Shri Mahadev Shiv Mandir,Charthawal

Shri Mahadev Shiv Mandir,Charthawal Shri Mahadev Shiv Mandir is situated on Muzaffarnagar-Thanabhavan road. Here is a Shivling which is at the time of Mahabharat and It has appeared itself.

आजकल कुछ तथाकथित कथावाचक शिवलिंग पर काले तिल चढ़वाते हैं। ऐसे व्यक्ति जो उनकी बातों में आकर शिवलिंग पर वर्जित वस्तुएं अर...
04/08/2025

आजकल कुछ तथाकथित कथावाचक शिवलिंग पर काले तिल चढ़वाते हैं। ऐसे व्यक्ति जो उनकी बातों में आकर शिवलिंग पर वर्जित वस्तुएं अर्पण करते हैं, पाप के भागी न बनें। केवल शास्त्र सम्मत वस्तुएं ही शिवलिंग पर अर्पण करें।

*श्रावण मास निकट है और शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए ये तो बहुत लोग जानते हैं किन्तु कुछ ऐसी वस्तुएं भी हैं जिसे भगवान शिव को अर्पण करने को शास्त्रों में मना किया गया है।*

*आइये ऐसी ही कुछ वस्तुओं के विषय में जानते हैं।*

*💐 #हल्दी:*
भगवान शिव को हल्दी नहीं चढ़ती है क्यूंकि
इसका सम्बन्ध भगवान विष्णु से है।
*विष्णु-लक्ष्मी को हल्दी चढाने का विधान है*
क्यूंकि नारायण को हल्दी या पीली वस्तुएंबड़ी पसंद हैं।यही कारण है कि उन्हें पीतांबर कहा गया है।
इसके अतिरिक्त चूँकि हल्दी का सम्बन्धरसोईघर से है इसीलिए भी ये महादेव को
नहीं चढ़ाई जाती।

*💐 #चंपा_और_केवड़े_का_फूल:*
इन दोनों फूलों को महादेव
पर नहीं चढ़ाया जाता।
इन दोनों की गंध अत्यंत तीखी होती है।
इसके अतिरिक्त दोनों से,विशेषकर केवड़े के फूल से इत्र बनाया जाता है जो सांसारिक अथवा भौतिक वस्तुओं का द्योतक है।
महादेव भैतिक वस्तुओं से परे हैं इसीलिएये दोनों फूल उनके लिए वर्जित है।

*💐 #शंख_और_तुलसी:*
महादेव को शंख और तुलसी भी अर्पित नहीं की जाती क्यूंकि भगवान शिव ने शंखचूड़नामक राक्षस का वध किया था।
उसे ही कई जगह जालंधर के नाम से जाना जाता है।

वृंदा इसी शंखचूड़ की पत्नी थी और उसे वरदान था कि जबतक उसका पतिव्रत अखंड रहेगा तब तक उसके पति को कोई मार नहीं सकेगा।
इसी कारण युद्ध में महादेव शंखचूड़ का वध नहीं कर रहे थे ताकि वरदान का अपमान ना हो।
तब उनकी प्रेरणा से भगवान विष्णु ने
शंखचूड़ का वेश लेकर वृंदा का पतिव्रत भंग कर दिया और तब महादेव ने
शंखचूड़ का वध कर दिया।
जब वृंदा को इसका पता चला तो उन्होंने नारायण क पत्थर बन जाने का श्राप दे
दिया और स्वयं भस्म हो गयी।
उनके भस्म से ही तुलसी की उत्पत्ति हुई और नारायण श्राप के कारण शालिग्राम के रूप में जन्मे।
तब से शंख और तुलसी महादेव स्वीकार नहीं करते।
शंख के जल से महादेव का अभिषेक भी नही करना चाहिए।

*💐 #नारियल_का_जल:*
*इसे श्रीफल कहते हैं,अर्थात देवी लक्ष्मी का फल।*
देवी लक्ष्मी का सम्बन्ध भगवान विष्णु से है
इसी कारण महादेव को नारियल या नारियल का पानी नहीं चढ़ाया जाता।*

*💐 #तिल:*
*ऐसी मान्यता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान*
*विष्णु के मैल से हुई थी।*
यही कारण है कि इसे भगवान शिव पर नहीं चढ़ाया जाता।

*💐 #खंडित_चावल(टूटा चावल):*
इसे किसी भी देवता को नहीं चढ़ाना चाहिए।
पूजा में चढ़ने वाले चावल को "अक्षत" कहते हैं,
अर्थात जिसकी कोई क्षति ना हुई हो।

खंडित अथवा क्षत चावल इसी कारण महादेव
या किसी अन्य देवता को नहींचढ़ाया जाता है।

*💐 #खंडित_बेलपत्र:बेलपत्र*
महादेव को अत्यंत प्रिय है किन्तु बेलपत्र केवल तीन की संख्यामें महादेव को समर्पित किया जाना चाहिए।
पत्तियों को तोड़ कर एक अथवा दो बेलपत्रभगवान शिव को अर्पण नहीं किया जाता है।

*💐 #लाल_वस्त्र:*
भगवान शिव को लाल वस्त्र भी अर्पण नहीं किया जाता क्यूंकि ये मातापार्वती को प्रियनहीं है।
ये कथा कुमकुम से भी सम्बंधित है क्यूंकि
दोनों का रंग लाल होता है।

*💐 #कुमकुम(रोली):*
ये भी माता पार्वती को प्रिय नहीं क्यूंकि ऐसी
कथा आती है कि एक बार कुमकुम चढाने के
कारण माता को रक्त का भ्रम हो गया था।

*💐 #उबला_दूध:*
अक्षत की ही भांति उबला दूध ना केवल महादेव को बल्कि किसी और देवता को
नहीं चढ़ाना चाहिए।
भगवान शिव को गाय का ताजा दूध ही,अर्पित करना चाहिए।
अगर गाय का दूध उपलब्ध ना हो तो भी बाजार से खरीदे गए दूध को बिना उबाले भगवान शिव पर चढ़ाना चाहिए।
दूध को उबलने पर वो जूठा माना जाता है और इसीलिए भगवान शिव पर नहीं चढ़ाया जाता।

*💐 #लौह_पात्र_से_जल:*
भगवान शिव को केवल कांसे या ताम्बे,के पात्र से जल चढ़ाया जाता है।
लौह पात्र उनके लिए सर्वथा वर्जित है।
कई जगह उन्हें लौह के साथ-साथ उन्हें सवर्ण और रजत पात्र से भी जल चढाने
से मना किया जाता है क्यूंकि महादेव ने
त्रिपुर,जो क्रमशः *स्वर्ण,रजत और लौह से*
*बने थे, का संहार किया था और* *त्रिपुरारि,*
*कहलाये।*

*💐 #केतकी_का_फूल:*
ये पुष्प महादेव को प्रिय नहीं क्यूंकि इसने महादेव से असत्य कहा था।

अतः आप सभी भक्त भी महादेव को अर्पण करते समय इन बातों का ध्यान रखें।

ॐ नमः शिवाय 🙏🏻

श्रावण मास में जलाभिषेक करने को आए श्रद्धालु
23/07/2025

श्रावण मास में जलाभिषेक करने को आए श्रद्धालु

23/07/2025

सभी शिवभक्तों को श्रावण मास की शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 🎉

श्रावण मास के प्रथम सोमवार की संध्या आरती में उपस्थित श्रद्धालु गण।
14/07/2025

श्रावण मास के प्रथम सोमवार की संध्या आरती में उपस्थित श्रद्धालु गण।

14/02/2025

मंदिर प्रांगण के शिवालय का गर्भगृह जीर्ण होने को है, भक्तों के विचार से इसका जीर्णोद्धार होना चाहिए या शिव चौक की तरह ही इसका भी पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए?

