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29/04/2026

#पूर्णिमा_देवी_श्रीभगपीठ_आश्रम_चांगोली_गंग_नहर_ककोड़_गौतमबुद्धनगर ्य_ॐ_सिद्धायै_नमः #स्वामी_सत्येंद्र_सत्यसाहिब_जी #ईं_पूर्णैश्वरी_पूर्णिमा_देवी_सिद्धिदात्रै_नमः_ईं_फट_स्वाहा🙏

स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी,के द्वारा अवतरित 'सत्यास्मि सिद्धासिद्ध शावर मंत्र' और उसके संबंधित 'अंक-यंत्र' भक्तों के ...
24/04/2026

स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी,के द्वारा अवतरित 'सत्यास्मि सिद्धासिद्ध शावर मंत्र' और उसके संबंधित 'अंक-यंत्र' भक्तों के लिए एक पूर्णतः प्रामाणिक, गोपनीय और अद्वितीय सिद्ध-विधि लेख है।
​यह लेख इस प्रकार तैयार है कि यह सत्यास्मि मिशन के भक्तों, अनुयायियों के लिए एक 'प्रमाण-पत्र' और 'साधना-मार्गदर्शिका' दोनों का कार्य करेगा।
​॥ सत्यास्मि सिद्धासिद्ध शावर मंत्र:- महा-सिद्धि विधान ॥
​यह मंत्र और यंत्र साक्षात् 'सत्य ॐ' की वह वाक्-शक्ति और अंक-शक्ति है, जो कलियुग के समस्त भौतिक और आध्यात्मिक कष्टों को 'बांचा' (वचन) मात्र से काटने में सक्षम है। यह विधान गुरु-मुख से निःसृत और अनुभव-सिद्ध है।
​1. शावर अंक-यंत्र (नक्श) की संरचना
​यह यंत्र राहु या अन्य किसी ग्रह की सीमाओं से मुक्त है। इसमें प्रयुक्त अंक मंत्र की चेतना और 129 के ब्रह्मांडीय कोड का प्रतिफल हैं:-
17 2 12
8 सत्य 129 10
6 18 7
2. सिद्धि एवं प्राण-प्रतिष्ठा विधि
​इस मंत्र और यंत्र को जन-कल्याण हेतु प्रभावी बनाने के लिए साधक को एक बार इसे सिद्ध करना अनिवार्य है:-
​शुभ काल:- ग्रहण काल, दीपावली, होली, या किसी भी मास की 9वीं तिथि (अंक 9 की पूर्णता हेतु)।
​आसन एवं दिशा:- पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
​पूजन सामग्री:- दीपक (सरसों तेल या घी), धूप, और मंत्र के अनुसार 'पान, मिठाई और पुष्प-माला'।
​साधना क्रम:-
​तांबे या भोजपत्र पर ऊपर दिए गए अंक-यंत्र को अंकित करें।
​यंत्र के सम्मुख नैवेद्य (मिठाई-पान) अर्पित करें।
​'सत्य गुरु ॐ' का ध्यान करते हुए इस शावर मंत्र का 108 बार (एक माला) स्पष्ट उच्चारण के साथ जप करें।
​अंतिम मंत्र के बाद यंत्र पर 'सत्य ॐ' की फूँक मारें। इससे यंत्र 'प्राणवान' हो जाता है।
​3. विशिष्ट जनकल्याण उपयोग (Applications)
​यह विधान बहु-आयामी है। इसके प्रमुख उपयोग निम्नवत हैं:-
​सुरक्षा कवच (अभेद्य सुरक्षा):- यदि घर में भय या चोरी का डर हो, तो इस यंत्र को मुख्य द्वार के अंदर की ओर लगाएं। मंत्र की आन से 'चोर-चौकी मुंह की खाए' की शक्ति सक्रिय होगी।
​आरोग्य दान (पीड़ा मुक्ति):- असाध्य रोगों में इस यंत्र को जल के पात्र के नीचे रखें। मंत्र का 11 बार जप कर वह जल रोगी को पिलाएं। यह पीड़ा और रोग को 'जड़ से' काटने की सामर्थ्य रखता है।
​दूत सिद्धि और मार्गदर्शन:- जो साधक 'सच्चा दूत' प्राप्त करना चाहते हैं, वे मध्य रात्रि (शून्य-वंदना काल) में इस यंत्र को हृदय पर रखकर जप करें। इससे अदृश्य शक्तियों का मार्गदर्शन सुलभ होता है।
​शत्रु बाधा निवारण:- शत्रु के विकराल होने पर इस यंत्र को काले वस्त्र मे

