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29/03/2026
25/03/2026

શાસન રક્ષા માટે પડેલ હાકલ
શ્રી સમસ્ત સુરત જૈન સંઘ જોગ,

પ્રણામ..

જૈન શાસનની પ્રભાવના કરવી કરાવવી એ જેમ આપણા સૌનું પરમ કર્તવ્ય છે તેમ સમય આવ્યે તેની રક્ષા કોઈપણ ભોગે કરવી તે આપણું પરમ.. પરમ.. પરમ.. કર્તવ્ય છે...

સુરત - વેસુ વિસ્તારમા શ્રી આગમોદ્ધારક જૈન સંઘ - ધાનેરા ભવનના આંગણે
એક વાસનાયુક્ત વિચારધારા ધરાવતા કુકર્મી સાગરચંદ્રસાગર નો પ્રવેશ થયેલ છે.. અને શ્રી આગમોદ્ધારક જૈન સંઘ-વેસુ સુરત, જીનાલયની પ્રતિષ્ઠા - અંજન શલાકા કરાવનાર છે.
જેમની સામે ગંભીર આરોપો છે.. પોલીસ ફરિયાદ છે.. પુરાવાઓ છે.. "જેમની જ પવિત્રતા માં ખામી છે. જ
જેમણે ભોળી સાધ્વીજીઓ ને ભોળવીને તેમના શીલ લૂંટ્યા છે
આવા લંપટ કહેવાતા સાધુ પ્રભુની અંજન પ્રતિષ્ઠા કરીને પ્રભુને અને સંઘ ને અભડાવવા નીકળ્યા છે
આ ઘણી ગંભીર બાબત છે.

*આ બાબતે તાત્કાલિક ઉચિત પગલાં લેવા માટે આજે સવારે 08:15 વાગે શાસનપ્રેમી, શ્રાવક અને શ્રાવિકાઓએ શ્રી આગમોદ્ધારક જૈન સંઘની બહાર વિરોધ પ્રદર્શન કરવાનું છે...*

મોડું થાય તે પહેલા જાગી જઈએ.
સુરત જૈન સંઘ - શાસન ને સુરક્ષિત કરીએ..
* *તારીખ : ૨૫-૦૩-૨૦૨૬ બુધવાર*
* *સમય : ૮:૧૫ સવારે*
* *સ્થળ : આગમોદ્ધારક જૈન સંઘ-વેસુ સુરત*

19/03/2026

જાગો જૈનો..જાગો જૈનો.. પ્રશ્ન પૂછો...લાખો રૂપિયાની અંગરચનાની રકમ ક્યાં વેડફાઈ રહી છે

Today Fagan Vad 8 Lord Aadinath 's JANAM KALYANAK And DIKSHA KALYANAK आज फागण वद ८ युगादिदेव श्री ऋषभदेव परमात्मा का जन्...
11/03/2026

Today Fagan Vad 8 Lord Aadinath 's
JANAM KALYANAK And DIKSHA KALYANAK

आज फागण वद ८ युगादिदेव श्री ऋषभदेव परमात्मा का जन्म कल्याणक व दीक्षा कल्याणक है ।

આજ ફાગણ વદ ૮ શ્રી અયોધ્યા મંડન દેવાધિદેવ શ્રી આદિનાથ દાદાનું જન્મ કલ્યાણક અને દીક્ષા કલ્યાણક છે

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फागन सुद १३ के अत्यंत ही पवित्र और शुभ दिन पर सिद्धवड पर आयोजित आयंबिल पाल संख्या १ में फेरी हेतु आने वाले सभी आयंबिल के...
27/02/2026

फागन सुद १३ के अत्यंत ही पवित्र और शुभ दिन पर सिद्धवड पर आयोजित आयंबिल पाल संख्या १ में फेरी हेतु आने वाले सभी आयंबिल के तपस्वी देवलोक जिनालय पालीताणा परिवार की तरफ़ से पाल नम्बर १ में संघ पूजन का लाभ देवे ।

आयंबिल भक्ति का लाभ पिछले ६७ वर्षों से पूज्य शेठ श्री मोहनलाल गगजीभाई ( शिहोरवाला) परिवार ले रहे है ।