1. पुनर्निर्माण होना चाहिए
2. केवल जीर्णोद्धार (मरम्मत) होना चाहिए
3. यूँ ही रहने देना चाहिए: न जीर्णोद्धार , न पुनर्निर्माण

सभी शिवभक्त अपने विचार अवश्य प्रकट करें |

शिव महापुराण - विद्येश्वर संहिता - अध्याय १८:*बन्धन और मोक्ष का विवेचन, शिवपूजा का उपदेश, लिंग आदि में शिवपूजन का विधान,...
23/10/2024

शिव महापुराण - विद्येश्वर संहिता - अध्याय १८:

*बन्धन और मोक्ष का विवेचन, शिवपूजा का उपदेश, लिंग आदि में शिवपूजन का विधान, भस्म के स्वरूप का निरूपण और महत्त्व, शिव एवं गुरु शब्द की व्युत्पत्ति तथा शिव के भस्मधारण का रहस्य*

ऋषि बोले- सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ सूतजी ! बन्धन और मोक्षका स्वरूप क्या है? यह हमें बताइये।

सूतजी ने कहा-महर्षियों ! मैं बन्धन और मोक्ष का स्वरूप तथा मोक्ष के उपाय का वर्णन करूँगा। तुमलोग आदरपूर्वक सुनो। जो प्रकृति आदि आठ बन्धनों से बँधा हुआ है, वह जीव बद्ध कहलाता है और जो उन आठों बन्धनों से छूटा हुआ है, उसे मुक्त कहते हैं। प्रकृति आदि को वश में कर लेना मोक्ष कहलाता है। बन्धन आगन्तुक है और मोक्ष स्वतः सिद्ध है। बद्ध जीव जब बन्धन से मुक्त हो जाता है तब उसे मुक्तजीव कहते हैं। प्रकृति, बुद्धि (महत्तत्त्व), त्रिगुणात्मक अहंकार और पाँच तन्मात्राएँ - इन्हें ज्ञानी पुरुष प्रकृत्याद्यष्टक मानते हैं। प्रकृति आदि आठ तत्त्वों के समूह से देह की उत्पत्ति हुई है। देह से कर्म उत्पन्न होता है और फिर कर्म से नूतन देह की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार बारंबार जन्म और कर्म होते रहते हैं। शरीर को स्थूल, सूक्ष्म और कारण के भेद से तीन प्रकार का जानना चाहिये। स्थूल शरीर (जाग्रत् अवस्था में) व्यापार कराने वाला, सूक्ष्म शरीर (जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओं में) इन्द्रिय-भोग प्रदान करने वाला तथा कारण शरीर (सुषुप्तावस्था में) आत्मानन्द की अनुभूति कराने वाला कहा गया है। जीव को उसके प्रारब्ध कर्मानुसार सुख दुःख प्राप्त होते हैं। वह अपने पुण्यकर्मों के फलस्वरूप सुख और पापकर्मों के फलस्वरूप दुःख का उपभोग करता है। अतः कर्मपाश से बँधा हुआ जीव अपने त्रिविध शरीर से होने वाले शुभाशुभ कर्मों द्वारा सदा चक्र की भाँति बारंबार घुमाया जाता है। इस चक्रवत् भ्रमण की निवृत्ति के लिये चक्रकर्ता का स्तवन एवं आराधन करना चाहिये। प्रकृति आदि जो आठ पाश बतलाये गये हैं, उनका समुदाय ही महाचक्र है और जो प्रकृति से परे हैं, वे परमात्मा शिव हैं। भगवान् महेश्वर ही प्रकृति आदि महाचक्र के कर्ता हैं; क्योंकि वे प्रकृति से परे हैं। जैसे बकायन नामक वृक्ष का थाला जल को पीता और उगलता है, उसी प्रकार शिव प्रकृति आदि को अपने वश में करके उस पर शासन करते हैं। उन्होंने सबको वश में कर लिया है, इसीलिये वे शिव कहे गये हैं। शिव ही सर्वज्ञ, परिपूर्ण तथा निःस्पृह हैं। सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति से संयुक्त होना और अपने भीतर अनन्त शक्तियों को धारण करना - महेश्वर के इन छः प्रकार के मानसिक ऐश्वर्यों को केवल वेद जानता है। अतः भगवान् शिव के अनुग्रह से ही प्रकृति आदि आठों तत्त्व वश में होते हैं। भगवान् शिव का कृपाप्रसाद प्राप्त करने के लिये उन्हीं का पूजन करना चाहिये।

यदि कहें- शिव तो परिपूर्ण हैं, निःस्पृह हैं,उनकी पूजा कैसे हो सकती है? तो इसका उत्तर यह है कि भगवान् शिव के उद्देश्य से- उनकी प्रसन्नता के लिये किया हुआ सत्कर्म उनके कृपाप्रसाद को प्राप्त कराने वाला होता है। शिवलिंग में, शिव की प्रतिमा में तथा शिवभक्तजनों में शिव की भावना करके उनकी प्रसन्नता के लिये पूजा करनी चाहिए । यह पूजन शरीर से, मन से, वाणी से और धन से भी किया जा सकता है। उस पूजा से महेश्वर शिव, जो प्रकृति से पूजक पर विशेष कृपा करते हैं और उनका वह कृपाप्रसाद सत्य होता है। शिव की कृपा से कर्म आदि सभी बन्धन अपने वश में हो जाते हैं। कर्म से लेकर प्रकृतिपर्यन्त सब कुछ जब वश में हो जाता है, तब वह जीव मुक्त कहलाता है और स्वात्मारामरूप से विराजमान होता है। परमेश्वर शिव की कृपा से जब कर्मजनित शरीर अपने वश में हो जाता है, तब भगवान् शिव के लोक में निवास का सौभाग्य प्राप्त होता है। इसी को सालोक्य-मुक्ति कहते हैं। जब तन्मात्राएँ वश में हो जाती हैं, तब जीव जगदम्बासहित शिवbका सामीप्य प्राप्त कर लेता है। यह सामीप्य मुक्ति है, उसके आयुध आदि और क्रिया आदि सब कुछ भगवान् शिव के समान हो जाते हैं। भगवान्‌ का महाप्रसाद प्राप्त होने पर बुद्धि भी वश में हो जाती है। बुद्धि प्रकृति का कार्य है। उसका वश में होना साष्टिमुक्ति कहा गया है। पुनः भगवान्‌ का महान् अनुग्रह प्राप्त होने पर प्रकृति वश में हो जायगी। उस समय भगवान् शिव का मानसिक ऐश्वर्य बिना यत्न के ही प्राप्त हो जायगा। सर्वज्ञता और तृप्ति आदि जो शिव के ऐश्वर्य हैं, उन्हें पाकर मुक्त पुरुष अपने आत्मा में ही विराजमान होता है। वेद और शास्त्रों में विश्वास रखने वाले विद्वान् पुरुष इसी को सायुज्यमुक्ति कहते हैं। इस प्रकार लिंग आदि में शिव की पूजा करने से क्रमशः मुक्ति स्वतः प्राप्त हो जाती है। इसलिये शिव का कृपाप्रसाद प्राप्त करने के लिये तत्सम्बन्धी क्रिया आदि के द्वारा उन्हीं का पूजन करना चाहिये। शिवक्रिया, शिवतप, शिवमन्त्र जप, शिवज्ञान और शिवध्यान के लिये सदा उत्तरोत्तर अभ्यास बढ़ाना चाहिये। प्रतिदिन प्रातःकाल से रात को सोते समय तक और जन्मकाल से लेकर मृत्युपर्यन्त सारा समय भगवान् शिव के चिन्तन में ही बिताना चाहिये। सद्योजातादि मन्त्रों तथा नाना प्रकार के पुष्पों से जो शिव की पूजा करता है, वह शिव को ही प्राप्त होगा।
ऋषि बोले-उत्तम व्रत का पालन करने वाले सूतजी ! लिंग आदि में शिवजी की पूजा का क्या विधान है, यह हमें बताइये।

