Radhey priya krishna sakhi Diwana

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जय श्री राधेकृष्ण शुभ प्रभात दोस्तो ~~~~~~~~~~~यदि आप अनुभव करते हैं कि आपका चरित्र वैसा नहीं है जैसा आप चाहते हैं, तो य...
10/03/2024

जय श्री राधेकृष्ण
शुभ प्रभात दोस्तो
~~~~~~~~~~~

यदि आप अनुभव करते हैं कि आपका चरित्र वैसा नहीं है जैसा आप चाहते हैं, तो याद रखिए कि उसे और किसी ने नहीं बल्कि स्वयं आपने वैसा बनाया है। बेशक बाहरी प्रभाव भी इसके लिए ज़िम्मेदार होते हैं, परंतु आंतरिक स्वीकृति ही इसे मुख्यत: निर्धारित करती है ।।

30/11/2020

मित्रों आज सोमवार है, भगवान भोलेनाथ का दिन है। आज हम इन्हीं की महिमा का गुणगान करेगें!!!!!!!!!!

*कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥

भावार्थ:-जिनका कुंद के पुष्प और चन्द्रमा के समान (गौर) शरीर है, जो पार्वतीजी के प्रियतम और दया के धाम हैं और जिनका दीनों पर स्नेह है, वे कामदेव का मर्दन करने वाले (शंकरजी) मुझ पर कृपा करें॥

शास्त्र कहते हैं कि भोलेनाथ शिवजी प्रथम महायोगी है, योग शिक्षा के अनुसार भगवान् शिवजी को ही प्रथम योगी तथा आदिगुरु के रूप में माना गया है, कई हजारों वर्ष पूर्व हिमालय में अदियोगी भगवान् शिवजी ने ही अपने गहरे ज्ञान को पौराणिक सप्तऋिषियों को प्रदान किया, ये ऋषि इस शक्तिशाली योग विज्ञान को पूरे संसार में लेकर गयें, लेकिन केवल भारत मे ही योग परम्परा पूरी तरह से विकसित हुयीं।

सप्तऋिषियों ने योग का जीवन शैली के रूप से चारों और इस संस्कृति का निर्माण किया, भगवान् शिव को स्वयंभू इसलिये कहा जाता है, क्योंकि वे आदिदेव हैं, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था सिर्फ वही थे, उन्हीं से धरती पर सब कुछ हो गया, कैलाश पर्वत पर प्रारम्भ में उनका निवास रहा, भगवान् शिवजी कहते हैं कि योग के बिना मनुष्य पशु है।

योग में मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- जागरण, अभ्यास और समर्पण, तंत्रयोग है समर्पण का मार्ग, जब शिवजी ने जाना क‍ि उस परम तत्व या सत्य को जानने का मार्ग है, तो उन्होंने अपनी अर्धांगिनी पार्वतीजी को मोक्ष हेतु वह मार्ग बताया, शिवजी द्वारा माँ पार्वतीजी को जो ज्ञान दिया गया वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखायें हो चली हैं, वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों मे सम्मिलित हैं।

विज्ञान भैरव तंत्र एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान् भोलेनाथ द्वारा पार्वती को बतायें गये एक सो बारह ध्यान सूत्रों का संकलन है, योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान् शिवजी के विज्ञान भैरव तंत्र और शिव संहिता में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है, तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है, भगवान् शिवजी के योग को तंत्र या वामयोग भी कहते हैं, इसी की एक शाखा हठयोग की हैं।

भगवान् शिवजी के अनुसार "वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य" अर्थात वाम मार्ग अत्यन्त गहन है और योगियों के लिये भी अगम्य है, शिवयोग में धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग का ही प्रचलन अधिक रहा है, पतंजलि के बाद बहुत से ऋषियों और योग गुरुओं ने अच्छी तरह से लिखे गये अभ्यासों और साहित्य के माध्यम से इस विषय को संरक्षित करने और इसका विकास करने में महान योगदान दिया, जिसमे बाबा रामदेवजी का उल्लेखनीय योगदान है।

प्राचीन समय से लेकर आज तक प्रमुख योग गुरुओं की शिक्षाओं के माध्यम से योग संसार भर में फैला है, योग अभ्यास बीमारियों से बचाता है, स्वास्थ्य को बनाये रखता है तथा स्वस्थ जीवन प्रदान करता है, ओऊम् नम: शिवाय, ओम' प्रथम नाम परमात्मा का फिर नमन शिवजी को करते हैं, "सत्यम, शिवम और सुंदरम" जो सत्य है वह ब्रह्म है, ब्रह्म अर्थात परमात्मा, जो शिव है वह परम शुभ और पवित्र है, और जो सुंदरम है वही प्रकृति है, अर्थात परमात्मा।

