Apney KANHA

Apney KANHA जय श्री कृष्णा ||

सत्संग की नाव में बेठे कर भव सागर बिना किसी कष्ट से पार हो जाओ संसार में कोई खुश हो कर तुमे क्या देगा और अप्रसन्न हो कर क्या ले लेगा ...कान्हा खुश हैं तो संसार रूठ कर तुमारा क्या बिगाड़ देगा

बाबा भोले की राजनीति देखिये -गणेश जी का चूहा ऊधम मचाता है तो उसको कंट्रोल करने के लिए अपने साँप भेज देते हैंसाँप का मन ब...
22/06/2022

बाबा भोले की राजनीति देखिये -

गणेश जी का चूहा ऊधम मचाता है
तो उसको कंट्रोल करने के लिए अपने साँप भेज देते हैं

साँप का मन बढ़ता है तो उसको कंट्रोल करने के लिए
कार्तिकेय का मोर भेज देते हैं

मोर ऊधम करे तो बैल
बैल भड़के तो भवानी का शेर

शेर भड़के तो भवानी
भवानी भड़के तो बच्चे गणेश-कार्तिकेय

बच्चे भड़कें तो भूत
भूत भड़कें तो उन पर भभूत,

विष गले में तो चंद्रमा से अमृत,

नेत्र में आग तो सर पे गंगा जल !!

अमङ्गल वेश और स्वयं सर्व मङ्गल !!!

सब प्रकार ज्ञान से भरे पूरे लायक शिव
इसप्रकार राजनीति करते
हमारी रक्षा करें
___
मूसे पर साँप राखे, साँप पर मोर राखे, बैल पर सिंह राखे, वाके कहा भीति है
पूतनि को भूत राखे, भूत को विभूति राखे, छमुख को गजमुख यहै बड़ी नीति है
काम पर बाम राखे, बिष को पियूष राखै, आग पर पानी राखै सोई जग जीति है
'देवीदास' देखौ ज्ञानी संकर की सावधानी, सब बिधि लायक पै राखे राजनीति है l

भक्ति एकदम स्वतंत्र है.... ( यह भक्तिमय कथा हमे पसन्द आयी, सोचा आपसे भी शेयर करें )भगवान ने हमे स्वतंत्रता दी है, की तू ...
10/04/2022

भक्ति एकदम स्वतंत्र है.... ( यह भक्तिमय कथा हमे पसन्द आयी, सोचा आपसे भी शेयर करें )

भगवान ने हमे स्वतंत्रता दी है, की तू जहां चाहे, वहां मुझे मान ले ...यह बात अलग है, की इस बात को कोई न समझ पाए । कथा चल रही थी, व्यासगद्दी पर बैठे महाराज ने कहा :- जब भगवान गर्भ में आ गए, तो देवताओं में उनकी स्तुति करनी शुरू कर दी ।।

किसी सज्जन को यह बात बुरी लग गयी, क्या भगवान भी गर्भ में आते है ? अगर वह गर्भ में आते है, तो हममे और भगवान ने अंतर क्या रहा ?? इस सज्जन को भगवान् के गर्भ में आने से परेशानी हो गयी ....

महाराज जी उत्तर देते, इससे पहले ही दूसरा सज्जन उठ खड़ा हुआ, ओर बोला .... क्या भगवान गर्भ में नही है ??? क्यो की एक और तो तुम कहते हो, की भगवान कण कण में है ..... "ईशावास्यं इदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत....."
अरे जब सब जगह भगवान है, तो किसी ने माता के गर्भ में मान लिया, तो क्या कठिनाई हो गयी ??? जब वह सब जगह है , तो किसी ने मूर्ति में मान लिया, तो क्या कठिनाई हो गयी ? जब वह सब जगह है, तो किसी ने चित्र में मान लिया, तो क्या कठिनाई हो गयी ?? अद्भुत हमारी सोच है, हम भगवान को सर्वव्यापी तो मानते है, लेकिन मूर्ति में नही मानते ....

अगर सर्वव्यापक को किसी ने कही भी मान लिया, तो क्या फर्क पड़ता है ?? भगवान तो प्रत्येक स्थान पर है, मूर्ति में , चित्र में , कलेंडर में .... आपको जहां मानना है, वहां मान लो ...

