्ति अत्यन्त बलवती हो उठी और वे वहीं बैठ कर तपस्या में लीन हो गये।

नारद मुनि की इस तपस्या से देवराज इन्द्र भयभीत हो उठे कि कहीं देवर्षि नारद अपने तप के बल से इन्द्रपुरी को अपने अधिकार में न ले लें। इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिये कामदेव को उनके पास भेज दिया।

वहाँ पहुँच कर कामदेव ने अपनी माया से वसन्त ऋतु को उत्पन्न कर दिया। वृक्षों और लताओं में रंग-बिरंगे फूल खिल गये, कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली शीतल-मन्द-सुगन्ध सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती अप्सराएँ नृत्य व गान करने लगीं।

किन्तु कामदेव की किसी भी कला का नारद मुनि पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। तब कामदेव को भय सताने लगा कि कहीं देवर्षि मुझे शाप न दे दें। हारकर वे देवर्षि के चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगे। नारद मुनि को थोड़ा भी क्रोध नहीं आया और उन्होंने कामदेव को क्षमा कर दिया। कामदेव वापस अपने लोक में चले गये।

कामदेव के चले जाने पर नारद मुनि के मन में अहंकार हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। वहाँ से वे शिव जी के पास चले गये और उन्हें अपने द्वारा कामदेव को जीतने का विवरण कह सुनाया। भगवान शिव समझ गये कि इन्हें अहंकार हो गया है। शंकर जी ने सोचा कि यदि इनके अहंकार की बात विष्णु जी जान गये तो देवर्षि का अहित ही होगा। अतः उन्होंने नारद से कहा कि तुमने जो कथा मुझे बताई है उसे श्री हरि को मत बताना।

नारद जी को शिव जी की यह बात अच्छी नहीं लगी। श्री राम की इच्छा ही बलवती होती है अतः नारद जी क्षीरसागर में पहुँच गये और शिव जी के मना करने के बाद भी सारी कथा उन्हें सुना दी। भगवान विष्णु तत्काल समझ गये कि इनके मन को अहंकार ने घेर लिया है।

अपने भक्त के अहंकार को वे सह नहीं पाते इसलिये उन्होंने अपने मन में सोचा कि मैं ऐसा उपाय करूँगा कि नारद का अहंकार भी दूर हो जाये और मेरी लीला भी चलती रहे।
नारद जी जब श्री विष्णु से विदा होकर चले तो उनका अभिमान और भी बढ़ गया।

इधर श्री हरि ने अपनी माया से नारद जी के रास्ते में सौ योजन का एक अत्यन्त सुन्दर नगर रच दिया। उस नगर में शीलनिधि अत्यन्त वैभवशाली राजा रहता था। उस राजा की विश्वमोहिनी नाम की ऐसी रूपवती कन्या थी जिसके रूप को देख कर साक्षात् लक्ष्मी भी मोहित हो जायें। विश्वमोहिनी स्वयंवर करना चाहती थी इसलिये अनगिनत राजा उस नगर में आये हुए थे।

नारद जी उस नगर के राजा के यहाँ पहुँचे तो राजा ने उनका पूजन कर के उन्हें आसन पर बैठाया। फिर उनसे अपनी कन्या की हस्तरेखा देख कर उसके गुण-दोष बताने के लिया कहा। उस कन्या के रूप को देख कर नारद मुनि वैराग्य भूल गये और उसे देखते ही रह गये।

उस कन्या की हस्तरेखा बता रही थी कि उसके साथ जो ब्याह करेगा वह अमर हो जायेगा, उसे संसार में कोई भी जीत नहीं सकेगा और संसार के समस्त चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। इन लक्षणों को नारद मुनि ने अपने तक ही सीमित रखा और राजा को उन्होंने अपनी ओर से बना कर कुछ अन्य अच्छे लक्षणों को कह दिया।

अब नारद जी ने सोचा कि कुछ ऐसा उपाय करना चाहिये कि यह कन्या मुझे ही वरे। इस मामले में जप-तप से से तो काम चलना नहीं है, जो कुछ होना है वह सुन्दर रूप से ही होना है ऐसा विचार कर के नारद जी ने श्री हरि को स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये। नारद जी ने उन्हें सारा विवरण बता कर कहा, “हे नाथ आप मुझे अपना सुन्दर रूप दे दीजिये। जिस प्रकार से भी मेरा हित हो आप शीघ्र वही कीजिये।”

भगवान हरि ने कहा, “हे नारद! हम वही करेंगे जिससे तुम्हारा परम हित होगा। तुम्हारा हित करने के लिये हम तुम्हें हरि हरि शब्द का एक अर्थ बन्दर भी होता है का रूप देते हैं।” यह कह कर प्रभु अन्तर्धान हो गये साथ ही उन्होंने नारद जी बन्दर जैसा मुँह और भयंकर शरीर दे दिया। माया के वशीभूत हुए नारद जी को इस बात का ज्ञान नहीं हुआ। वहाँ पर छिपे हुए शिव जी के दो गणों ने भी इस घटना को देख लिया।

