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प्रणाम है ब्राह्मण समाज को! जय वीर बजरंगी !आप सभी को ब्राह्मण समाज की हार्दिक शुभकामनाए💮वीर बजरंगी आप सभी की सभी मनोकामन...
08/12/2019

प्रणाम है ब्राह्मण समाज को
! जय वीर बजरंगी !
आप सभी को ब्राह्मण समाज की हार्दिक शुभकामनाए💮
वीर बजरंगी आप सभी की सभी मनोकामनाए पूर्ण करें
“संकट कटे मिटे सब पीरा जो सुमिरे हनुमंत बलबीरा”
“Sankat Kate Mite Sab Peera Jo Sumire Hanumant Balbeera”

Hanumaan Chalisa is an adi Chalisa and is sadhna procedure in which power of many ishts works. Hanumaan Chalisa is full many sabar mantras which have infinite powers. Regular reading of Hunumaan Chalisa is capable of giving many accompalishments to the Sadhaks.Its careful and minute recitation is a Sabar prayer of Aadinath form of Lord Shiva, basic form of Huanuman. Many kinds of secrets are unvieled if sadhak understands the abstract meaning of phrases like kanan kundal, sanker suvan, Tumharo mantra, Aapan Tej, Gurudev ki nai, Asht sidhi etc..
While browsing internet I had come across a very educative article on the recitation of the Hanuman Chalisa in which the reference made to the chopayee in the chalisa was discussed and that is as follows: “ Jo Sat Baat Path kare koi, Chhothee Banee Mahasukh Hoyi”. This is the bench mark of the Hanuman Chalisa and often not understod. Ordinarily, this conveys that a man reads Hanuman Chalisa 100 times gets freedom from bo***ge and attains great pleasure, gets freedom from bo***ge. Spiritually, this bo***ge relates to both internal and physical bo***ge and to attain a state of peaceful mind.
However, the Sadhak performs one of this kind of Sadhna is done for fulfilment of one’s desires termed Sakaam or for without any desire termed as Nishkaam. It is necessary for the sadhak to define the procedre to obtain the desired results. Normally, we perform Saadhna for Sakaam and for that the procedure suggested is to first take a sankalp ( resolution) that I (Your name) is performing this recitation for realisation of (name the accompalshmente)). Lord Hanuman provide me Shakti and your succcess for success in it.
If Sadhak is doing sadhna in sakaam manner then he should place a picture of Shri Hanuman in the Veer form tht it in which Hanuman is shown picking up a mountain or in which he destroying the asurs and not the one in which he is projected as a bhakt in Ram Darbar. While doing this Sadhna, he should be alone, even when done in his room. His dress should be red. The Sadhak male or female must perform celebacy three days before undertking the Sadhna i.e on the previous and next day of the sadhna. Sitting direction of the Sadhak must face North.
For best results, Sadhak must first the place the photo as described above in from of him, light a oil or ghee lamp and offer bhog of jaggery and chana and perform this sadhna on any tueday after 10 pm. Sitting on red Aasan, to make counting of 100 recitatation of Chalisa keep 100 red flowers and after every recitations keep apart one flower. Speaking out the wish that he wants to be fulfilled must pray to Lord Hanuman to personally come and help him realise his wish. Then sadhak must recite the chalisa till 100 flowers are kept apart. It is beleived tht this way Hanuman blesses the sadhak to fulfil his wish.
Please use your descretion before trying this Prayog.

प्रणाम है ब्राह्मण समाज कोૐ नमः शिवायप़िय मित्रों, आपको और आपके समग्र परिवार, को .... हार्दिक बधाइयाँ व शुभकामनाऐ!!आप सब...
30/11/2019

प्रणाम है ब्राह्मण समाज को
ૐ नमः शिवाय
प़िय मित्रों, आपको और आपके समग्र परिवार, को .... हार्दिक बधाइयाँ व शुभकामनाऐ!!
आप सबके जीवनमें खुशहाली ,समृद्धि, शांति, प्रेम, और प्रसिद्धि लाये ऐसी हार्दिक शुभकामना के साथ.🌿आप सभी दोस्तों पे भोले बाबा की किरपा बनी रहे ॐहरी ॐ
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शँकराय च |
मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ||
ૐ नमः शिवाय 🌿हर हर महादेव ॐनम:शिवाय 🌿