अब मीरा बाई ने भगवान का एक नाम चुना ...

" मीरा के प्रभु, गिरधर नागर " ।। बस यही एक नाम .... और सूरदास जी ...

"जय मीरा के गिरधर नागर,।
और सूरदास के श्याम ....।।
नरसी के प्रभु सांवल शाह।
और तुलसीदास के राम ।। " कितने भगवान हो गए ???

एक बार एक सज्जन ने कहा, कबीर जी ने तो 4 राम बताए है ...

एक राम तो दसरथ का बेटा
एक राम घट घट में लेटा
एक राम सकल पसारा
एक राम सब जग से न्यारा
सन्त ने कहा ... कबीर में चार राम कहां कहे? एक ही तो राम है ...

वही राम दसरथ का बेटा
वही राम घट घट में लेटा
वही राम सकल पसारा
वही राम सब जग से न्यारा ....

एक बार की बात है ...बड़े नामी भक्त हुए है, नरसीजी

नरसी जी तो अपनी कुटिया में भजन कर रहे रहे थे .... " श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी ... हे नाथः नारायण वासुदेवा " ।।कीर्तन किये जायें बस

अब ऐसे के पास रहे कौन ??
कोई सूरदास जी जैसा अंधा ही रहे, सूरदास को दिखे नही, और नरसी जी भजन करते समय आँख बंद कर ले ...भंडारे के लिए उधार सामग्री ले आये ... आगे जो होगा देखी जाएगी...

एक बार कुछ सन्त आये नरसी जी के पास, बोले .... भई हम द्वारिका के लिये जा रहे है .... हमारे पास पैसा है ...अगर किसी का द्वारिका में कारोबार हो, तो हुंडी का कागज लिखकर दे दे ...तो हमे यह धन साथ नही ले जाना पड़ेगा ...

गांव के लोग नरसी जी से जलते थे ... उन्होंने नरसी का ही पता दे दिया ... कहा..." गाँव मे सेठ तो एक ही है, नरसी मेहता, लेकिन वह रहता है, दीन हीन भाव से ... आप बस उसके पीछे पड़ जाना । उसका बड़ा कारोबार है द्वारिका में , वही लिख सकता है आपकी हुंडी ...."

सन्तो ने कहा चलो नरसी के यहां

नरसी जी अपनी कुटिया में लगे हुए " श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी ... " सन्तजी आये, अरे जय हो .... जय हो सेठजी ।। हमारा भी उद्धार करो ।

नरसी जी कांप गए, की हम कबसे उद्धार करने लगे,,, हम तो कीर्तन करते है ।

सेठ बोले ... हम द्वारिका जा रहे है, हमारा पैसा लो, और हुंडी लिखकर दो ।।

नरसी जी ने कहा.... महाराज हम तो गरीब आदमी है, उधार लाकर भंडारा करते है, हम तो दीन हीन आदमी है....

सन्त बोले, गांव वालों ने पहले ही कहा था, वह ऐसे ही बोलेगा ।।

नरसी बोले ... साब, हमारा कोई कारोबार नही द्वारिका में , हम सही कहते है ।

अब जब ज़्यादा जिद की , तो सन्तो ने एक ही बात कही ... हमारी सौगंध कह के कहो, की द्वारिका में तुम्हारा कोई नही है ???

अब तो नरसीजी के आंखों में आंसू आ गए, अब यह कैसे कह दे, की द्वारिका में उनका कोई नही है .... "द्वारिका में ही तो कोई है, जिससे हमारा नाता है ।।" नरसी जी चुप पड़ गए।।।

सन्तो के कहा, लिखो हुंडी ।।

नरसी जी ने भी सोच ही लिया, की अब भगवान ने भेज ही दिया, तो लिख ही देते है ... आगे जो होगी देखी जाएगी .... हुंडी लिख दी। पैसा ले लिया ।। अब हुंडी में नाम किसका लिखे ?? तो ऐसे ही भगवान का एक नाम बनाकर सांवल शाह लिख दिया ।।

नरसी जी सोच रहे रहे, यह सन्त इतनी जल्दी तो आते नही, भोज भंडारा होगा, आएंगे, तब देखा जाएगा। खूब भंडारा कीर्तन हुआ, अब सन्त द्वारिका पहुँचे, तो सांवल शाह नाम का कोई सेठ मिले ही नही ।। पूरे दिन ढूंढा ... अब थक हारकर सन्त समुद्र किनारे जाकर बैठे ओर बोले, ठग लिया ....