सूतजी ने कहा-द्विजों ! मैं लिंगों के क्रम का यथावत् वर्णन कर रहा हूँ तुम सब लोग सुनो। वह प्रणव ही समस्त अभीष्ट वस्तुओं को देने वाला प्रथम लिंग है। उसे सूक्ष्म प्रणवरूप समझो। सूक्ष्म लिंग निष्कल होता है और स्थूल लिंग सकल। पंचाक्षर मन्त्र को ही स्थूल लिंग कहते हैं। उन दोनों प्रकार के लिंगों का पूजन तप कहलाता है। वे दोनों ही लिंग साक्षात् मोक्ष देने वाले हैं। पौरुष-लिंग और प्रकृति-लिंग के रूप में बहुत से लिंग हैं। उन्हें भगवान् शिव ही विस्तारपूर्वक बता सकते हैं। दूसरा कोई नहीं जानता। पृथ्वी के विकारभूत जो-जो लिंग ज्ञात हैं, उन-उनको मैं तुम्हें बता रहा हूँ। उनमें स्वयम्भूलिंग प्रथम है। दूसरा बिन्दुलिंग, तीसरा प्रतिष्ठितलिंग, चौथा चरलिंग और पाँचवाँ गुरुलिंग है। देवर्षियों की तपस्या से सन्तुष्ट हो उनके समीप प्रकट होने के लिये पृथ्वी के अन्तर्गत बीजरूप से व्याप्त हुए भगवान् शिव वृक्षों के अंकुर की भाँति भूमि को भेदकर नादलिंग के रूप में व्यक्त हो जाते हैं। वे स्वतः व्यक्त हुए शिव ही स्वयं प्रकट होने के कारण स्वयम्भू नाम धारण करते हैं। ज्ञानीजन उन्हें स्वयम्भूलिंग के रूप में जानते हैं। उस स्वयम्भूलिंग की पूजा से उपासक का ज्ञान स्वयं ही बढ़ने लगता है। सोने-चाँदी आदि के पत्र पर, भूमि पर अथवा वेदी पर अपने हाथ से लिखित जो शुद्ध प्रणव मन्त्ररूप लिंग है, उसमें तथा मन्त्रलिंग का आलेखन करके उसमें भगवान् शिव की प्रतिष्ठा और आवाहन करे। ऐसा बिन्दुनादमय लिंग स्थावर और जंगम दोनों ही प्रकार का होता है। इसमें शिव का दर्शन भावनामय ही है, ऐसा निस्संदेह कहा जा सकता है। जिसको जहाँ भगवान् शंकर के प्रकट होने का विश्वास हो, उसके लिये वहीं प्रकट होकर वे अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। अपने हाथ से लिखे हुए यन्त्र में अथवा अकृत्रिम स्थावर आदि में भगवान् शिव का आवाहन करके सोलह उपचारों से उनकी पूजा करे। ऐसा करने से साधक स्वयं ही ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेता है और इस साधन के अभ्यास से उसको ज्ञान भी होता है। देवताओं और ऋषियों ने आत्मसिद्धि के लिये अपने हाथ से वैदिक मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक शुद्ध मण्डल में शुद्ध भावना द्वारा जिस उत्तम शिवलिंग की स्थापना की है, उसे पौरुषलिंग कहते हैं तथा वही प्रतिष्ठितलिंग कहलाता है। उस लिंग की पूजा करने से सदा पौरुष ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। महान् ब्राह्मण और महाधनी राजा किसी कारीगर से शिवलिंग का निर्माण कराकर जो मन्त्रपूर्वक उसकी स्थापना करते हैं, उनके द्वारा स्थापित हुआ वह लिंग भी प्रतिष्ठितलिंग कहलाता है। किंतु वह प्राकृतलिंग है। इसलिये प्राकृत ऐश्वर्य-भोग को ही देने वाला होता है। जो शक्तिशाली और नित्य होता है, उसे पौरुष कहते हैं तथा जो दुर्बल और अनित्य होता है, वह प्राकृत कहलाता है। लिंग, नाभि, जिह्वा, नासाग्रभाग और शिखा के क्रम से कटि, हृदय और मस्तक तीनों स्थानों में जो लिंग की भावना की गयी है, उस आध्यात्मिक लिंग को ही चरलिंग कहते हैं। पर्वत को पौरुषलिंग बताया गया है और भूतल को विद्वान् पुरुष प्राकृतलिंग मानते हैं। वृक्ष आदि को पौरुषलिंग जानना चाहिये और गुल्म आदि को प्राकृतलिंग। साठी नामक धान्य को प्राकृतलिंग समझना चाहिये और शालि (अगहनी) एवं गेहूँ को पौरुषलिंग। अणिमा आदि आठों सिद्धियों को देनेवाला जो ऐश्वर्य है, उसे पौरुष ऐश्वर्य जानना चाहिये। सुन्दर स्त्री तथा धन आदि विषयों को आस्तिक पुरुष प्राकृत ऐश्वर्य कहते हैं। चरलिंगों में सबसे प्रथम रसलिंग का वर्णन किया जाता है। रसलिंग ब्राह्मणों को उनकी सारी अभीष्ट वस्तुओं को देने वाला है। शुभकारक बाणलिंग क्षत्रियों को महान् राज्य की प्राप्ति कराने वाला है। सुवर्णलिंग वैश्यों को महाधनपति का पद प्रदान करने वाला है तथा सुन्दर शिवलिंग शूद्रों को महाशुद्धि देने वाला है। स्फटिकमय लिंग तथा बाणलिंग सब लोगों को उनकी समस्त कामनाएँ प्रदान करते हैं। अपना न हो तो दूसरे का स्फटिक या बाणलिंग भी पूजा के लिये निषिद्ध नहीं है। स्त्रियों, विशेषतः सधवाओं के लिए पार्थिव लिंग की पूजा का विधान है। प्रवृत्ति- मार्ग में स्थित विधवाओं के लिये स्फटिक- लिंग की पूजा बतायी गयी है। परंतु विरक्त विधवाओं के लिये रसलिंग की पूजा को ही श्रेष्ठ कहा गया है। उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षियों! बचपन में, जवानी में और बुढ़ापे में भी शुद्ध स्फटिकमय शिवलिंग का पूजन स्त्रियों को समस्त भोग प्रदान करने वाला है। गृहासक्त स्त्रियों के लिये पीठपूजा भूतल पर सम्पूर्ण अभीष्ट को देने वाली है। प्रवृत्तिमार्ग में चलने वाला पुरुष सुपात्र गुरु के सहयोग से ही समस्त पूजाकर्म सम्पन्न करे। इष्टदेव का अभिषेक करने के पश्चात् अगहनी के चावल से बने हुए खीर आदि पक्वान्नों द्वारा नैवेद्य अर्पण करे। पूजा के अन्त में शिवलिंग को सम्पुट में पधराकर घर के भीतर पृथक् रख दे। जो निवृत्तिमार्गी पुरुष हैं, उनके लिये हाथ पर ही शिवलिंग-पूजा का विधान है। उन्हें भिक्षादि से प्राप्त हुए अपने भोजन को ही नैवेद्यरूप में निवेदित करना चाहिये। निवृत्त पुरुषों के लिये सूक्ष्म लिंग ही श्रेष्ठ बताया जाता है। वे विभूति के द्वारा पूजन करें और विभूति को ही नैवेद्यरूप से निवेदित भी करें। पूजा करके उस लिंग को सदा अपने मस्तक पर धारण करें।