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे मान मिले सम्मान मिले,सुख - संपत्ति का वरदान मिले...
29/11/2019

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
मान मिले सम्मान मिले,
सुख - संपत्ति का वरदान मिले.
क़दम-क़दम पर मिले सफलता,
सदियों तक पहचान मिले। जय श्री राधे ॥

प्रणाम है ब्राह्मण समाज कोमाँ भवानी आप सभी की मनोकामनाए पूर्ण करें ...माँ वैष्णो देवी के बारे में जानकारी प्राप्त करे उन...
25/11/2019

प्रणाम है ब्राह्मण समाज को
माँ भवानी आप सभी की मनोकामनाए पूर्ण करें ...
माँ वैष्णो देवी के बारे में जानकारी प्राप्त करे उनका गुणगान करे
* *********
शक्ति को समर्पित एक पवित्रतम हिंदू मंदिर है, जो भारत के जम्मू और कश्मीर में वैष्णो देवी की पहाड़ी पर स्थित है। हिंदू धर्म में वैष्णो देवी , जो माता रानी और वैष्णवी के रूप में भी जानी जाती हैं, देवी मां का अवतार हैं।

हिंदू महाकाव्य के अनुसार, मां वैष्णो देवी ने भारत के दक्षिण में रत्‍‌नाकर सागर के घर जन्म लिया। उनके लौकिक माता-पिता लंबे समय तक नि:संतान थे।

दैवी बालिका के जन्म से एक रात पहले, रत्‍‌नाकर ने वचन लिया कि बालिका जो भी चाहे, वे उसकी इच्छा के रास्ते में कभी नहीं आएंगे. मां वैष्णो देवी को बचपन में त्रिकुटा नाम से बुलाया जाता था। बाद में भगवान विष्णु के वंश से जन्म लेने के कारण वे वैष्णवी कहलाईं।

जब त्रिकुटा 9 साल की थीं, तब उन्होंने अपने पिता से समुद्र के किनारे पर तपस्या करने की अनुमति चाही। त्रिकुटा ने राम के रूप में भगवान विष्णु से प्रार्थना की। सीता की खोज करते समय श्री राम अपनी सेना के साथ समुद्र के किनारे पहुंचे। उनकी दृष्टि गहरे ध्यान में लीन इस दिव्य बालिका पर पड़ी।

त्रिकुटा ने श्री राम से कहा कि उसने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया है। श्री राम ने उसे बताया कि उन्होंने इस अवतार में केवल सीता के प्रति निष्ठावान रहने का वचन लिया है। लेकिन भगवान ने उसे आश्वासन दिया कि कलियुग में वे कल्कि के रूप में प्रकट होंगे और उससे विवाह करेंगे।

इस बीच, श्री राम ने त्रिकुटा से उत्तर भारत में स्थित माणिक पहाडि़यों की त्रिकुटा श्रृंखला में अवस्थित गुफा में ध्यान में लीन रहने के लिए कहा। रावण के विरुद्ध श्री राम की विजय के लिए मां ने नवरात्र मनाने का निर्णय लिया।

इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी। त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी।

प्रेम से बोलो ... जय माता दी ...! जय माँ भवानी प्रणाम है! जय हो माँ वैष्णो देवी

Om Namo Bhagwate Vasudevay is a potent mantra that connects the soul with the almighty that you pay obeisance to every m...
16/11/2019

Om Namo Bhagwate Vasudevay is a potent mantra that connects the soul with the almighty that you pay obeisance to every minute in your prayers. This connects the soul to the deity of Lord Krishna and this connect gives you solace and peace. Chanting of this mantra every morning for five minutes shall give you throughout the day the power to face all evils that distract your attention from pious things and acts. This is one mantra that you can chant while a newborn is inducted in the family or when a loved one departs from you to be in the heavenly abode. This is relevant in pre birth through the chant of the parents, during lifetime by your own chanting and once you depart and go to meet the Lord in the heavens by the prayers of your loved ones....Om Namo Bhagwate Vasudevaye.....Chant one and everyone every moment of your life for salvation and mukti.
Satish Chandra Sharma