दूसरे बोले ... वह तो पहले ही मना कर रहे रहे, तुम्ही पीछे पड़े थे ।।

" अरे फिर भी बताना तो चाइये था ".. ऐसा कहकर सन्त नरसी को गालियां दे ।। इतने में ही साफा लगाए हुए, धोती कुर्ता पहने , चश्मा लगाए, कलम कान पर धरकर , सांवल सेठ आ गए, अरे बताओ भई हमको किसने याद किया ?? नरसी का नाम कौन ले रहा है ??

आकर कहा की मेरा ही नाम सांवल शाह है, में यहां से दूर रहता हूँ । कल मिल नही पाया, लाओ कागज दिखाओ, और पैसा ले लो ...

हुंडी दी, रुपया मिल गया । सांवल सेठ ने एक चिट्ठी दे दी, लो यह चिट्ठी नरसी को दे देना।

अब सन्त पुनः जूनागढ़ आये, तो दूर से ही गांव वालों ने देख किया.... नरसी से कहा वही सन्त आ रहे है, जिसकी तुमने हुंडी लिखी थी । अब नरसी जी तो घबरा कर कुटिया के भीतर में घुस गए ...

सन्त कहे.... अरे भई बाहर तो आओ ....

यहां नरसी अंदर से बोले .... देखिए हमने तो आपको मना किया था, आपही नही माने।

बोले यह सब बाद में .... पहले बाहर निकलो ।

नरसी जी हाथ जोड़े, कांपते हुए बाहर आये .... यहां सन्त सोचे, देखो कितना बड़ा कारोबारी है, और कैसा विन्रम स्वभाव है ...

नरसी जी को लगे, की सन्त व्ययंग कर रहे है ।।

सन्तो ने कहा, अरे हम व्ययंग नही कर रहे, लो यह सांवल सेठ की चिट्ठी पढ़ो।

सिद्ध श्री जूनागढ़ के भक्त
कहियो हमारी जाय,
जय नरसी की है।
सन्तन के बहाने मोये
सेवा को अवसर दियो
चिट्ठी लिख भेजी, बात इतनी है ।
बार बार सन्तन के संग सन्देश भेजत,
आप नही आवत , बात यह फीकी है ...
ज्ञान के मुनि, फिर याद करना हमे
यह दुकान आपकी ही है ।।

नरसी ने चिट्ठी माथे पर रखी, और कहा जय हो भगवान ....

( राजेश्वरानंद जी महाराज का प्रवचन )

05/09/2021

जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏼

15/08/2021

जय श्री कृष्णा 🙏🏼

05/08/2021

मेरी प्रार्थना हो तुम.. 🙏🏼❤️

आप के नाम में छुपा है राम का नाम : अद्भुत गणित अदभुत गणितज्ञ "श्री.तुलसीदासजी से एक भक्त ने पूछा कि महाराज आप श्रीराम के...
29/07/2021

आप के नाम में छुपा है राम का नाम
: अद्भुत गणित

अदभुत गणितज्ञ "श्री.तुलसीदासजी से एक भक्त ने पूछा कि महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं, क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं ?..

तुलसीदास बोले :- " हां "
भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ???
तुलसीदास :- " हां अवश्य " ....तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए !!!

तुलसीदास जी ने कहा , ""अरे भाई यह बहुत ही आसान है !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.""

हर नाम के अंत में राम का ही नाम है.

इसे समझने के लिए तुम्हे एक "सूत्रश्लोक " बताता हूं .
यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!!
भक्त :-" कौनसा सूत्र महाराज ?"

तुलसीदास :- यह सूत्र है ...
||"नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण || || तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम || "

इस सूत्र के अनुसार

★ अब हम किसी का भी नाम लें और उसके अक्षरों की गिनती करें...