परिवार ने इस प्रसंग पर देवलोक जिनालय पालीताणा परिवार को अमूल्य संघ पूजन करने का अवसर प्रदान किया हम सभी ह्रदय की गहराई से भावभरा आभार प्रकट करते हैं ।

देवलोक जिनालय पालीताणा

088791 45554

fans

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23/01/2026

एक अनोखे किर्तीमान की ओर अग्रसर

आज महा सुद पंचमी ( वंसत पंचमी ) - संवत २०८२ ,शुक्रवार दिनाँक २३-०१-२०२६

तीन लोक के नाथ श्री पार्श्वनाथ परमात्मा के मुख्य धाम श्री शंखेश्वर तीर्थ की ध्वजा का दिन -

इन्दौर मालवा का परिवार लगातार छट्टी बार ध्वजा बोली का लाभ लेकर अपनी लक्ष्मी का सदउपयोग करने जा रहा है…

ऐसे श्री जयसिंहजी सौ.टीना कुमारीजी के संपूर्ण लोढ़ा परिवार की बहुत बहुत अनुमोदना ।

95 वर्ष की वृद्ध अवस्था में भी कठिन आगमों को सरल बनाने वाले जैनाचार्य -प्रभु महावीर के शासन परंपरा में दो दुर्लभ घटनाएँ ...
18/01/2026

95 वर्ष की वृद्ध अवस्था में भी कठिन आगमों को सरल बनाने वाले जैनाचार्य -

प्रभु महावीर के शासन परंपरा में दो दुर्लभ घटनाएँ घटी। उनकी परंपरा में विराजमान दीक्षित आचार्य श्री शय्यंभवसूरी ने दीक्षा ली। उस समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं। दूसरी घटना में प्रभु के सोलहवें पाटे पर विराजमान श्री वज्रस्वामी की जो मां के गर्भ में थे, जबकि उनके पिता मुनि श्री धनगिरी महाराज ने दीक्षा ग्रहण की थी।

आज से साढ़े पांच दशकों पहले ऐसी एक घटना में आचार्य श्री कुलचंद्रसूरीजी ने दीक्षा ली। उस समय उनकी धर्मपत्नी लक्ष्मीबाई गर्भवती थीं। दीक्षा के छह महीने बाद लक्ष्मीबाई ने पुत्र कुमारपाल को जन्म दिया।

अभी बात करनी है 95 वर्ष की उम्र में भी अनोखी ऊर्जा एवं स्फूर्ति के साथ श्रुत सेवा में तत्पर रहने वाले कुलचंद्रसूरिश्वरजी और उनके कुल (परिवार) की।

संवत 1901 में आचार्य श्री कुलचंद्रसूरीश्वरजी के परदादा गमनाजी मेघाजी मेहता ने श्री समेतशिखरजी की कठिन यात्रा ऊंट पर सवार होकर की थी। वे पिंडवाड़ा में 100 मकानों और दुकानों के मालिक थे। दैनिक परमात्मा की अष्टप्रकारी पूजा के बाद ही वे नवकारशी (सुबह का नाश्ता) करते थे। उनके पाँच पुत्रों में से एक अमीचंदजी के एक पुत्र का नाम रिखबदासजी था, और रिखबदासजी के पाँच पुत्रों में से एक कांतिलाल। 20 नवम्बर, 1931 को जन्मे कांतिलाल का बचपन शांत स्वभाव का था और वे पढ़ाई में भी तेज थे। प्रारंभिक शिक्षा पिंडवाड़ा में हुई। कपड़े के व्यापार से जुड़े उनके पिता ने व्यवसाय के लिए मुंबई स्थानांतरित किया। कांतिलाल ने मुंबई में दसवीं कक्षा तक अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की और फिर वे व्यापार में जुड़ गए।

