Vivek Shastri Upvaid

Vivek Shastri Upvaid Professional-Astrologer-Numerologist-Signature Analyst-Graphology, Astro-Vastu Consultant Shri Sanatan Dharma Panchmukhi Hanuman Mandir Sector 19a Chandigarh

वैदिक साहित्य ही हिन्दू धर्म के प्राचीनतम स्वरूप
30/01/2022

वैदिक साहित्य ही हिन्दू धर्म के प्राचीनतम स्वरूप

वैदिक साहित्य से तात्पर्य उस विपुल साहित्य से है जिसमें वेद, ब्राह्मण, अरण्यक एवं उपनिषद् शामिल हैं। वर्तमान समय म...

माघ संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा विधि , कब और कैसे ?माघ संकष्टी चतुर्थी व्रत तिथि 21 जनवरी (शुक्रवार) 2022 , चंद्रोदय (लुधिय...
21/01/2022

माघ संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा विधि , कब और कैसे ?

माघ संकष्टी चतुर्थी व्रत तिथि 21 जनवरी (शुक्रवार) 2022 , चंद्रोदय (लुधियाना में) 09:03 PM
यदि बादल के कारण चन्द्र न दिखे तो 09:03 PM के बाद अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण कर सकते है।

माघ मास में ‘भालचन्द्र’ नामक गणेश का षोडशोपचार से पूजा करने का विधान है. तिल के बीस लड्डू बना लें उसमे से पांच लड्डू देवता को चढ़ाये और पांच दक्षिणा के साथ ब्राह्मण को दे और दस लड्डू स्वयं खायें।

व्रत का फल : इस व्रत को करने से सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं।

माघ संकष्टी गणेश चौथ कथा

सतयुग में हरिश्चन्द्र नामक सत्यवादी राजा था वे साधू-सेवी व धर्मात्मा थे। उनके राज्य में कोई भी दु:खी नही था। उन्ही के राज्य में एक ऋषि शर्मा ब्राह्मण रहते थे। उनको एक पुत्र पैदा हुआ और कुछ समय बाद ब्राह्मण की मृत्यु हो गई। ब्राह्मणी दु:खी होकर भी अपने पुत्र का पालन करने लगी और गणेश चौथ का व्रत करती थी।

एक दिन ब्राह्मणी का पुत्र गणेश जी की प्रतिमा को लेकर खेलने निकला। एक दुष्ट कुम्हार ने उस बालक को आवा (जिसमें मिट्टी के बर्तन पकाते हैं) में रखकर आग लगा दी, इधर जब लड़का घर नही आया तो ब्राह्मणी बहुत परेशान होकर और चिन्ता करते हुये गणेश जी से अपने पुत्र के लिए प्रार्थना करने लगी और कहने लगी- अनाथो के नाथ मेरी रक्षा करो। मैं आपकी शरण में हूँ। इस प्रकार रात्रि भर विलाप करती रही। प्रात: काल कुम्हार अपने पके हुए बर्तनों देखने के लिए आया तो देखा बालक वैसे ही हैं। आवा में जंघा तक पानी भर गया हैं।
इस घटना से हतप्रद कुम्हार ने राजा के पास जा कर सारे वृतान्त सुनाये और बोला मुझसे अनर्थ हो गया मैंने अनर्थ किया हैं, मैं दण्ड का भागी हूँ मुझे मृत्यु दण्ड मिलना चाहिये। महराज ! मैंने अपनी कन्या के विवाह के लिए बर्तनों का आवा लगाया था पर बर्तन न पके। मुझे एक टोटका जानने वाले ने बताया कि बालक की बलि देने से आवा पक जायेगा। मैं इस बालक की बलि दी पर अब आवा में जल भर रहा है और बालक खेल रहा हैं।

उसी समय ब्राह्मणी आ गई और अपने बालक को उठाकर कलेजे से लगा कर घुमने लगी। राजा हरिश्चन्द्र ने उस ब्राह्मणी से पुछा ऐसा चमत्कार कैसे हो गया ? ऐसा कौन सा व्रत, तप करती हो या ऐसी कौन सी विधा जानती हो जिससे ये चमत्कार हुआ। ब्राह्मणी बोली – महाराज ! मैं कोई विधा नही जानती हूँ और नहीं कोई तप जानती हूँ। मैं सिर्फ संकष्ट गणेश चतुर्थी नामक व्रत करती हूँ। इस व्रत के प्रभाव से मेरा पुत्र कुशलपूर्वक हैं।।

इस व्रत के प्रभाव से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।

10/09/2021

!! ताश का मर्म !!

