09/01/2021
क्षिण-प्रदेशमें कृष्णवीणा-नदीके तटपर एक ग्रामें रामदास नामक एक भगवद्भक्त ब्राह्मण निवास करते थे उन्हींके पुत्रका नाम बिल्वमङ्गठ या । थे पिताने यथासाध्य पुत्रको धर्मशास्त्रोंकी शिक्षा दी थी। विल्वमङ्गल पिताको शिक्षा तथा उनके भक्तिभावके प्रभावसे वाल्यकालमें ही अति शान्त, शिष्ट और श्रद्धावान् हो गया था । परन्तु दैवयोगसे पिता-माताके देहावसान होनेपर जवसे घरकी सम्पत्तिपर उसका अधिकार हुआ तभीसे उसके कुसङ्गी मित्र जुटने लगे । कुसङ्गी मित्रोंके संगसे अविवेकने भी आकर अड्डा जमा लिया । धीरे-धीरे विल्वमङ्गलके अन्तःकरणमें अनेक दोषों ने अपना घर कर लिया । एक दिन गाँवमें कहीं चिन्तामणि नामक वेश्याका नाच था, शौकीनोंके दल-के-दल नाचमें जा रहे थे । बिल्वमङ्गल भी अपने मित्रोंके साथ वहाँ जा पहुँचा । वेश्यांको देखते ही बिल्वमङ्गलका मन चञ्चल हो उठा, विवेक शून्य बुद्धिने सहारा दिया, बिल्वमङ्गल ऐसे डूबे कि उसन्होंनें हाड़-मांस भरे चामके कल्पित रूपपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया - तन, मन, धन, कुल, मान, मर्यादा और धर्म सबको उत्सर्ग कर दिया ! है । जिस दिन उनके पिता का श्राद्ध था विद्वान् कुलपुरोहित विल्वमङ्गलसे श्राद्धके मन्त्रोंकी आवृत्ति करवा रहे हैं परन्तु उनका मन 'चिन्तामणि' की चिन्तामें निमग्न है। उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता । किसी प्रकार श्राद्ध समाप्त कर जैसे-तैसे ब्राह्मणोंको झटपट भोजन करवाकर बिल्वमङ्गल चिन्तामणिके घर जानेको तैयार हुए । सन्ध्या हो चुकी थी, लोगोंने समझाया कि 'भाई ! आज तुम्हारे पिताका श्राद्ध है, वेश्याके घर नहीं जाना चाहिये', परन्तु कौन सुनता था ! उसका हृदय तो कभीका धर्म-कर्मसे शून्य हो चुका था । वि्वबमङ्गত दौड़कर नदीके किनारे गये । भगवान्की माया अपार है, अकस्मात् प्रबळ बेगम तूफान आया और उसीके साथ मूसलधार वर्षा होने लगी। आक़ाशमें अन्धकार छा गया, बादलोंकी भयानक गर्जना और बिजलीकी कड़कड़ाहटसे जीवमात्र भयभीत हो गये । रात-दिन नदीमें रहनेवाले केवटोंने भी नावोंको किनारे बाँधकर वृक्षोंका आश्रय लिया, परन्तु विल्वमङ्गलपर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने केवटोंसे उस पार ले चलनेको कहा, बार-बार विनती की, उंतराईका भी गहरा लालच दिया परन्तु मृत्युका सामना करनेको कौन तैयार होता ? सवने इन्कार कर दिया । ज्यों-ज्यों विलम्ब होता था, त्यों-ही-त्यों विल्वमङ्गलकी व्याकुलता बढ़ती जाती थी । अन्तमें वह अधीर हो उठे और कुछ भी आगा-पीछा न सोचकर तैरकर पार जानेके लिये सहसा नदीमें कूद पड़े !
