महन्त श्री छोटूनाथ योगी जी

महन्त श्री छोटूनाथ योगी जी जय श्री गुरु गोरक्षनाथ जी
जय श्री बाबा मस्तनाथ जी

हिंदू ध्यावे देहुरा, मुसलमान मसीत,जोगी ध्यावे परम पद, जहां देहुरा न मसीत !!( योगी मंदिर-मस्जिद का ध्यान नहीं करता। वह पर...
02/01/2022

हिंदू ध्यावे देहुरा, मुसलमान मसीत,
जोगी ध्यावे परम पद, जहां देहुरा न मसीत !!

( योगी मंदिर-मस्जिद का ध्यान नहीं करता। वह परम पद का ध्यान करता है। यह परम पद क्या है, कहां है ? यह परम पद तुम्हारे भीतर है )

14/08/2020

Jai bholenath

14/08/2020

जय भोलेनाथ 🙏

जय श्री गुरु गोरक्षनाथ जी 🙏जय श्री बाबा मस्तनाथ जी 🙏ऊपर गगन शिखर (ब्रह्मरंध) मे पांणीं ( परमानंद रुपी अमृत) पाया जाता है...
14/08/2020

जय श्री गुरु गोरक्षनाथ जी 🙏
जय श्री बाबा मस्तनाथ जी 🙏
ऊपर गगन शिखर (ब्रह्मरंध) मे पांणीं ( परमानंद रुपी अमृत) पाया जाता है ( यानी सहस्त्रार मे ब्रह्मनुभूति करके साधक अमर पद को पा लेता है)। गोरखनाथ जी का कथन है की फिर भी अजीब विडंम्बना है की बिना इस मरम को जाने, मूर्ख लोग यूँ ही मरते रहते है ( यहाँ गोरखनाथ जी संकेत कर रहे है की हे मनुष्य! बिना उस परम सता का भेद जाने, ये जीवन मरण का चक्र यू ही लगा रहेगा। इसलिए अपनी चेतना को ऊचाँ उठाकर, उस परम सता की थाह प्राप्त कर ले)।
महायोगी गोरख कहते है की मानव धर्मसंगत कार्यो को ना करके अपनी मनमत से कर्म करते है ( यानी गुरुमत या सन्तमत की अवहेलना करते है)। इस प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह के अधीन होकर, यह सारा संसार बिना किसी प्राप्ति के यूँ ही मरा जा रहा है। ( यहाँ गोरखनाथ जी संकेत कर रहे है की हे मनुष्य! मनमत का त्याग करके गुरु की शरणागति हो और गुरुमत का अनुसरण कर जीवन के सार लक्ष्य को प्राप्त कर ले)।

महायोगी गोरख कहते है की बैठते, चलते, सोते हुए हम व्यर्थ ही श्वासो रुपी निधी को गवाँ देते है। बैठते समय बारह, चलते समय अठ...
12/08/2020

महायोगी गोरख कहते है की बैठते, चलते, सोते हुए हम व्यर्थ ही श्वासो रुपी निधी को गवाँ देते है। बैठते समय बारह, चलते समय अठारह, सोते समय तीस और इसी प्रकार अन्य प्रपंचो मे चौसठ श्वासो का क्षय हो जाता है। इन श्वासो का उपयोग हमे अजपाजाप के द्वारा परमात्म तादात्मय प्राप्त करने के लिए करना चाहिए था, लेकिन हम असार रुप से इनका व्यय कर देते है और इस क्रम मे बिना किसी प्राप्ति के काल (मृत्यु) समीप खड़ा हो जाता है। इसलिए महायोगी गोरखनाथ जी का कथन है की हे मनुष्य! यदि इसी प्रकार प्राण ऊर्जा को व्यर्थ गवाँ दिया और काल की भेंट चढ़ गए, तो फिर प्राणरहित शरीर से कैसे परमात्म एकरुपता पाओगे। ( यहाँ महायोगी गोरखनाथ संकेत कर रहे है की जगत के प्रपंच मे पड़कर इन बेशकिमति श्वासो को मत गवाओ, जीवन की प्रत्येक क्रिया को परमात्मा सता की दिशा मे क्रियान्वित करके जीवन के सार लक्ष्य को प्राप्त करो)।महायोगी गोरख कहते है की निज अन्तर मे परम सता का दर्शन (साक्षात्कार) ही सब कुछ है, वही माता (आदि - शक्ति) है वही पिता (शिव स्वरुपता) है। सबसे अहम बात यह है की दर्शन की अनुभूति मे केवल आप ही होते हो, वहाँ निज से निज को ही पा लिया जाता है, किसी दूसरी सता की वहाँ उपस्थिति नही होती है, केवल एक र्निलेप सता परब्रह्म रुप से आप ही शेष रह जाते हो। गोरखनाथ जी का कथन है की इस दर्शन (अनुभूति) का जो भेद जानता है, वह स्वयं ही परमात्म स्वरुप हो जाता है ( यानी निज के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान होने पर योगी अपनी विराटता को समझता है और अपने आप ही में सर्वज्ञ हो जाता है)।

