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बॉलीवुड फिल्मी अभिनेता राजपाल यादव आज दिवड़ी मंदिर पहुंचे और माॅ दिउड़ी के दरबार में टेका माथा, पूजा-अर्चना कर लिया आशीर...
09/04/2018

बॉलीवुड फिल्मी अभिनेता राजपाल यादव आज दिवड़ी मंदिर पहुंचे और माॅ दिउड़ी के दरबार में टेका माथा, पूजा-अर्चना कर लिया आशीर्वाद.

Navratri 2018: कब से शुरू हो रहा है चैत्र नवरात्र और क्या है कलश स्थापना का शुभ मुहुर्त, जानिए  पूजन विधिChaitra Navratr...
17/03/2018

Navratri 2018: कब से शुरू हो रहा है चैत्र नवरात्र और क्या है कलश स्थापना का शुभ मुहुर्त, जानिए पूजन विधि
Chaitra Navratri 2018 Date: इस साल चैत्र नवरात्र रविवार 18 मार्च से शुरू हो रहे हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार ही चैत्र नवरात्र से ही नए साल की शुरूआत होती है। साल में चार नवरात्रि होते हैं जिनमें से दो गुप्त नवरात्र होते है। चैत्र और आश्विन नवरात्र को हिंदू धर्म में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। नवरात्र के दौरान लोग साफ-सफाई और खान-पान की चीजों का विशेष ध्यान रखते हैं। इस बार अष्टमी और नवमी एक ही दिन 25 मार्च को होगी। हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का ज्यादा महत्व होता है। माना जाता है इस महीने से शुभता और ऊर्जा का आरंभ होता है और ऐसे समय में मां काली की पूजा से घर में सुख-समृद्धि आती है। चैत्र महीने में हिंदू देवी दुर्गा की आराधना करते हैं। विक्रम संवत 2074 के पहले महीने चैत्र की शुरुआत मंगलवार से हुई। त्योहार के दौरान देवी के नौ रूपों का ध्यान करने से शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।
नवरात्रि के दौरान 9 दिन व्रत किया जाता है। मां दुर्गा के 9 रूपों की आराधना की जाती है। साल 2018 में चैत्र नवरात्रि 18 मार्च को शुरू हो रहे हैं और यह 25 मार्च तक रहेंगे। 25 मार्च नवरात्र के आखिरी दिन रामनवमी मनाई जाएगी। 26 मार्च को नवरात्र का व्रत तोड़ा जाएगा।

नवरात्र के एक दिन पहले दिन घटस्थापना की जाती है। इसके बाद लगातार नौ दिनों तक मां की पूजा व उपवास किया जाता है। दसवें दिन कन्या पूजन के बाद व्रत को खोला जाता है।

मां दुर्गा के 9 रूप- मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि मां के नौ अलग-अलग रुप हैं।
कलश की स्थापना का शुभ मुहूर्त – इस बार प्रतिपदा सायं 06.32 तक रहेगी। इसलिए सायं 06.32 के पहले ही कलश की स्थापना कर लें। इसमें भी सबसे ज्यादा शुभ समय होगा – प्रातः 09.00 से 10.30 तक रहेगा।

कलश स्थापना व पूजा विधि

हिन्दू शास्त्रों में किसी भी पूजन से पूर्व, गणेशजी की आराधना का प्रावधान बताया गया है. माता की पूजा में कलश से संबन्धित एक मान्यता के अनुसार, कलश को भगवान श्विष्णु का प्रतिरुप माना गया है. इसलिए सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है. कलश स्थापना करने से पहले पूजा स्थान को गंगा जल से शुद्ध किया जाना चाहिए. पूजा में सभी देवताओं आमंत्रित किया जाता है.

कलश में हल्दी को गांठ, सुपारी, दूर्वा, मुद्रा रखी जाती है और पांच प्रकार के पत्तों से कलश को सजाया जाता है. इस कलश के नीचे बालू की वेदी बनाकर कर जौ बौये जाते है. जौ बोने की इस विधि के द्वारा अन्नपूर्णा देवी का पूजन किया जाता है. जोकि धन-धान्य देने वाली हैं. तथा माता दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल के मध्य में स्थापित कर रोली ,चावल, सिंदूर, माला, फूल, चुनरी, साड़ी, आभूषण और सुहाग से माता का श्रृंगार करना चाहिए.