प्रणाम है ब्राह्मण समाज को॥ ॐ नमः शिवाय॥जय भोलेनाथसत्य सनातन सुन्दर शिवअविकारी , अविनाशी, अज, अन्तर्यामी...आदि , अनन्त ,...
15/11/2019

प्रणाम है ब्राह्मण समाज को
॥ ॐ नमः शिवाय॥
जय भोलेनाथ
सत्य सनातन सुन्दर शिव
अविकारी , अविनाशी, अज, अन्तर्यामी...
आदि , अनन्त , अनामय, अकल, कलाधारी
अरूप , अगोचर , अविचल , अघोरी
ब्रह्मा विष्णु महेश तुम ही त्रिमूर्ति धारी
कर्ता भर्ता धर्ता तुम ही संहारी ॥ ॐ नमः शिवाय॥

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव.भगवान श्री कृष्णा ने अमृतमयी वाणी भगवद गीता में बताया है की उनके सच्च...
13/11/2019

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव.
भगवान श्री कृष्णा ने अमृतमयी वाणी भगवद गीता में बताया है की उनके सच्चे और प्रिये भक्त कौन हैं, उनकी पहचान क्या है।जो प्राणी किसी से भी द्वेष की भावना नहीं रखता, सबसे प्रेम और स्नेह भाव रखता है , जो दीन दुखयिओं के प्रति करुणा भाव रखता है और उनकी मदद के लिये तय्यार रहता है , जो अहंकार मुक्त हो , सुख और दुख में सम रहता हो , जिसे संसार से अधिक मोह ना हो।ऐसे जीव प्रभु को सर्व प्रिय होते हैं।ऐसे प्रिय जन मन बुद्धि से सदा प्रभु से जुड़े रहते हैं और हर प्राणी में ईश्वर की छाया देखते हैं।जय श्री कृष्ण ॐ श्री राधेकृष्णाय् नमौ नमौ

श्री रामजी बोले, हे भगवान्(गुरु वसिष्ठजी)! जो वृत्तान्त है सो तुम्हारे सम्मुख क्रम से कहता हूँ मैं राजा दशरथ के घर में उ...
07/11/2019