सज्जनों! शिवजी और पार्वती के अलावा कुछ भी जानने योग्य नहीं है, इन्हें जानना और इन्हीं में लीन हो जाने का मार्ग है योग, आदि पुरुष यानी आदि का अर्थ प्रारम्भ, शिवजी को आदिदेव या आदिनाथ कहा जाता है, नाथ और शैव सम्प्रदाय के आदिदेव, शिवजी से ही योग का जन्म माना गया है, वैदिककाल के रुद्र का स्वरूप और जीवन दर्शन पौराणिक काल आते-आते पूरी तरह से बदल गया, वेद जिन्हें रुद्र कहते है, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं।

शिवजी का न प्रारंभ है और न अंत हैं, ज्योतिषियों और पुराणिकों की धारणा से सर्वथा भिन्न है, भगवान् शंकरजी का दर्शन और जीवन, उनके इस दर्शन और ‍‍जीवन को जो समझता है वही महायोगी के मर्म, कर्म और मार्ग को भी समझता है, ऋग्वेद में वृषभदेव का वर्णन मिलता है, जो जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथजी हैं, उन्हें ही वातरशना मुनि‍‍‍ कहा गया है, उनका जीवन अवधूत जैसा ब‍ताते है।

योगयुक्त व्यक्ति ही अवधूत हो सकता है, माना जाता है कि शिवजी के बाद मूलत: उन्हीं से एक ऐसी परम्परा की शुरुआत हुई जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगम्बर और सूफी सम्प्रदाय में वि‍भक्त हो गई, इस्लाम के प्रभाव में आकर सूफियों से कमंडल और धूना छूट गया, लेकिन चिमटा और खप्पर आज भी नहीं छूटा, जो माला रुद्राक्ष की होती थी, वह अब हरे, पीले, सफेद, मोतियों की होती है, जो कुछ है सब उस योगेश्वर शिवजी के प्रति ही है।

भगवान् शिवजी के निराकार स्वरूप को शिव और साकार स्वरूप को शंकर कहते हैं, शैव और नाथ सम्प्रदाय की बहुत प्राचीन परम्परा रही है, जैन और नाथ सम्प्रदाय में जिन नौ नाथ की चर्चा की गई है वह सभी योगी ही थे और शिव के अनुगामी ही थे, शिवजी के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वह सद्बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं।

शिवजी का दर्शन कहता है कि यथार्थ में ज‍ीयो, वर्तमान में जीयो अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिये उपयोग करो, सर्व प्रथम शिवजी ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है, शिवयोग को तंत्र या वामयोग भी कहते हैं, शिवयोग में धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग का ही प्रचलन अधिक रहा है।

शिवजी के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है और इस भिन्नता का कारण है परम्परा और भाषा का बदलते रहना, भाई-बहनों, भगवान् शिवजी तो सृष्टि के प्रथम योगी थे, शिवजी के बगैर योग की व्याख्या का कोई औचित्य नहीं है,आज सोमवार के पावन दिवस की पावन सुप्रभात् आप सभी को मंगलमय् हो।

ओऊम् नम: शिवाय्
हर हर महादेव!

12/11/2020

मित्रों आज नरक चतुर्दशी है। नरक चतुर्दशी रूप चतुर्दशी कथा,पूजन विधि!!!!!!!

नरक चतुर्दशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को कहा जाता है। नरक चतुर्दशी को ‘छोटी दीपावली’ भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त इस चतुर्दशी को ‘नरक चौदस’, ‘रूप चौदस’, ‘रूप चतुर्दशी’, ‘नर्क चतुर्दशी’ या ‘नरका पूजा’ के नाम से भी जाना जाता है।

नरक चतुर्दशी का महत्व !!!!!!

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है।दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं। इस चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज जी की पूजा व उपासना की जाती है।

अन्य प्रसंगानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह में कृष्ण चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करके देवताओं व ऋषियोंको उसके आतंक से मुक्ति दिलवाई थी। इसके साथ ही कृष्ण भगवान ने सोलह हज़ार कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त करवाया। इसी उपलक्ष्य में नगरवासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया। तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा।

नरक चतुर्दशी कथा !!!!!!!!

