10/04/2022
भक्ति एकदम स्वतंत्र है.... ( यह भक्तिमय कथा हमे पसन्द आयी, सोचा आपसे भी शेयर करें )
भगवान ने हमे स्वतंत्रता दी है, की तू जहां चाहे, वहां मुझे मान ले ...यह बात अलग है, की इस बात को कोई न समझ पाए । कथा चल रही थी, व्यासगद्दी पर बैठे महाराज ने कहा :- जब भगवान गर्भ में आ गए, तो देवताओं में उनकी स्तुति करनी शुरू कर दी ।।
किसी सज्जन को यह बात बुरी लग गयी, क्या भगवान भी गर्भ में आते है ? अगर वह गर्भ में आते है, तो हममे और भगवान ने अंतर क्या रहा ?? इस सज्जन को भगवान् के गर्भ में आने से परेशानी हो गयी ....
महाराज जी उत्तर देते, इससे पहले ही दूसरा सज्जन उठ खड़ा हुआ, ओर बोला .... क्या भगवान गर्भ में नही है ??? क्यो की एक और तो तुम कहते हो, की भगवान कण कण में है ..... "ईशावास्यं इदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत....."
अरे जब सब जगह भगवान है, तो किसी ने माता के गर्भ में मान लिया, तो क्या कठिनाई हो गयी ??? जब वह सब जगह है , तो किसी ने मूर्ति में मान लिया, तो क्या कठिनाई हो गयी ? जब वह सब जगह है, तो किसी ने चित्र में मान लिया, तो क्या कठिनाई हो गयी ?? अद्भुत हमारी सोच है, हम भगवान को सर्वव्यापी तो मानते है, लेकिन मूर्ति में नही मानते ....
अगर सर्वव्यापक को किसी ने कही भी मान लिया, तो क्या फर्क पड़ता है ?? भगवान तो प्रत्येक स्थान पर है, मूर्ति में , चित्र में , कलेंडर में .... आपको जहां मानना है, वहां मान लो ...
अब मीरा बाई ने भगवान का एक नाम चुना ...
" मीरा के प्रभु, गिरधर नागर " ।। बस यही एक नाम .... और सूरदास जी ...
"जय मीरा के गिरधर नागर,।
और सूरदास के श्याम ....।।
नरसी के प्रभु सांवल शाह।
और तुलसीदास के राम ।। " कितने भगवान हो गए ???
एक बार एक सज्जन ने कहा, कबीर जी ने तो 4 राम बताए है ...
एक राम तो दसरथ का बेटा
एक राम घट घट में लेटा
एक राम सकल पसारा
एक राम सब जग से न्यारा
सन्त ने कहा ... कबीर में चार राम कहां कहे? एक ही तो राम है ...
वही राम दसरथ का बेटा
वही राम घट घट में लेटा
वही राम सकल पसारा
वही राम सब जग से न्यारा ....
एक बार की बात है ...बड़े नामी भक्त हुए है, नरसीजी
नरसी जी तो अपनी कुटिया में भजन कर रहे रहे थे .... " श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी ... हे नाथः नारायण वासुदेवा " ।।कीर्तन किये जायें बस
अब ऐसे के पास रहे कौन ??
कोई सूरदास जी जैसा अंधा ही रहे, सूरदास को दिखे नही, और नरसी जी भजन करते समय आँख बंद कर ले ...भंडारे के लिए उधार सामग्री ले आये ... आगे जो होगा देखी जाएगी...
एक बार कुछ सन्त आये नरसी जी के पास, बोले .... भई हम द्वारिका के लिये जा रहे है .... हमारे पास पैसा है ...अगर किसी का द्वारिका में कारोबार हो, तो हुंडी का कागज लिखकर दे दे ...तो हमे यह धन साथ नही ले जाना पड़ेगा ...
गांव के लोग नरसी जी से जलते थे ... उन्होंने नरसी का ही पता दे दिया ... कहा..." गाँव मे सेठ तो एक ही है, नरसी मेहता, लेकिन वह रहता है, दीन हीन भाव से ... आप बस उसके पीछे पड़ जाना । उसका बड़ा कारोबार है द्वारिका में , वही लिख सकता है आपकी हुंडी ...."