। संयोगवश नदीमें एक मुर्दा बहा जा रहा या। बिल्वमंगल तो बेहोश थे, उन्होंनें उसे लकड़ी समझा और उसीके सहारे नदीके उस पार चले गये । उन्है कपड़ोंकी सुध नहीं है, बिल्कुल दिगम्बर हो चुके है, चारों ओर अन्धकार छाया हुआ है, पशु भयानक शब्द कर रहे हैं, कहीं मनुष्य की गन्ध भी नहीं आती, परन्तु बिल्वमङ्गल उन्मत्तकी भाँति अपनी धुनमें चले जा रहे हैं । कुछ ही दूरपर चिन्तामणिका घर था । श्राद्धके कारण आज बिल्वमङ्गलके आनेकी बात नहीं थी अतएव चिन्ता घरके सब दरवाजोंको बन्द करके निश्चिन्त होकर सो चुकी थी । बिल्वमङ्गउने बाहरसे बहुत पुकारा परन्तु तफ़ानके कारण अन्दर । कुछ भी नहीं सुनायी पड़ा । बिल्बमङ्गने इधर-उधर ताकते हुए बिजलीके प्रकाशमें दीवालपर एक रस्सा-सा लटकता देखा, तुरन्त उसने उसे पकड़ा और उसीके सहारे दीवाल फाँदकर अन्दर चले गये । चिन्ताको जगाया । वह तो इनहें ऐसे देखते ही स्तम्भित-सी रह गयी ! नंगा बदन, सारा शरीर पानीसे भीगा हुआ, भयानक दुर्गन्ध आ रही है । उसने कहा-'तुम इस भयावनी रातमें नदी पार होकर बन्द घरमें कैसे आये ? बिल्वमङ्गलने काठपर चढ़कर नदी पार होने और रस्सेकी सहायतासे दीवालपर चढ़नेकी कथा सुनायी ! वृष्टि थम चुकी थी। चिन्ता दीपक हाथमें लेकर बाहर आयी, देखती है तो दीवालपर भयानक काला नाग लटक रहा है और नदीके तीर सड़ा मुर्दा पड़ा है । बिल्वमङ्गळने भी देखा और
देखते ही कॉप उठे | चिन्ताने भर्त्सना करके कहा कि 'तू ब्राह्मण है ? अरे ! आज तेरे पिताका श्राद्ध था, परन्तु एक हाड़-मांसकी पुतलीपर त इतना आसक्त हो गया कि अपने सारे धर्म-कर्मको तिलाञ्जलि देकर इस डरावनी रातमें मुर्दे और साँपकी सहायतासे यहाँ दौड़ा आया ! तू आज जिसे परम सुन्दर समझ कर इस तरह पागल हो रहा है, उसका भी एक दिन तो वही परिणाम होनेवाला है जो तेरे आँखोंके सामने इस सड़े मुर्देका है ! धिक्कार है तेरी इस नीच वृत्तिको ! अरे, यदि तु इसी प्रकार उस मनमोहन श्यामसुन्दरपर आसक्त होता-यदि उससे मिलनेके लिये यों छटपटाकर दौड़ता तो अबतक उसको पाकर तू अवश्य ही कृतार्थ हो चुका होता !
वेश्याकी वाणीने बड़ा काम किया । बिल्वमङ्गल चुप होकर सोचने लगे । वाल्यकालकी स्मृति उसके मनमें जाग उठी । पिताजीकी भक्ति और उनकी धर्मप्राणताके दृश्य उसकी आँखोंके सामने मूर्तिमान् होकर नाचने लगे । बिल्वमङ्गउकी हृदयतन्त्री नवीन सुरोंसे बज उठी, विवेककी अग्निका प्रादुर्भाव हुआ, भगवत् प्रेमका समुद्र उमड़ा और उसकी आँखोंसे अश्रुओंकी अजस्र धारा बहने लगी । विल्वमङ्गउने चिन्तामणिक्े चरण पकड़ लिये और कहा कि 'माता ! तूने आज मुझको दिव्यदृष्टि देकर कृतार्थ कर दिया।' मन-ही-मन चिन्तामणिको गुरु मानकर प्रणाम किया और उसी क्षण जगच्चिन्तामणिकी चारु-चिन्तामें निमन् होकर उन्मत्तकी
भौँति चिन्ताके घरसे निकल पड़ा । विल्वमङ्गलके जीवन-नाटकको यवनिकाका परिवर्तन हो गया ।
श्यामसुन्दरको प्रेममयो मनोहर नूर्तिका दर्शन करनेके लिये विल्वमङ्गल पागलकी तरह जगह-जगह भटकने लगे । कई दिनोंके बाद एक दिन अकस्मात् उनको रात में एक परम रूपवती युवती दीख पड़ी, पूर्व-संस्कार अभी सर्वथा नहीं मिटे थे । युवतीका सुन्दर रूप देखते ही नेत्र चंचल हो उठे और नेत्रों के साथ ही मन भी खिंचा । श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है