विभूति तीन प्रकार की बतायी गयी है- लोकाग्निजनित, वेदाग्निजनित और शिवाग्निजनित। लोकाग्निजनित या लौकिक भस्म को द्रव्यों की शुद्धि के लिये लाकर रखे। मिट्टी, लकड़ी और लोहे के पात्रों की, धान्यों की, तिल आदि द्रव्यों की, वस्त्र आदि की तथा पर्युषित वस्तुओं की भस्म से शुद्धि होती है। कुत्ते आदि से दूषित हुए पात्रों की भी भस्म से ही शुद्धि मानी गयी है। वस्तु विशेष की शुद्धि के लिये यथायोग्य सजल अथवा निर्जल भस्म का उपयोग करना चाहिये। वेदाग्निजनित जो भस्म है, उसको उन-उन वैदिक कर्मों के अन्त में धारण करना चाहिये। मन्त्र और क्रिया से जनित जो होमकर्म है, वह अग्नि में भस्म का रूप धारण करता है। उस भस्म को धारण करने से वह कर्म आत्मा में आरोपित हो जाता है। अघोर मूर्तिधारी शिव का जो अपना मन्त्र है, उसे पढ़कर बेल की लकड़ी को जलाये। उस मन्त्र से अभिमन्त्रित अग्नि को शिवाग्नि कहा गया है। उसके द्वारा जले हुए काष्ठ का जो भस्म है, वह शिवाग्निजनित है। कपिला गाय के गोबर अथवा गायमात्र के गोबर को तथा शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर-इनकी लकड़ियों को शिवाग्नि से जलाये। वह शुद्ध भस्म शिवाग्निजनित माना गया है अथवा कुशा की अग्नि में शिवमन्त्र के उच्चारणपूर्वक काष्ठ को जलाये। फिर उस भस्म को कपड़े से अच्छी तरह छानकर नये घड़े में भरकर रख दे। उसे समय-समय पर अपनी कान्ति या शोभा की वृद्धि के लिये धारण करे। ऐसा करनेवाला पुरुष सम्मानित एवं पूजित होता है। पूर्वकाल में भगवान् शिव ने भस्म शब्द का ऐसा ही अर्थ प्रकट किया था। जैसे राजा अपने राज्य में सारभूत कर को ग्रहण करता है, जैसे मनुष्य सस्य आदि को जलाकर (राँधकर) उसका सार ग्रहण करते हैं तथा जैसे जठरानल नाना प्रकार के भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थों को भारी मात्रा में ग्रहण करके जलाता, जलाकर सारतर वस्तु ग्रहण करता और उस सारतर वस्तु से स्वदेह का पोषण करता है, उसी प्रकार प्रपंचकर्ता परमेश्वर शिव ने भी अपने में आधेयरूप से विद्यमान प्रपंच को जलाकर भस्मरूप से उसके सारतत्त्व को ग्रहण किया है। प्रपंच को दग्ध करके शिव ने उसके भस्म को अपने शरीर में लगाया है। राख, भभूत पोतने के बहाने जगत्‌ के सार को ही ग्रहण किया है। अपने शरीर में अपने लिये रत्नस्वरूप भस्म को इस प्रकार स्थापित किया है- आकाश के सारतत्त्व से केश, वायु के सारतत्त्व से मुख, अग्नि के सारतत्त्व से हृदय, जल के सारतत्त्व से कटिभाग और पृथ्वी के सारतत्त्व से घुटने को धारण किया है। इसी तरह उनके सारे अंग विभिन्न वस्तुओं के साररूप हैं। महेश्वर ने अपने ललाट में तिलकरूप से जो त्रिपुण्ड्र धारण किया है, वह ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का सारतत्त्व है। वे इन सब वस्तुओं को जगत्‌ के अभ्युदय का हेतु मानते हैं। इन भगवान् शिव ने ही प्रपंच के सार-सर्वस्व को अपने वश में किया है। अतः इन्हें अपने वश में करने वाला दूसरा कोई नहीं है। जैसे समस्त मृगों का हिंसक मृग सिंह कहलाता है और उसकी हिंसा करने वाला दूसरा कोई मृग नहीं है, अतएव उसे सिंह कहा गया है।

शकार का अर्थ है नित्यसुख एवं आनन्द, इकार का अर्थ है पुरुष और वकार का अर्थ है अमृतस्वरूपा शक्ति। इन सबका सम्मिलित रूप ही शिव कहलाता है। अतः इस रूप में भगवान् शिव को अपना आत्मा मानकर उनकी पूजा करनी चाहिये; अतः पहले अपने अंगों में भस्म मले। फिर ललाट में उत्तम त्रिपुण्ड्र धारण करे। पूजाकाल में सजल भस्म का उपयोग होता है और द्रव्यशुद्धि के लिये निर्जल भस्म का। गुणातीत परम शिव राजस आदि सविकार गुणों का अवरोध करते हैं- दूर हटाते हैं, इसलिये वे सबके गुरुरूप का आश्रय लेकर स्थित हैं। गुरु विश्वासी शिष्यों के तीनों गुणों को पहले दूर करके फिर उन्हें शिवतत्त्व का बोध कराते हैं, इसीलिये गुरु कहलाते हैं। गुरु की पूजा परमात्मा शिव की ही पूजा है। गुरु के उपयोग से बचा हुआ सारा पदार्थ आत्मशुद्धि करने वाला होता है। गुरु की आज्ञा के बिना उपयोग में लाया हुआ सब कुछ वैसा ही है, जैसे चोर चोरी करके लायी हुई वस्तु का उपयोग करता है। गुरु से भी विशेष ज्ञानवान् पुरुष मिल जाय तो उसे भी यत्नपूर्वक गुरु बना लेना चाहिये। अज्ञानरूपी बन्धन से छूटना ही जीवमात्र के लिये साध्य पुरुषार्थ है। अतः जो विशेष ज्ञानवान् है, वही जीव को उस बन्धन से छुड़ा सकता है।

