09/02/2026
1️⃣ चार महीने वाली बात कहाँ से आई?
कुरआन में “चार महीने” का ज़िक्र ईला (إيلاء) के मसले में है।
📖 सूरह अल-बक़रह 2:226
“जो लोग अपनी बीवियों के पास न जाने की क़सम खा लेते हैं, उनके लिए चार महीने की मोहलत है। फिर अगर वे रुजू कर लें तो अल्लाह बख़्शने वाला है।”
👉 यानी अगर कोई आदमी कसम खा ले कि वह अपनी पत्नी के पास नहीं जाएगा, तो उसे चार महीने के अंदर फैसला करना होगा — या तो रिश्ता निभाए या अलग कर दे।
2️⃣ क्या हर हाल में 4 महीने से ज़्यादा दूर रहना हराम है?
नहीं।
अगर कोई शौहर मजबूरी से (रोज़गार, बीमारी, जिहाद, हज, पढ़ाई आदि) दूर है, और पत्नी राज़ी है या सब्र कर रही है, तो यह “ईला” में नहीं आता।
लेकिन—
✔️ अगर बिना वजह, जानबूझकर, बीवी के हक़ को दबाने के लिए दूर रहे —
तो यह ज़ुल्म है।
3️⃣ सहाबा का अमल
हज़रत उमर (र.अ.) ने एक बार सुना कि औरतें अपने शौहर की जुदाई में परेशान होती हैं।
तो उन्होंने तय किया कि फौज में भेजे गए सैनिक 4 महीने से ज़्यादा बाहर न रहें (अगर संभव हो)।
यह शरीयत का सीधा हुक्म नहीं, बल्कि इंसाफ और हक़ की हिफाज़त के लिए इंतज़ाम था।
✅ निचोड़ (सरल शब्दों में)
बीवी का हक़ है कि शौहर उसकी जिस्मानी और भावनात्मक ज़रूरत पूरी करे।
बिना वजह लंबे समय तक दूर रहना ग़लत है।
“चार महीने” खास हालत (कसम खाने) से जुड़ा हुक्म है।
मजबूरी में दूरी हो सकती है, लेकिन हक़ अदा करना ज़रूरी है।