सन्तो ने कहा चलो नरसी के यहां
नरसी जी अपनी कुटिया में लगे हुए " श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी ... " सन्तजी आये, अरे जय हो .... जय हो सेठजी ।। हमारा भी उद्धार करो ।
नरसी जी कांप गए, की हम कबसे उद्धार करने लगे,,, हम तो कीर्तन करते है ।
सेठ बोले ... हम द्वारिका जा रहे है, हमारा पैसा लो, और हुंडी लिखकर दो ।।
नरसी जी ने कहा.... महाराज हम तो गरीब आदमी है, उधार लाकर भंडारा करते है, हम तो दीन हीन आदमी है....
सन्त बोले, गांव वालों ने पहले ही कहा था, वह ऐसे ही बोलेगा ।।
नरसी बोले ... साब, हमारा कोई कारोबार नही द्वारिका में , हम सही कहते है ।
अब जब ज़्यादा जिद की , तो सन्तो ने एक ही बात कही ... हमारी सौगंध कह के कहो, की द्वारिका में तुम्हारा कोई नही है ???
अब तो नरसीजी के आंखों में आंसू आ गए, अब यह कैसे कह दे, की द्वारिका में उनका कोई नही है .... "द्वारिका में ही तो कोई है, जिससे हमारा नाता है ।।" नरसी जी चुप पड़ गए।।।
सन्तो के कहा, लिखो हुंडी ।।
नरसी जी ने भी सोच ही लिया, की अब भगवान ने भेज ही दिया, तो लिख ही देते है ... आगे जो होगी देखी जाएगी .... हुंडी लिख दी। पैसा ले लिया ।। अब हुंडी में नाम किसका लिखे ?? तो ऐसे ही भगवान का एक नाम बनाकर सांवल शाह लिख दिया ।।
नरसी जी सोच रहे रहे, यह सन्त इतनी जल्दी तो आते नही, भोज भंडारा होगा, आएंगे, तब देखा जाएगा। खूब भंडारा कीर्तन हुआ, अब सन्त द्वारिका पहुँचे, तो सांवल शाह नाम का कोई सेठ मिले ही नही ।। पूरे दिन ढूंढा ... अब थक हारकर सन्त समुद्र किनारे जाकर बैठे ओर बोले, ठग लिया ....
दूसरे बोले ... वह तो पहले ही मना कर रहे रहे, तुम्ही पीछे पड़े थे ।।
" अरे फिर भी बताना तो चाइये था ".. ऐसा कहकर सन्त नरसी को गालियां दे ।। इतने में ही साफा लगाए हुए, धोती कुर्ता पहने , चश्मा लगाए, कलम कान पर धरकर , सांवल सेठ आ गए, अरे बताओ भई हमको किसने याद किया ?? नरसी का नाम कौन ले रहा है ??
आकर कहा की मेरा ही नाम सांवल शाह है, में यहां से दूर रहता हूँ । कल मिल नही पाया, लाओ कागज दिखाओ, और पैसा ले लो ...
हुंडी दी, रुपया मिल गया । सांवल सेठ ने एक चिट्ठी दे दी, लो यह चिट्ठी नरसी को दे देना।
अब सन्त पुनः जूनागढ़ आये, तो दूर से ही गांव वालों ने देख किया.... नरसी से कहा वही सन्त आ रहे है, जिसकी तुमने हुंडी लिखी थी । अब नरसी जी तो घबरा कर कुटिया के भीतर में घुस गए ...
सन्त कहे.... अरे भई बाहर तो आओ ....
यहां नरसी अंदर से बोले .... देखिए हमने तो आपको मना किया था, आपही नही माने।
बोले यह सब बाद में .... पहले बाहर निकलो ।
नरसी जी हाथ जोड़े, कांपते हुए बाहर आये .... यहां सन्त सोचे, देखो कितना बड़ा कारोबारी है, और कैसा विन्रम स्वभाव है ...
नरसी जी को लगे, की सन्त व्ययंग कर रहे है ।।
सन्तो ने कहा, अरे हम व्ययंग नही कर रहे, लो यह सांवल सेठ की चिट्ठी पढ़ो।
सिद्ध श्री जूनागढ़ के भक्त
कहियो हमारी जाय,
जय नरसी की है।
सन्तन के बहाने मोये
सेवा को अवसर दियो
चिट्ठी लिख भेजी, बात इतनी है ।
बार बार सन्तन के संग सन्देश भेजत,
आप नही आवत , बात यह फीकी है ...
ज्ञान के मुनि, फिर याद करना हमे
यह दुकान आपकी ही है ।।
नरसी ने चिट्ठी माथे पर रखी, और कहा जय हो भगवान ....
( राजेश्वरानंद जी महाराज का प्रवचन )