जन्म और मरणरूप द्वन्द्व को भगवान् शिव की माया ने ही अर्पित किया है। जो इन दोनों को शिव की माया को ही अर्पित कर देता है, वह फिर शरीर के बन्धन में नहीं पड़ता। जब तक शरीर रहता है, तब तक जो क्रिया के ही अधीन है, वह जीव बद्ध कहलाता है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण- तीनों शरीरों को वश में कर लेने पर जीव का मोक्ष हो जाता है, ऐसा ज्ञानी पुरुषों का कथन है। मायाचक्र के निर्माता भगवान् शिव ही परम कारण हैं। वे अपनी माया के दिये हुए द्वन्द्व का स्वयं ही परिमार्जन करते हैं। अतः शिव के द्वारा कल्पित हुआ द्वन्द्व उन्हीं को समर्पित कर देना चाहिये। जो शिव की पूजा में तत्पर हो, वह मौन रहे, सत्य आदि गुणों से संयुक्त हो तथा क्रिया, जप, तप, ज्ञान और ध्यान में से एक-एक का अनुष्ठान करता रहे। ऐश्वर्य, दिव्य शरीर की प्राप्ति, ज्ञान का उदय, अज्ञान का निवारण और भगवान् शिव के सामीप्य का लाभ - ये क्रमशः क्रिया आदि के फल हैं। निष्काम कर्म करने से अज्ञान का निवारण हो जाने के कारण शिवभक्त पुरुष उसके यथोक्त फल को पाता है। शिवभक्त पुरुष देश, काल, शरीर और धन के अनुसार यथायोग्य क्रिया आदि का अनुष्ठान करे। न्यायोपार्जित उत्तम धन से निर्वाह करते हुए विद्वान् पुरुष शिव के स्थान में निवास करे। जीवहिंसा आदि से रहित और अत्यन्त क्लेशशून्य जीवन बिताते हुए पंचाक्षर मन्त्र के जप से अभिमन्त्रित अन्न और जल को सुखस्वरूप माना गया है अथवा कहते हैं कि दरिद्र पुरुष के लिये भिक्षा से प्राप्त हुआ अन्न ज्ञान देनेवाला होता है। शिवभक्त को भिक्षान्न प्राप्त हो तो वह शिवभक्ति को बढ़ाता है। शिवयोगी पुरुष भिक्षान्न को शम्भुसत्र कहते हैं। जिस किसी भी उपाय से जहाँ-कहीं भी भूतलपर शुद्ध अन्न का भोजन करते हुए सदा मौन- भाव से रहे और अपने साधन का रहस्य किसी पर प्रकट न करे। भक्तों के समक्ष ही शिव के महात्म्य को प्रकाशित करे। शिवमन्त्र के रहस्य को भगवान् शिव ही जानते हैं, दूसरा नहीं।

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साभार: गीताप्रेस गोरखपुर

शिव महापुराण - विद्येश्वर संहिता - अध्याय १७:*ष‌ड्लिंगस्वरूप प्रणव का माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूप (ॐकार) और स्थूल रूप (प...
22/10/2024

शिव महापुराण - विद्येश्वर संहिता - अध्याय १७:

*ष‌ड्लिंगस्वरूप प्रणव का माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूप (ॐकार) और स्थूल रूप (पंचाक्षरमन्त्र) का विवेचन, उसके जप की विधि एवं महिमा, कार्यब्रह्म के लोकों से लेकर कारणरुद्र के लोकों तक का विवेचन करके कालातीत, पंचावरण-विशिष्ट शिवलोक के अनिर्वचनीय वैभव का निरूपण तथा शिवभक्तों के सत्कार की महत्ता*

ऋषि बोले- प्रभो ! महामुने ! आप हमारे लिये क्रमशः षड्लिंगस्वरूप प्रणव का माहात्म्य तथा शिवभक्त के पूजन का प्रकार बताइये ।
सूतजी ने कहा-महर्षियों! आप लोग तपस्या के धनी हैं, आपने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न उपस्थित किया है। किंतु इसका ठीक-ठीक उत्तर महादेवजी ही जानते हैं, दूसरा कोई नहीं। तथापि भगवान् शिव की कृपा से ही मैं इस विषय का वर्णन करूँगा। वे भगवान् शिव हमारी और आप लोगों की रक्षा का भारी भार बारंबार स्वयं ही ग्रहण करें। 'प्र' नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसाररूपी महासागर का। प्रणव इससे पार करने के लिये दूसरी (नव) नाव है। इसलिये इस ओंकार को 'प्रणव' की संज्ञा देते हैं। ॐकार अपने जप करने वाले साधकों से कहता है- 'प्र-प्रपंच, न नहीं है, वः - तुम लोगों के लिये।' अतः इस भाव को लेकर भी ज्ञानी पुरुष 'ओम्' को 'प्रणव' नाम से जानते हैं। इसका दूसरा भाव यों है-'प्र-प्रकर्षेण, न-नयेत्, वः युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणवः। अर्थात् यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देगा।' इस अभिप्राय से भी इसे ऋषि-मुनि 'प्रणव' कहते हैं। अपना जप करने वाले योगियों के तथा अपने मन्त्र की पूजा करने वाले उपासक के समस्त कर्मों का नाश करके यह दिव्य नूतन ज्ञान देता है; इसलिये भी इसका नाम प्रणव है। उन मायारहित महेश्वर को ही नव अर्थात् नूतन कहते हैं। वे परमात्मा प्रकृष्टरूप से नव अर्थात् शुद्धस्वरूप हैं, इसलिये 'प्रणव' कहलाते हैं। प्रणव साधक को नव अर्थात् नवीन (शिवस्वरूप) कर देता है। इसलिये भी विद्वान् पुरुष उसे प्रणव के नाम से जानते हैं। अथवा प्रकृष्टरूप से नव- दिव्य परमात्मज्ञान प्रकट करता है, इसलिये वह प्रणव है।
प्रणव के दो भेद बताये गये हैं- स्थूल और सूक्ष्म। एक अक्षररूप जो 'ओम्' है, उसे सूक्ष्म प्रणव जानना चाहिये और 'नमः शिवाय' इस पाँच अक्षर वाले मन्त्र को स्थूल प्रणव समझना चाहिये। जिसमें पाँच अक्षर व्यक्त नहीं हैं, वह सूक्ष्म है और जिसमें पाँचों अक्षर सुस्पष्ट- रूप से व्यक्त हैं, वह स्थूल है। जीवन् मुक्त पुरुष के लिये सूक्ष्म प्रणव के जप का विधान है। वही उसके लिये समस्त साधनों का सार है। (यद्यपि जीवन् मुक्त के लिये किसी साधन की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह सिद्धरूप है, तथापि दूसरों की दृष्टि में जब तक उसका शरीर रहता है, तब तक उसके द्वारा प्रणव-जप की सहज साधना स्वतः होती रहती है।) वह अपनी देह का विलय होने तक सूक्ष्म प्रणव मन्त्र का जप और उसके अर्थभूत परमात्म-तत्त्व का अनुसंधान करता रहता है। जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिव को प्राप्त कर लेता है- यह सुनिश्चित बात है। जो अर्थ का अनुसंधान न करके केवल मन्त्र का जप करता है, उसे निश्चय ही योग की प्राप्ति होती है। जिसने छत्तीस करोड़ मन्त्र का जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जाता है। सूक्ष्म प्रणव के भी ह्रस्व और दीर्घ के भेद से दो रूप जानने चाहिये। अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद, शब्द, काल और कला- इनसे युक्त जो प्रणव है, उसे 'दीर्घ प्रणव' कहते हैं। वह योगियों के ही हृदय में स्थित होता है। मकारपर्यन्त जो ओम् है, वह अउ म्- इन तीन तत्त्वों से युक्त है। इसी को 'ह्रस्व प्रणव' कहते हैं। 'अ' शिव है, 'उ' शक्ति है और मकार इन दोनों की एकता है। वह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर ह्रस्व प्रणव का जप करना चाहिये। जो अपने समस्त पापों का क्षय करना चाहते हैं, उनके लिये इस ह्रस्व प्रणव का जप अत्यन्त आवश्यक है।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - ये पाँच भूत तथा शब्द, स्पर्श आदि इनके पाँच विषय-ये सब मिलकर दस वस्तुएँ मनुष्यों की कामना के विषय हैं। इनकी आशा मन में लेकर जो कर्मों के अनुष्ठान में संलग्न होते हैं, वे दस प्रकार के पुरुष प्रवृत्त (अथवा प्रवृत्तिमार्गी) कहलाते हैं तथा जो निष्कामभाव से शास्त्रविहित कर्मों का अनुष्ठान करते हैं, वे निवृत्त (अथवा निवृत्तिमार्गी) कहे गये हैं। प्रवृत्त पुरुषों को ह्रस्व प्रणव का ही जप करना चाहिये और निवृत्त पुरुषों को दीर्घ प्रणव का। व्याहृतियों तथा अन्य मन्त्रों के आदि में इच्छानुसार शब्द और कला से युक्त प्रणव का उच्चारण करना चाहिये। वेद के आदि में और दोनों संध्याओं की उपासना के समय भी ओंकार का उच्चारण करना चाहिये।