हम ताश खेलते है, अपना मनोरंजन करते है। ताश का खेल हर जगह खेला जाता है। पर शायद कुछ ही लोग जानते होंगे कि ताश आधार वैज्ञानिक है, व साथ साथ ही प्राकृति से भी जुड़ा हुआ है:

आयताकार मोंटे कागज़ से बने पत्ते चार प्रकार के .....ईंट, पान, चिड़ी, और हुक्म, प्रत्येक 13 पत्तों को मिलाकर कुल 52 पत्ते होते हैं।

पत्ते.... एक्का से दस्सा, गुलाम, रानी एवं राजा ।

1. 52 पत्ते .......52 सप्ताह
2. 4 प्रकार के पत्ते .......4 ऋतु
3. प्रत्येक रंग के 13 पत्ते....प्रत्येक ऋतु में 13 सप्ताह
4. सभी पत्तों का जोड़ ..1 से 13 = 91 × 4 = 364
5. एक जोकर..... 364+1= 365 दिन...1 वर्ष
6. दूसरा जोकर गिने..365 +1=366 दिन..लीप वर्ष
7. 52 पत्तों में 12 चित्र वाले पत्ते - 12 महिने
8. लाल और काला रंग ... दिन और रात

पत्तों का अर्थ:-

1 दुक्की - पृथ्वी और आकाश
2. तिक्की- ब्रम्हा, विष्णू, महेश
3. चौकी - चार वेद (अथर्व वेद, सामवेद, ऋग्वेद, अथर्ववेद)
4. पंजी - पंच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान)
5. छक्की - षड रिपू (काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, लोभ)
6. सत्ती- सात सागर
7. अटठी- आठ सिद्धी
8. नव्वा- नौ ग्रह
9. दस्सी- दस इंद्रियां
10. गुलाम- मन की वासना
11. रानी- माया
12. राजा - सबका शासक
13. एक्का- मनुष्य का विवेक

जय श्रीराम
जय भारत

15/08/2021

दिग्बन्धन के पूर्व तालत्रय और छोटिका मुद्रा,digbandhan ke purv taltray aur chhotika mudra
दिग्बन्धन के पूर्व तालत्रय और छोटिका मुद्रा

तर्जनीमध्यमाभ्यां च वामपाणितले शिवे ।
ऊर्ध्वमूर्ध्वं तालत्रयं दत्वा दिग्बन्धनं तत: ।।
अस्त्रेण छोटिकाभिश्च --"।।
--महानिर्वाणतन्त्र--पंचमोल्लास,
-श्लोकसंख्या-92

वायें हाथ की हथेली पर तर्जनी और मध्यमा
इन दोनों अंगुलियों को मिलाकर तीन वार
ताली बजायें।

दूसरी ताली पहली ताली से कुछ ऊपर बजाये। तीसरी ताली दूसरी ताली से कुछ ऊपर बजायें।
इसके बाद अस्त्र मन्त्र था जो भी दिग्बन्धन का
मन्त्र बताया गया हो । उसका उच्चारण करते
हुए छोटिका मुद्रा द्वारा दशों दिशाओं में
दिग्बन्धन करें।

तर्जनी और अंगूठे को मिलाने से छोटिका मुद्रा
बनती है। जैसे सामान्यतया लोग मध्यमा और
अंगूठे को मिलाकर चुटकी बजाते हैं। ऐसे ही
तर्जनी और अंगूठे को मिलाकर चुटकी बजाना छोटिका मुद्रा है ।

इसी मुद्रा से सभी मन्त्रों, स्तोत्रों और कवचों के जप में दिग्बन्धन किया जाता है । दिग्बन्धन के मन्त्रों में भेद हो सकता है पर छोटिका मुद्रा सर्वत्र एक जैसी ही होगी ।