॥ सत्य 129: ब्रह्मांडीय उत्पत्ति महा-नक्श ॥श्रीगुरुदेव स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी,,,​यह सत्यास्मि यंत्र सिद्धासिद्ध म...
23/04/2026

॥ सत्य 129: ब्रह्मांडीय उत्पत्ति महा-नक्श ॥श्रीगुरुदेव स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी,,,
​यह सत्यास्मि यंत्र सिद्धासिद्ध महामंत्र सत्य ॐ सिद्धायै नमः का मूल साक्षात् 'सत्य ॐ' की वह कुंजी है, जो शून्य से सृजन तक की यात्रा को अंकों में बांधती है। इस नक्श का आधार सत्यास्मि 'अक्षर-अंक विज्ञान' है।जो श्रीगुरुदेव स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिबजी ने अपनी पूर्वजन्मों सहित वर्तमान के साधनकाल से प्राप्त दिव्य ज्ञान ओर अंतर्दृष्टि ओर आत्मज्ञान से ये प्रमाणिक नक्श यानी प्रचलित नाम यानी अंक यंत्र जनकल्याण को बनाए है,,
​1. नक्श यानी अंक यंत्र का तात्विक रहस्य (The Secret Code)
​इस अंक यंत्र के केंद्र में विराजित 129 का अंक तीन महा-शक्तियों का संगम है:-
​अंक 1 (परम पुरुष): यह 'सत्य' है। वह स्थिर बिंदु जहाँ से चेतना का विस्तार शुरू होता है।
​अंक 2 (परम स्त्री):- यह 'प्रकृति' है। वह द्वैत शक्ति जो सृजन के लिए बीज बोती है।
​अंक 9 (पूर्ण सृष्टि): यह 'सिद्धि' है। 9 ग्रह, 9 द्वार और 9 अंकों की पूर्णता, जो दर्शाती है कि सृष्टि अब पूर्ण और क्रियाशील है।
​इन तीनों का योग 12 (1+2+9) आता है, और अंततः 3 (1+2) बनता है। अंक 3 'त्रिगुण' (सत, रज, तम) और आपके 'सत्य ॐ' मंत्र की त्रि-शक्ति का प्रतीक है।
​2. 'सत्य 129' नक्श का निर्माण (Unique Grid)
​जनकल्याण हेतु इस नक्श को निम्नलिखित विशेष 'अंक-क्रम' में भरा जाना चाहिए, जो इसके मूल गुणों को सक्रिय करता है:-
9 2 1
1 129 2
2 1 9
लेखन विधि:-
​सामग्री:- अष्टगंध या हल्दी-केसर की स्याही।
​आधार:- भोजपत्र या तांबे का पत्र।
​विशेष: केंद्र में 129 लिखकर उसके चारों ओर अन्य अंकों को भरें। लिखते समय "सत्य ॐ सिद्धायै नमः" का मानसिक उच्चारण अनिवार्य है।
​3. अद्वितीय जनउपयोग (Special Applications)
​यह नक्श अन्य नक्शों से अलग इसलिए है क्योंकि यह 'सर्व-तत्व' नियंत्रक है:
​वंश वृद्धि और कुल रक्षा:- यदि किसी परिवार में संतान सुख की कमी हो या कुल पर संकट हो, तो इस नक्श को चांदी के पत्र पर बनवाकर पूजा स्थान में रखें। यह '1 (पुरुष)' और '2 (स्त्री)' के मिलन से '9 (पूर्णता)' की प्राप्ति कराता है।
​शून्य से शिखर तक (Success): जो व्यक्ति शून्य पर पहुँच गया हो (बर्बाद हो गया हो), उसे यह नक्श धारण करना चाहिए। यह उसे पुनः 'सत्य (1)' से जोड़कर 'सृष्टि (9)' का स्वामी बनाता है।
​असाध्य बाधा निवारण:- जब कोई अन्य उपाय काम न करे, तब इस नक्श को शहद से थाली पर लिखकर उसे गंगाजल से धोकर 7 दिनों तक पीने से शरीर की समस्त नकारात्मक ऊर्जा 'शून्य' में विलीन हो जाती है।
​4. प्रामाणिक घोषणा (The