धर्म की ओर रुचि धीरे-धीरे कांतिलाल में भी विकसित हुई। एक बार गुरु देव प्रेमसूरीश्वरजी महाराजा 119 साधुओं के साथ पिंडवाडा के बावन जिनालय की प्रतिष्ठा के लिए आए, तब कांतिलाल के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि अगर वह भी एक साधु बनें तो कितना अच्छा होगा। अंततः 1967 में 35 वर्ष की आयु में गर्भवती पत्नी और दो पुत्रों मनमोहन और पंकज के साथ तथा करोड़ों की संपत्ति को छोड़कर उन्होंने पिंडवाड़ा में दीक्षा ली। ब्रांडेड कपड़े, घड़ियाँ और अन्य चीजें पहनने वाले कांतिलाल अब केवल सफेद वस्त्रों में साधु जीवन और सरलता का पालन कर रहे हैं।कुछ समय पश्चात 84 वर्ष की उम्र में उनके गुरु देव प्रेमसूरीश्वरजी ने कहा था कि उनके देवलोक के बाद उन्हें मुनि जयघोष के साथ रहना होगा और 45 आगम-न्याय छेदसूत्र आदि विशाल साहित्य का अध्ययन करना होगा। दीक्षा के बाद उन्होंने प्रतिदिन आठ से दस घंटे शास्त्राध्ययन किया।

श्रुतसेवा में आचार्य कुलचंद्रसूरीजी का योगदान अमूल्य है। उन्होंने लगभग 90 ग्रंथों पर शोध और संपादन किया। आगमिक रहस्यों को भविष्य तक पहुँचाने के उद्देश्य से उन्होंने सबसे पहले आचारांग सूत्र पर टिप्पणी की थी। 88 वर्ष की उम्र में 24,451 श्लोक प्रमाण पंच कल्प भाष्य टिप्पणी की रचना की। फिर 90 वर्ष की आयु में तपागच्छ के 2400 वर्ष पुराने इतिहास में पहली बार 45 आगम के छेदसूत्रों में से एक दशाश्रुत स्कंध ग्रंथ पर 12,840 श्लोक प्रमाण जयघोष टीका की रचना की। 93 वर्ष की आयु में ताजगी और प्रसन्नता के साथ उन्होंने छेदसूत्र के निशीथ ग्रंथ पर टिप्पणी लिखी। उनका लेखन कार्य पूरा हो चुका है और वर्तमान में ग्रंथ का प्रूफरीडिंग चल रहा है। इन छह छेद ग्रंथों में संयम जीवन के पापों के प्रायश्चित के उपाय बताए गए हैं। साधु यदि कोई गलती करें तो उसका क्या निवारण हो सकता है, इसका विवरण भी इनमें है। यह ग्रंथ केवल साधुओं (जो कम से कम 15 वर्ष के दीक्षापर्याय और 30 वर्ष से ऊपर हों) के लिए उपलब्ध हैं। इन ग्रंथों का अध्ययन करने से पहले गुरु की अनुमति आवश्यक है। इसके बाद चार महीने की तपस्या करके ही इन्हें पढ़ा जा सकता है। ये ग्रंथ प्राकृत भाषा में होने के कारण सभी के लिए समझना कठिन होता है । एक समय था जब आगम कठिन थे, तब 2000 साल पहले आचार्य अभयदेवसूरीजी ने नव अंग आगम पर टिप्पणी लिखी थी। जिस तरह से उन्हें नवांगी टिप्पणीकर्ता के रूप में याद किया जाता है, ठीक वैसे ही जैन समाज आचार्य कुलचंद्रसूरीजी को भी आगम की टिप्पणियों के लिए याद करेगा।

निशीथ ग्रंथ साधु जीवन में होने वाली गलतियों का प्रायश्चित ग्रंथ है। यह बताता है कि किस समय, किस क्षेत्र में, और कैसे जीवन जीना चाहिए। इस ग्रंथ पर जैनशासन के इतिहास में पहली बार संस्कृत में टिप्पणी की गई है। कलिकुंड तीर्थ में गच्छाधिपति जयघोषसूरीश्वरजी महाराजा ने आचार्य कुलचंद्रसूरीश्वरजी को निशीथ ग्रंथ पर टिप्पणी लिखने के लिए प्रेरित किया और पालीताणा स्थित मेवाड़ भवन धर्मशाला में आचार्य कुलचंद्रसूरीजी ने 89 वर्ष की आयु में टिप्पणी का लेखन शुरू किया। वह वर्ष 2019 था।

