05/08/2023
#मेवात_का_इतिहास
मेव अपने आप को मुसलमान नही मेव कहलाना पसंद करते है। जानिए आखिर क्यों ?
मेवात के मेव समाज के बारे में लोगो को बहुत कम जानकारी है। मेवात में 9वी 10वी शताब्दी के आस पास, राजपूतों के उदय से पहले। मेवाल गोत्र के राजाओं का शासन था। इसलिए इस क्षेत्र का नाम मेवात पड़ा। यहां के लोगो को मेव कहा जाता था। ये मेव शब्द उनको अपने अतीत से जोड़े रखता है। इसलिए मेव अपने आप को मुसलमान कहलाना पंसद नही करते। वे अपने आप को मेव कहलाना ज्यादा पसंद करते है। मुसलमान तो उनको हिंदुओं ने बनाया है। हिंदुओं ने मेवो को मुसलमानों की तरफ धकेला है। मेव भारत का एक ऐसा समाज है जो हिंदू-मुस्लिम धर्म, संस्कृति दोनो को एक साथ जिया है और निभाया भी है। मेव समाज हिन्दू-मुस्लिम एकता, भाईचारे की कड़ी है। ये लगभग 1992 तक ईद के साथ साथ होली भी खेलते थे, दिवाली भी मनाते थे। हिन्दुओं के लगभग सभी त्योहार हर्षो उल्लास के साथ मनाते थे। शादी में निकाह भी पढ़ते थे और फेरे भी लेते थे। इनकी पुरानी पीढ़ी के नाम भी मंगल खां, शेरू खां, कालू खां आदि हिन्दू मुस्लिम मिक्स नाम होते थे। दाढ़ी मूंछ हिन्दुओं की तरह ही रखते थे। पहनावे में पुरुष धोती कुर्ता साफा पहनते थे।
1992 के हिंदू मुस्लिम दंगो में इन्होंने महसूस किया की ना तो हिंदू अपना समझ रहे है और ना मुस्लिम। दोनो की नफरत का शिकार कब तक होते रहेंगे। उनको लगा की अब कही एक साइड हो जाना चाहिए। हिन्दू उनको अपना नही रहे थे, मुसलमानों में वे जाना नही चाह रहे थे। हिन्दुओं ने इनके घर वापसी का कोई प्रयास किया नही, मुस्लिम संस्थाओं ने इनके लिए दरवाजे खोल दिए।
1992 के बाद से इनके पहनावे, नामकरण, रितिरिवाजो में तेजी से बदलाव आया। मेवात का मेव समाज मीना, जाट, गुर्जर, अहीर, राजपूत और अन्य समाजों से बना हुआ है। मेव समाज अभी भी अपने बच्चो की शादी मुसलमानों में नही करते, मेवों में ही करते है। चाचा, ताऊ के बच्चो के साथ शादी नही करते है और ये तीन गोत्र टालते है। इन्होंने निश्चित कर रखा है की किन गोत्रो में शादी करनी है, किन में नही करनी।
मेवों का इतिहास बहुत ही शानदार और गौरवपूर्ण रहा है। मेवों को एक देशभक्त कौम के रूप में जाना जाता है। लेकिन विडंबना है कुटिल मानसिकता वाले लोग मेवों को भारत की प्राचीन संस्कृति और भाईचारे से पहले भी दूर धकेला गया और आज भी धकेलते जा रहे है। बाहरी मुस्लिम हो, अंग्रेज हो, या कोई ओर, किसी भी बाहरी अक्रांता और आततायियों का मेवों ने मुंहतोड़ जवाब दिया है। आक्रांताओं से संघर्ष में इस समाज ने अपना बहुत कुछ खोया है।
दिल्ली से महज 90 किलोमीटर की दूरी पर होते हुए भी विकास यहां से कोसो दूर है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, असुरक्षा की भावना चरम पर है। बेरोजगारी और अशिक्षा की वजह से यहां के युवा अपराध की तरफ बढ़ गए। ना सरकार ने मेवात की तरफ ध्यान दिया, ना हिन्दू मुसलमानों ने इनको अपना समझकर इनका विकास करने में मदद की। निरन्तर खतरा और असुरक्षा की भावना, गरीबी, बेरोजगारी निरंतर इनको अपराध की तरफ धकेल रही है।
मेरे हिन्दुस्तान के लोगो से निवेदन है कि मेवों को मेव ही रहने दो और मेवात को मेवात। मिनी पाकिस्तान का ठप्पा लगाकर अपने ही खून के हिस्से को उपहार स्वरूप पाकिस्तान को भेंट ना करो दोस्तों।
धर्म के नाम पर गन्दी राजनीति के नफरती खेल मत रंगो अपने हिन्दुस्तान की सरजमी को। भारत की इस सरजमी के हम सभी भारतवासी बराबर के हिस्सेदार है, इसे किसी एक की बापौती मत समझो।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, किसान, दलित, आदिवासी के बलिदानी खून से छपा पड़ा है इस सरजमी पर, सब बराबर हिस्सेदार है इस मिट्टी के।
यह समय लड़ने झगड़ने का नही है। समय है सबकी उन्नति, सबका विकास और एक दूसरे के सुख दुख में सामिल होकर आपस में भाई-चारा व प्रेम बढ़ाने का !!
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