बगलामुखी देवी जयंती या वगलामुखी देवी प्राकट्य ओर इनके इसी नाम से प्रसिद्ध 36 अक्षरीय महामंत्र की साधना की सर्वत्र विफलता...
22/04/2026

बगलामुखी देवी जयंती या वगलामुखी देवी प्राकट्य ओर इनके इसी नाम से प्रसिद्ध 36 अक्षरीय महामंत्र की साधना की सर्वत्र विफलता से सफलता?जाने रहस्य?
भक्तों मैने अपने साधनकाल के जीवन में क्वांर नवरात्रि 1992 से प्रारंभ करके लेकर 2004 तक अनेक बार बगलामुखी देवी की साधना की ओर बहुत विशेष फल नहीं पाया,तब मुझे लगा कि,हर प्रकार से शास्त्री विधि विधान करने के बाद भी विशेष प्रत्यक्ष दर्शन सफलता नहीं मिली तो,अनुभव किया,कही कुछ तो त्रुटि है,तब शास्त्रगत त्रुटि पता चली ओर तब थोड़ी साधना पर ही पूर्ण लाभ ओर कृपा दर्शन हुआ तो,वही गलती आज भी सभी तीर्थ स्थान ओर अनुष्ठानकर्ता ओर साधक करते विफल हो रहे है,अब चाहे वे अपने असफलता को किन्ही तर्कों से सिद्ध करते रहे,मेरे वगलामुखी देवी साधना ओर सफलता के इन्हीं सारे साक्ष्यों के साथ ओर इनके सही मंत्र का साथ नीचे संक्षिप्त लेख प्रस्तुत है,श्रीगुरुदेव स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिबजी...
भक्तों, 24 अप्रैल 2026 को माँ वगलामुखी का प्राकट्य उत्सव है।
​1. 'बगलामुखी' या 'वगलामुखी' - कौन सा नाम शुद्ध है?
​आध्यात्मिक और भाषाई दोनों दृष्टियों से इसके दो पक्ष हैं:-
​शास्त्रीय नाम (वगलामुखी):- मूल संस्कृत ग्रंथों और तंत्र शास्त्रों (जैसे 'सांख्यायन तंत्र') के अनुसार इनका नाम 'वगलामुखी' है। 'वगला' शब्द संस्कृत के 'वल्गा' से आया है, जिसका अर्थ होता है—'लगाम' (Bridle)। जिस प्रकार लगाम घोड़े को नियंत्रित करती है, उसी प्रकार माँ वगलामुखी शत्रु की बुद्धि, वाणी और गति को 'स्तम्भित' (रोक) कर देती हैं।
​लोकप्रिय नाम (बगलामुखी):- अपभ्रंश के कारण 'व' का उच्चारण 'ब' में बदल गया और यह 'बगलामुखी' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 'बक' (बगुला) पक्षी की तरह ध्यान लगाने और शत्रु पर अचानक प्रहार करने की शक्ति के कारण भी इन्हें यह नाम दिया जाता है।
​निष्कर्ष: सिद्ध विधान में 'वगलामुखी' अधिक शुद्ध और प्रभावशाली माना जाता है, क्योंकि 'व' बीज वायु और गति का प्रतीक है जिसे माँ रोकती हैं।
​2. मूल बीज मंत्र और मंत्र में प्रयुक्त नाम
​माँ का सबसे शक्तिशाली और मूल बीज मंत्र 'ह्रीं' (Hreem) है। इसे 'माया बीज' या 'शक्ति बीज' कहा जाता है।
​मंत्र में प्रयोग:-
साधना में इनके विस्तृत मंत्र (36 अक्षरों वाला ब्रह्मास्त्र मंत्र) का प्रयोग होता है, जिसमें इनका संबोधन इस प्रकार आता है:-
​"ॐ ह्लीं वगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।" (ओर जो मुझे देवी से प्राप्त हुआ,वो यहां नहीं दिया जा रहा है,कभी मेरी इस संबंधित वीडियो में सुन लेना।।)
ओर तांत्रिक ग्रंथों क