प्राचीन समय में एक रन्तिदेव नामक राजा था। वह हमेशा धर्म – कर्म के काम में लगा रहता था। जब उनका अंतिम समय आया तब उन्हें लेने के लिए यमराज के दूत आये और उन्होंने कहा कि राजन अब आपका नरक में जाने का समय आ गया हैं।

नरक में जाने की बात सुनकर राजा हैरान रह गये और उन्होंने यमदूतों से पूछा की मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया। मैंने हमेशा अपना जीवन अच्छे कार्यों को करने में व्यतीत किया।

तो आप मुझे नरक में क्यों ले जा रहे हो। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि एक बार राजन तुम्हारे महल के द्वारा एक ब्राहमण आया था जो भूखा ही तुम्हारे द्वारा से लौट गया। इस कारण ही तुन्हें नरक में जाना पड रहा हैं।

यह सब सुनकर राजा ने यमराज से अपनी गलती को सुधारने के लिए एक वर्ष का अतिरिक्त समय देने की प्रार्थना की। यमराज ने राजा के द्वारा किये गये नम्र निवेदन को स्वीकार कर लिया और उन्हें एक वर्ष का समय दे दिया। यमदूतों से मुक्ति पाने के बाद राजा ऋषियों के पास गए और उन्हें पूर्ण वृतांत विस्तार से सुनाया।

यह सब सुनकर ऋषियों ने राजा को एक उपाय बताया। जिसके अनुसार ही उसने कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन व्रत रखा और ब्राहमणों को भोजन कराया जिसके बाद उसे नरक जाने से मुक्ति मिल गई। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।

रूप चतुर्दशी कथा !!!!!!!

प्राचीन समय पहले हिरण्यगर्भ नामक राज्य में एक योगी रहा करते थे। एक बार योगीराज ने प्रभु को पाने की इच्छा से समाधि धारण करने का प्रयास किया। अपनी इस तपस्या के दौरान उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पडा़। उनकी देह पर कीड़े पड़ गए, बालों, रोओं और भौंहों पर जुएँ पैदा हो गई।

अपनी इतनी विभत्स दशा के कारण वह बहुत दुखी होते हैं। तभी विचरण करते हुए नारद जी उन योगी राज जी के पास आते हैं और उन योगीराज से उनके दुख का कारण पूछते हैं। योगीराज उनसे कहते हैं कि, हे मुनिवर मैं प्रभु को पाने के लिए उनकी भक्ति में लीन रहा परंतु मुझे इस कारण अनेक कष्ट हुए हैं ऎसा क्यों हुआ?

योगी के करूणा भरे वचन सुनकर नारदजी उनसे कहते हैं, हे योगीराज तुमने मार्ग तो उचित अपनाया किंतु देह आचार का पालन नहीं जान पाए इस कारण तुम्हारी यह दशा हुई है।

नारद जी के कथन को सुन, योगीराज उनसे देह आचार के विषय में पूछते हैं इस पर नारदजी उन्हें कहते हैं कि सर्वप्रथम आप कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा अराधना करें क्योंकि ऎसा करने से आपका शरीर पुन: पहले जैसा स्वस्थ और रूपवान हो जाएगा।

तब आप मेरे द्वारा बताए गए देह आचार को कर सकेंगे। नारद जी के वचन सुन योगीराज ने वैसा ही किया और उस व्रत के फलस्वरूप उनका शरीर पहले जैसा स्वस्थ एवं सुंदर हो गया। अत: तभी से इस चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी के नाम से जाना जाने लगा।

इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर शरीर पर तेल या उबटन लगाकर मालिश करने के बाद स्नान करना चाहिए। ऐसा माना जाता हैं कि जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी के दिन सूर्य के उदय होने के बाद नहाता हैं। उसके द्वारा पूरे वर्ष भर में किये गये शुभ कार्यों के फल की प्राप्ति नहीं होती।

सूर्य उदय से पहले स्नान करने के बाद दक्षिण मुख करके हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना करें। ऐसा करने से व्यक्ति के द्वारा किये गये वर्ष भर के पापों का नाश होता हैं।

इस दिन विशेष पूजा की जाती है जो इस प्रकार होती है, सर्वप्रथम एक थाल को सजाकर उसमें एक चौमुख दिया जलाते हैं तथा सोलह छोटे दीप और जलाएं तत्पश्चात रोली खीर, गुड़, अबीर, गुलाल, तथा फूल इत्यादि से ईष्ट देव की पूजा करें। इसके बाद अपने कार्य स्थान की पूजा करें।