लगभग प्रतिदिन तीन-चार घंटे लेखन कार्य करने और पांच साल बाद इस कार्य को सुरत में समाप्त किया। 4000 से अधिक पृष्ठों में 6703 प्राकृत श्लोकों के ग्रंथ की टिप्पणी पूरी की, जिसका प्रमाण लगभग 1,08,747 श्लोकों के बराबर है। टिप्पणी के 32 अक्षरों को एक श्लोक के बराबर माना जाता है।

निशीथ टीका ग्रंथ का 1 फरवरी, 2026 को भव्य विमोचन पाल सुरत में गुजरात के गृहमंत्री सुश्रावक श्री हर्षभाई संधवी द्वारा किया जाएगा।

इस आयु में इतनी स्फूर्ति और ग्रंथ लेखन की शक्ति कहाँ से मिलती है? इस चित्रलेखा के सवाल का जवाब देते हुए आचार्य कुलचंद्रसूरीश्वरजी ने धीरे से हाथ उठाकर और श्रद्धाभरे स्वर में कहते हैं: "सब कुछ ऊपरवाले की कृपा से होता है। मेरे गुरुदेव प्रेमसूरीश्वरजी और जयघोषसूरीश्वरजी महाराज के आशीर्वाद से ही यह सब संभव हुआ है। मैं केवल एक निमित्त मात्र हूं।"

उनके तंदुरुस्त जीवन का यश कठोर संयम पालन में छिपा है। मीठाई , फल और सूखे मेवों का त्याग, 88 वर्ष तक विहार और खड़े-खड़े प्रतिक्रमण, दैनिक 108 लोगस्स का जाप, जो आज भी अनवरत जारी है। वर्तमान में वे रोज़ सुबह साढ़े चार बजे उठकर सूरी मंत्र का जाप करते हैं। देरासर में ढाई घंटे भक्ति, फिर पढ़ाई और लेखन कार्य चलता है।

उनका पूरा जीवन श्रुतसेवा और शासनसेवा का जीवंत उदाहरण है। उन्हें पिंडवाड़ा में गणिपद (1989), अहमदाबाद में पंन्यासपद (1992), और पालीताणा में आचार्यपद (1998) प्राप्त हुआ। उनके कार्यों के कारण उन्हें पालीताणा में वैराग्यवारिधि , आयड़ तीर्थ में आयड़ तीर्थोंद्धारक और सुरत में सिद्धांत विशारद की पदवियाँ प्राप्त हुई हैं।

पूज्य गुरुदेव के चरणों में कोटि-कोटि वंदन।

✍️ अरविंद गोण्डलिया, सुरत - चित्रलेखा के लिए

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10/01/2026

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||आज का पंचाग||
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॰॰॰ आज का नियम ॰॰॰
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देवलोक जिनालय पालीताणा
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🔹वीर संवत- २५५२
🔹विक्रम संवत-२०८२
🔹मास- पोष
🔹पक्ष- वद
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♦️तिथि - ८
♦️वार - रविवार
♦️दिनांक - ११-१-२०२६
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🔸आज का नियम
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🔸 लीलोतरी अभक्ष्य का
🔸 त्याग करे।
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🔸अगर आप एक दिन का
🔸त्याग / नियम / पच्चखाण
🔸करना चाहते हैं तो
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🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
🔹हाथ जोड़कर एक नवकार
🔹गिनके पच्चखाण बोले
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🔹धारणा अभिग्रहं
🔹पचक्खामि
🔹अन्नथणाभोगेणं
🔹सहसागारेणं
🔹महत्तरागारेणं
🔹सवस्समाहिवतियागारेणं
🔹वोसिरामि।
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♦️प्रतिदिन छोटे छोटे नियम
♦️लेकर कर्म निर्जरा
♦️करने वाले सभी
♦️ कल्याण मित्रो
♦️की बारम्बार
♦️अनुमोदना।
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♦️आज का "त्याग" लेनेवाले
♦️सभी "भव्य आत्मा" की
♦️खूब ख़ूब अनुमोदना !!!
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🔸कल पोष वद ९
🔸 सोमवार
🔸तारीख़ १२-१-२०२६
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🔹लिए नीचे के नम्बर
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🔹 श्री उमरवाडी पार्श्वनाथ
🔹 जिनालय - सुरत
🔹 दर्शन वीडियो लिंक
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