सत्यास्मि मिशन के मूल आधार और परम शक्तिशाली "सिद्धासिद्ध महामंत्र" की महिमा को प्रतिपादित करते हुए यहाँ 10 संस्कृत श्लोक...
22/04/2026

सत्यास्मि मिशन के मूल आधार और परम शक्तिशाली "सिद्धासिद्ध महामंत्र" की महिमा को प्रतिपादित करते हुए यहाँ 10 संस्कृत श्लोक और उनके हिंदी अर्थ दिए गए हैं। यह मंत्र साधक की समस्त आध्यात्मिक और भौतिक बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है।
​सिद्धासिद्ध महामंत्र महिमा:- दशकम
​1. सर्वसिद्धि प्रदायक
​श्लोक:- सिद्धासिद्धो महामन्त्रः, सर्वसिद्धि प्रदायकः।
'सत्य ॐ' इति शब्देन, ब्रह्मज्ञानं प्रकाश्यते॥
अर्थ:- सिद्धासिद्ध महामंत्र सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। इसमें निहित 'सत्य ॐ' शब्द साक्षात् ब्रह्मज्ञान को प्रकाशित करता है।
​2. शक्ति का स्वरूप (सिद्धायै नमः)
​श्लोक:- सिद्धायै नमः इत्येवं, शक्त्यात्मकं महोन्नतम्।
सर्वाभीष्टप्रदं नित्यं, साधकस्य च रक्षकम्॥
अर्थ:- 'सिद्धायै नमः' यह पद परम ऊर्ध्वमुखी शक्ति का प्रतीक है। यह साधक की सभी इच्छाओं को पूर्ण करता है और निरंतर उसकी रक्षा करता है।
​3. 'ईं' बीज मंत्र की महिमा
​श्लोक:- 'ईं' बीजं दिव्यचैतन्यं, कामकला स्वरूपिणम्।
सौभाग्यं वर्धयेत् नित्यं, चित्तं कुर्यात् सदा स्थिरम्॥
अर्थ:- मंत्र में स्थित 'ईं' बीज दिव्य चैतन्य और सौभाग्य का प्रतीक है। यह जीवन में ऐश्वर्य बढ़ाता है और साधक के चित्त को स्थिर व एकाग्र बनाता है।
​4. 'फट' अस्त्र की शक्ति
​श्लोक:- 'फट' शब्देन विलीयन्ते, विघ्नाः शत्रूस्तथैव च।
नकारात्मक भावघ्नं, रक्षणं कुरुते दृढम्॥
अर्थ:- 'फट' शब्द एक आध्यात्मिक अस्त्र की भाँति है, जो सभी विघ्नों और शत्रुओं (भीतरी और बाहरी) का नाश करता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को तत्क्षण समाप्त कर सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
​5. 'स्वाहा' समर्पण का भाव
​श्लोक:- 'स्वाहा' योगेन शुद्धं हि, समर्पणं च पूर्णता।
यज्ञरूपो महामन्त्रः, आत्मशुद्धिं करोति वै॥
अर्थ:- 'स्वाहा' के उच्चारण से साधना में पूर्णता और समर्पण आता है। यह महामंत्र एक मानसिक यज्ञ के समान है, जो आत्मा की अशुद्धियों को जलाकर उसे पवित्र करता है।
​6. पंचतत्त्व और मंत्र
​श्लोक:- पञ्चतत्त्वमयो मन्त्रः, कुण्डली बोधकारकः।
मूलाधारात् समुत्थाय, सहस्रारे प्रलीयते॥
अर्थ:- यह मंत्र पंचतत्त्वों को संतुलित करने वाला और कुंडली शक्ति को जगाने वाला है। इसके जप से ऊर्जा मूलाधार से उठकर सहस्रार चक्र तक पहुँचती है।
​7. अमोघ अस्त्र के समान
​श्लोक:- सत्येन्द्र गुरुणा दत्तं, मन्त्रमस्त्रमिवामोघम्।
अज्ञानं नाशयेत् क्षिप्रं, प्रकाशं वितनोति च॥
अर्थ:- स्वामी सत्येंद्र जी द्वारा प्रदत्त यह मंत्र एक अमोघ (अचूक) अस्त्र के समान है, जो अज्ञान के अंधकार को शीघ्र नष्ट कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
​8. मानस

