30/11/2020
मित्रों आज सोमवार है, भगवान भोलेनाथ का दिन है। आज हम इन्हीं की महिमा का गुणगान करेगें!!!!!!!!!!
*कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥
भावार्थ:-जिनका कुंद के पुष्प और चन्द्रमा के समान (गौर) शरीर है, जो पार्वतीजी के प्रियतम और दया के धाम हैं और जिनका दीनों पर स्नेह है, वे कामदेव का मर्दन करने वाले (शंकरजी) मुझ पर कृपा करें॥
शास्त्र कहते हैं कि भोलेनाथ शिवजी प्रथम महायोगी है, योग शिक्षा के अनुसार भगवान् शिवजी को ही प्रथम योगी तथा आदिगुरु के रूप में माना गया है, कई हजारों वर्ष पूर्व हिमालय में अदियोगी भगवान् शिवजी ने ही अपने गहरे ज्ञान को पौराणिक सप्तऋिषियों को प्रदान किया, ये ऋषि इस शक्तिशाली योग विज्ञान को पूरे संसार में लेकर गयें, लेकिन केवल भारत मे ही योग परम्परा पूरी तरह से विकसित हुयीं।
सप्तऋिषियों ने योग का जीवन शैली के रूप से चारों और इस संस्कृति का निर्माण किया, भगवान् शिव को स्वयंभू इसलिये कहा जाता है, क्योंकि वे आदिदेव हैं, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था सिर्फ वही थे, उन्हीं से धरती पर सब कुछ हो गया, कैलाश पर्वत पर प्रारम्भ में उनका निवास रहा, भगवान् शिवजी कहते हैं कि योग के बिना मनुष्य पशु है।
योग में मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- जागरण, अभ्यास और समर्पण, तंत्रयोग है समर्पण का मार्ग, जब शिवजी ने जाना कि उस परम तत्व या सत्य को जानने का मार्ग है, तो उन्होंने अपनी अर्धांगिनी पार्वतीजी को मोक्ष हेतु वह मार्ग बताया, शिवजी द्वारा माँ पार्वतीजी को जो ज्ञान दिया गया वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखायें हो चली हैं, वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों मे सम्मिलित हैं।
विज्ञान भैरव तंत्र एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान् भोलेनाथ द्वारा पार्वती को बतायें गये एक सो बारह ध्यान सूत्रों का संकलन है, योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान् शिवजी के विज्ञान भैरव तंत्र और शिव संहिता में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है, तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है, भगवान् शिवजी के योग को तंत्र या वामयोग भी कहते हैं, इसी की एक शाखा हठयोग की हैं।
भगवान् शिवजी के अनुसार "वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य" अर्थात वाम मार्ग अत्यन्त गहन है और योगियों के लिये भी अगम्य है, शिवयोग में धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग का ही प्रचलन अधिक रहा है, पतंजलि के बाद बहुत से ऋषियों और योग गुरुओं ने अच्छी तरह से लिखे गये अभ्यासों और साहित्य के माध्यम से इस विषय को संरक्षित करने और इसका विकास करने में महान योगदान दिया, जिसमे बाबा रामदेवजी का उल्लेखनीय योगदान है।
प्राचीन समय से लेकर आज तक प्रमुख योग गुरुओं की शिक्षाओं के माध्यम से योग संसार भर में फैला है, योग अभ्यास बीमारियों से बचाता है, स्वास्थ्य को बनाये रखता है तथा स्वस्थ जीवन प्रदान करता है, ओऊम् नम: शिवाय, ओम' प्रथम नाम परमात्मा का फिर नमन शिवजी को करते हैं, "सत्यम, शिवम और सुंदरम" जो सत्य है वह ब्रह्म है, ब्रह्म अर्थात परमात्मा, जो शिव है वह परम शुभ और पवित्र है, और जो सुंदरम है वही प्रकृति है, अर्थात परमात्मा।
सज्जनों! शिवजी और पार्वती के अलावा कुछ भी जानने योग्य नहीं है, इन्हें जानना और इन्हीं में लीन हो जाने का मार्ग है योग, आदि पुरुष यानी आदि का अर्थ प्रारम्भ, शिवजी को आदिदेव या आदिनाथ कहा जाता है, नाथ और शैव सम्प्रदाय के आदिदेव, शिवजी से ही योग का जन्म माना गया है, वैदिककाल के रुद्र का स्वरूप और जीवन दर्शन पौराणिक काल आते-आते पूरी तरह से बदल गया, वेद जिन्हें रुद्र कहते है, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं।
शिवजी का न प्रारंभ है और न अंत हैं, ज्योतिषियों और पुराणिकों की धारणा से सर्वथा भिन्न है, भगवान् शंकरजी का दर्शन और जीवन, उनके इस दर्शन और जीवन को जो समझता है वही महायोगी के मर्म, कर्म और मार्ग को भी समझता है, ऋग्वेद में वृषभदेव का वर्णन मिलता है, जो जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथजी हैं, उन्हें ही वातरशना मुनि कहा गया है, उनका जीवन अवधूत जैसा बताते है।
योगयुक्त व्यक्ति ही अवधूत हो सकता है, माना जाता है कि शिवजी के बाद मूलत: उन्हीं से एक ऐसी परम्परा की शुरुआत हुई जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगम्बर और सूफी सम्प्रदाय में विभक्त हो गई, इस्लाम के प्रभाव में आकर सूफियों से कमंडल और धूना छूट गया, लेकिन चिमटा और खप्पर आज भी नहीं छूटा, जो माला रुद्राक्ष की होती थी, वह अब हरे, पीले, सफेद, मोतियों की होती है, जो कुछ है सब उस योगेश्वर शिवजी के प्रति ही है।
भगवान् शिवजी के निराकार स्वरूप को शिव और साकार स्वरूप को शंकर कहते हैं, शैव और नाथ सम्प्रदाय की बहुत प्राचीन परम्परा रही है, जैन और नाथ सम्प्रदाय में जिन नौ नाथ की चर्चा की गई है वह सभी योगी ही थे और शिव के अनुगामी ही थे, शिवजी के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वह सद्बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं।
शिवजी का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जीयो, वर्तमान में जीयो अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिये उपयोग करो, सर्व प्रथम शिवजी ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है, शिवयोग को तंत्र या वामयोग भी कहते हैं, शिवयोग में धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग का ही प्रचलन अधिक रहा है।
शिवजी के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है और इस भिन्नता का कारण है परम्परा और भाषा का बदलते रहना, भाई-बहनों, भगवान् शिवजी तो सृष्टि के प्रथम योगी थे, शिवजी के बगैर योग की व्याख्या का कोई औचित्य नहीं है,आज सोमवार के पावन दिवस की पावन सुप्रभात् आप सभी को मंगलमय् हो।
ओऊम् नम: शिवाय्
हर हर महादेव!