तर्जनी और अंगूठें से जो तीन ताली बजाने का क्रम बतलाया गया है । वह भी सर्वत्र समान है । कोई अन्तर नहीं ।

प्रायः जापक तालत्रय ( तीनों ताली बजाते समय )
अंगुलियों पर ध्यान नहीं देते हैं। और न ही लोग
इसे बतलाते हैं। कई लोग तीन तो कई चार
अंगुलियों से ताली बजाते हैं। इस तरह सुरक्षा
में कमी रह जाती है।

साधना में दिग्बन्धन का उतना ही महत्त्व है ।
जितना महत्त्व सम्पत्ति की सुरक्षा में सुदृढ़
मकान या किले या सुरक्षाकर्मियों का है ।
दिग्बन्धन के अभाव में उच्चाटन, भय आदि
कोई भी विघ्न आ सकता है ।

अत: दिग्बन्धन में साधक विशेष ध्यान रखें। जिन मन्त्रों में दिग्बन्धन न हो । वहां "भूर्भुवः: स्वरोम्" से या नरसिंह आदि किसी भी भगवन्नाम से दिग्बन्वन
कर सकते हैं ।

सभी साधकों का अभिनन्दन एवं जय श्रीराम

27/06/2021

Bhadra kal Vichar | भद्रा काल प्रभाव एवं दोष परिहार

Bhadra kal Vichar | भद्रा काल प्रभाव एवं दोष परिहारBhadra kal Vichar | भद्रा प्रभाव एवं दोष परिहार . भारतीय हिन्दू संस्कृति में भद्रा काल को अशुभ काल माना जाता है इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है। यदि आप शुभ कार्य करते है तो अशुभ परिणाम मिलने की प्रबल सम्भावना होती है। मुहूर्त मार्तण्ड में कहा है –

“ईयं भद्रा शुभ-कार्येषु अशुभा भवति” अर्थात शुभ कार्य में भद्रा अशुभ होती है। ऋषि कश्यप ने भी भद्रा काल को अशुभ तथा दुखदायी बताया है —

न कुर्यात मंगलं विष्ट्या जीवितार्थी कदाचन।
कुर्वन अज्ञस्तदा क्षिप्रं तत्सर्वं नाशतां व्रजेत।।

अर्थात जो व्यक्ति अपना जीवन सुखमय व्यतीत करना चाहता है उसे भद्रा काल में कोई भी मंगल कार्य नही करना चाहिए। यदि आप अज्ञानतावश भी ऐसा कार्य करते है तो मंगल कार्य का फल अवश्य ही नष्ट हो जाएगा। भद्रा काल को लेकर मन में अनेक प्रश्न उत्पन्न होता है जैसे —

भद्रा क्या है ?
भद्रा काल कब होती है ?
इस काल का निर्णय कैसे होता है ?
अशुभ परिणाम मिलने के पीछे क्या तर्क है ?
भद्रा के लिए पौराणिक मान्यता क्या है ?
भद्रा काल किसे कहते है ?
किसी भी शुभ कार्य में मुहूर्त का विशेष महत्व है तथा मुहूर्त की गणना के लिए पंचांग का सामंजस्य होना अति आवश्यक है।पंचांग में तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण होता है। पंचांग का पांचवा अंग “करण” होता है। तिथि के पहले अर्ध भाग को प्रथम “करण” तथा तिथि के दूसरे अर्ध भाग को द्वितीय करण कहते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है की एक तिथि में दो करण होते हैं। जब भी तिथि विचार में विष्टि नामक करण आता है तब उस काल विशेष को “भद्रा” कहते हैं। भद्रा नमक करण का विशेष महत्व है।

भद्रा काल कब-कब होती है ?
महीना में दो पक्ष होते है। मास के एक पक्ष में भद्रा की 4 बार पुनरावृति होती है। यथा —-शुक्ल पक्ष में अष्टमी( 8) तथा पूर्णिमा (15 ) तिथि के पूर्वार्द्ध में भद्रा होती है, वही चतुर्थी (4) एकादशी (11) तिथि के उत्तरार्ध में भद्रा काल होती है। कृष्ण पक्ष में भद्रा तृतीया (3) व दशमी (10) तिथि का उत्तरार्ध और सप्तमी (7) व चतुर्दशी(14) तिथि के पूर्वार्ध में होती है।