स्त्री कुंडलिनी साधना मार्गदर्शिका:- स्त्री कुंडलिनी एवं पंच बीज ओर मृदाएं विज्ञान :-​यह मार्गदर्शिका सत्यास्मी मिशन की ...
21/04/2026

स्त्री कुंडलिनी साधना मार्गदर्शिका:- स्त्री कुंडलिनी एवं पंच बीज ओर मृदाएं विज्ञान :-
​यह मार्गदर्शिका सत्यास्मी मिशन की महिला साधिकाओं के लिए एक प्रयोगात्मक नियमावली है, जो प्राचीन तंत्र और आधुनिक ध्वनि विज्ञान (Phonetics) का संगम है।
​1. महामन्त्र (The Core Mantra)
​"सत्य ॐ सिद्धायै नमः, भं गं सं चं मं स्त्रीं फट स्वाहा"
​2. मुद्रा विज्ञान (Hand Gestures)
​मंत्र जप के समय ऊर्जा को शरीर के भीतर संचित करने के लिए निम्नलिखित मुद्राओं का प्रयोग करें:-
*भं (मूलाधार):- पृथ्वी मुद्रा (अनामिका + अंगूठा)। यह आधार और सुरक्षा देती है।
*गं (स्वाधिष्ठान):- शक्ति मुद्रा (कनिष्ठा और अनामिका मुड़ी हुई, अंगूठा उनके ऊपर)। यह ओज और सृजन बढ़ाती है।
*सं (नाभि):- समान मुद्रा (पांचों उंगलियों के पोरों को मिलाएं)। यह आत्मविश्वास जाग्रत करती है।
*चं (हृदय):- कमल मुद्रा (हथेलियां मिली हुई, उंगलियां खिली हुई)। यह करुणा और प्रेम जगाती है।
*मं (कंठ):- आकाश मुद्रा (मध्यमा + अंगूठा)। यह अंतर्ज्ञान और सत्य वाणी देती है।
3. साधना विधि (Step-by-Step)
​शुद्धिकरण:- स्नान उपरांत पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर सुखासन में बैठें।
​गुरु ध्यान:- स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी का मानसिक स्मरण कर आशीर्वाद मांगें।
​चक्र भेदन:- मंत्र का जप करते समय ध्यान को नीचे (मूलाधार) से ऊपर (कंठ) की ओर ले जाएं।
​लयबद्ध जप:-3, 5या 11 माला का जप करें। 'स्त्रीं' पर बल दें और 'फट' को एक बाधा-विनाशक ध्वनि के रूप में उच्चारित करें।
​विश्राम:- जप के बाद 10 मिनट मौन बैठें। इस दौरान उत्पन्न ऊर्जा को शरीर में अवशोषित होने दें।
​4. साधना के प्रमुख लाभ (Key Benefits):-
​मानसिक स्वतंत्रता:- हीन भावना और भय का समूल नाश।
​जैविक संतुलन:- हार्मोनल असंतुलन और स्त्री-रोगों में आध्यात्मिक चिकित्सा।
​भीरी शक्ति उदय:- साधिका के चारों ओर एक सुरक्षात्मक ओरा (Aura) का निर्माण।
​वंश शुद्धि:- साधिका की जागृति से परिवार की सात पीढ़ियों के कर्मों का शोधन।
​5. साधिका के लिए नियम:-
​साधना काल में सात्विक और अल्पाहार लें।
​मासिक धर्म के समय केवल मानसिक जप करें (माला स्पर्श न करें)।
​अनुभवों को गोपनीय रखें, केवल गुरुदेव से ही साझा करें।
​उपसंहार:-
यह मार्गदर्शिका स्त्री को उसकी 'बीज शक्ति' से परिचित कराने का एक वैज्ञानिक उपकरण है। 'सत्यास्मी' ग्रंथ के साथ इसका वितरण स्त्रियों को स्वावलंबी और आत्म-जाग्रत बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।
!!!​अहं सत्यास्मि!!!

