14/05/2026
. “रुक्मिणीजी का राधा दर्शन”
एक बार भगवान कृष्ण एकान्त में ‘राधा-राधा’ पुकारते हुए भावविभोर हो जाते हैं। उन्हें इस अवस्था में देखकर माता रुक्मिणी के मन में श्री राधाजी के दर्शन की इच्छा जागृत होती है।
वे प्रभु से प्रार्थना करती हैं कि वे उस स्वरूप के दर्शन करना चाहती हैं जिनका नाम लेकर प्रभु की आँखों से अश्रु बहने लगते हैं। उचित समय आने पर, जब ब्रजवासी और द्वारिका का परिकर प्रभास क्षेत्र में एकत्रित होते हैं, तब प्रभु रुक्मिणीजी को अकेले राधाजी के दर्शन के लिए भेजते हैं।
जब रुक्मिणीजी राधाजी के महल के द्वार पर पहुँचती हैं, तो वे वहाँ द्वार के पास ही खड़ी एक सखी को देखकर ही ठिठक जाती हैं। उस सखी का सौंदर्य इतना अद्भुत होता है कि रुक्मिणीजी को लगता है कि यही राधाजी हैं।
जैसे-जैसे वे महल की सात सीढ़ियों को पार करती हैं, हर सीढ़ी पर उन्हें एक नई सखी मिलती है, जिसका रूप करोड़ों लक्ष्मियों से भी अधिक दिव्य होता है।
अंत में जब वे श्री राधाजी के समक्ष पहुँचती हैं, तो उनके तेज और अनुपम सौंदर्य को देखकर स्तब्ध रह जाती हैं। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। राधाजी के ‘नित्य नवायमान’ (हर क्षण बदलने और निखरने वाली) स्वरूप को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाती हैं।
राधाजी के दर्शन कर जब रुक्मिणीजी वापस लौटती हैं, तो उनकी आँखों से अश्रु बह रहे होते हैं। रुक्मिणीजी स्वयं स्वीकार करती हैं कि अब तक वे अपनी और अन्य पटरानियों की शक्तियों पर गर्व करती थीं, लेकिन राधाजी के प्रेम और रूप के आगे सब फीका है।
वे कृष्ण से पूछती हैं–‘आप इनके बिना जीवित कैसे रहते हैं ?’ तब प्रभु उन्हें समझाते हैं कि वे कभी राधाजी से दूर नहीं होते, वे सदैव उनके हृदय में और उनके समीप ही रहते हैं।
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॥जय जय श्री राधे॥
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