१) उस गिनती को (चतुर्गुण) ४ से गुणाकार करें.

२) उसमें (पंचतत्व मिलन) ५ मिला लें.

३) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें.

४) आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) ८ से विभाजित करें .

*"" संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा २ शेष रहेगा!!! ...
यह २ ही "राम" है। यह २ अंक ही " राम " अक्षर हैं...

★विश्वास नहीं हों रहा है ना???
चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं ...
आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों !!!

★ उदाहरण के लिए. ..निरंजन... ४ अक्षर

१) ४ से गुणा करिए ४x४=१६

२) ५ जोड़िए १६+५=२१

३) दुगने करिए २१×२=४२

४) ८ से विभाजन करने पर ४२÷८= ५ पूर्ण अंक , शेष २ !!!

शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे २ अर्थात् - "राम" !!!

विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है!!!

★1) चतुर्गुण अर्थात् ४ पुरुषार्थ :- धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष !!!

★2) पंचतत्व अर्थात् ५ पंचमहाभौतिक :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश!!!

★3) द्विगुण प्रमाण अर्थात् २ माया व ब्रह्म !!!

★4) अष्ट सो भागे अर्थात् ८ * आठ प्रकार की लक्ष्मी (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योग लक्ष्मी ) अथवा तो अष्ठधा प्रकृति.

★अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष २ ही प्राप्त होगा ...
इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!!

☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀
🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

28/07/2021

Hare Krishna 🙏🏼

14/07/2021

राधे राधे 🙏🏼

24/05/2021

"त्रिगुण स्वामी"

"ॐ जय शिव ओंकारा", यह वह प्रसिद्ध आरती है जो देश भर में शिव-भक्त नियमित गाते हैं..

लेकिन, बहुत कम लोग का ही ध्यान इस तथ्य पर जाता है कि, इस आरती के पदों में ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनो की स्तुति है..
👇
एकानन (एकमुखी, विष्णु) चतुरानन (चतुर्मुखी, ब्रम्हा) पंचानन (पंचमुखी, शिव) राजे..
हंसासन(ब्रम्हा) गरुड़ासन(विष्णु ) वृषवाहन (शिव) साजे..

दो भुज (विष्णु) चार चतुर्भुज (ब्रम्हा) दसभुज (शिव) ते सोहे..

अक्षमाला (रुद्राक्ष माला, ब्रम्हाजी ) वनमाला (विष्णु ) रुण्डमाला (शिव) धारी..
चंदन (ब्रम्हा ) मृगमद (कस्तूरी , विष्णु ) चंदा (शिव) भाले शुभकारी (मस्तष्क पर शोभा पाते है)..

श्वेताम्बर (सफेदवस्त्र, ब्रम्हा) पीताम्बर (पीले वस्त्र, विष्णु) बाघाम्बर (बाघ चर्म ,शिव) अगें..

ब्रम्हादिक (ब्राह्मण, ब्रह्मा) सनकादिक (सनक आदि, विष्णु ) भूतादिक (शिव ) संगे (साथ रहते हैं।)..

कर के मध्य कमंडल (ब्रम्हा) चक्र (विष्णु) त्रिशूल (शिव) धर्ता..
जगकर्ता (ब्रम्हा) जगहर्ता (शिव ) जग पालनकर्ता (विष्णु)..

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका (अविवेकी लोग इन तीनो को अलग अलग जानते हैं।)

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका (सृष्टि के निर्माण के मूल ऊँकार नाद में ये तीनो एक रूप रहते है, आगे सृष्टि निर्माण, पालन और संहार हेतु त्रिदेव का रूप लेते हैं।...