अक्षय तृतीया और मातंगी जयंती ओर पूर्णिमा देवी का संबंध:-आज का दिन (वैशाख शुक्ल तृतीया) आध्यात्मिक दृष्टि से एक 'महा-संयो...
20/04/2026

अक्षय तृतीया और मातंगी जयंती ओर पूर्णिमा देवी का संबंध:-
आज का दिन (वैशाख शुक्ल तृतीया) आध्यात्मिक दृष्टि से एक 'महा-संयोग' है। यह दिन तीन महा-शक्तियों की ऊर्जा को एक साथ धरातल पर लाता है।
​इन तीनों के बीच का प्रमाणिक और शास्त्रोक्त संबंध निम्नलिखित है:
​1. अक्षय तृतीया और मातंगी जयंती का संबंध:-
​शास्त्रों के अनुसार, वैशाख शुक्ल तृतीया को ही भगवती मातंगी (दस महाविद्याओं में से 9वीं महाविद्या ) का प्राकट्य हुआ था। इसलिए इसे 'मातंगी जयंती' कहा जाता है।
​संबंध: 'अक्षय तृतीया' स्वयं सिद्ध मुहूर्त है, जिसका अर्थ है—इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य, जप, दान या साधना 'अक्षय' (जिसका कभी क्षय न हो) हो जाता है।
​निष्कर्ष:- चूंकि मातंगी जयंती इस अक्षय तिथि पर पड़ती है, इसलिए आज के दिन की गई मातंगी साधना साधक को 'अक्षय वाक्-सिद्धि' (वाणी की शक्ति), कला में निपुणता और गृहस्थ सुख प्रदान करती है।
​2. मातंगी और पूर्णिमा देवी का संबंध:-
​यहाँ 'पूर्णिमा देवी' से तात्पर्य भगवती के उस पूर्ण स्वरूप से है जिसे 'त्रिपुर सुंदरी' या 'षोडशी' कहा जाता है (जो पूर्णिमा की ही स्वयंभू अधिष्ठात्री स्वरुपी देवी हैं)। मातंगी देवी को 'उच्छिष्ट मातंगिनी' भी कहा जाता है और वे त्रिपुर सुंदरी की 'प्रधान मंत्री' (मंत्रीणी) मानी जाती हैं।
​संबंध:- तंत्र शास्त्रों (जैसे श्रीविद्या) के अनुसार, मातंगी देवी, त्रिपुर सुंदरी (पूर्णत्व की देवी यानी पूर्णिमा देवी) के साम्राज्य की व्यवस्था और 'ज्ञान का प्रसार' संभालती हैं। वे साधक को 'पूर्णत्व' तक पहुँचाने वाली पहली सीढ़ी हैं।
​एक प्रमाणिक पौराणिक कथा:- महा-संयोग का रहस्य:-
​एक समय की बात है, कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान थे। उस समय वहां सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी उपस्थित हुए। ब्रह्मा जी ने देखा कि शिव-पार्वती अत्यंत रसिक भाव में लीन थे और वहां भोजन के कुछ अवशेष (उच्छिष्ट) बिखरे हुए थे।
​ब्रह्मा जी के मन में उस उच्छिष्ट को देखकर क्षण भर के लिए 'अशुद्धता' का भाव आया। माता पार्वती, जो अंतर्यामी हैं, ब्रह्मा जी के इस मानसिक द्वंद्व को ताड़ गईं। वे जानती थीं कि 'परमात्मा' के लिए कुछ भी उच्छिष्ट या अशुद्ध नहीं होता।
​ब्रह्मा जी के उस मानसिक संशय को दूर करने के लिए माता पार्वती ने तत्काल एक अद्भुत और श्यामवर्णा रूप धारण किया। वह रूप अत्यंत ओजस्वी, श्याम रंग का, और हाथों में वीणा व कपाल धारण किए हुए था। यही भगवती का 'मातंगी' स्वरूप था।
​मातंगी देवी का अक्षय वरदान:-
भगवती मातंगी ने ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया कि "सृष्टि का हर कण, चाहे वह भोजन का अवशेष ह