श्री रामजी बोले, हे भगवान्(गुरु वसिष्ठजी)! जो वृत्तान्त है सो तुम्हारे सम्मुख क्रम से कहता हूँ मैं राजा दशरथ के घर में उत्पन्न होकर क्रमसे बड़ा हुआ और चारों वेद पढ़कर ब्रह्मचर्यादि व्रत धारण किये; तदनन्तर घर में आया तो मेरे हृदय में विचार हुआ कि तीर्थाटन करूँ और देवद्वारों में जाकर देवों के दर्शन करूँ । निदान मैं पिता की आज्ञा लेकर तीर्थों में गया और गंगा आदि सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान और शालग्राम और केदार आदि ठाकुरों के विधिसंयुक्त दर्शन करके यहाँ आया । फिर उत्साह हुआ तब यह विचार आया कि प्रातःकाल उठकर स्नान सन्ध्यादिक कर्म करके भोजन करता । जब इस प्रकार से कुछ दिन व्यतीत हुए तब मेरे हृदय में एक विचार उत्पन्न हुआ जो मेरे हृदय को खैंच ले गया । जैसे नदी के तट पर तृण बेल होती है उसको नदी का प्रवाह खींच ले जाता है वैसे ही मेरे हृदय में जो कुछ जगत् की आस्थारूपी बेल थी उसको विचाररूपी प्रवाह खींच ले गया । तब मैंने जाना कि राज्य करने से क्या है, भोग से क्या है और जगत क्या है - सब भ्रममात्र है - इसकी वासना मूर्ख रखते हैं; यह स्थावर, जंगम जगत् सब मिथ्या है । हे मुनीश्वर! जितने कुछ पदार्थ हैं वह सब मन से उत्पन्न होते हैं सो मन ही भ्रममात्र है अनहोता मन दुःखदायी हुआ है । मन जो पदार्थों को सत्य जानकर दौड़ता है और सुखदायक जानता है सो मृगतृष्णा के जलवत् है । जैसे मृगतृष्णा के जल को देखकर मृग दौड़ते हैं और दौड़ते-दौड़ते थक कर गिर पड़ते हैं तो भी उनको जल प्राप्त नहीं होता वैसे ही मूर्ख जीव पदार्थों को सुखदायी जानकर भोगने का यत्न करते हैं और शान्ति नहीं पाते । हे मुनीश्वर! इन्द्रियों के भोग सर्पवत् है जिनका मारा हुआ जन्म मरण और जन्म से जन्मान्तर पाता है । भोग और जगत् सब भ्रममात्र हैं उनमें जो आस्था करते हैं वह महामूर्ख हैं मैं विचार करके ऐसा जानता हूँ कि सब आगमापायी है अर्थात् आते भी हैं और जाते भी हैं । इससे जिस पदार्थ का नाश न हो वही पदार्थ पाने योग्य है इसी कारण मैंने भोगों को त्याग दिया है । हे मुनीश्वर! जितने सम्पदारूप पदार्थ भासते हैं वह सब आपदा हैं; इनमें रञ्चक भी सुख नहीं । जब इनका वियोग होता है तब कण्टक की नाई मन में चुभते हैं । जब इन्द्रियों को भोग प्राप्त होते हैं तब जीव राग द्वेष से जलता है और जब नहीं प्राप्त होते तब तृष्णा से जलता है--इससे भोग दुःखरूप ही है । जैसे पत्थर की शिला में छिद्र नहीं होता वैसे ही भोगरूपी दुःख की शिला में सुखरूप छिद्र नहीं होता । हे मुनीश्वर! मैं विषय की तृष्णा में बहुत काल से जलता रहा हूँ । जैसे हरे वृक्ष के छिद्र में अग्नि धरी हो तो धुँवा हो थोड़ा थोड़ा जलता रहता है वैसे ही भोगरूपी अग्नि से मन जलता रहता है । विषयों में कुछ भी सुख नहीं है दुःख बहुत हैं, इससे इनकी इच्छा करनी मूर्खता है । जैसे खाईं के उपर तृण और पात होते हैं और उससे खाईं आच्छादित हो जाती है उसको देख हरिण कूदकर दुःख पाता है वैसे ही मूर्ख