12/08/2020
महायोगी गोरख कहते है की बैठते, चलते, सोते हुए हम व्यर्थ ही श्वासो रुपी निधी को गवाँ देते है। बैठते समय बारह, चलते समय अठारह, सोते समय तीस और इसी प्रकार अन्य प्रपंचो मे चौसठ श्वासो का क्षय हो जाता है। इन श्वासो का उपयोग हमे अजपाजाप के द्वारा परमात्म तादात्मय प्राप्त करने के लिए करना चाहिए था, लेकिन हम असार रुप से इनका व्यय कर देते है और इस क्रम मे बिना किसी प्राप्ति के काल (मृत्यु) समीप खड़ा हो जाता है। इसलिए महायोगी गोरखनाथ जी का कथन है की हे मनुष्य! यदि इसी प्रकार प्राण ऊर्जा को व्यर्थ गवाँ दिया और काल की भेंट चढ़ गए, तो फिर प्राणरहित शरीर से कैसे परमात्म एकरुपता पाओगे। ( यहाँ महायोगी गोरखनाथ संकेत कर रहे है की जगत के प्रपंच मे पड़कर इन बेशकिमति श्वासो को मत गवाओ, जीवन की प्रत्येक क्रिया को परमात्मा सता की दिशा मे क्रियान्वित करके जीवन के सार लक्ष्य को प्राप्त करो)।महायोगी गोरख कहते है की निज अन्तर मे परम सता का दर्शन (साक्षात्कार) ही सब कुछ है, वही माता (आदि - शक्ति) है वही पिता (शिव स्वरुपता) है। सबसे अहम बात यह है की दर्शन की अनुभूति मे केवल आप ही होते हो, वहाँ निज से निज को ही पा लिया जाता है, किसी दूसरी सता की वहाँ उपस्थिति नही होती है, केवल एक र्निलेप सता परब्रह्म रुप से आप ही शेष रह जाते हो। गोरखनाथ जी का कथन है की इस दर्शन (अनुभूति) का जो भेद जानता है, वह स्वयं ही परमात्म स्वरुप हो जाता है ( यानी निज के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान होने पर योगी अपनी विराटता को समझता है और अपने आप ही में सर्वज्ञ हो जाता है)।