साथ ही माता जी को प्रातः काल फल एवं मिष्ठान का भोग और रात्रि में दूध का भोग लगाना चाहिए और पूर्ण वाले दिन हलवा पूरी का भोग लगाना चाहिए. इस दिन से 'दुर्गा सप्तशती' अथवा 'दुर्गा चालीसा' का पाठ प्रारम्भ किया जाता है. पाठ पूजन के समय अखंड दीप जलाया जाता है जोकि व्रत के पारण तक जलता रहना चाहिए.

कलश स्थापना के बाद, गणेश जी और मां दुर्गा की आरती से, नौ दिनों का व्रत प्रारंभ किया जाता है. कलश स्थापना के दिन ही नवरात्रि की पहली देवी, मां दुर्गा के शैलपुत्री रूप की आराधना की जाती है. इस दिन सभी भक्त उपवास रखते हैं और सायंकाल में दुर्गा मां का पाठ और विधिपूर्वक पूजा करके अपना व्रत खोलते हैं.

महाशिवरात्रि 2018: 13 या 14 जानें किस दिन शिवरात्रि का व्रत होगा फलदायक, ये उपाय चमका सकते हैं किस्मतमहाशिवरात्रि पर्व इ...
12/02/2018

महाशिवरात्रि 2018: 13 या 14 जानें किस दिन शिवरात्रि का व्रत होगा फलदायक, ये उपाय चमका सकते हैं किस्मत
महाशिवरात्रि पर्व इस बार दो दिन 13 व 14 फरवरी को होगा। दो दिनों में व्रत किस दिन किया जाए इसे लेकर श्रद्धालु असमंजस में हैं। ज्योतिषियों के अनुसार 13 फरवरी को प्रदोष के साथ मध्य रात्रि में चतुर्दशी भी है। ऐसे में 13 फरवरी को व्रत रखना अधिक फलदायक होगा।

फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। 13 फरवरी मंगलवार को रात 10:22 बजे के बाद चतुर्दशी तिथि लग जाएगी जो अगले दिन 14 फरवरी की रात 12:17 बजे तक रहेगी।
धर्मशास्त्रों में प्रदोष एवं अर्ध रात्रि में चतुर्दशी को ज्यादा महत्व दिया गया है। इस वर्ष महाशिवरात्रि का व्रत पर्व 13 एवं 14 दोनों दिन किया जा सकता है। क्योंकि दोनों के धर्मशास्त्रीय प्रमाण मिल जाएंगे। 13 फरवरी को महाशिवरात्रि का व्रत रखने वालों को 14 की सुबह पारण करना होगा और 14 को व्रत रखने वाले को 14 तारीख की शाम को ही चतुर्दशी तिथि में पारण करना होगा। उत्थान ज्योतिष संस्थान के निदेशक पं. दिवाकर त्रिपाठी पूर्वांचली के अनुसार प्रदोष के साथ चतुर्दशी तिथि के महत्त्व ज्यादा होने के कारण 13 को ही महाशिवरात्रि व्रत करना ज्यादा ठीक होगा।
विवाह के लिए : यदि विवाह में अड़चन आ रही है तो शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर केसर मिला कर दूध चढ़ाएं।

धन प्राप्ति के लिए : मछलियों को आटे की गोलियां खिलाएं। इस दौरान भगवान शिव का ध्यान करते रहें।

मनोकामना पूर्ति के लिए : शिवरात्रि पर 21 बिल्व पत्रों पर चंदन से ॐ नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं।

सुख समृद्धि के लिए : शिवरात्रि पर बैल को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में सुख-समृद्धि आएगी और परेशानियों का अंत होगा।
पितरों की शांति के लिए : शिवरात्रि पर गरीबों को भोजन कराएं, इससे आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी। साथ ही पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी।

मन की शांति के लिए : पानी में काला तिल मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें व ॐ नम: शिवाय मंत्र का जप करें। इससे मन को शांति मिलेगी।

आमदनी बढ़ाने के लिए : शिवरात्रि पर घर में पारद के शिवलिंग की योग्य ब्राह्मण से सलाह कर स्थापना कर प्रतिदिन पूजा करें। इससे आपकी आमदनी बढ़ाने के योग बनते हैं।