करण के प्रकार | Type of Karan
पंचांग का पांचवा अंग करण है। करण कुल 11 प्रकार के होते हैं। इनमें से 4 स्थिर तथा 7 चर होते हैं। स्थिर करण —

शकुनि
चतुष्पद
नाग
किंस्तुध्न।
चर करण
बव
बालव
कौलव
तैतिल
गर
वणिज
विष्टि (भद्रा)
भद्रा काल में क्या-क्या कार्य करना चाहिए | Which work should do during Bhadra
भद्रा काल केवल शुभ कार्य के लिए अशुभ माना गया है। जो कार्य अशुभ है परन्तु करना है तो उसे भद्रा काल में करना चाहिए ऐसा करने से वह कार्य निश्चित ही मनोनुकूल परिणाम प्रदान करने में सक्षम होता है। भद्रा में किये जाने वाले कार्य – जैसे क्रूर कर्म, आप्रेशन करना, मुकदमा आरंभ करना या मुकदमे संबंधी कार्य, शत्रु का दमन करना,युद्ध करना, किसी को विष देना,अग्नि कार्य,किसी को कैद करना, अपहरण करना, विवाद संबंधी काम, शस्त्रों का उपयोग,शत्रु का उच्चाटन, पशु संबंधी कार्य इत्यादि कार्य भद्रा में किए जा सकते हैं।

भद्रा में कौन से कार्य नहीं करना चाहिए | Which work should not do during Bhadra
भद्रा काल में शुभ कार्य अज्ञानतावश भी नहीं करना चाहिए ऐसा करने से निश्चित ही अशुभ परिणाम की प्राप्ति होगी। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भद्रा में निम्न कार्यों नही करना चाहिए है। यथा — विवाह संस्कार, मुण्डन संस्कार, गृह-प्रवेश, रक्षाबंधन,नया व्यवसाय प्रारम्भ करना, शुभ यात्रा, शुभ उद्देश्य हेतु किये जाने वाले सभी प्रकार के कार्य भद्रा काल में नही करना चाहिए।

भद्रा का वास कब और कहां होता है
पौराणिक ग्रथ मुहुर्त्त चिन्तामणि में कहा गया है की जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होता है तब भद्रा का वास पृथ्वी अर्थात मृत्युलोक में होता है। चंद्रमा जब मेष, वृष, मिथुन या वृश्चिक में रहता है तब भद्रा का वास स्वर्गलोक में होता है। कन्या, तुला, धनु या मकर राशि में चंद्रमा के स्थित होने पर भद्रा का वास पाताल लोक में होता है। कहा जाता है की भद्रा जिस भी लोक में विराजमान होती है वही मूलरूप से प्रभावी रहती है। अतः जब चंद्रमा गोचर में कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होगा तब भद्रा पृथ्वी लोक पर असर करेगी । भद्रा जब पृध्वी लोक पर होगी तब भद्रा की अवधि कष्टकारी होगी।

जब भद्रा स्वर्ग या पाताल लोक में होगी तब वह शुभ फल प्रदान करने में समर्थ होती है। संस्कृत ग्रन्थ पीयूषधारा में कहा गया है —

स्वर्गे भद्रा शुभं कुर्यात पाताले च धनागम।
मृत्युलोक स्थिता भद्रा सर्व कार्य विनाशनी ।।

मुहूर्त मार्तण्ड में भी कहा गया है —“स्थिताभूर्लोख़्या भद्रा सदात्याज्या स्वर्गपातालगा शुभा” अतः यह स्पष्ट है कि मेष, वृष, मिथुन, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु या मकर राशि के चन्द्रमा में भद्रा पड़ रही है तो वह शुभ फल प्रदान करने वाली होती है।