प्रणव का नौ करोड़ जप करने से मनुष्य शुद्ध हो जाता है। फिर नौ करोड़ का जप करने से वह पृथ्वीतत्त्व पर विजय पा लेता है। तत्पश्चात् पुनः नौ करोड़ का जप करके वह जल-तत्त्व को जीत लेता है। पुनः नौ करोड़ जप से अग्नितत्त्व पर विजय पाता है। तदनन्तर फिर नौ करोड़ का जप करके वह वायु-तत्त्व पर विजयी होता है। फिर नौ करोड़ के जप से आकाश को अपने अधिकार में कर लेता है। इसी प्रकार नौ-नौ करोड़ का जप करके वह क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द पर विजय पाता है, इसके बाद फिर नौ करोड़ का जप करके अहंकार को भी जीत लेता है। इस तरह एक सौ आठ करोड़ प्रणव का जप करके उत्कृष्ट बोध को प्राप्त हुआ पुरुष शुद्ध योग का लाभ करता है। शुद्ध योग से युक्त होने पर वह जीवन् मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। सदा प्रणव का जप और प्रणवरूपी शिव का ध्यान करते-करते समाधि में स्थित हुआ महायोगी पुरुष साक्षात् शिव ही है, इसमें संशय नहीं है। पहले अपने शरीर में प्रणव के ऋषि, छन्द और देवता आदि का न्यास करके फिर जप आरम्भ करना चाहिये। अकारादि मातृ का वर्णों से युक्त प्रणव का अपने अंगों में न्यास करके मनुष्य ऋषि हो जाता है। मन्त्रों के दशविध संस्कार, मातृकान्यास तथा षडध्वशोधन आदि के साथ सम्पूर्ण न्यासफल उसे प्राप्त हो जाता है। प्रवृत्ति तथा प्रवृत्ति-निवृत्ति से मिश्रित भाव वाले पुरुषों के लिये स्थूल प्रणव का जप ही अभीष्ट साधक होता है।

क्रिया, तप और जप के योग से शिव- योगी तीन प्रकार के होते हैं- जो क्रमशः क्रियायोगी, तपोयोगी और जपयोगी कहलाते हैं। जो धन आदि वैभवों से पूजा- सामग्री का संचय करके हाथ आदि अंगों से नमस्कारादि क्रिया करते हुए इष्टदेव- की पूजा में लगा रहता है, वह 'क्रियायोगी' कहलाता है। पूजा में संलग्न रहकर जो परिमित भोजन करता, बाह्य इन्द्रियों को जीतकर वश में किये रहता और मन को भी वश में करके परद्रोह आदि से दूर रहता है, वह 'तपोयोगी' कहलाता है। इन सभी सद्‌गुणों से युक्त होकर जो सदा शुद्धभाव से रहता तथा समस्त काम आदि दोषों से रहित हो। ॐ शान्तचित्त से निरन्तर जप किया करता है, उसे महात्मा पुरुष 'जपयोगी' मानते हैं। जो मनुष्य सोलह प्रकार के उपचारों से शिवयोगी महात्माओं की पूजा करता है, वह शुद्ध होकर सालोक्य आदि के क्रम से उत्तरोत्तर उत्कृष्ट मुक्ति को प्राप्त कर लेता है।

द्विजों ! अब मैं जपयोग का वर्णन करता हूँ। तुम सब लोग ध्यान देकर सुनो। तपस्या करने वाले के लिये जप का उपदेश किया गया है; क्योंकि वह जप करते करते अपने-आप को सर्वथा शुद्ध (निष्याप) कर लेता है। ब्राह्मणों ! पहले 'नमः' पद हो, उसके बाद चतुर्थी विभक्ति में 'शिव' शब्द हो तो पंचतत्त्वात्मक 'नमः शिवाय' मन्त्र होता है। इसे 'शिव पंचाक्षर' कहते हैं। यह स्थूल प्रणवरूप है। इस पंचाक्षर के जप से ही मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। पंचाक्षरमन्त्र के आदि में ओंकार लगाकर ही सदा उसका जप करना चाहिये। द्विजों ! गुरु के मुख से पंचाक्षरमन्त्र का उपदेश पाकर जहाँ सुखपूर्वक निवास किया जा सके, ऐसी उत्तम भूमि पर महीने के पूर्वपक्ष (शुक्ल) में (प्रतिपदा से) आरम्भ करके कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तक निरन्तर जप करता रहे। माघ और भादों के महीने अपना विशिष्ट महत्त्व रखते हैं। यह समय सब समयों से उत्तमोत्तम माना गया है। साधक को चाहिये कि वह प्रतिदिन एक बार परिमित भोजन करे, मौन रहे, इन्द्रियों को वश में रखे, अपने स्वामी एवं माता-पिता की नित्य सेवा करे। इस नियम से रहकर जप करने वाला पुरुष एक सहस्त्र जप से ही शुद्ध हो जाता है, अन्यथा वह ऋणी होता है । भगवान् शिव का निरन्तर चिन्तन करते हुए पंचाक्षरमन्त्र का पाँच लाख जप करे। जपकाल में इस प्रकार ध्यान करे - कल्याणदाता भगवान् शिव कमल के आसन पर विराजमान हैं। उनका मस्तक श्रीगंगाजी तथा चन्द्रमा की कला से सुशोभित है। उनकी बायीं जाँघ पर आदिशक्ति भगवती उमा बैठी हैं। वहाँ खड़े हुए बड़े-बड़े गण भगवान् शिव की शोभा बढ़ा रहे हैं। महादेवजी अपने चार हाथों में मृगमुद्रा, टंक तथा वर एवं अभय की मुद्राएँ धारण किये हुए हैं। इस प्रकार सदा सब पर अनुग्रह करने वाले भगवान् सदाशिव का बारंबार स्मरण करते हुए हृदय अथवा सूर्यमण्डल में पहले उनकी मानसिक पूजा करके फिर पूर्वाभिमुख हो पूर्वोक्त पंचाक्षरी विद्या का जप करे। उन दिनों साधक सदा शुद्ध कर्म ही करे (और दुष्कर्म से बचा रहे)। जप की समाप्ति के दिन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को प्रातःकाल नित्यकर्म करके शुद्ध एवं सुन्दर स्थान में शौच संतोषादि नियमों से युक्त हो शुद्ध हृदय से पंचाक्षरमन्त्र का बारह सहस्त्र जप करे। तत्पश्चात् पाँच सपत्नीक ब्राह्मणों का, जो श्रेष्ठ एवं शिवभक्त हों, वरण करे। इनके अतिरिक्त एक श्रेष्ठ आचार्यप्रवर का भी वरण करे और उसे साम्ब सदाशिव का स्वरूप समझे। ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात - इन पाँचों के प्रतीकस्वरूप पाँच ही श्रेष्ठ और शिवभक्त ब्राह्मणों का वरण करने के पश्चात् पूजन- सामग्री को एकत्र करके भगवान् शिव का पूजन आरम्भ करे। विधिपूर्वक शिव की पूजा सम्पन्न करके होम आरम्भ करे।