पूजा के बाद सभी दीयों को घर के अलग अलग स्थानों पर रख दें तथा गणेश एवं लक्ष्मी के आगे धूप दीप जलाएं। इसके पश्चात संध्या समय दीपदान करते हैं जो यम देवता, यमराज के लिए किया जाता है। विधि-विधान से पूजा करने पर व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो प्रभु को पाता है।

11/11/2020

* पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥

भावार्थ:-हे भाई! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है। हे तात! समस्त पुराणों और वेदों का यह निर्णय (निश्चित सिद्धांत) मैंने तुमसे कहा है, इस बात को पण्डित लोग जानते हैं॥

परमात्मा की कृपा और माता-पिता का उपकार ही साकार होकर हम सबको शरीर रूप में मिला है। इस बात को इस प्रकार भी कह सकते हैं कि मानव-जीवन की आधार-शिला उपकार ही है। इसलिये हमारा यह जीवन परोपकार में ही लगना चाहिये। इसी में इसकी सार्थकता है और इसी में कल्याण।

परोपकार के सदृश इस संसार में कोई दूसरा धर्म नहीं है। अपने अस्तित्व को संसार हित में बलिदान कर देने से जिस महान धर्मफल की प्राप्ति होती है, उसकी तुलना अन्य धार्मिक कर्मकांडों से नहीं की जा सकती। प्रसिद्ध सन्त मोओतजे कहा करते थे कि “यदि मेरे शरीर को पीस कर चूर्ण बना लेने में संसार के एक भी प्राणी का भला हो सकता है तो मैं उसके लिये सहर्ष तैयार हूँ।”

परोपकार के समान पुण्यदाता कोई भी दूसरा धर्म नहीं है। यदि ऐसा होता तो तपस्या में निरत महर्षि दधीचि देवों की भलाई के लिये अपना शरीर नहीं दे देते।

वे शरीर की रक्षा करते और तपस्या करके बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त और मुक्ति के लिये प्रयत्न करते रहते। किन्तु अवसर पाते ही उन्होंने तुरन्त ही परोपकार में अपना शरीर दान कर दिया। वे जानते थे कि हजारों वर्ष तप करने पर भी जो मुक्ति कठिनता से मिलती है, वह परोपकार में शरीर त्याग देने से तत्काल सरलतापूर्वक मिल जाती है।

परोपकार में सर्वस्व दे देने वाले एक दधीचि ही नहीं हुए। भारत में तो शिवि, हरिश्चंद्र, मोरध्वज, कर्ण, दिलीप आदि न जाने कितने महापुरुष ऐसे हुए हैं, जिन्होंने परोपकार को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म माना और अवसर आने पर उसका सहर्ष निर्वाह भी किया। यह सारे मनीषी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे कि यह शरीर कल्याण का साधन होने पर भी नाशवान है। मानव-जीवन का कोई ठीक नहीं कि किस समय समाप्त हो जाये।

यह तब तक भी चल सकता है, जब तक साधना पूरी हो और बीच में भी समाप्त हो सकता है। जीवन का रहना और न रहना सदा संदिग्ध बना रहता है। शरीर से जहाँ पुण्य कर्म बनते हैं वहाँ कभी प्रमादवश इससे कोई त्रुटि भी हो सकती है। यही साधन साधना के बीच में व्यवधान भी खड़ा कर सकता है।

जीवन-प्रवाह तो ऊँचे-नीचे मार्गों के बीच से होकर बहता है। अस्तु इस शरीर, इस जीवन को परोपकार में समर्पित कर देना साधना का, धर्म का सबसे निरापद मार्ग है। इसी विवेचना के आधार पर इन्होंने अवसर पाते ही अपना जीवन परोपकार में लगा दिया और ऐसे ही सत्पुरुष क्षण-क्षण अपना जीवन परोपकार में ही लगाये चलते हैं। परोपकार से बढ़ कर और निरापद दूसरा कोई धर्म नहीं है।

प्राणिमात्र का हित, उपकार और कल्याण में रत रहना। मन, वचन, कर्म से दूसरे का हित चाहना और करना, किसी के अहित अथवा पीड़ा का विचार न करना और विश्व-बन्धुत्व की भावना को विकसित और विस्तृत करते रहना आदि सारी सदाशयतायें परोपकार ही मानी गई हैं। तथापि इनमें आध्यात्मिक शाँति और निष्कलंक धर्मफल का समावेश तभी होता है, जब इनके पीछे कोई स्वार्थ-भाव निहित न हो। अन्यथा यही पुण्य कर्म आत्मा के लिये एक प्रवंचना बन जायेगा।

परोपकार का भाव तो प्रकृति के समान निःस्वार्थ होना चाहिये। सूर्य, चन्द्र, वायु, नदी, वन, पहाड़ नित्य निरन्तर संसार के उपहार में ही लगे रहते हैं किन्तु उसके बदले में न कुछ माँगते हैं और न ही चाहते हैं। चुपचाप अपना सर्वस्व दान करते रहते हैं। सूर्य नित्य नियम से अपना प्रकाश और ऊष्मा संसार को देने के लिये पृथ्वी की परिक्रमा करते रहते हैं, किन्तु उसके बदले में किसी से कुछ चाहते नहीं।

