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20/08/2021
रवि योग में 13 अगस्त को बन रहा  है नागपंचमी का अद्भुत संयोग- पं बीरेन्द्र नारायण मिश्राश्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी...
12/08/2021

रवि योग में 13 अगस्त को बन रहा है नागपंचमी का अद्भुत संयोग
- पं बीरेन्द्र नारायण मिश्रा
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन व्रत पूर्वक नागों का अर्चन-पूजन होता है। भृगु ज्योतिष केंद्र, महाकाली मंदिर, सेक्टर-30 चंडीगढ़ के ज्योतिषाचार्य पं बीरेन्द्र नारायण मिश्रा ने बताया कि श्रावण शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि 12 अगस्त, गुरुवार को दोपहर 3:25 से प्रारम्भ होकर शुक्रवार, 13 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 43 मिनट तक रहेगी। नागपंचमी प्रातःकालीन पर्व होने के कारण शुक्रवार दिनांक 13 अगस्त को ही मनाई जाएगी। इसके साथ ही 13 अगस्त को प्रातः 8:00 बजे से रवि योग का आरम्भ भी हो रहा है जो अगले दिन प्रातः 6 बजकर 56 मिनट तक रहेगा तथा हस्त नक्षत्र 12 अगस्त को प्रातः 8:52 से प्रारम्भ होकर 13 अगस्त प्रातः 7:59 तक रहेगा। जिससे शुक्रवार के दिन रवि योग तथा हस्त नक्षत्र में नागपंचमी पूजा का एक अद्भुत कल्याणकारी योग बन रहा है। हस्त नक्षत्र का स्वामी चंद्र है। भगवान शिव ने चंद्र को अपने शीश पर धारण किया है और कंठ में नागों की माला धारण करते हैं। अतः इस योग में भगवान शिव की नागों से पूजा उत्तम तथा कल्याणकारी है। पं बीरेन्द्र नारायण मिश्रा के अनुसार यह कालसर्प दोष की शांति के लिए एक उत्तम योग है। उन्होंने बताया ज्योतिष शास्त्र में राहु को सर्प का मुख तथा केतु को पूंछ बतलाया गया है। सर्पिणी भद्रा होती है। जिस जातक की कुंडली में भद्रा तथा कालसर्प दोष हो उन्हें नागपंचमी के दिन कालसर्प दोष की शांति के लिए तीन धातु के बने एक सौ आठ सर्पों 4 सूखे नारियल का पूजन करके पानी में प्रवाहित कर देना चाहिए। इससे कालसर्प दोष की शांति होती है तथा सर्प दंश से मृत्यु का भय समाप्त होता है। पं मिश्रा ने बताया कि बृहद पराशर होरा शास्त्र के अनुसार नामस योगों में ऐसा वर्णन है की सर्प दोष के कारण संतान उत्पत्ति में यदि बाधा हो तो नाग पंचमी के दिन भगवान शिव के साथ नाग देवता की पूजा से सर्पदोष से मुक्ति मिलती है। जिन जातको की कुंडली में कालसर्प दोष हो, राहु की महादशा में चंद्र की अन्तर्दशा हो या चंद्र की महादशा में राहु की अंतरदशा हो जिसके कारण घर में अशांति, पति पत्नी में क्लेश, नौकरी में असहजता, राजपक्ष से प्रताड़ना अथवा संतान / पुत्र की विद्या में विघ्न हो तो उसे इसके समाधान के लिए एक सौ आठ नागों से भगवान शिव का पूजन करना चाहिए।
नाग पंचमी व्रत श्रावण शुक्लपक्ष की पंचमी को किया जाता है। इस व्रत के देव अनंत आदि अष्टनाग तथा उपदेवता भगवान शिव हैं।
शुभ मुहूर्त : 13 अगस्त को प्रातः सूर्योदय से लेकर दोपहर 1 बजकर 43 मिनट तक किसी भी समय में पूजा की जा सकती है।
पूजन कैसे करें : प्रातः काल स्नान इत्यादि से निवृत्त होकर भगवान शिव के मंदिर में जाएं। जल, दूध, पंचामृत चढाने के बाद जल से स्नान कराएं। शिवजी को वस्त्र, जनेऊ इत्यादि चढ़ाकर 108 सर्प ॐ नमः शिवाय या नाग गायत्री मंत्र बोलकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। इसके बाद सर्पों को जल से स्नान कराकर पुनः पंचामृत से स्नान करवाएं तथा वस्त्र, जनेऊ, रोली, चावल इत्यादि चढ़ाकर धूप दीप दिखाए तथा आरती करें।
नाग पंचमी के महत्व की जानकारी देते हुए भृगु ज्योतिष केंद्र के ही पं मुनीश तिवारी ने बताया नाग देवता भारतीय संस्कृति में देवरूप में स्वीकार किए गए हैं। पुराणों में यक्ष, किन्नर और गंधर्वों के वर्णन के साथ नागों का भी वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु की शय्या की शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं। भगवान शिव और गणेश जी के अलंकरण में भी नागों की महत्वपूर्ण भूमिका हैं इसलिए नागपंचमी के अवसर पर नागों की पूजा का विशेष विधान है।