संतान प्राप्ति के लिए : शिवरात्रि के दिन आटे से 11 शिवलिंग बनाएं। 11 बार इनका जलाभिषेक करें। इस उपाय से संतान प्राप्ति के योग बनते हैं।

भगवान परशुराम का तपो स्थली है बाबा टांगीनाथ धामझारखंड की राजधानी रांची से करीब 175 किमी और जिला मुख्यालय से करीब 75 किमी...
12/02/2018

भगवान परशुराम का तपो स्थली है बाबा टांगीनाथ धाम
झारखंड की राजधानी रांची से करीब 175 किमी और जिला मुख्यालय से करीब 75 किमी दूर गुमला जिले के डुमरी प्रखंड स्थित लुचुतपाट की पहाडियों में अवस्थित है प्राक एतेहासिक बाबा टांगीनाथ धाम। लुचुत पाट के इस पहाड़ी में सैकड़ो शिवलिंग समेत अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा बिखरी पड़ी थी। पिछले कुछेक वर्षोँ के पहाड़ी में बिखरे प्रतिमाओं और शिव लिंग और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को कतारबद्ध तरीके से स्थापित कर और प्राक एतेहासिक शिव मंदिर को नया लुक और कलेवर देकर पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन भव्य और आकर्षक मंदिर का निर्माण कराया है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक बाबा टांगी नाथ भगवान परशुराम का तपो स्थली है। भगवान परशुराम ने यहां शिव की घोर उपासना की थी और यहीं उन्होंने अपने परशु यानी फरसे को जमीन में गाड़ दिया था।इस फरसे की ऊपरी आकृति कुछ त्रिशूल से मिलती-जुलती है। यही वजह है कि श्रद्धालु इस फरसे की पूजा अर्चना करते हैं। महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक और पूजा अर्चना करने के लिए यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते है।

श्रद्धालुओं का मानना है कि टांगीनाथ धाम में साक्षात भगवान शिव निवास करते हैं। स्थानीय आदिवासी बैगा और पाहन ही यहां के पुजारी है। और उनके मुताबिक यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। आश्चर्य की बात ये है कि टागीनाथ में स्थापित त्रिशूल में कभी जंग नहीं लगता। खुले आसमान के नीचे धूप, छांव, बरसात- का कोई असर इस त्रिशूल पर नहीं पड़ता है।

पौराणिक महत्व
त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम ने जनकपुर में आयोजित सीता स्वयंवर में भगवान शिव के धनुष तोड़ा ,तो वहां पहुंचे भगवान परशुराम काफी क्रोधित हो गए। इस दौरान लक्ष्मण से उनकी लंबी बहस हुई ।और इसी जब भगवान परशुराम को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं नारायण ही हैं तो उन्हें बड़ी आत्मग्लानि हुई। शर्म के मारे वे वहां से निकल गए और पश्चाताप करने के लिए घने जंगलों के बीच लुचुतपाट पर्वत श्रृंखला में आ गए। यहां वे भगवान शिव की स्थापना कर आराधना करने लगे। स्थानीय झारखंड में फरसा को टांगी कहा जाता है, इसलिए इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया

शनिदेव से भी जुड़ी है गाथा
टांगीनाथ धाम में प्राचीन शिवलिंग बिखरे पड़े हैं। यहां मौजूद कलाकृतियां- नक्काशियां और यहां की बनावट देवकाल की कहानी बयां करती हैं। साथ ही कई ऐसे स्रोत हैं, जो त्रेता युग में ले जाते हैं। वैसे एक कहानी और भी है, कहते हैं कि शिव इस क्षेत्र के पुरातन जातियों से संबंधित थे। शनिदेव के किसी अपराध के लिए शिव ने त्रिशूल फेंक कर वार किया तो वह इस पहाड़ी की चोटी पर आ धंसा,लेकिन उसका अग्र भाग जमीन के ऊपर रह गया जबकि त्रिशूल जमीन के नीचे कितना गड़ा है, यह कोई नहीं जानता।

टांगीनाथ में नही बसते लोहार जाति के लोग
टांगीनाथ धाम के करीब 15 किमी के परिधि में लोहार जाति के लोग नही बसते। स्थानीय निवासी बताते हैं कि एक बार क्षेत्र मे रहने वाली लोहार जाति के कुछ लोगो ने लोहा प्राप्त करने के लिए फरसे को काटने प्रयास किया था। वो लोग फरसे को ,तो नही काट पाये पर उनकी जाति के लोगो को इस दुस्साहस कि कीमत चुकानी पड़ी और वो अपने आप मरने लगे। इससे डर के लोहार जाति ने वो क्षेत्र छोड़ दिया और आज भी धाम से 15 किमी की परिधि में लोहार जाति के
लोग नही बसते।