जय श्री गुरु गोरक्षनाथ जी 🙏जय श्री बाबा मस्तनाथ जी 🙏महायोगी गोरख का कथन है की मै सुरघट घाट (परम स्थान) का व्यापारी हूँ औ...
12/08/2020

जय श्री गुरु गोरक्षनाथ जी 🙏
जय श्री बाबा मस्तनाथ जी 🙏
महायोगी गोरख का कथन है की मै सुरघट घाट (परम स्थान) का व्यापारी हूँ और शून्य मे हमारा पसारा है (यानी शून्य स्थान मे हमारा व्यवसाय क्रियान्वित होता है)। हमारा व्यापार भी ऐसा है जो लेन देन की भावना से रहित है। मछेन्द्रनाथ के शिष्य गोरखनाथ कहते है की हमारे इस व्यापार का अर्थ है की गुरु के वचनो का आधार तो जरुर लेकर रखो, लेकिन सार बात तो अपनी निज की करणी है जिसके कारण मुक्ति पद को प्राप्त किया जा सकता है (यानी गुरु ज्ञान के अनुरुप श्रेष्ठ करणी करते हुए परम पद को पाना ही महायोगी गोरखनाथ जी के लिए अगम का व्यवसाय है)।
महायोगी गोरख कहते है की जीवन मे ऐसे परम तत्व का वाणिज्य (व्यापार) करो, जैसे की हमने किया और उसको करके मन मे विश्वास हो गया की यही सर्वोतम व खरा वाणिज्य है। गोरखनाथ तो पांच बैलो (ज्ञानेंद्रियो) और नौ गायो (नव रंध्रो) के संग, सहज ज्ञान का वाणिज्य करते है। महायोगी गोरखनाथ जी महाराज का कथन है की हमने इन पाँच बैलो व नौ गायो के संग वाणिज्य (लेन देन) किया और इनके लिए सहज भाव का बाखर उपलब्ध करा दिया, जिसके परिणामस्वरुप हमारा मन ऊँची उड़ान लेने लग गया है ( यानी इनके चंचलता रहित, सहज भाव मे स्थित होने से मन पूर्ण निर्लेप रुप से परम अवस्था मे टिक गया )।

ऐसी गायत्री घर बारि हमारै, गगन मंडल मैं लाधी लो।इहि लागि रहा परिवार हमारा, लेइ निरंतरि बांधी लो।कानां पूछां सींग बिबरजित...
11/08/2020

ऐसी गायत्री घर बारि हमारै, गगन मंडल मैं लाधी लो।

इहि लागि रहा परिवार हमारा, लेइ निरंतरि बांधी लो।

कानां पूछां सींग बिबरजित, बर्न बिवरजित गाई लो।

मछिंद्र प्रसादै जती गोरष बोल्या, तहां रहै ल्यो लाई लो।

महायोगी गोरख कहते है की हमारे घर मे ऐसी गाय (गायत्री) बँधी है, जिसे हमने गगन मंडल (ब्रह्मारंध) में प्राप्त (लाधी) किया है ( यानी हमारे काया रुपी घर मे चेतन रुप से परमात्मा रुपी गाय का वासा हुआ है )। मेरा सारा परिवार (सकल इन्द्रियाँ व मन) इसी गाय की सेवा मे लगा रहता है (यानी मन सहित समस्त इन्द्रिया निरन्तर परमात्म रस का रसपान करते रहते है, अन्य कोई भटकाव शेष नही रहा है )। यह गाय कान, सींग, पूँछ व रंग से रहित है ( यानी परमात्म सता सम्पूर्ण मायावी द्वैत व प्रपंच से रहित, परम र्निकार व निर्लेप रुप से व्याप्त है)। महायोगी गोरखनाथ जी महाराज का कथन है की मेरे गुरु मछेन्द्रनाथ के कृपा प्रसाद से हम निरन्तर उस परम उन्मुक्त अवस्था मे ही निवास करते हुए, ब्रह्मानुभूति मे ही लवलीन रहते है महायोगी गोरख कहते है की अनाहत शब्द रुपी शंख का उदघोष करते हुए हमने काल की सेना का दमन कर दिया ( यानी अनाहत नाद के जागरण से उन सभी कारणो का नाश हो गया जो काल का ग्रास बनाने वाले तथा जन्म मरण के प्रपंचो मे फँसाने वाले थे)। महायोगी गोरखनाथ का कथन है की तदउपरान्त इसी घट (काया) के भीतर, हमने गगन मंडल (सहस्त्रार स्थान) पर सहज रुप से स्वामी (परब्रह्म) को पा लिया (यानी उनसे तादाम्य प्राप्त हो गया)।