चन्द्रमा नियम से संसार को आलोक और शीतलता दान करते रहते हैं, किन्तु सर्वथा निःस्वार्थ-भाव से। इसी प्रकार वन-वृक्ष, नदी और पर्वत भी सदैव निःस्वार्थ-भाव से ही अपने फल-फूल, काष्ठ, जल और वनस्पतियाँ संसार को देते हुये कभी कोई प्रतिकार नहीं चाहते।

लोग जाते हैं अधिकारपूर्वक उनकी संपत्ति का भाग लेकर चले आते हैं। उनके भण्डार, उनकी सम्पत्ति सदा सर्वदा संसार हित के लिये खुली पड़ी रहती है। वे उसके लिये ना तो किसी का हाथ रोकते हैं और न प्रतिपादन के लिये हाथ फैलाते हैं। धन्य हैं ऐसे निःस्वार्थ, निष्काम और उदार परोपकारी ऐसे ही प्रतिकार रहित परोपकारी परमात्मा की कृपा और आत्मा की सच्ची शाँति के अधिकारी बनते हैं।

जब जड़ प्रकृति संसार का उपकार करने में इस गहरे निष्कामभाव से लगी रहती हैं तो चेतन होकर मनुष्य संसार के कल्याण में नहीं लग सकता? लग सकता है और आवश्यक लग सकता है।

उसे लगाना भी चाहिये। परोपकार में निरत होने से केवल संसार का भला नहीं होता प्रत्युत अपना कल्याण भी होता है। मनुष्य के चरित्र की परीक्षा परोपकार की कसौटी पर ही होती है। जो इसमें अपने को उत्तीर्ण कर लेता है, वह सहज रूप से भवसागर से उत्तीर्ण हो जाता है।

परोपकार का पुण्य मनुष्य को सभ्य-सुसंस्कृत, उच्चविचार और भावना वाला बना देता है। परोपकार से मनुष्य का मन निर्मल और विकार रहित बनता है। उसके जीवन में सतोगुण की वृद्धि और आत्मा में आध्यात्मिक आलोक का समावेश होता है।

परोपकार की भावना जितनी उच्च-विशाल और निष्काम होती जाती है, मनुष्य उतना ही परमात्मा के सान्निध्य की ओर बढ़ता जाता है। इस आत्मिक उन्नति और विकास का सुख अनिर्वचनीय है। इसका अनुभव तो वही त्यागी पुरुष कर सकता है, जो परोपकार के यज्ञ में अपने सर्वस्व को समिधा मान कर समर्पित कर देता है।

सत्पुरुषों की पहचान का सबसे बड़ा लक्षण है परमार्थ। कोई कितना ही सभ्य, शिष्ट और सुशील क्यों न दिखाई दे।

नम्रता और विनय उसके शब्द-शब्द से टपकती चलती हो, मुख्य पर कितनी ही करुणा और कृतज्ञता का भाव विराजमान क्यों न रहे, यदि उसका जीवन परमार्थ पूर्ण नहीं है, उसके जीवन और वैभव को कोई अंश परोपकार एवं परमार्थ में नहीं लगता तो उसके उस प्रकार का वास्तविक मनुष्य नहीं माना जा सकता, जैसा कि वह ऊपर से दीखता है।

धनाढ्यता का लक्षण धन उपार्जन अथवा संचय की मात्रा नहीं है। उसका लक्षण उदारता ही है। जो जितना अधिक उदार और परोपकार है, वह उतना ही अधिक धनवान है।

एक पैसे का उपकार करने वाला गरीब कहीं अधिक धनवान है, उस व्यक्ति की तुलना में जो करोड़ों का स्वामी होकर भी परोपकार के विषय में कृपणता करते हैं। जो परमार्थ में लीन है, तन, मन, धन से परोपकार एक परहित में निरत है, वही सज्जन है, वही सत्पुरुष है और वही धनवान है।

परोपकार केवल मानवीय गुण ही नहीं नहीं वह आध्यात्मिक सद्गुण भी है। इसकी आराधना करने से लोक और परलोक दोनों का बनाव बनता है। इसी गुण पर जहाँ आत्मा का उत्थान निर्भर है, वहाँ संसार और समाज का सृजन, व्यवस्था और विकास की धुरी भी इसी पर निर्भर रहती है। आज यदि समाज के सारे लोग केवल स्वार्थी बन जांय और दूसरों के हित का सम्पादन न करें तो कल ही समाज में घोर अनर्थ घटित होने लगे।

अराजकता, संघर्ष और छीना-झपटी का बोल-बाला हो जाये, जो उद्दंड, बली और शक्तिशाली हों, वे सारे साधनों और सम्पत्ति पर अपना एकाधिपत्य स्थापित कर लें और जो सामान्य, साधारण अथवा अपेक्षाकृत निर्बल हों, वे बेचारे पिस कर ही रह जायें। परहित और परोपकार के बिना संसार का क्रम एक क्षण भी नहीं चल सकता। अस्तु आत्मा और समाज के कल्याण के लिये यथासाध्य परोपकार के कार्य करते रहना चाहिये।

माता-पिता सन्तान को जन्म देते हैं। उनके पालन-पोषण और विकास के लिये अपार कष्ट उठाते हैं। धन के लिये परिश्रम करते, सुख और सुविधा के के लिये चिन्ता करते, तन-पेट काट कर उन्नति और विकास की व्यवस्था करते, किन्तु वे यह सब करते हैं, निस्वार्थ भावना से ही।