भद्रा लोक वास चक्रम
लोकवास स्वर्ग पाताल भूलोक
चंद्रराशि 1,2,3,8 6,7,9,10 4,5,11,12
भद्रा-मुख उर्ध्वमुखी अधोमुख सम्मुख
भद्रा काल संबंधी परिहार | Avoidance of Bhadra
भद्रा परिहार हेतु मुहूर्त चिंतामणि, पीयूषधारा तथा ब्रह्म्यामल में कहा गया है —

दिवा भद्रा रात्रौ रात्रि भद्रा यदा दिवा।
न तत्र भद्रा दोषः स्यात सा भद्रा भद्रदायिनी।।

अर्थात यदि दिन की भद्रा रात में और रात की भद्रा दिन में आ जाए तब भद्रा का दोष नहीं लगता है। भद्रा का दोष पृथ्वी पर नहीं होता है । ऎसी भद्रा को शुभ फल देने वाली माना जाता है।

रात्रि भद्रा यदा अहनि स्यात दिवा दिवा भद्रा निशि।
न तत्र भद्रा दोषः स्यात सा भद्रा भद्रदायिनी।।

अर्थात रात की भद्रा दिन में हो तथा दिन की भद्रा जब रात में आ जाए तो भद्रा दोष नही होता है यह भद्रा शुभ फल देने वाली होती है।

एक अन्य मतानुसार —

तिथे पूर्वार्धजा रात्रौ दिन भद्रा परार्धजा।
भद्रा दोषो न तत्र स्यात कार्येsत्यावश्यके सति।।

अर्थात यदि को महत्वपूर्ण कार्य है और उसे करना जरुरी है एवं उत्तरार्ध की भद्रा दिन में तथा पूर्वार्ध की भद्रा रात में हो तब इसे शुभ माना गया है। अंततः यह कहा जा सकता है की यदि कभी भी भद्रा में शुभ काम करना जरुरी है तब भूलोक की भद्रा तथा भद्रा मुख-काल को त्यागकर स्वर्ग व पाताल की भद्रा पुच्छकाल में मंगलकार्य किए जा सकते हैं इसका परिणाम शुभ फलदायी होता है।

भद्रा मुख तथा भद्रा पुच्छ जानने की विधि
भद्रा मुख | Bhadra Mukh
प्राचीन ग्रन्थ मुहुर्त्त चिन्तामणि के अनुसार “शुक्ल पक्ष” की चतुर्थी तिथि की पांचवें प्रहर की 5 घड़ियों में भद्रा मुख होता है, अष्टमी तिथि के दूसरे प्रहर के कुल मान आदि की 5 घटियाँ, एकादशी के सातवें प्रहर की प्रथम 5 घड़ियाँ तथा पूर्णिमा के चौथे प्रहर के शुरुआत की 5 घड़ियों में भद्रा मुख होता है।

उसी तरह “कृष्ण पक्ष” की तृतीया के 8वें प्रहर आदि की 5 घड़ियाँ भद्रा मुख होती है, कृष्ण पक्ष की सप्तमी के तीसरे प्रहर में आदि की 5 घड़ी में भद्रा मुख होता है। इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि का 6 प्रहर और चतुर्दशी तिथि का प्रथम प्रहर की 5 घड़ी में भद्रा मुख व्याप्त रहता है।

Bhadra kal Vichar | भद्रा काल प्रभाव एवं दोष परिहार
भद्रा पुच्छ | Bhadra Puncch
शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के अष्टम प्रहर की अन्त की 3 घड़ी दशमांश तुल्य को भद्रा पुच्छ कहा गया है। पूर्णिमा की तीसरे प्रहर की अंतिम 3 घटी में भी भद्रा पुच्छ होती है।