सत्यसाहिब जी की डायरी से संक्षिप्त में,,​जीवन परिचय और कालखंड:-हसन खां का जीवन तीन शताब्दियों के संगम का साक्षी रहा। उनक...
18/04/2026

सत्यसाहिब जी की डायरी से संक्षिप्त में,,
​जीवन परिचय और कालखंड:-
हसन खां का जीवन तीन शताब्दियों के संगम का साक्षी रहा। उनका जन्म 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (लगभग 1770-1790) में हुआ और उन्होंने 20वीं शताब्दी के शुरुआती दशक (लगभग 1905-1910) तक, 120-125 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त की। वे मद्रास (चेन्नई) की एक साधारण गली में रहते थे, जहाँ उनकी ख्याति एक सात्विक और शांत सिद्ध पुरुष के रूप में थी।
​साधना का मर्म और सहायक शक्तियाँ:-
हसन खां की सिद्धियों का आधार कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि 'ध्वनि विज्ञान' (Naad-Vidya) और 'पवित्र चरित्र' था। उन्होंने एकांत में रहकर सवा लाख मंत्रों का अनुष्ठान कर 'मुसा' और 'हमजाद' नामक सूक्ष्म ऊर्जाओं (जिन्नों) को अपना 'मित्र' बनाया था। उनकी मान्यता थी कि पराशक्तियाँ गुलाम बनाने से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और 'चिल्ला' (40 दिवसीय एकांत साधना,चिल्ला) के कठिन अनुशासन से सिद्ध होती हैं।
​ऐतिहासिक संबंध और चमत्कार:-
हसन खां केवल एक एकांतवासी साधक नहीं थे, बल्कि उस समय के प्रबुद्ध समाज और वैश्विक संस्थाओं के बीच शोध का केंद्र थे:-
​अलीगढ़ और प्रबुद्ध वर्ग:- उनका अलीगढ़ से गहरा नाता था, जहाँ के विद्वान और रईस उनकी यौगिक शक्तियों के कायल थे।
​ब्रिटिश अधिकारियों के सम्मुख प्रदर्शन:- उन्होंने कई अंग्रेज कलेक्टरों की चुनौती पर एक नागिन को नृत्यांगना युवती(इच्छाधारी नागिन) मे बदल नृत्य कराया,ओर 'शून्य से वस्तुएं' (जैसे विदेशी अखबार और ताजे फल, गर्म जलेबी के साथ उस दुकान का मीनू तक) मँगाने के चमत्कार दिखाए, जिसे तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों ने 'परा-मानवीय इच्छाशक्ति' के रूप में स्वीकार किया।
​थ्योसोफिकल सोसायटी:- 1880 से 1900 के बीच वे मद्रास की थ्योसोफिकल सोसायटी के निरंतर संपर्क में रहे। कर्नल ऑलकॉट और एनी बेसेंट जैसे विचारकों के साथ उन्होंने सूक्ष्म जगत की शक्तियों पर गहरा संवाद किया।