किन्तु माता-पिता को पहले से ही यह पता रहता है कि उनका पुत्र बड़ा होकर सेवा करेगा, उनके लिए सुख और आराम के साथ डडडड। तब भी वे बच्चों की सेवा में हर प्रकार का त्याग एवं उत्सर्ग करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं संसार के कुपुत्रों का उदाहरण देख कर भी और स्वयं भी एक से कष्ट पाते हुए भी दूसरे का पालन -पोषण करते ही रहते हैं।

वे अपनी इस सेवा के पीछे किसी प्रकार के प्रतिकार की भावना नहीं रखते। बच्चे की सेवा वे सेवा-भाव से ही करते हैं। बच्चों द्वारा कष्ट पाने के उदाहरणों को देख कर भी वे सेवा से संकोच नहीं करते। उन्हें उसमें एक आनन्द एक सुख की उपलब्धि होती है। वह सुख, वह आनन्द किसी आशा के कारण नहीं होता है।

वह सुख उस परमार्थभाव का ही होता है, जो सन्तान की सेवा में उनके अनजाने ही निहित रहता है। परोपकार के सम्बन्ध में इसी प्रकार माता-पिता की तरह ही निःस्वार्थभाव रखने से उसके द्वारा अनिवर्चनीय आनन्द, आध्यात्मिक आनन्द की उपलब्धि होती है।

परोपकार एवं परमार्थ से विमुख रहना समाज के साथ विश्वासघात करने के बराबर है। हम आज जो कुछ हैं या हमारे पास जो कुछ धन-संपत्ति, पद-प्रतिष्ठा और अवसर, संयोग है, वह सब समाज द्वारा हमारे ऊपर उपकार किये जाने का ही फल है।

यदि समाज ने हमारी उपेक्षा की होती, हमारे हित से सर्वथा मुख मोड़ लिया होता तो हमारा अस्तित्व ही आपत्ति ग्रस्त हो जाता। थोड़ी दूर भी अपना जीवन चल सकना कठिन हो जाता। अस्तु समाज के प्रत्युपकार के लिए कुछ न करना कृतघ्नता ही होगी, उसकी अपेक्षाओं के प्रति विश्वासघात होगा।

जो कि न तो लौकिक दृष्टिकोण से शुभ है और न पारलौकिक दृष्टि से कल्याणकारी। लोक और परलोक शरीर और आत्मा, सारे माननीय अनुबन्धों के मंगल के लिए परोपकार एवं परमार्थ में निरत रहना परमावश्यक है। इससे विमुख होना अपना वर्तमान और भविष्य दोनों को बिगाड़ लेना है। इसी तथ्य और अपने अनुभव के आधार पर ही तो महर्षि व्यास ने कहा है-

“जीवितं सफलं तस्य, यः परार्थोद्यतः सदा” -जीवन उसी का सफल एवं सार्थक है, जो सदा परोपकार में प्रवृत्त रहता है, निश्चय ही, परोपकारी को न पाप का भय रहता है और न पतन का। वह तो लोक अथवा परलोक सब जगह श्रेय का ही अधिकारी बनता है।

10/11/2020

मंगल भवन अमंगल हारी चौपाई चौपाई

श्री तुलसीदास जी महाराज ने रामचरित मानस से बहुत ही प्यारी चौपाई लिखी है जो भक्तो को अति प्रिय और याद भी है | यह मंगल करने वाली और अमंगल का नाश करने वाली मंत्र समान चौपाई है |

आइये जाने मंगल भवन अमंगल हारी चौपाई का हिंदी में अर्थ सहित भावार्थ :

मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम – २
अर्थ : जो मंगल करने वाले है और अमंगल हो दूर करने वाले है , वो दशरथ नंदन श्री राम है वो मुझपर अपनी कृपा करे |

हो, होइहै वही जो राम रचि राखा
को करे तरफ़ बढ़ाए साखा

अर्थ : जो भगवान श्री राम ने पहले से ही रच रखा है ,वही होगा | हम्हारे कुछ करने से वो बदल नही सकता
हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी
आपद काल परखिये चारी
अर्थ : बुरे समय में यह चार चीजे हमेशा परखी जाती है , धैर्य , मित्र , पत्नी और धर्म |

हो, जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू
सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू
अर्थ : सत्य को कोई छिपा नही सकता , सत्य का सूर्य उदय जरुर होता है |

हो, जाकी रही भावना जैसी
रघु मूरति देखी तिन तैसी

अर्थ : जिनकी जैसी प्रभु के लिए भावना है उन्हें प्रभु उसकी रूप में दिखाई देते है |

रघुकुल रीत सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाई
अर्थ : रघुकुल परम्परा में हमेशा वचनों को प्राणों से ज्यादा महत्व दिया गया है |
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता

अर्थ : प्रभु श्री राम भी अंनत हो और उनकी कीर्ति भी अपरम्पार है ,इसका कोई अंत नही है | बहुत सारे संतो ने प्रभु की कीर्ति का अलग अलग वर्णन किया है |

!! जय श्री राम !!
