30/03/2026
वृंदावन में एक कृष्ण दास बाबा थे , उन्होंने कहीं किसी ग्रन्थ में पढ़ लिया कि अगर कोई सेवा बिना नागा किये लगातार प्रति दिन बारह वर्ष तक करी जाए तो फिर आप जो चाहो वो मिल जाएगा। बाबा ने निश्चय किया कि मैं बारह वर्ष तक लगातार कृष्ण जी को माला पहनाऊँगा और मुझे इसका फल बस ये चाहिए कि तेरहवें वर्ष के पहले दिन ठाकुर जी मुझसे माला पहनने मेरी कुटिया पर आवें। अब बाबा रोज माला पहनाने ठाकुर जी के मंदिर जाएँ , रोज़ ठाकुर जी को याद दिलाएं कि लाला अब इतने दिन हो गए , अब इतने दिन रह गए। बारहवें वर्ष के अंतिम दिन बाबा ने ठाकुर जी को माला पहनाते हुए कहा मेरी सेवा पूर्ण हुई , अब आपको आना है कल, मैं छप्पन भोग तैयार कर के रखूँगा।
अगले दिन बाबा ने खूब सवेरे उठकर छप्पन भोग तैयार किये, कुटिया सजाई, और ठाकुर जी की राह देखने लगे, राह देखते देखते अर्धरात्रि के करीब समय हो गया, मंदिर में शयन आरती भी हो गयी। अब बाबा को निश्चित हो गया कि ठाकुर जी नहीं आएंगे, बाबा ने ठाकुर जी को बुरा भला कहना शुरू कर दिया, अरे मेरी ही गलती थी, वो तो है ही छलिया, यशोदा मइया से दो दिन की कह के गया फिर आया ही नहीं, बारह साल मैं किसी और की आराधना करता तो मेरा भला हो जाता, अब मैं एक क्षण भी नहीं रहूंगा यहाँ और क्रोध में बाबा ने अपनी कुटिया तोड़ दी और उपवन उजाड़ दिया, और सारा छप्पन भोग अपनी पोटली में बाँध कर चल दिये, लेकिन जाते भी कहाँ, उन्होंने सोचा बाराह वर्ष कृष्ण को दिए अब बारह दिन श्रीजी को देकर देखता हूँ और बरसाना की तरफ चल दिये।
तभी गायों का एक झुंड निकला, और निकलता ही चला गया, बाबा किनारे खड़े हो कर झुंड के पार होने की प्रतीक्षा करने लगे, पाँच मिनट हो गए, दस मिनट हो गए, एक घंटा हो गया गाये खत्म ही नहीं हुई, वो आती गईं, इतने में ही एक नन्हा बालक जो इन गायों का ग्वाल प्रतीत हुआ वो बाबा को दिखा, बाबा ने उससे पूछा ये किसकी गायें हैं और कितनी हैं , ये तो चलती चली जा रहीं हैं, उस ग्वाले ने बताया कि ये नंद भवन की गाय हैं, पूरी नौ लाख हैं, अभी दो चार घंटे और लगेंगे तब तक आप यहीं किनारे ही बैठ जाओ। बाबा बैठ गए, सुबह से उन्होंने कुछ खाया पिया नहीं था, ग्वाले ने कहा बाबा तुम्हारे पोटली में से तो बड़ी खुश्बू आ रही है, मुझे भूख लग रही है, कुछ खाने के लिए दे दो, बाबा ने पोटली खोली , भूख उनको भी लगी थी, वो अभी भी द्रवित थे कि ठाकुर जी ने उनके खाने का भोग नहीं लगाया, उस ग्वाले ने कहा मेरे हाथ मे गोबर लगा है, आप अपने हाथ से खिला दो, उन्होंने जैसे ही पहला निवाला उस ग्वाले के को खिलाया, उस बालक की आँखें सजल हो गयी, बाबा ने पूछा क्या बात है तू रो क्यों रहा है, ग्वाला बोला, बाबा मैं आज सुबह से प्रतीक्षा कर रहा था किसी ने मुझे माला नहीं पहनाई , बाबा इतना सुनते ही चौंक गए, बोले अरे कन्हैया तू, और ठाकुर जी से लिपट गए, ठाकुर जी तुरंत अपने स्वरूप में आये, कुछ क्षण तो बाबा भाव विभोर हुए, किंतु उन्होंने कृष्ण जी से अलग हो कर बोला, मैं जानता हूँ आज तू क्यों आया है, बारह वर्ष तक तो एक क्षण भी अनुभूति नहीं दी लेकिन आज जैसे ही मैंने बरसाने की तरफ श्रीजी के पास जाने के लिए पग बढ़ाये वैसे ही तू आ गया, जब तू केवल उनकी तरफ पग बढ़ाने से ही दर्शन दे देता है तो अगर मैं किशोरी जी के चरणों मे ही पड़ा रहूँ तब क्या होगा। यह कहकर ही बाबा ठाकुर जी को छोड़ कर बरसाने की तरफ भागे और ठाकुर जी उनको रोकने के लिए पीछे पीछे भागे। बाबा ने शेष जीवन बरसाने में श्री जी के चरणों मे व्यतीत किया और कृष्णदास से किशोरीदास हो गए।