पिता और पुत्र के अनोखे मिलन को दर्शाता सकारात्मकता का प्रतीक पर्व है मकर संक्रांतिहिन्दू धर्म में मकर संक्रांति का विशेष...
14/01/2021

पिता और पुत्र के अनोखे मिलन को दर्शाता सकारात्मकता का प्रतीक पर्व है मकर संक्रांति
हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति का विशेष महत्व होता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है जो कि अत्यंत शुभ माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन को नई फसल और नई ऋतु के आगमन के लिए मनाया जाता है। भृगु ज्योतिष केंद्र सेक्टर 30, चंडीगढ़ के ज्योतिषाचार्य पं बीरेन्द्र नारायण मिश्रा ने बताया कि इस वर्ष 2021 में मकर संक्रांति 14 जनवरी 2021, दिन गुरुवार को मनायी जाएगी। मकर संक्रांति का पुण्य काल प्रातः 08:15 से से प्रारम्भ होकर पूरे दिन रहेगा। इस दिन सूर्य बृहस्पति के साथ शनि की राशि मकर में प्रवेश कर रहे हैं। यह अवधिकाल ऐसे जातकों जिनकी कुंडली में सूर्य या शनि नीच का हो, सूर्य की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो या शनि की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो, के लिए शुभ नहीं है। इस कालावधि में उन्हें राजपक्ष से कष्ट, नौकरी में उन्नति में अवरोध अथवा व्यापर में हानि का सामना करना पड़ सकता है। अतः मकर संक्रांति के दिन ऐसे जातकों को सूर्य और शनि का पूजन, इनसे सम्बंधित दान व जप कर हवन करें। सामान्यतः यह समय जनसाधारण के लिए उत्तम है।
मकर संक्रांति का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बताते हुए पं बीरेन्द्र नारायण मिश्रा कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव दिन धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं और शनिदेव को मकर और कुंभ राशि का स्वामी माना जाता है। इस कारण से यह दिन पिता और पुत्र के अनोखे मिलन को दर्शाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की असुरों पर विजय के तौर पर भी मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस मौके पर लाखों श्रद्धालु गंगा और अन्य पावन नदियों के तट पर स्नान और दान - धर्म करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर चलता है, इस दौरान सूर्य की किरणों को खराब माना गया है, लेकिन जब सूर्य पूर्व से उत्तर की ओर गमन करने लगता है, तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं। इस वजह से साधु-संत और वे लोग जो आध्यात्मिक क्रियाओं से जुड़े हैं उन्हें शांति और सिद्धि प्राप्त होती है। इस समय नेत्र अथवा चर्म रोगों से पीड़ित व्यकितयों को चाक्षुषोपनिषद का पथ शुभ एवं लाभकारी माना गया है।
मकर संक्रांति का महत्व बताते हुए अखिल भारतवर्षीय ब्राह्मण महासभा चंडीगढ़ के स्थानीय प्रवक्ता पं मुनीश तिवारी कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से खिचड़ी बनाने, खाने और दान करने का विशेष महत्व है। इसलिए बहुत सी जगहों पर इस पर्व को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में मकर संक्रांति को लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति पोंगल के तौर पर मनाई जाती है। जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी पर्व के नाम से मकर संक्रांति को मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन गर्म वस्त्र, तिल की मिठाईयां, खिचड़ी के साथ धन आदि दान देने से शनि त्रस्त व्यक्ति को कष्टों से मुक्ति मिलती है। गरीब तथा अपाहिज और मजदूर वर्ग के सभी लोग शनि के प्रतिनिधि माने जाते हैं। इन्हें कभी सताना नहीं चाहिए। जिस तरह दान का विशेष महत्व है उसी तरह मकर संक्रांति पर स्नान का भी बहुत अधिक महत्व होता है। इस दिन किसी नदी में स्नान करने से सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य को मरने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान अवश्य करना चाहिए। यदि किसी पवित्र नदी में स्नान संभव न हो तो घर पर ही एक पात्र में गंगाजल में तिल डालें और उसके पश्चात् उसमें पानी मिलाकर स्नान करना चाहिए। सूर्यदेव को लाल पुष्प अर्पित करें और सूर्यदेव के मंत्रों का तथा आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ भी करें। इसके बाद उनका विधिवत पूजन कर धूप और दीप अर्पित करें, तिल और गुड़ से बने हुए लड्डुओं का भोग लगाने के बाद तांबे के लोटे का जल सूर्यदेव को अर्पित करें।
पं मुनीश तिवारी के अनुसार मकरसंक्रांति ही एक ऐसा पर्व है जिसका निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते हैं। यूं तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है पर वर्ष की बारह संक्रांतियों में यह सब से महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महा स्नान की संज्ञा दी गई है। मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। अत मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी।