सुप्रभात की मधुर मनहर मनभावन.वेला.में आह्लादित.क्षण का .आनन्द के.झूले.में.रमण.करे।
!! जय श्री राम !!

03/11/2020

मित्रों आज मंगलवार है, आज हम आपको हनुमान चालीसा के बारे में बतायेंगे!!!!!!

* श्री गुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

भावार्थ:-श्री गुरुजी के चरण कमलों की रज से अपने मन रूपी दर्पण को साफ करके मैं श्री रघुनाथजी के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फलों को (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को) देने वाला है।

*श्री हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयां हैं, ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है।*

कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है। माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना बचपन में की थी। हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की।

अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जीवन में प्रबन्धन के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं। हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है। शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई। हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं।

*आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं ।*

हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई है…
*श्रीगुरु चरन सरोज रज,*
*निज मनु मुकुरु सुधारि।*

अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं।

गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता। गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं। इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूं। माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है।

समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है। अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।

*अपने पहनावे का रखें ख्याल*
चालीसा की चौपाई है,,,

*कंचन बरन बिराज सुबेसा,*
*कानन कुंडल कुंचित केसा।*

आपका शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।

आज के दौर में आपकी उन्नति इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप कैसे रहते और दिखते कैसे हैं एवं आपका दूसरों के प्रति व्यवहार कैसा है ।आपका प्रथम संस्कार (प्रभाव ) अच्छा होना चाहिए। अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके भविष्य को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रहन-सहन और पहनावा हमेशा अच्छा रखें।

*आगे पढ़ें - हनुमान चालीसा में छिपे आपके जीवन के संचालन के सूत्र*
सिर्फ डिग्री काम नहीं आती।

*बिद्यावान गुनी अति चातुर,*
*राम काज करिबे को आतुर।*

आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं। राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।

आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है। लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे। विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।

*अच्छे श्रोता बनें*

*प्रभु चरित सुनिबे को रसिया,*
*राम लखन सीता मन बसिया।*

आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं।

जो आपकी प्राथिमिक्ता है ।उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए। अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है। अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी अच्छे नेता नहीं बन सकते।

*कहां, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है*

*सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा,*
*बिकट रुप धरि लंक जरावा।*

आपने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए। और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।

कब, कहां, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है। सीता से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया। अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।

*अच्छे सलाहकार बनें*

*तुम्हरो मंत्र बिभीसन माना,* *लंकेस्वर भए सब जग जाना।*

विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।

हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले। विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी। विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए। किसको, कहां, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है। सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुंचाती है।

*आत्मविश्वास की कमी ना हो*

*प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही,* *जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।*

राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।

अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल कार्य को आसानी से पूरा कर सकते हैं। आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है। अपने आप तथा अपने इष्ट देव पर पूरा भरोसा रखें।

07/09/2020

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के प्रातःदर्शन का आनंद लें. दूसरे भक्तों को भी बाबा के दर्शन का आनंद दिलायें. प्रेम से बोलिये बाबाबाबा बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग की जय.

