09/09/2025
श्रीजी का कृष्णप्रेम......
एक बार श्रीकृष्ण अपनी रानियों के साथ गंगा जी में स्नान करने सिद्धाश्रम गए। संयोगवश वहाँ श्री राधा रानी भी उसी समय अपनी हजारों सखियों के साथ गंगा स्नान करने पहुंची।
रुक्मिणी जी ने श्री राधा रानी के अद्भुत सौंदर्य के बारे में सुना था। जब उन्हें यह पता चला तो वे राधा रानी से मिलने के लिए उत्सुक होने लगीं । उन्होंने श्री राधा रानी को अपने परिसर में आमंत्रित किया जिसे श्री राधा रानी ने स्वीकार कर लिया।
जैसे ही श्री राधा रानी ने रुक्मणी जी के परिसर में प्रवेश किया तो सभी रानियां उनके रूप माधुर्य तथा आभा को देखकर स्तब्ध रह गईं। उन्होंने सहर्ष श्री राधा रानी तथा सखियों का स्वागत किया । तब रुक्मिणी जी ने श्री राधा रानी से एक प्रश्न किया।
" सभी रानियां तथा गोपियां श्रीकृष्ण को अपना प्रियतम मानकर प्रेम करती हैं। क्या तुम्हें उनसे ईर्ष्या नहीं होती?”
श्री राधारानी मुस्कुराई तथा बड़ा ही सुंदर उत्तर दिया ।
चन्द्रो यथैको बहवश्चकोराः, सूर्यो यथैको बहवः दृशस्युः ।
श्रीकृष्ण चन्द्रो भगवाँस्थैको, भक्ता भगिन्यो बहवो वयं च ॥
लाड़लीजु बोली मेरी प्यारी बहनों!....चंद्रमा तो केवल एक ही है परंतु चकोर तो बहुत हैं। कल्पना कीजिए यदि एक चकोर चंद्रमा पर अपना अधिकार कर ले तो बाकी सभी चकोर तो मर जायेंगे । इसी प्रकार सूर्य एक है हम सभी उसी के प्रकाश से दृष्टि पाते हैं।
यदि कोई एक सूर्य पर अधिकार कर ले तो बाकी सब नेत्रहीन हो जाएंगे। सच कहुँ तो....श्री कृष्ण ही प्रेम तत्व हैं । यदि मैं उन पर अपना एकाधिकार कर लूंगी तो अन्य जीव उनके प्रेम से वंचित रह जायेंगे । दूसरी बात यह है कि मेरे श्याम सुंदर अन्य जीवों से प्रेम करके सुख प्राप्त करते हैं तो मुझे कोई आपत्ति क्यों होगी ?
इन उदाहरणों से अब आप यह समझ गए होंगे कि मायिक प्रेम की तुलना श्री राधा रानी व गोपियों के प्रेम से नहीं की जा सकती।
संसार में जीव स्वार्थ से ही प्रेम करता है
अतः हम दिव्य प्रेम को भी उसी पैमाने से नापते हैं। इसीलिए हम दोनों प्रेम की तुलना करने की चेष्टा करते हैं। मायिक प्रेम का आधार स्वसुख है जब कि राधा रानी के प्रेम में स्वसुख वासना की गंध भी नहीं होती।
मायिक प्रेम को काम या राग कहते हैं जिसका आधार केवल और केवल स्वार्थ है। जबकि दिव्य प्रेम स्वार्थ रहित होता है जिसमें सिर्फ देना देना ही होता है।
दिव्य प्रेम का मुख्य मापदण्ड यह है कि -
"प्रेम के समाप्त होने का कारण हो तो भी वह समाप्त नहीं हो तो वह प्रेम है।"
"अपने प्रेमास्पद के सुख में सुखी रहना।
श्री राधा रानी का प्रेम इतना गूढ़ है कि इसकी निःस्वार्थता का अनुमान ब्रह्मा शंकर आदि भी नहीं लगा सकते। शंकर जी गोपी बनकर इस प्रेम को प्राप्त करने आए ।
श्री राधा रानी के प्रेम का अनुमान ब्रह्मा शंकर तक नहीं लगा सकते।
हमें दिव्य प्रेम का कोई अनुमान नहीं है इसलिए हम अपने स्वार्थ सिद्धि के आधार पर हुए राग को ही प्रेम मान लेते हैं
ब्रह्मा जी ने कहा -
“मैंने 60,000 वर्षों तक तपस्या गोपियों की चरण धूलि पाने के लिए की । तो भी गोपियों की चरण धूलि प्राप्त नहीं कर सका ।” गोपियाँ निष्काम प्रेम का प्रतीक हैं
जब गोपियों के प्रेम की यह अवस्था है तो श्री राधा रानी, जो प्रेम तत्व का सार हैं, के प्रेम का वर्णन कौन कर सकता है।
जब श्री कृष्ण के लिए गोपियों का प्रेम ऐसा है तो श्री कृष्ण के प्रति श्री राधा रानी के प्रेम का वर्णन करने के लिए कोई शब्द हो ही नहीं सकता है
जय हो मेरे श्यामाश्याम.... 🙏🙏
#मेरे__प्यारे__दोस्तों #मेरेकान्हा #वृन्दावन #गोपी