ध्यातव्य बातें :- यह बात ध्यान देने योग्य है कि भद्रा के कुल मान को 4 से भाग देने के बाद जो परिणाम आएगा वह प्रहर कहलाता है है, 6 से भाग देने पर षष्ठांश आता है और दस से भाग देने पर दशमांश प्राप्त हो जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार भद्रा कौन थी ?
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान सूर्य देव की पुत्री तथा शनिदेव की बहन का नाम भद्रा है। भविष्यपुराण में कहा गया है की भद्रा का प्राकृतिक स्वरूप अत्यंत भयानक है इनके उग्र स्वभाव को नियंत्रण करने के लिए ही ब्रह्मा जी ने इन्हें कालगणना का एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। कहा जाता है की ब्रह्मा जी ने ही भद्रा को यह वरदान दिया है कि जो भी जातक/व्यक्ति उनके समय में कोई भी शुभ /मांगलिक कार्य करेगा, उस व्यक्ति को भद्रा अवश्य ही परेशान करेगी। इसी कारण वर्तमान समय में भी ज्योतिषी तथा गृह के बुजुर्ग भद्रा काल में शुभ कार्य करने से मना करते है। ऐसा देखा भी गया है की इस काल में जो भी कार्य प्रारम्भ किया जाता है वह या तो पूरा नही होता है या पूरा होता है तो देर से होता है।

जाने ! भद्रा के दुष्प्रभावों से बचने का उपाय
भद्रा के दुष्प्रभावों से बचने के लिए मनुष्य को भद्रा नित्य प्रात: उठकर भद्रा के बारह नामों का स्मरण करना चाहिए। विधिपूर्वक भद्रा का पूजन करना चाहिए। भद्रा के बारह नामों का स्मरण और उसकी पूजा करने वाले को भद्रा कभी परेशान नहीं करतीं। ऐसे भक्तों के कार्यों में कभी विघ्न नहीं पड़ता।

भद्रा के बारह नाम | Twelfth Name of Bhadra
धन्या
दधिमुखी
भद्रा
महामारी
खरानना
कालरात्रि
महारुद्रा
विष्टि
कुलपुत्रिका
भैरवी
महाकाली
असुरक्षयकारी

शिववास तिथि एवं फलशिववास मुहूर्त के अनुसार यह तिथियाँ लिखी  गयी  हैं .. मासिक शिवरात्रि शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को भी होता ह...
26/06/2021

शिववास तिथि एवं फल
शिववास मुहूर्त के अनुसार यह तिथियाँ लिखी गयी हैं .. मासिक शिवरात्रि शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को भी होता है जिसे प्रदोष व्रत कहते हैं और उसमे रुद्राभिषेक का विधान है ऐसा हमारे पंचांग कहते हैं .. वैसे त्रयोदशी तिथि भगवान् शिव को ही समर्पित है परन्तु कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मैं रुद्राभिषेक की सलाह नहीं देता .. महाशिवरात्रि शिव जी के विशेष दिन के कारण क्षम्य है साथ ही श्रावण मास में तिथि या मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती अतः पूरे श्रावण पर्यंत रुद्राभिषेक कर सकते हैं

शिव वास ज्ञान : वर्तमान तिथि को २ से गुणा करके पांच जोड़ें फिर ७ का भाग दें . शेष १ रहे तो शिव वास कैलाश में, २ से गौरी पाशर्व में, ३ से वृषारूड़ श्रेष्ठ, ४ से सभा में सामान्य एवं ५ से ज्ञानबेला में श्रेष्ठ होता है. यदि शेष ६ रहे तो क्रीड़ा में तथा शून्य से शमशान में अशुभ होता है. तिथि की गणना शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से करनी चाहिए. शिवार्चन के लिए शुभ तिथियाँ शुक्ल पक्ष में २,५,६,७,९,१२,१३,१४ और कृष्ण पक्ष में १,४,५,६,८,११,१२,१३,३०

शिव वास देखने का सूत्र
शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक तिथियों की कुल संख्या 30 होती है । इस तरह से कोई भी मुहूर्त देखने के लिए 1 से 30 तक की संख्या को ही लेना चाहिए ।।
तिथी च द्विगुणी कृत्वा तामे पञ्च समाजयेत ।।
सप्तभि (मुनिभिः) हरेद्भागं शेषे शिव वाससं ।।
एक शेषे तू कैलाशे, द्वितीये गौरी संनिधौ ।।
तृतीये वृष भारुढौ सभायां च चतुर्थके ।।
पंचमे तू क्रीडायां भोजने च षष्टकं ।।
सप्तमे श्मशाने च शिववास: प्रकीर्तितः ।।
अर्थ:- तिथि को दुगुना करें,
उसमे पांच को जोड़ देना चाहिए,
कुल योग में, 7 का भाग देने पर, 1.2.3. शेष बचे तो इच्छा पूर्ति होता है,
शिववास अच्छा बनता है । बाकि बचे तो हानिकारक होता है, शुभ नहीं है ।।
इसे इस प्रकार समझना चाहिए ...
१.कैलाश अर्थात = सुख,
२. गौरिसंग = सुख एवं संपत्ति,
३.वृषभारूढ = अभिष्ट्सिद्धि
, ४.सभा = सन्ताप,
५.भोजन = पीड़ा,
६.क्रीड़ा = कष्ट,
७.श्मशाने = मरण ।।