यततो हापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ (२।६०)
'यत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुपके मनको भी ये प्रमथन खमाववाली इन्द्रियाँ जबरदस्ती हरण कर लेती हैं।
इसीके अनुसार विल्वमङ्गलको भी फिर मोह हुआ । भगवान्को भूलकर वह पुनः पतंग वनकर विषयाग्निकी ओर दौड़ा । बिल्वमङ्गल युवतीके पीछे-पीछे उसके मकानतक गया। युवती अपने घरके अन्दर चली गयी, बिल्वमङ्गल उदास होकर घरके दरवाजेपर बैठ गया । घरके मालिकने बाहर आकर देखा कि एक मलिनमुख अतिथि ब्राह्मण बाहर बैठा है। उसने कारण पूछा । विल्वमङ्गलने कपट छोड़कर सारी घटना सुना दी और कहा कि 'मैं एक बार फिर उस युवतीको प्राण भरकर देख लेना चाहता हूँ, तुम उसे यहाँ बुलवा दो ।' युवती उसी सेठको धर्मपत्नी थी, सेठने सोचा कि इसमें हानि ही क्या है, यदि उसके देखनेसे ही इसकी तृप्ति होती हो तो अच्छी बात है । अतिथिवत्सल सेठ अपनी पत्नीको बुलानेके लिये अन्दर गया । इधर विल्वमङ्गलके मनसमुद्रमें तरह तरहकी तरङ्गोंका तूफान उठने लगा।
जो एक बार अनन्यचित्तसे उस अशरण-शरणकी शरणमें चला जाता है उसके योगक्षेम का सारा भार वह अपने ऊपर उठा लेता है। आज विल्वमङ्गलको सँभालनेकी भी चिन्ता उसीको पड़ी । दीनवत्सल भगवान्ने अज्ञानान्ध विल्वमङ्गलको दिव्यचक्षु प्रदान किये; उसको अपनी अवस्थाका यथार्थ ज्ञान हुआ, हृदय शोकसे भर गया और न मालूम क्या सोचकर उसने पासके बेलके पेड़से दो काँटे तोड़ लिये । इतनेमें ही सेठकी धर्मपत्नी वहाँ आ पहुँची, बिल्बमङ्गजने उसे फिर देखा और मन-ही-मन, अपनेको धिक्कार देकर कहने लगा कि 'अभागी आँखें ! यदि तुम न होती
तो आज मेरा इतना पतन क्यों होता!' इतना कहकर विच मङ्गटने, चाहे यह उसकी कमजोरी हो या और कुछ, उस समय उन चञ्चल नेत्रोंको दण्ड देना ही उचित समझा और तत्काल उन दोनों काँटोंको दोनों आँखोंमें भोंक लिया! ऑम्बास रुषिरकी अजन धारा बहने लगी ! बिल्वमङ्गल हॅनता और नाचता हुआ तुमुल हरिष्वनिसे आकाशको गुँजाने गा । सेठको और उनकी पत्नीको बड़ा दुःख हुआ, परन्तु थे बेचारे निरुपाय थे । विल्वनङ्गलका बचा-खुचा चित्तमल भी आज सारा नष्ट होगया और अब तो वे उस अनाथ के नाथको अति शीघ्र पानेके लिये बड़ा ही व्याकुल हो उठे, उनके जीवन-नाटकका यह तीसरा पट-परिवर्तन हुआ!
परम प्रियतम श्रीकृष्णके वियोगकी दारुण व्ययासे उनकी ফूटी आँखोंने चौबीसों घण्टे आँसुओंकी झड़ी लगा दी । न भूखका पता है न प्यासका, न सोनेका ज्ञान है और न जागनेका ! 'कृष्ण-कृष्ण की पुकारते दिशाओंको गुँजाता हुए विल्वमङ्गल जङ्गल-जङ्गल और गाँव-गाँवमें घूमने लगते हैं ! जिस दीनबन्धुके लिये जान-बूझकर आँखें फोड़ी, जिस प्रियतमको पानेके लिये ऐश आराम पर लात मारी, वह मिलने में इतना विलम्ब करे, यह भला किसीसे कैसे सहन हो ? यदि आजकलका-मेरे जैसा कोई होता तो वह भगवान्को कोसते-कोसते ही पिण्ड न छोड़ता,भक्तिका त्याग तो कभीका कर चुका होता ! परन्तु उन्हौनें दोषारोपण कदापि नहीं किया, उनको अपने प्रेमास्पदमें कभी कोई दोष दीखा ही नहीं मेघ जल न बरसाकर पत्थरोंकी वर्षासे चातककी एक-एक पाँखको तोड़ डाले तो भी क्या चातक उसपर नाराज होता है ? .