ऋषिराज नारद तत्काल विश्वमोहिनी के स्वयंवर में पहुँच गये और साथ ही शिव जी के वे दोनों गण भी ब्राह्मण का वेश बना कर वहाँ पहुँच गये। वे दोनों गण नारद जी को सुना कर कहने लगे कि भगवान ने इन्हें इतना सुन्दर रूप दिया है कि राजकुमारी सिर्फ इन पर ही रीझेगी। उनकी बातों से नारद जी अत्यन्त प्रसन्न हुए।

स्वयं भगवान विष्णु भी उस स्वयंवर में एक राजा का रूप धारण कर आ गये। विश्वमोहिनी ने कुरूप नारद की तरफ देखा भी नहीं और राजारूपी विष्णु के गले में वरमाला डाल दी।
मोह के कारण नारद मुनि की बुद्धि नष्ट हो गई थी अतः राजकुमारी द्वारा अन्य राजा को वरते देख वे विकल हो उठे। उसी समय शिव जी के गणों ने व्यंग करते हुए नारद जी से कहा जरा दर्पन में अपना मुँह तो देखये!

मुनि ने जल में झाँक कर अपना मुँह देखा और अपनी कुरूपता देख कर अत्यन्त क्रोधित हो उठे। क्रोध में आकर उन्होंने शिव जी के उन दोनों गणों को राक्षस हो जाने का शाप दे दिया। उन दोनों को शाप देने के बाद जब मुनि ने एक बार फिर से जल में अपना मुँह देखा तो उन्हें अपना असली रूप फिर से प्राप्त हो चुका था।

यद्यपि नारद जी को अपना असली रूप वापस मिल गया था किन्तु भगवान विष्णु पर उन्हें अत्यन्त क्रोध आ रहा था क्योंकि विष्णु के कारण ही उनकी बहुत ही हँसी हुई थी। वे तुरन्त विष्णु जी से मिलने के लिये चल पड़े। रास्ते में ही उनकी मुलाकात विष्णु जी, जिनके साथ लक्ष्मी जी और विश्वमोहिनी भी थीं, से हो गई।

उन्हें देखते ही नारद जी ने कहा, “तुम दूसरों की सम्पदा देख ही नहीं सकते। तुम्हारे भीतर तो ईर्ष्या और कपट ही भरा हुआ है। समुद्र-मंथन के समय तुमने शिव को बावला बना कर विष और असुरों को मदिरा पिला दिया और स्वयं लक्ष्मी जी और कौस्तुभ मणि को ले लिया। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। हमेशा कपट का व्यवहार करते हो।

हमारे साथ तुमने जो किया है उसका फल तुम अवश्य पाओगे। तुमने मनुष्य रूप धारण करके विश्वमोहिनी को प्राप्त किया है इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम्हें मनुष्य जन्म लेना पड़ेगा, तुमने हमें स्त्री वियोग दिया इसलिये तुम्हें भी स्त्री वियोग सह कर दुःखी होना पड़ेगा और तुमने हमें बन्दर का रूप दिया इसलिये तुम्हें बन्दरों से ही सहायता लेना पड़ेगा।”

नारद के शाप को श्री विष्णु ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और उन पर से अपनी माया को हटा लिया। माया के हट जाने से अपने द्वारा दिये शाप को याद कर के नारद जी को अत्यन्त दुःख हुआ किन्तु दिया गया शाप वापस नहीं हो सकता था। इसीलिये श्री विष्णु को श्री राम के रूप में मनुष्य बन कर अवतरित होना पड़ा।

शिव जी के उन दोनों गणों ने जब देखा कि देवर्षि नारद अब मोहरहित हो चुके हैं तो उन्होंने नारद जी के पास आकर तथा उनके चरणों में गिर कर दीन वचन में कहा, “हे मुनिराज! हम दोनों शिव जी के गण हैं। हमने बहुत बड़ा अपराध किया है जिसके कारण हमें आपसे शाप मिल चुका है। अब हमें अपने शाप से मुक्त करने की कृपा कीजिये।”

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नारद जी बोले, “मेरा शाप मिथ्या नहीं हो सकता इसलिये तुम दोनों रावण और कुम्भकर्ण के रूप में महान ऐश्वर्यशाली, बलवान तथा तेजवान राक्षस बनोगे और अपनी भुजाओं के बल से सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करोगे। उसी समय भगवान विष्णु राम के रूप में मनुष्य शरीर धारण करेंगे। युद्ध में तुम दोनों उनके हाथों से मारे जाओगे और तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी।”

इस प्रकार से श्री तुलसीदास जी रामचरितमानस में कहते हैं कि श्री हरि अनन्त हैं और उनकी कथा भी अनन्त है। उनकी कथा को संतजन अनेक प्रकार से कहते और सुनते हैं।

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साभार:- Dharmik Bhakti Kathayein - धार्मिक भक्ति कथाएं By श्री भक्ति ग्रुप मंदिर
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