भोग को सुखरूप जानकर भोगने की इच्छा करता है और जब भोगता है तब जन्म से जन्मान्तररूपी खाईं में जा पड़ता है और दुःख पाता है । हे मुनीश्वर! भोगरूपी चोर अज्ञानरूपी रात्रिमें आत्मा रूपी धन लूट ले जाता है, पर उसके वियोग से महादीन रहता है । जिस भोग के निमित्त यह यत्न करता है वह दुखरूप है । उससे शान्ति प्राप्त नहीं होती और जिस शरीर का अभिमान करके यह यत्न करता है वह शरीर क्षणभंगुर और असार है । जिस पुरुष को सदा भोग की इच्छा रहती है वह मूर्ख और जड़ है । उसका बोलना और चलना भी ऐसा है जैसे सूखे बाँस के छिद्र में पवन जाता है और उसके वेग से शब्द होता है । जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़ के मार्ग की इच्छा नहीं करता वैसे ही दुःख जानकर मैं भोग की इच्छा नहीं करता । लक्ष्मी भी परम अनर्थकारी है जब तक इसकी प्राप्ति नहीं होती तब तक उसके पाने का यत्न होता है और यह अनर्थ करके प्राप्त होती है । जब लक्ष्मी प्राप्त हुई तब सब सद्गुण अर्थात् शीलता, सन्तोष, धर्म, उदारता, कोमलता, वैराग्य विचार दयादिक का नाश कर देती है । जब ऐसे गुणों का नाश हुआ तब सुख कहाँ से हो, तब तो परम आपदा ही प्राप्त होती है । इसको परमदुःख का कारण जानकर मैंने त्याग दिया है । हे मुनीश्वर! इस जीव में गुण तबतक हैं जब तक लक्ष्मी नहीं प्राप्त हुई । जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब सब गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे बसन्त ऋतु की मञ्जरी तब तक हरी रहती है जब तक ज्येष्ठ आषाढ़ नहीं आता और जब ज्येष्ठ आषाढ़ आया तब मञ्जरी जल जाती है वैसे ही जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब शुभ गुण जल जाते हैं । मधुर वचन तभी तक बोलता है जब तक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं है और जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब कोमलता का अभाव होकर कठोर हो जाता है । जैसे जल पतला तब तक रहता है जब तक शीतलता का संयोग नहीं हुआ और जब शीतलता का संयोग होता है तब बरफ होकर कठोर दुःखदायक हो जाता है; वैसे यह जीव लक्ष्मी से जड़ हो जाता है । हे मुनीश्वर! जो कुछ संपदा है वह आपदा का मूल है, क्योंकि जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तब बड़े-बड़े सुख भोगता है और जब उसका अभाव होता है तब तृष्णा से जलता है और जन्म से जन्मान्तर पाता है । लक्ष्मी की इच्छा करना ही मूर्खता है । यह तप क्षणभंगुर है, इससे भोग उपजते और नष्ट होते हैं । जैसे जल से तरंग उपजते और मिट जाते हैं और जैसे बिजली स्थिर नहीं होती वैसे ही भोग भी स्थिर नहीं रहते । पुरुष में शुभ गुण तब तक हैं जब तक तृष्णा का स्पर्श नहीं और जब तृष्णाहुई तब गुणों का अभाव हो जाता है । जैसे दूध में मधुरता तब तक है जब तक उसे सर्प ने स्पर्श नहीं किया और सर्प ने स्पर्श किया तब वही दूध विषरूप हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे रामेणवैराग्य वर्णनन्नामसप्तमस्सर्गः ॥७॥