04/08/2019

🚩मङ्गलस्तोत्रम् 🚩
।। ॐ गं गणपतये नमः।।
गणाधिपो भानु-शशी-धरासुतो बुधो गुरुर्भार्गवसूर्यनन्दनाः ।
राहुश्च केतुश्च परं नवग्रहाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ १॥

उपेन्द्र इन्द्रो वरुणो हुताशनस्त्रिविक्रमो भानुसखश्चतुर्भुजः ।
गन्धर्व-यक्षोरग-सिद्ध-चारणाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ २॥

नलो दधीचिः सगरः पुरूरवा शाकुन्तलेयो भरतो धनञ्जयः ।
रामत्रयं वैन्यबली युधिष्ठिरः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ३॥

मनु-र्मरीचि-र्भृगु-दक्ष-नारदाः पाराशरो व्यास-वसिष्ठ-भार्गवाः ।
वाल्मीकि-कुम्भोद्भव-गर्ग-गौतमाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ४॥

रम्भाशची सत्यवती च देवकी गौरी च लक्ष्मीश्च दितिश्च रुक्मिणी ।
कूर्मो गजेन्द्रः सचराऽचरा धरा कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ५॥

गङ्गा च क्षिप्रा यमुना सरस्वती गोदावरी नेत्रवती च नर्मदा ।
सा चन्द्रभागा वरुणा त्वसी नदी कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ६॥

तुङ्ग-प्रभासो गुरुचक्रपुष्करं गया विमुक्ता बदरी वटेश्वरः ।
केदार-पम्पासरसश्च नैमिषं कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ७॥

शङ्खश्च दूर्वासित-पत्र-चामरं मणि प्रदीपो वररत्नकाञ्चनम् ।
सम्पूर्णकुम्भः सुहृतो हुताशनः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ८॥

P.c. kumari anjali

09/07/2019

हरि बोल प्रभु 🙏
परमात्मा हमेशा हमारे साथ है.....
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एक शख्स सुबह सवेरे उठा साफ़ कपड़े पहने और ठाकुर जी के दर्शन के लिए मन्दिर की तरफ चल दिया ताकि ठाकुर जी के दर्शन कर आनंद प्राप्त कर सके।चलते चलते रास्ते में ठोकर खाकर गिर पड़ा.
कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया।कपड़े बदलकर वापस मन्दिर की तरफ रवाना हुआ फिर ठीक उसी जगह ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले।
फिर मन्दिर की तरफ रवाना हो गया.
जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक शख्स चिराग हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है।
इस तरह वो शख्स उसे मन्दिर के दरवाज़े तक ले आया। पहले वाले शख्स ने उससे कहा आप भी अंदर आकर दर्शन का लाभ लें।
लेकिन वो शख्स चिराग हाथ में थामे खड़ा रहा और मन्दिर में दाखिल नही हुआ.
दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है ...?
दूसरे वाले शख्स ने जवाब दिया "इसलिए क्योंकि मैं काल हूँ,। ये सुनकर पहले वाले शख्स की हैरत का ठिकाना न रहा। काल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं ही था जिसने आपको ज़मीन पर गिराया था।
जब आपने घर जाकर कपड़े बदले और दुबारा मन्दिर की तरफ रवाना हुए तो भगवान ने आपके सारे पाप क्षमा कर दिए. जब मैंने आपको दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर फिर कपड़े बदले और फिर दुबारा जाने लगे तो भगवान ने आपके पूरे परिवार के गुनाह क्षमा कर दिए.
*मैं डर गया की अगर अबकी बार मैंने आपको गिराया और आप फिर कपड़े बदलकर चले गए तो कहीं ऐसा न हो वह आपके सारे गांव के लोगो के पाप क्षमा कर दे.।इसलिए मैं यहाँ तक आपको खुद पहुंचाने आया हूँ.
अब हम देखे कि उस शख्स ने दो बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार फिर पहुँच गया और एक हम हैं यदि हमारे घर पर कोई मेहमान आ जाए या हमें कोई काम आ जाए तो उसके लिए हम सत्संग छोड़ देते हैं, भजन जाप छोड़ देते हैं। क्यों....???
क्योंकि हम जीव अपने भगवान से ज्यादा दुनिया की चीजों और रिश्तेदारों से ज्यादा प्यार करते हैं।
उनसे ज्यादा मोह हैं। इसके विपरीत वह शख्स दो बार कीचड़ में गिरने के बाद भी तीसरी बार फिर घर जाकर कपड़े बदलकर मन्दिर चला गया। क्यों...???
क्योंकि उसे अपने दिल में भगवान के लिए बहुत प्यार था। वह किसी कीमत पर भी अपनी बंदगीं का नियम टूटने नहीं देना चाहता था।
इसीलिए काल ने स्वयं उस शख्स को मंजिल तक पहुँचाया, जिसने कि उसे दो बार कीचड़ में गिराया और मालिक की बंदगी में रूकावट डाल रहा था, बाधा पहुँचा रहा था !
राधे राधे तो बोलना पड़ेगा 🙏

11/02/2019

कीर्ति मंदिर बरसाना में कीर्ति माँ की गोद में छोटी राधारानी 💞
जय जय श्रीराधे 🌹🙏🏼🌹

10/02/2019

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