11/08/2020

जय भोलेनाथ की 🙏

काल न मिटया जंजाल न छुटया, तप कर हूवा न सूरा।कुल का नास करै मति कोई, जै गुर मिलै न पूरा।महायोगी गोरख कहते है की यदि योगय...
11/08/2020

काल न मिटया जंजाल न छुटया, तप कर हूवा न सूरा।

कुल का नास करै मति कोई, जै गुर मिलै न पूरा।

महायोगी गोरख कहते है की यदि योगयुक्ति धारण करके भी साधक का आवागमन समाप्त नही होता है, जगत का जंजाल मिटता नही है और तप के द्वारा वह परम निर्भयता व उपरामता को नही पाता है तो फिर ऐसे योगानुसंधान का क्या लाभ है ? ( यानी ऐसा योग का मार्ग ही सारहीन हो जाता है)। महायोगी गोरखनाथ जी महाराज का कथन है की बिना पूर्ण गुरु की शरण लिये, गृहत्याग कर जोग नही लेना चाहिए, इससे वह अपयश ही पाता है ( क्योंकी पूर्ण गुरु के मार्गदर्शन मे ही पूर्णता को पाया जा सकता है, जिससे सकल द्वन्दो का नास हो जाता है)।
महायोगी गोरख कहते है की हे अवधूत! ऐसे ज्ञान का विचार करो जिससे ज्योति का झिलमिल प्रकाश प्रत्यक्ष हो जाये ( यानी ज्योतिस्वरुप परमात्मा के निर्मल नूर का साक्षात्कार हो जाए और हमारा अन्तर उससे प्रकाशित हो उठे)। साधक को परख करके गुरु करना चाहिए, ताकी सदगुरु की कृपा से ऐसा परम योग घटित हो, जिस के बाद फिर माया का कोई रोग व्याप्त ना हो पाए। महायोगी गोरखनाथ जी महाराज का कथन है की यदि तन व मन के स्तर से ऊपर उठकर, उस परम सता से परिचय (साक्षात्कार) नही हुआ, तो फिर किसलिए योग का अनुसंधान करके कष्ट पाना है ( यानी योग की सार्थकता तभी है जब वह परमात्मा से एकरुपता स्थापित करा दे, अन्यथा तो वह प्रंपच मात्र बन कर रह जाता है)।

आऊं नही जाऊं, निरंजन नाथ की दुहाई।१।प्यंड ब्रह्मंड षोजता, अन्हे सब सिधि पाई।२।काया गढ़ भींतरि, नव लष खाई।३।दसवे द्वारि अ...
10/08/2020

आऊं नही जाऊं, निरंजन नाथ की दुहाई।१।

प्यंड ब्रह्मंड षोजता, अन्हे सब सिधि पाई।२।

काया गढ़ भींतरि, नव लष खाई।३।

दसवे द्वारि अवधू ताली लाई।૪।

महायोगी गोरख अलख पुरुष (निरंजन नाथ) को साक्षी करके कहते है की ना तो हमारा कही आना है और ना ही कही जाना है ( यानी हमारे लिए किसी प्रकार का आवागमन नही है)। हमने पिंड (काया) में ही ब्रह्माण्ड को खोज लिया, जिससे इसी काया मे ही हमे सर्व प्रकार की सिद्धता प्राप्त हो गयी। महायोगी गोरखनाथ जी महाराज का कथन है की कायागढ़ (शरीर रुपी किले मे) नौ लाख खाइयाँ है (यानी नवरंध्रो मे चौरासी लाख योनियो के अनेको संस्कार भरे हुए है) जिनको हमने योग द्वारा पाट दिया है और दसवे द्वार पर लगे ताले को कुण्डलिनी शक्ति रुपी ताली लगाकर खोल लिया है, जिससे ब्रह्मरंध स्थान पर विजय प्राप्त हो गयी है।

जय श्री गुरु गोरक्षनाथ जी 🙏जय श्री बाबा मस्तनाथ जी 🙏किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण संभव है, किसी एक को भी मारे ...
10/08/2020

जय श्री गुरु गोरक्षनाथ जी 🙏
जय श्री बाबा मस्तनाथ जी 🙏
किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण संभव है, किसी एक को भी मारे या न मारे। मगर बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती है।जो धुरंधर महापुरुष आपत्ति पड़ने पर कभी दुखी नहीं होता, बल्कि सावधानी के साथ उद्योग का आश्रय लेता है तथा समय पर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं।“

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