अपने गृह्यसूत्र के अनुसार सुखान्त कर्म करके अर्थात् परिसमूहन, उपलेपन, उल्लेखन, मृद्-उद्धरण और अभ्युक्षण- इन पंच भू-संस्कारों के पश्चात् वेदी पर स्वाभिमुख अग्नि को स्थापित करके कुशकण्डिका के अनन्तर प्रज्वलित अग्नि में आज्यभागान्त आहुति देकर प्रस्तुत होम का कार्य आरम्भ करे। कपिला गाय के घी से ग्यारह, एक सौ एक अथवा एक हजार एक आहुतियाँ स्वयं ही दे अथवा विद्वान् पुरुष शिवभक्त ब्राह्मणों से एक सौ आठ आहुतियाँ दिलाये। होमकर्म समाप्त होने पर गुरु को दक्षिणा के रूप में एक गाय और बैल देने चाहिये। ईशान आदि के प्रतीकरूप जिन पाँच ब्राह्मणों का वरण किया गया हो, उनको ईशान आदि का स्वरूप ही समझे तथा आचार्य को साम्ब सदाशिव का स्वरूप माने। इसी भावना के साथ उन सबके चरण धोये और उनके चरणोदक से अपने मस्तक को सींचे। ऐसा करने से वह साधक अगणित तीर्थों में तत्काल स्नान करने का फल प्राप्त कर लेता है। उन ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक दशांश अन्न देना चाहिये। गुरुपत्नी को पराशक्ति मानकर उनका भी पूजन करे। ईशानादि-क्रम से उन सभी ब्राह्मणों का उत्तम अन्न से पूजन करके अपने वैभव-विस्तार के अनुसार रुद्राक्ष, वस्त्र, बड़ा और पूआ आदि अर्पित करे। तदनन्तर दिक्पालादि को बलि देकर ब्राह्मणों को भरपूर भोजन कराये। इसके बाद देवेश्वर शिव से प्रार्थना करके अपना जप समाप्त करे। इस प्रकार पुरश्चरण करके मनुष्य उस मन्त्र को सिद्ध कर लेता है। फिर पाँच लाख जप करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है। तदनन्तर पुनः पाँच लाख जप करने पर अतल से लेकर सत्यलोक तक चौदहों भुवनों पर क्रमशः अधिकार प्राप्त हो जाता है।

यदि अनुष्ठान पूर्ण होने के पहले बीच में ही साधक की मृत्यु हो जाय तो वह परलोक में उत्तम भोग भोगने के पश्चात् पुनः पृथ्वी पर जन्म लेकर पंचाक्षरमन्त्र के जप का अनुष्ठान करता है। समस्त लोकों का ऐश्वर्य पाने के पश्चात् वह मन्त्र को सिद्ध करने वाला पुरुष यदि पुनः पाँच लाख जप करे तो उसे ब्रह्माजी का सामीप्य प्राप्त होता है। पुनः पाँच लाख जप करने से सारूप्य नामक ऐश्वर्य प्राप्त होता है। सौ लाख जप करने से वह साक्षात् ब्रह्मा के समान हो जाता है। इस तरह कार्य-ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) का सायुज्य प्राप्त करके वह उस ब्रह्मा का प्रलय होने तक उस लोक में यथेष्ट भोग भोगता है। फिर दूसरे कल्प का आरम्भ होने पर वह ब्रह्माजी का पुत्र होता है। उस समय फिर तपस्या करके दिव्य तेज से प्रकाशित हो वह क्रमशः मुक्त हो जाता है। पृथ्वी आदि कार्यस्वरूप भूतों द्वारा पाताल से लेकर सत्यलोक पर्यन्त ब्रह्माजी के चौदह लोक क्रमशः निर्मित हुए हैं। सत्यलोक से ऊपर क्षमालोक तक जो चौदह भुवन हैं, वे भगवान् विष्णु के लोक हैं। क्षमालोक से ऊपर शुचिलोक पर्यन्त अट्ठाईस भुवन स्थित हैं। शुचिलोक के अन्तर्गत कैलास में प्राणियों का संहार करने वाले रुद्रदेव विराजमान हैं। शुचिलोक से ऊपर अहिंसालोक पर्यन्त छप्पन भुवनों की स्थिति है। अहिंसालोक का आश्रय लेकर जो ज्ञानकैलास नामक नगर शोभा पाता है, उसमें कार्यभूत महेश्वर सबको अदृश्य करके रहते हैं। अहिंसालोक के अन्त में कालचक्र की स्थिति है। यहाँ तक महेश्वर के विराट् स्वरूप का वर्णन किया गया। वहीं तक लोकों का तिरोधान अथवा लय होता है। उससे नीचे कर्मों का भोग है और उससे ऊपर ज्ञान का भोग। उसके नीचे कर्ममाया है और उसके ऊपर ज्ञानमाया।