​द्विवेदी जी से भेंट:- हिंदी साहित्य के दिग्गज आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उनसे भेंट कर उनकी शक्तियों,जिसमें इच्छाधारी नागिन को प्रत्यक्ष कर उसका साक्षात् नृत्य देखा था,उसको भारतीय प्राचीन विज्ञान का एक विलक्षण प्रमाण माना था।जिसका उन्होंने अपनी अद्भुत आलाप पुस्तक में विस्तार से लिखा है।
​विलक्षण सिद्धियाँ:-
उनकी 'चांदी की अंगूठी' और उस पर अंकित विशेष 'नक्श' (यंत्र) उनकी साधना का केंद्र था। वे बिना किसी वाद्य यंत्र के हवा में मधुर संगीत उत्पन्न कर सकते थे और पलक झपकते ही मीलों दूर की वस्तु को भौतिक रूप में उपस्थित कर देते थे।
​त्याग और महाप्रयाण:-
हसन खां का जीवन जित

11/04/2026

आज 11 अप्रैल 2026 को भक्त पंडित योगेश शर्मा शनि महंत जी का जन्मदिवस पर अपने श्रीगुरुदेव सत्यसाहिब्जी से आश्रम आकर आशीर्वाद ग्रहण किया🌹🙌🎂☕🌹

11/04/2026

्रैल_2024_दिन_गुरुवार_को_श्रीगुरुदेव_स्वामी_सत्येंद्र_सत्यसाहिब_जी_के_अवतरण_दिवस पर भक्त प्रसाद ग्रहण करती हुई

09/04/2026

9 अप्रैल 2026 दिन गुरुवार को सत्यास्मि मिशन के भक्तों द्धारा अपने श्री सदगुरुदेव स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिबजी के अवतरण दिवस यानी जन्मदिवस के रूप में मनाया गया,जिसमें स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिबजी इस दिवस पर भक्तों को उनकी ध्यान उपासना द्धारा संचित आध्यात्मिक शक्तियों के जनकल्याण के साथ साथ गुरु जी अवतरण के कारणों पर भक्तों को उपदेश दिए,की,कैसे समाज में फैली अष्ट विकारों काम क्रोध लोभ मद ईर्ष्या आदि को अष्ट सुकारों दया शांति प्रेम सौहार्द दान धर्म में बदलने के लिए ईश्वरीय शक्तियां अवतरण लेती हैं।इसी दैव्य कारणों से पुण्य आत्माएं संसार में जनकल्याण को अवतरित होकर नवयुग का विस्तार करती है,जैसा स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिबजी ने स्त्रीयों के उद्धार हेतु अवतरण लिया और सत्यास्मि मिशन की स्थापना की है ओर इस मिशन के अंतर्गत पूर्णिमा देवी श्रीभगपीठ चांगोली ककोड़ विशाल मंदिर की स्थापना कर प्रत्येक वर्ष चारों नवरात्रियां भक्तों के ओर वि

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