जहाँ निर्मल प्रेमका अगाध समुद्र है वहाँ तो एक प्रेमके अतिरिक्त और किसीका अस्तित्व ही नहीं रहता ! ऐसे प्रेमीके लिये प्रेमास्पदको भी कभी चैन नहीं पड़ती। उसे दौड़कर आना ही पड़ता है । आज अन्ध बिल्वमङ्गल कृष्ण प्रेममें मतवाला होकर जहाँ-तहाँ भटक रह् है । कहीं गिर पड़ता है, कहीं टकरा जाता है, अन्न-जलका तो कोई ठिकाना ही नहीं । ऐसी दशामें प्रेममय श्रीकृष्ण कैसे निश्चिन्त रह सकते हैं! एक छोटे-से गोप-बालकके वेशमें भगवान् विल्वमङ्गलके पास आकर अपनी मुनि-मन-मोहिनी मधुर वाणीसे बोले, 'सूरदासजी ! आपको बड़ी भूख लगी होगी, मैं कुछ मिठाई लाया हूँ, जल भी लाया हूँ, आप इसे ग्रहण कीजिये । बिल्वमङ्गल के प्राण तो बालक उस मधुर स्वरसे ही मोहे जा चुके थे, उसके हाथका दुर्लभ प्रसाद पाकर तो उनका हृदय हर्ष के हिलोरोंसे उछल उठा ! बिल्वमंगल ने बालक से कहा 'भैया ! तुम्हारा घर कहाँ है ? तुम्हारा नाम क्या है ? तुम क्या किया करते हो ?
वालकने कहा, 'मेरा घर पास ही है, मेरा कोई खास नाम नहीं, जो मुझे जिस नामसे पुकारता है, मैं उसीसे बोलता हूँ, गौएँ चराया करता हूँ, मुझसे जो प्रेम करते हैं मैं भी उनसे प्रेम करता हूँ ।' विल्वमङ्गल बालक की वीणा-विनिन्दित वाणी सुन कर विमुग्ध हो गये । बालक जाते-जाते कह गया कि 'मैं रोज आकर आपको भोजन करवा जाया करूँगा ।' बिल्वमङ्गलने कहा, 'बड़ी अच्छी बात है तुम रोज आया करो । बालक चला गया और बिल्वमङ्गलका मन भी साथ लेता गया । 'मनचोर' तो उसका नाम ही ठहरा ! अनेक प्रकारकी सामग्रियोंसे भोग लगाकर भी लोग जिनकी कृपाके लिये तरसा करते हैं वही कृपासिन्धु आज विल्वमङ्गलको अपने करकमलोंसे भोजन करवाने आते हैं ? धन्य है ! भक्तके लिये भगवान् क्या-क्या नहीं करते ?