(अब मैं कर्ममाया और ज्ञानमायाका तात्पर्य बता रहा हूँ-) 'मा' का अर्थ है लक्ष्मी। उससे कर्मभोग यात - प्राप्त होता है। इसलिये वह माया अथवा कर्ममाया कहलाती है। इसी तरह मा अर्थात् लक्ष्मी से ज्ञानभोग यात अर्थात् प्राप्त होता है। इसलिये उसे माया या ज्ञानमाया कहा गया है। उपर्युक्त सीमा से नीचे नश्वर भोग हैं और ऊपर नित्य भोग। उससे नीचे ही तिरोधान अथवा लय है, ऊपर नहीं। वहाँ से नीचे ही कर्ममय पाशों द्वारा बन्धन होता है। ऊपर बन्धन का सदा अभाव है। उससे नीचे ही जीव सकाम कर्मों का अनुसरण करते हुए विभिन्न लोकों और योनियों में चक्कर काटते हैं। उससे ऊपर के लोकों में निष्काम कर्म का ही भोग बताया गया है। बिन्दुपूजा में तत्पर रहने वाले उपासक वहाँ से नीचे के लोकों में ही घूमते हैं। उसके ऊपर तो निष्कामभाव से शिवलिंग की पूजा करने वाले उपासक ही जाते हैं। जो एकमात्र शिव की ही उपासना में तत्पर हैं, वे उससे ऊपर के लोकों में जाते हैं। वहाँ से नीचे जीवकोटि है और ऊपर ईश्वरकोटि। नीचे संसारी जीव रहते हैं और ऊपर मुक्त पुरुष। नीचे कर्मलोक है और ऊपर ज्ञानलोक । ऊपर मद और अहंकार का नाश करनेवाली नग्नता है, वहाँ जन्मजनित तिरोधान नहीं है। उसका निवारण किये बिना वहाँ किसी का प्रवेश सम्भव नहीं है। इस प्रकार तिरोधान का निवारण करने से वहाँ ज्ञानशब्द का अर्थ ही प्रकाशित होता है। आधिभौतिक पूजा करनेवाले लोग उससे नीचे के लोकों में ही चक्कर काटते हैं। जो आध्यात्मिक उपासना करने वाले हैं वे ही उससे ऊपर को जाते हैं। जो सत्य, अहिंसा आदि धर्मों से युक्त हो भगवान् शिव के पूजन में तत्पर रहते हैं, वे कालचक्र को पार कर जाते हैं। काल-चक्रेश्वर की सीमा तक जो विराट् महेश्वरलोक बताया गया है, उससे ऊपर वृषभ के आकार में धर्म की स्थिति है। वह ब्रह्मचर्य का मूर्तिमान् रूप हैं। उसके सत्य, शौच, अहिंसा और दया- ये चार पाद हैं। वह साक्षात् शिवलोक के द्वार पर खड़ा है। क्षमा उसके सींग हैं, शम कान है, वह वेदध्वनिरूपी शब्द से विभूषित है। आस्तिकता उसके दोनों नेत्र हैं, विश्वास ही उसकी श्रेष्ठ बुद्धि एवं मन है। क्रिया आदि धर्मरूपी जो वृषभ हैं, वे कारण आदि में स्थित हैं- ऐसा जानना चाहिये। उस क्रियारूप वृषभाकार धर्म पर कालातीत शिव आरूढ़ होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर की जो अपनी-अपनी आयु है, उसी को दिन कहते हैं। जहाँ धर्मरूपी वृषभ की स्थिति है, उससे ऊपर न दिन है न रात्रि। वहाँ जन्म-मरण आदि भी नहीं हैं। वहाँ फिर से कारणस्वरूप ब्रह्मा के कारण सत्यलोकपर्यन्त चौदह लोक स्थित हैं, जो पांचभौतिक गन्ध आदि से परे हैं। उनकी सनातन स्थिति है। सूक्ष्म गन्ध ही उनका स्वरूप है। उनसे ऊपर फिर कारणरूप विष्णु के चौदह लोक स्थित हैं। उनसे भी ऊपर फिर कारणरूपी रुद्र के अट्ठाईस लोकों की स्थिति मानी गयी है। फिर उनसे भी ऊपर कारणेश शिव के छप्पन लोक विद्यमान हैं। तदनन्तर शिवसम्मत ब्रह्मचर्यलोक है और वहीं पाँच आवरणों से युक्त ज्ञानमय कैलास है, जहाँ पाँच मण्डलों, पाँच ब्रह्मकलाओं और आदिशक्ति से संयुक्त आदिलिंग प्रतिष्ठित है। उसे परमात्मा शिव का शिवालय कहा गया है। वहीं पराशक्ति से युक्त परमेश्वर शिव निवास करते हैं। वे सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह- इन पाँचों कृत्यों में प्रवीण हैं। उनका श्रीविग्रह सच्चिदानन्दस्वरूप है। वे सदा ध्यानरूपी धर्म में ही स्थित रहते हैं और सदा सब पर अनुग्रह किया करते हैं। वे स्वात्माराम हैं और समाधिरूपी आसन पर आसीन हो नित्य विराजमान होते हैं। कर्म एवं ध्यान आदि का अनुष्ठान करने से क्रमशः साधनपथ में आगे बढ़ने पर उनका दर्शन साध्य होता है। नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मों द्वारा देवताओं का यजन करने से भगवान् शिव के समाराधन- कर्म में मन लगता है। क्रिया आदि जो शिवसम्बन्धी कर्म हैं, उनके द्वारा शिवज्ञान सिद्ध करे। जिन्होंने शिवतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है अथवा जिनपर शिव की कृपादृष्टि पड़ चुकी है, वे सब मुक्त ही हैं- इसमें संशय नहीं है। आत्मस्वरूप से जो स्थिति है, वही मुक्ति है। एकमात्र अपने आत्मा में रमण या आनन्द का अनुभव करना ही मुक्ति का स्वरूप है। जो पुरुष क्रिया, तप, जप, ज्ञान और ध्यानरूपी धर्मों में भलीभाँति स्थित है, वह शिव का साक्षात्कार करके स्वात्मारामत्वरूप मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है। जैसे सूर्यदेव अपनी किरणों से अशुद्धि को दूर कर देते हैं, उसी प्रकार कृपा करने में कुशल भगवान् शिव अपने भक्त के अज्ञान को मिटा देते हैं। अज्ञान की निवृत्ति हो जाने पर शिवज्ञान स्वतः प्रकट हो जाता है। शिवज्ञान से अपना विशुद्ध स्वरूप आत्मारामत्व प्राप्त होता है और आत्मारामत्व की सम्यक् सिद्धि हो जाने पर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

इस तरह यहाँ जो कुछ बताया गया है। वह पहले मुझे गुरुपरम्परा से प्राप्त हुआ था। तत्पश्चात् मैंने पुनः नन्दीश्वर के मुख से इस विषय को सुना था। नन्दिस्थान से परे जो स्वसंवेद्य शिव-वैभव है, उसका अनुभव केवल भगवान् शिव को ही है। साक्षात् शिवलोक के उस वैभव का ज्ञान सबको शिव की कृपा से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं- ऐसा आस्तिक पुरुषों का कथन है। साधक को चाहिये कि वह पाँच लाख जप करने के पश्चात् भगवान् शिव की प्रसन्नता के लिये महाभिषेक एवं नैवेद्य निवेदन करके शिवभक्तों का पूजन करे। भक्त की पूजा से भगवान् शिव बहुत प्रसन्न होते हैं। शिव और उनके भक्त में कोई भेद नहीं है। वह साक्षात् शिवस्वरूप ही है। शिवस्वरूप मन्त्र को धारण करके वह शिव ही हो गया रहता है। शिवभक्त का शरीर शिवरूप ही है। अतः उसकी सेवा में तत्पर रहना चाहिये। जो शिव के भक्त हैं, वे लोक और वेद की सारी क्रियाओं को जानते हैं। जो क्रमशः जितना-जितना शिवमन्त्र का जप कर लेता है, उसके शरीर को उतना ही-उतना शिव का सामीप्य प्राप्त होता जाता है, इसमें संशय नहीं है। शिवभक्त स्त्री का रूप देवी पार्वती का ही स्वरूप है। वह जितना मन्त्र जपती है, उसे उतना ही देवी का सांनिध्य प्राप्त होता जाता है। साधक स्वयं शिवस्वरूप होकर पराशक्ति का पूजन करे। शक्ति, वेर तथा लिंग का चित्र बनाकर अथवा मिट्टी आदि से इनकी आकृति का निर्माण करके प्राणप्रतिष्ठापूर्वक निष्कपट- भाव से इनका पूजन करे। शिवलिंग को शिव मानकर, अपने को शक्तिरूप समझकर, शक्तिलिंग को देवी मानकर और अपने को शिवरूप समझकर, शिवलिंग को नादरूप तथा शक्ति को बिन्दुरूप मानकर परस्पर सटे हुए शक्तिलिंग और शिवलिंग के प्रति उपप्रधान और प्रधान की भावना रखते हुए जो शिव और शक्ति का पूजन करता है, वह मूलरूप की भावना करने के कारण शिवरूप ही है। शिवभक्त शिव-मन्त्ररूप होने के कारण शिव के ही स्वरूप हैं। जो सोलह उपचारों से उनकी पूजा करता है, उसे अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। जो शिवलिंगोपासक शिवभक्त की सेवा आदि करके उसे आनन्द प्रदान करता है, उस विद्वान् पर भगवान् शिव बड़े प्रसन्न होते हैं। पाँच, दस या सौ सपत्नीक शिवभक्तों को बुलाकर भोजन आदि के द्वारा पत्नीसहित उनका सदैव समादर करे। धन में, देह में और मन्त्र में शिवभावना रखते हुए उन्हें शिव और शक्ति का स्वरूप जानकर निष्कपट- भाव से उनकी पूजा करे। ऐसा करने वाला पुरुष इस भूतल पर फिर जन्म नहीं लेता।

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साभार: गीताप्रेस गोरखपुर

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