(योगवसिष्ठ, वैराग्य प्रकरण)

जय श्री राम

निधिवन - जहाँ कान्हा जी आज भी रचाते है रास।5200 वर्ष पूर्व वृन्दावन की इसी धरा पर कान्हा जी ने राधारानी और गोपियों संग म...
05/11/2019

निधिवन - जहाँ कान्हा जी आज भी रचाते है रास।
5200 वर्ष पूर्व वृन्दावन की इसी धरा पर कान्हा जी ने राधारानी और गोपियों संग महारास रचाया था...द्वापर युग से आज तक हर रात राधे-कृष्ण यहां साक्षात प्रकट होते है...निधिवन में स्थित 16108 वृक्ष गोपियों में तब्दील होकर रातभर कान्हा संग महारास रचाती है...सूरज की पहली किरण फूटने से पहले ही गोपियां वृक्ष का आकार ले लेती है और भगवान कृष्ण राधिका रानी के संग अन्तर्धान हो जाते है।
एक बार कलकत्ता का एक भक्त अपने गुरु की सुनाई हुई भागवत कथा से इतना मोहित हुआ कि वह हर समय वृन्दावन आने की सोचने लगा उसके गुरु उसे निधिवन के बारे में बताया करते थे और कहते थे कि आज भी भगवान यहाँ रात्रि को रास रचाने आते है उस भक्त को इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था और एक बार उसने निश्चय किया कि मैं वृन्दावन जाऊंगा और ऐसा ही हुआ श्री राधा रानी की कृपा हुई और आ गया वृन्दावन उसने जी भर कर बिहारी जी का राधा रानी का दर्शन किया लेकिन अब भी उसे इस बात का यकीन नहीं था कि निधिवन में रात्रि को भगवान रास रचाते है उसने सोचा कि एक दिन निधिवन रुक कर देखता हू इसलिए वो वही पर रूक गया और देर तक बैठा रहा और जब शाम होने को आई तब एक पेड़ की लता की आड़ में छिप गया। जब शाम के वक़्त वहा के पुजारी निधिवन को खाली करवाने लगे तो उनकी नज़र उस भक्त पर पड गयी और उसे वहा से जाने को कहा तब तो वो भक्त वहा से चला गया लेकिन अगले दिन फिर से वहा जाकर छिप गया और फिर से शाम होते ही पुजारियों द्वारा निकाला गया और आखिर में उसने निधिवन में एक ऐसा कोना खोज निकाला जहा उसे कोई न ढूंढ़ सकता था और वो आँखे मूंदे सारी रात वही निधिवन में बैठा रहा और अगले दिन जब सेविकाए निधिवन में साफ़ सफाई करने आई तो पाया कि एक व्यक्ति बेसुध पड़ा हुआ है और उसके मुह से झाग निकल रहा है।
तब उन सेविकाओ ने सभी को बताया तो लोगो कि भीड़ वहा पर जमा हो गयी सभी ने उस व्यक्ति से बोलने की कोशिश की लेकिन वो कुछ भी नहीं बोल रहा था। लोगो ने उसे खाने के लिए मिठाई आदि दी लेकिन उसने नहीं ली और ऐसे ही वो ३ दिन तक बिना कुछ खाएपीये ऐसे ही बेसुध पड़ा रहा और ५ दिन बाद उसके गुरु जो कि गोवर्धन में रहते थे बताया गया तब उसके गुरूजी वहा पहुचे और उसे गोवर्धन अपने आश्रम में ले आये आश्रम में भी वो ऐसे ही रहा और एक दिन सुबह सुबह उस व्यक्ति ने अपने गुरूजी से लिखने के लिए कलम और कागज़ माँगा गुरूजी ने ऐसा ही किया और उसे वो कलम और कागज़ देकर मानसी गंगा में स्नान करने चले गए जब गुरूजी स्नान करके आश्रम में आये तो पाया कि उस भक्त ने दीवार के सहारे लग कर अपना शरीर त्याग दिया था और उस कागज़ पर कुछ लिखा हुआ था।
उस पर लिखा था-
"गुरूजी मैंने यह बात किसी को भी नहीं बताई है, पहले सिर्फ आपको ही बताना चाहता हू आप कहते थे न कि निधिवन में आज भी भगवान रास रचाने आते है और मैं आपकी कही बात पर यकीन नहीं करता था, लेकिन जब मैं निधिवन में रूका तब मैंने साक्षात बांके बिहारी का राधा रानी के साथ गोपियों के साथ रास रचाते हुए दर्शन किया और अब मेरी जीने की कोई भी इच्छा नहीं है, इस जीवन का जो लक्ष्य था वो लक्ष्य मैंने प्राप्त कर लिया है और अब मैं जी कर करूँगा भी क्या?
श्याम सुन्दर की सुन्दरता के आगे ये दुनिया वालो की सुन्दरता कुछ भी नहीं है, इसलिए आपके श्री चरणों में मेरा अंतिम प्रणाम स्वीकार कीजिये।
वो पत्र जो उस भक्त ने अपने गुरु के लिए लिखा था आज भी मथुरा के सरकारी संघ्रालय में रखा हुआ है और बंगाली भाषा में लिखा हुआ है।
कहा जाता है निधिवन के सारी लताये गोपियाँ है जो एक दूसरे कि बाहों में बाहें डाले खड़ी है। जब रात में निधिवन में राधा रानी जी, बिहारी जी के साथ रास लीला करती है तो वहाँ की लताये गोपियाँ बन जाती है, और फिर रास लीला आरंभ होती है, इस रास लीला को कोई नहीं देख सकता,दिन भर में हजारों बंदर, पक्षी,जीव जंतु निधिवन में रहते है पर जैसे ही शाम होती है,सब पक्षी,जीव जंतु ,बंदर अपने आप निधिवन से चले जाते है एक परिंदा भी फिर वहाँ पर नहीं रुकता यहाँ तक कि जमीन के अंदर के जीव चीटी आदि भी जमीन के अंदर चले जाते है रास लीला को कोई नहीं देख सकता। क्योकि रास लीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है रास तो अलौकिक जगत की "परम दिव्यातिदिव्य लीला" है कोई साधारण व्यक्ति या जीव अपनी आँखों से देख ही नहीं सकता। जो बड़े बड़े संत है उन्हें निधिवन से राधारानी जी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि सुनी है।
जब रास करते करते राधा रानी जी थक जाती है तो बिहारी जी उनके चरण दबाते है और रात्रि में शयन करते है।

"आज भी निधिवन में शयन कक्ष है जहाँ पुजारी जी जल का पात्र, पान, फूल और प्रसाद रखते है, और जब सुबह पट खोलत...े है तो जल पीला मिलता है, पान चबाया हुआ मिलता है और फूल बिखरे हुए मिलते है।"जय श्री राधेकृष्णा.I.......

15/10/2019

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