महाशिवरात्रि के मौके पर बाबा टांगीनाथ धाम में झारखंड समेत विभिन्न राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। महाशविरात्रि के मौके पर बाबा टांगीनाथ धाम तीन दिनी मेले का आयोजन किया जाता है। मेले की तैयारी को लेकर आयोजन समिति कई राउंड की बैठक कर चुकी है। विधि व्यवस्था बनाये रखने और महाशिवरात्रि पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं को कोई परेशानी नही हो इसके लिए खासा प्रबंध करने का निर्णय लिया है। इसके लिए श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का भी प्रबंध किया

धनतेरस की शुभकामनाएं
17/10/2017

धनतेरस की शुभकामनाएं

धनतेरस पर 19 साल बाद लक्ष्मी योग, ये हैं शुभ मुहूर्त व पूजा विधिकार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदिशी तिथि को धनतेरस का...
17/10/2017

धनतेरस पर 19 साल बाद लक्ष्मी योग, ये हैं शुभ मुहूर्त व पूजा विधि
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदिशी तिथि को धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 17 अक्टूबर, मंगलवार को है। ज्योतिषियों के अनुसार, इस बार धनतेरस पर 19 साल बाद लक्ष्मी योग बन रहा है, जो धन की पूजा से लेकर बाजार से खरीदी सहित हर काम के लिए शुभ है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. अमर डिब्बेवाला के अनुसार, धनतेरस पर चंद्रमा, मंगल और शुक्र कन्या राशि में होकर एक साथ युति कर लक्ष्मी योग बनाएंगे। साथ ही इस दिन मंगलवार होने से भौम प्रदोष का योग भी बन रहा है। इसके अलावा सूर्य, बुध और गुरु तुला राशि में रहकर बुधादित्य और गुरु आदित्य योग बनाएंगे।

ये हैं धनतेरस के शुभ मुहूर्त
सुबह 09:17 से 10:40 तक
सुबह 10:40 से दोपहर 12:10 तक
दोपहर 12:10 से 01:25 तक
शाम 07.20 से 08.45 तक

इसी दिन प्रकट हुए थे भगवान धन्वंतरि
धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा की जाती है। पुराणों में लिखी कथा के अनुसार, देवताओं व दैत्यों ने जब समुद्र मंथन किया तो उसमें से कई रत्न निकले। समुद्र मंथन के अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। उस दिन कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी ही थी। इसलिए तब से इस तिथि को भगवान धन्वंतरि का प्रकटोत्सव मनाए जाने का चलन प्रारंभ हुआ। पुराणों में धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंशावतार भी माना गया है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा इस प्रकार करें-

पूजा विधि
सबसे पहले नहाकर साफ वस्त्र पहनें। भगवान धन्वंतरि की मूर्ति या चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें तथा स्वयं पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। उसके बाद भगवान धन्वंतरि का आह्वान इस मंत्र से करें-
सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं,
अन्वेषित च सविधिं आरोग्यमस्य।
गूढं निगूढं औषध्यरूपम्, धन्वन्तरिं च सततं प्रणमामि नित्यं।।

इसके बाद पूजा स्थल पर आसन देने की भावना से चावल चढ़ाएं। आचमन के लिए जल छोड़ें। भगवान धन्वंतरि के चित्र पर गंध, अबीर, गुलाल पुष्प, रोली, आदि चढ़ाएं। चांदी के बर्तन में खीर का भोग लगाएं। (अगर चांदी का बर्तन न हो तो अन्य किसी बर्तन में भी भोग लगा सकते हैं।) इसके बाद पुन: आचमन के लिए जल छोड़ें। मुख शुद्धि के लिए पान, लौंग, सुपारी चढ़ाएं। भगवान धन्वंतरि को वस्त्र (मौली) अर्पण करें। शंखपुष्पी, तुलसी, ब्राह्मी आदि पूजनीय औषधियां भी भगवान धन्वंतरि को अर्पित करें। रोग नाश की कामना के लिए इस मंत्र का जाप करें-
ऊं रं रूद्र रोग नाशाय धनवंतर्ये फट्।।