बिल्वमङ्गल अबतक यह तो नहीं समझे कि मैंने जिसके लिये मैनें फकीरीका बाना लिया और आँखोंमें काँटे चुभाये, वह बालक वही कृष्ण हैं, परन्तु उस गोप-बालकने उनके हृदयपर इतना अधिकार अवश्य जमा लिया कि उनको दूसरी बातका सुनना भी असह हो उठा । एक दिन बिल्वमङ्गल मन-ही- मन विचार करने लगे कि 'सारी आफतें छोड़कर यहांतक आया, यहाँ यह नयी आफत आ गयी। संसार के मोहसे छूटा तो इस बालकने मोहमें घेर लिया' यों सोच ही रहे था कि वह रसिक बालक उनके पास आ बैठा और अपनी दीवानी बना देनेवाली वाणीसे बोला, 'वाबाजी ! चुपचाप क्या सोचते हो ! वृन्दावन चलोगे ! वृन्दावनका नाम सुनते ही विल्वमङ्गलका हृदय हरा हो गया परन्तु अपनी असमर्थता प्रकट करते हुआ बोले कि 'भैया, मैं अन्धा वृन्दावन कैसे जाऊँ ? बालकने कहा, 'यह लो मेरी लाठी, मैं इसे पकड़े-पकड़े तुम्हारे साथ चलता हूँ बिल्वमङ्गलका मुखड़ा खिल उठा, लाठी पकड़कर भगवान् भक्तके आगे-आगे चलने लगे । धन्य दयालुता ! भक्तकी लाठी पकड़कर मार्ग दिखाते हैं । थोड़ी-सी दूर जाकर बालकने कहा, 'लो ! वृन्दावन आ गया, अब मैं जाता हूँ।' बिल्वमङ्गलने बालक का हाथ पकड़ लिया, हाथका स्पर्श होते ही सारे शरीरमें बिजली-सी दौड़ गयी, सात्त्विक प्रकाशसे सारे द्वार प्रकाशित हो उठे, बिल्वमङ्गलने दिव्य दृष्टि पायी और उन्होंनें देखा कि बालकके रूपमें साक्षात् मेरे श्यामसुन्दर ही हैं । विल्वमङ्गलका शरीर रोमाञ्चित हो गया,आँखोंसे प्रेमाश्रुओंकी अनवरत धारा बहने लगी, भगवान्का हाथ उसने और भी जोरसे पकड़ लिया और कहा कि अब पहचान लिया है, बहुत दिनों के बाद पकड़ सका हूँ प्रभु ! अब नहीं छोड़नेका! भगवान नें कहा, 'छोड़ते हो कि नहीं ? बिल्वमङ्ने कहा, 'नहीं कभी नहीं, त्रिकालमें भी नहीं ।
भगवान्ने जोरसे झटका देकर हाथ छुड़ा लिया |। भला, जिसके बलसे बलान्विता होकर मायाने सारे जगत्को पदपलित कर रक्खा है उसके बलके सामने बेचारा अन्धा क्या कर सकता था? परन्तु उसने एक ऐसी रज्जुसे उनको बाँध लिया था कि जिससे छूटकर जाना उनके लिये बड़ी टेढ़ी खीर थी ! हाथ छुड़ाते ही बिल्वमङ्गलने कहा-जाते हो ? पर स्मरण रक्खो !
हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि यलात्कृष्ण किमद्भुतम् । हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते ॥
हाथ छुड़ाये जात हो, निबल जानिकै मोहि । हिरदयतें जब जाहुगे, मर्द बदौंगो तोहि ॥
आप मुझे निर्बल जानकर मुझसे बलपूर्वक हाथ छुड़ाकर तो जाते हो परंतु मेरे से जाकर दिखाओ मैं तभी आपको बलवान समझूंगा
भगवान् नहीं जा सके ! जाते भी कैसे ? प्रतिज्ञा कर
चुके हैं
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। '
जो मुझको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ। भगवान नें बिल्वमङ्गल की आँखोंपर अपना कोमल करकमल फिराया, उनकी आँखें खुल गयीं! नेत्रोंसे प्रत्यक्ष भगवान्को देखकर उनकी भुवनमोहिनी अनूप रूपराशिके दर्शन पाकर विल्वमङ्गल अपने आपको सँभाल नहीं सके । वह चरणोंमें गिर पड़े और प्रेमाश्रुओंसे प्रभु के पावन चरण कमलोंको धोने लगे!
भगवान्ने उठाकर उनको अपनी छातीसे लगा जिया । भक्त और भगवान के मधुर मिलनसे समस्त जगत में मधुरता छा गयी । देवता पुष्पवृष्टि करने लगे । सन्त-भक्तोंके दल नाचने लगे। हरिनामकी पवित्र ध्वनिसे आकाश परिपूर्ण हो गया । भक्त और भगवान् दोनों धन्य हुए । वेश्या चिन्तामणि, सेठ और उनकी पत्नी भी वहाँ आ गयीं, भक्तके प्रभावसे भगवान्ने उन सबको अपना दिव्य-दर्शन देकर कृतार्थ किया ।
विल्वमङ्गल जीवनभर भक्तिका प्रचारकर भगवान की महिमां बढाते रहे और अन्तमें गोलोकधामें पधारे !