08/06/2021
{{{ॐ}}}                                                            #दक्षिणामूर्ति_शिवदक्षिणामूर्ति शिव तंत्र के रचयिता ह...
23/09/2020

{{{ॐ}}}

#दक्षिणामूर्ति_शिव

दक्षिणामूर्ति शिव तंत्र के रचयिता है सारा तंत्र विज्ञान उन्हीं के श्री मुख से कहा गया है दक्षिणामूर्ति शिव की उपासना करने से अलौकिक गुरु के अभाव का भी निस्तारण हो जाता है दक्षिणामूर्ति से के मंत्र साधना उपासना को यहां पर दक्षिण वक्त प्रधान सौम्या समस्त सदस्य के मंत्रों का और साधना का और समस्त प्रकार के पुरुषार्थ को प्रदान करने वाले मंत्र और साधना का वर्णन किया जाता है
जिसके जप मात्र से ही मुनीश्वरों ने दिव्य ज्ञान प्राप्त किया है। दक्षिणामूर्ति शिव की उपासना अघोर मंत्र से की जाती है पशुपतास्त्र अभी कई प्रकार के मंत्रों से जप पूजा अर्चना किया जाता है।
दक्षिणामूर्ति शिव की आराधना सर्वश्रेष्ठ अघोरा मंत्र को वर्णित किया जाता है इसके स्मरण मात्र से मनुष्यों के सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं अब अघोरास्त्र मंत्र का उद्धार वर्णित करते हैं।
माया बीज के पश्चात दो स्फुर शब्द, इसके बाद दो प्रस्फुर शब्द, इसके बाद घोर घोरतर शब्द, इसके बाद तनुरूप शब्द, पुनः दो बार चट चट शब्द, इसके बाद प्रचट प्रचट शब्द दो बार, पुनः कहें शब्द दो बार, तत्पश्चात वम शब्द दो बार, उसके बाद बंध शब्द दो बार इसके बाद घातय शब्द दो बार तदनंतर मे हूँ फट् कहे यह मन्त्र इक्यावन अक्षरों का कहा गया है।
यह इक्यावन अक्षरों का मंत्र अघोरास्त्र नामक महामंत्र कहलाता है इस महामंत्र के अघोर ऋषि हैं त्रिष्टुप छंद है मंत्र वेत्ताओं ने इसके देवता अघोर रूद्र को कहा है पांच अक्षरों से ह्रदय न्यास छह अक्षरों से शिर न्यास दस अक्षरो से शिखा और उतने ही अक्षरों से कवच आठ वर्णों से नेत्र तथा बारह अक्षरों से अस्त्र न्यास करना चाहिए।
इसके पश्चात सिर नेत्र मुख कंठ हृदय नाभि लिंग पूर्व दो जानू दो जगह तथा दो पैर इन ग्यारह स्थानों में भी मंत्र का ग्यारह भाग करके न्यास करना चाहिए। वे भाग क्रमशः पांच छे दो आठ चार छे चार ,चार चार थे और दो वर्णों के कर्म से समझना चाहिए।
अघोर प्रभु मारण तथा ग्रहों के विनाशकारी में कृष्ण वर्ण और वैश्यकार्य में कुसुम्भ के सदृश और मुक्ति कार्य में चंद्रमा के समान रूप धारण करते हैं इस मंत्र का पुरश्चरण साधक एक लाख जप करें तत्पश्चात उसका दशांश धृतसिक्त तिल से होम करें जिससे साधक को मंत्र सिद्ध हो जाएगा।

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