🙏🏻श्रीराधे🙏🏻

17/05/2021

गले से लगा लो न कन्हैया मुझको
गले से लगा लो न तुम्हारे सिवा कोई न मेरा
मुझे अपना बना लो न... 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

जय श्री कृष्णक्यों किया जाता है तुलादान, क्या हैं इसके लाभतुलादान लीलाभगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में तुलादान लीला भी शामि...
23/03/2021

जय श्री कृष्ण
क्यों किया जाता है तुलादान, क्या हैं इसके लाभ
तुलादान लीला
भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में तुलादान लीला भी शामिल है। माना जाता है कि इस तुलादान लीला में भगवान कृष्ण ने तुलसी के महत्व के बारे में बताया है।
इस तुलादान लीला से प्रेरित होकर भगवान द्वारकाधीश के साथ ही एक और मंदिर का निर्माण किया था जिसे तुलादान मंदिर के नाम से जाना गया।

🍃क्यों पड़ा तुलादान नाम
इस मंदिर का नाम काफी अलग है। आप भी सोच रहे होंगें कि आखिर इस मंदिर को ऐसा नाम क्‍यों दिया गया। दरअसल, किवदंती है कि इसी स्‍थान पर सत्यभामाजी ने श्रीकृष्ण का तुलादान किया था। इस मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति के ठीक सामने एक विशाल तराजू रखा है जिस पर आज भी तुलादान किया जाता है।

श्रीकृष्ण ने क्‍यों किया था तुलादान
जहाँ पर श्रृद्धालुु अपने वजन के बराबर अन्न, घी, चीनी और तेल का दान करते हैं। किवदंती है कि भगवान कृष्ण को पूरी तरह से अपना बनाने का और उन पर एकाधिकार पाने की लालसा में उनकी पटरानी सत्यभामा ने नारद मुनि को श्रीकृष्ण का दान कर दिया और जब नारद जी कृष्ण जी को अपने साथ लेकर जाने लगे तब जाकर सत्यभामा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्‍होंने नारदजी से भगवान कृष्‍ण को वापिस पाने का उपाय पूछा।
👉तुलादान का बताया उपायत्‍यभामा को इस विपत्ति से निकालने के लिए नारद जी ने उन्‍हें श्रीकृष्ण के वजन के बराबर सोना दान करने को कहा। यहां भी सत्यभामा के मन में अहंकार आ गया और उसने श्रीकृष्ण को सोने से तोलना शुरु किया। खजाने से पूरा सोना तुला पर डालने के बाद भी श्रीकृष्ण जी का पलड़ा भारी था। ये सब देखकर उनकी पटरानी का अहंकार टूट गया। ये सब देखते हुए _रुक्मणी जी ने सत्यभामा से तुला में सोने के ऊपर तुलसी का पत्ता रखने को कहा। तुला पर तुलसी का पत्ता रखते ही सोने का वजन श्रीकृष्ण के बराबर हो गया। इसी कथा के संबंध में तुला मंदिर बनवाया गया था।🎊तुलादान लीला के लाभ
तुलादान के बारे में कहा जाता है कि इस दान को करने से सभी ग्रहों का दान होता है।
ज्‍योतिषशास्त्र के अनुसार बताते हैं कि हमारे शरीर के हर भाग पर किसी ना किसी ग्रह का प्रभाव होता है और तुलादान करने से सभी ग्रहों के निमित्त दान हो जाता है। इस तरह जिस भी ग्रह का दोष आप पर लगा होता है वो दूर हो जाता है। तुलादान करने वाले व्‍यक्‍ति का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है और उसे सुख-समृद्धि की प्राप्‍ति होती है।
पौराणिक कथाओं में भी तुलादान का उल्‍लेख मिलता है।
जय जै श्री राधे

कहा जाता है तुलादान महादान के बराबर होता है। जो भी व्‍यक्‍ति इस दान को करता है उसे विष्‍णु लोक की प्राप्‍ति होती है। प्राचीन समय में अमीर और संपन्‍न वर्ग के लोग सोने से तुलादान किया करते थे। अब अनाज से भी तुलादान किया जाता है। मान्‍यता है कि ब्रह्माजी ने भगवान विष्‍णु के कहने पर तीर्थों का महत्‍व तय करने के लिए तुलादान करवाया था। तुलादान को तीर्थयात्रा के बराबर बताया गया है।
अगर कोई व्‍यक्‍ति तीर्थयात्रा नहीं कर सकता तो वो तुलादान से भी उसके बराबर पुण्‍य प्राप्‍त कर सकता है।
जय श्री कृष्ण

21/03/2021

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