मां ब्रह्मचारिणी : मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप               मां दुर्गा के नौ रूपों में दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी का ...
18/10/2020

मां ब्रह्मचारिणी : मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप

मां दुर्गा के नौ रूपों में दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी का है। कठोर तपस्या और ब्रह्म में लीन रहने के कारण तथा ब्रह्म अर्थात तप का आचरण करने के कारण मां का नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान, तपस्या और वैराग्य की देवी माना जाता है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है जो भक्तों को अनंत फल देने वाला है। नवरात्र के दूसरे दिन साधक को पूजा के समय अपना ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर स्थिर करना चाहिये। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता। देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि तथा विजय की प्राप्ति होती है तथा विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा विधि:
सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो साधक को श्वेत या पीले वस्त्र पहनने चाहिए। सर्वप्रथम मां को दूध, दही, इत्र,मधु व् शक्कर से स्नान करने के पश्चात् जल से स्नान कराएं तथा प्रसाद अर्पित करें।मां को गुड़हल के फूल बहुत पसंद हैं इसलिए गुड़हल के फूलों की माला अर्पित करें। इसके पश्चात् फूल, अक्षत, रोली, चन्दन, सुपारी,लौंग, मिश्री इत्यादि मां को अर्पित कर प्रदक्षिणा करें तथा षोडशोपचार से मां की पूजा करें।

प्रार्थना मंत्र: दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु | देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||

जप मंत्र : माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए।
1. "या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।"
2. " ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः "

इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ज्योर्तिमय है। ये मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरी शक्ति हैं जो तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा इत्यादि अन्य नामों से भी जानी जाती हैं। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी मंगल ग्रह को नियंत्रित करती हैं। अतः इनकी पूजा उपासना से मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव कम/ निष्क्रिय होते हैं।

पं मुनीश तिवारी, भृगु ज्योतिष केंद्र, महाकाली मंदिर, सेक्टर - 30, चंडीगढ़।

सौभाग्य की देवी मां शैलपुत्री की उपासना का दिन : प्रथम नवरात्रमां दुर्गा के नौ रूपों में प्रथम रूप मां शैलपुत्री का है। ...
18/10/2020

सौभाग्य की देवी मां शैलपुत्री की उपासना का दिन : प्रथम नवरात्र

मां दुर्गा के नौ रूपों में प्रथम रूप मां शैलपुत्री का है। मां शैल पुत्री ही प्रथम दुर्गा हैं तथा नवरात्र - पूजन में प्रथम दिन मां दुर्गा के इसी रूप की पूजा उपासना की जाती है। शैलपुत्री का शाब्दिक अर्थ होता है "पर्वत (शिला) की पुत्री"। पर्वत राज हिमालय के घर पुत्रीरूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम "शैलपुत्री" पड़ा। प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को "मूलाधार चक्र" में स्थिर कर इनकी योगसाधना का प्रारम्भ करते हैं।शैलपुत्री के रूप में मां दुर्गा के बालरूप (स्त्रीत्व के प्रथम चरण) की उपासना की जाती है। ज्योतिष के अनुसार मां शैलपुत्री चन्द्रमा को दर्शाती हैं अतः मां शैलपुत्री के पूजन से जीवन में चन्द्रमा के द्वारा पड़ने वाले दुष्प्रभाव भी निष्क्रिय हो जाते हैं।
मां शैलपुत्री को पार्वती, हिमावती व् वृष की सवारी करने के कारण वृषारूढ़ा आदि नामों से भी पुकारा जाता है।

स्वरूप: वृषभ पर आरूढ़ (सवार) मां शैलपुत्री अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं जो कि पापियों का विनाश करता है और भक्तों को अभय प्रदान करता है। बाएं हाथ में सुशोभित कमल का फूल ज्ञान एवं शांति का प्रतीक है। माथे पर अर्धचंद्र मां की शोभा बढ़ता है।

श्लोक: वन्दे वंछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् | वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ||
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

भोग: मां को सफ़ेद रंग अत्यधिक प्रिय होने के कारण नवरात्री के पहले दिन सफ़ेद वस्त्र, सफ़ेद फूल तथा सफ़ेद भोग चढ़ाना चाहिए तथा सफ़ेद बर्फी का भोग लगाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री को शुद्ध देशी घी चढाने से साधकों को विकारों / बीमारियों से मुक्त जीवन की प्राप्ति होती है।

पूजन : नवरात्रि के प्रथम दिन योग्य ब्राह्मण को बुलाकर विधिवत घटस्थापना करें तथा पुष्प, अक्षत, रोली व् चन्दन के साथ षोडशोपचार से मां शैल पुत्री की पूजा करें । यथासंभव 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ करें।

- #पं मुनीश तिवारी, भृगु ज्योतिष केंद्र, महाकाली मंदिर #, सेक्टर - 30, चंडीगढ़।

Him Prabha....
10/09/2020

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30/08/2020

।।सुप्रभात।।

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