इसके बाद भगवान धन्वंतरि को श्रीफल व दक्षिणा चढ़ाएं। पूजा के अंत में कर्पूर आरती करें।

साभार : दैनिक भास्कर

29/09/2017
:::::शारदीय नवरात्र::::::::::नवम् सिध्दिदात्री:::::सिध्दगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि।सेव्यमाना सदा भूयात सिध्दिदा सिध्दि...
29/09/2017

:::::शारदीय नवरात्र:::::
:::::नवम् सिध्दिदात्री:::::

सिध्दगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात सिध्दिदा सिध्दिदायिनी॥

:::::शारदीय नवरात्र:::::
:::::नवम् सिध्दिदात्री:::::

सिध्दगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात सिध्दिदा सिध्दिदायिनी॥

भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से ये तमाम सिध्दियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्ध्दनारीश्वर नाम से प्रसिध्द हुए। इस देवी की पूजा नौंवे दिन की जाती है। ये देवी सर्व सिध्दियां प्रदान करने वाली देवी हैं। उपासक या भक्त पर इनकी कृपा से कठिन से कठिन कार्य भी चुटकी में संभव हो जाते हैं। हिमाचल के नंदापर्वत पर इनका प्रसिध्द तीर्थ है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिध्दियां होती हैं। इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से ये सभी सिध्दियां प्राप्त की जा सकती हैं। भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से ये तमाम सिध्दियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्ध्दनारीश्वर नाम से प्रसिध्द हुए। इस देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बाईं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। इसलिए इन्हें सिध्दिदात्री कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है और ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। विधि-विधान से नौंवे दिन इस देवी की उपासना करने से सिध्दियां प्राप्त होती हैं। ये अंतिम देवी हैं। इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। मां के चरणों में शरणागत होकर निरंतर उपासना करने से, इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन करने से हम अमृत पद की ओर चले जाते हैं। भगवती सिध्दिदात्री का ध्यान, स्रोत कवच का पाठ करने से निर्वाण चक्र जागृत होता है, जिससे सिध्दि-ऋध्दि की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के नौवें दिन सिध्ददात्री की पूजा-पाठ करने से आपके कार्यों में आ रहे सारे व्यवधान समाप्त हो जाते हैं तथा आपके सारे मनोकामना की पूर्ति अपने आप ही हो जाती है।

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29/09/2017

:::::शारदीय नवरात्र:::::
::::अष्टम् महागौरी:::::

श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया

नवरात्रि में आठवें दिन महागौरी शक्ति की पूजा की जाती है। नाम से प्रकट है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गयी है। ये अमोघ फलदायिनी हैं और भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है। इनकी कृपा से अलौकिक सिध्दियां भी प्राप्त होती हैं। अष्टवर्षा भवेद् गौरी यानी इनकी आयु आठ साल की मानी गयी है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। 4 भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए वृषारूढ़ा भी कहा गया है इनको। इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुआ है। ऊपर वाले बायें हाथ में डमरू धारण कर रखा है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है। पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिये महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। इसी वजह से इनका शरीर काला पड़ गया, लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कांतिमय बना दिया। उनका रूप गौर वर्ण का हो गया। इसीलिए ये महागौरी कहलाईं।

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29/09/2017

:::::शारदीय नवरात्र:::::
:::::सप्तम् कालरात्रि:::::

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी

नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि।
काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है। इस देवी के तीन नेत्र हैं। ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। ये गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। इसीलिए ये शुभंकरी कहलाईं। अर्थात इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं। उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है। ये ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिध्दियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं।

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29/09/2017

:::::शारदीय नवरात्र:::::
:::::षष्ठम् कात्यायनी:::::

चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी

नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। कात्य गोत्र में विश्व प्रसिध्द महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की। कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। तब मां भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं। इस देवी को नवरात्रि में छठे दिन पूजा जाता है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इनका गुण शोध कार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं। ये वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गयीं। मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गयी थी। इसीलिए ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। ये स्वर्ण के समान चमकीली हैं और भास्वर हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। मां के बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है। इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है। इसलिए कहा जाता है कि इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

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