भक्त और भगवान

भक्त और भगवान धार्मिक प्रचार

06/01/2025
20/11/2024

सच बोलने को हिम्मत बहुत कम लोगो में होती है, हो सके तो इस मूवी का सपोर्ट जरूर करना

क्षिण-प्रदेशमें कृष्णवीणा-नदीके तटपर एक ग्रामें रामदास नामक एक भगवद्भक्त ब्राह्मण निवास करते थे उन्हींके पुत्रका नाम बिल...
09/01/2021

क्षिण-प्रदेशमें कृष्णवीणा-नदीके तटपर एक ग्रामें रामदास नामक एक भगवद्भक्त ब्राह्मण निवास करते थे उन्हींके पुत्रका नाम बिल्वमङ्गठ या । थे पिताने यथासाध्य पुत्रको धर्मशास्त्रोंकी शिक्षा दी थी। विल्वमङ्गल पिताको शिक्षा तथा उनके भक्तिभावके प्रभावसे वाल्यकालमें ही अति शान्त, शिष्ट और श्रद्धावान् हो गया था । परन्तु दैवयोगसे पिता-माताके देहावसान होनेपर जवसे घरकी सम्पत्तिपर उसका अधिकार हुआ तभीसे उसके कुसङ्गी मित्र जुटने लगे । कुसङ्गी मित्रोंके संगसे अविवेकने भी आकर अड्डा जमा लिया । धीरे-धीरे विल्वमङ्गलके अन्तःकरणमें अनेक दोषों ने अपना घर कर लिया । एक दिन गाँवमें कहीं चिन्तामणि नामक वेश्याका नाच था, शौकीनोंके दल-के-दल नाचमें जा रहे थे । बिल्वमङ्गल भी अपने मित्रोंके साथ वहाँ जा पहुँचा । वेश्यांको देखते ही बिल्वमङ्गलका मन चञ्चल हो उठा, विवेक शून्य बुद्धिने सहारा दिया, बिल्वमङ्गल ऐसे डूबे कि उसन्होंनें हाड़-मांस भरे चामके कल्पित रूपपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया - तन, मन, धन, कुल, मान, मर्यादा और धर्म सबको उत्सर्ग कर दिया ! है । जिस दिन उनके पिता का श्राद्ध था विद्वान् कुलपुरोहित विल्वमङ्गलसे श्राद्धके मन्त्रोंकी आवृत्ति करवा रहे हैं परन्तु उनका मन 'चिन्तामणि' की चिन्तामें निमग्न है। उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता । किसी प्रकार श्राद्ध समाप्त कर जैसे-तैसे ब्राह्मणोंको झटपट भोजन करवाकर बिल्वमङ्गल चिन्तामणिके घर जानेको तैयार हुए । सन्ध्या हो चुकी थी, लोगोंने समझाया कि 'भाई ! आज तुम्हारे पिताका श्राद्ध है, वेश्याके घर नहीं जाना चाहिये', परन्तु कौन सुनता था ! उसका हृदय तो कभीका धर्म-कर्मसे शून्य हो चुका था । वि्वबमङ्गত दौड़कर नदीके किनारे गये । भगवान्की माया अपार है, अकस्मात् प्रबळ बेगम तूफान आया और उसीके साथ मूसलधार वर्षा होने लगी। आक़ाशमें अन्धकार छा गया, बादलोंकी भयानक गर्जना और बिजलीकी कड़कड़ाहटसे जीवमात्र भयभीत हो गये । रात-दिन नदीमें रहनेवाले केवटोंने भी नावोंको किनारे बाँधकर वृक्षोंका आश्रय लिया, परन्तु विल्वमङ्गलपर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने केवटोंसे उस पार ले चलनेको कहा, बार-बार विनती की, उंतराईका भी गहरा लालच दिया परन्तु मृत्युका सामना करनेको कौन तैयार होता ? सवने इन्कार कर दिया । ज्यों-ज्यों विलम्ब होता था, त्यों-ही-त्यों विल्वमङ्गलकी व्याकुलता बढ़ती जाती थी । अन्तमें वह अधीर हो उठे और कुछ भी आगा-पीछा न सोचकर तैरकर पार जानेके लिये सहसा नदीमें कूद पड़े !
। संयोगवश नदीमें एक मुर्दा बहा जा रहा या। बिल्वमंगल तो बेहोश थे, उन्होंनें उसे लकड़ी समझा और उसीके सहारे नदीके उस पार चले गये । उन्है कपड़ोंकी सुध नहीं है, बिल्कुल दिगम्बर हो चुके है, चारों ओर अन्धकार छाया हुआ है, पशु भयानक शब्द कर रहे हैं, कहीं मनुष्य की गन्ध भी नहीं आती, परन्तु बिल्वमङ्गल उन्मत्तकी भाँति अपनी धुनमें चले जा रहे हैं । कुछ ही दूरपर चिन्तामणिका घर था । श्राद्धके कारण आज बिल्वमङ्गलके आनेकी बात नहीं थी अतएव चिन्ता घरके सब दरवाजोंको बन्द करके निश्चिन्त होकर सो चुकी थी । बिल्वमङ्गउने बाहरसे बहुत पुकारा परन्तु तफ़ानके कारण अन्दर । कुछ भी नहीं सुनायी पड़ा । बिल्बमङ्गने इधर-उधर ताकते हुए बिजलीके प्रकाशमें दीवालपर एक रस्सा-सा लटकता देखा, तुरन्त उसने उसे पकड़ा और उसीके सहारे दीवाल फाँदकर अन्दर चले गये । चिन्ताको जगाया । वह तो इनहें ऐसे देखते ही स्तम्भित-सी रह गयी ! नंगा बदन, सारा शरीर पानीसे भीगा हुआ, भयानक दुर्गन्ध आ रही है । उसने कहा-'तुम इस भयावनी रातमें नदी पार होकर बन्द घरमें कैसे आये ? बिल्वमङ्गलने काठपर चढ़कर नदी पार होने और रस्सेकी सहायतासे दीवालपर चढ़नेकी कथा सुनायी ! वृष्टि थम चुकी थी। चिन्ता दीपक हाथमें लेकर बाहर आयी, देखती है तो दीवालपर भयानक काला नाग लटक रहा है और नदीके तीर सड़ा मुर्दा पड़ा है । बिल्वमङ्गळने भी देखा और
देखते ही कॉप उठे | चिन्ताने भर्त्सना करके कहा कि 'तू ब्राह्मण है ? अरे ! आज तेरे पिताका श्राद्ध था, परन्तु एक हाड़-मांसकी पुतलीपर त इतना आसक्त हो गया कि अपने सारे धर्म-कर्मको तिलाञ्जलि देकर इस डरावनी रातमें मुर्दे और साँपकी सहायतासे यहाँ दौड़ा आया ! तू आज जिसे परम सुन्दर समझ कर इस तरह पागल हो रहा है, उसका भी एक दिन तो वही परिणाम होनेवाला है जो तेरे आँखोंके सामने इस सड़े मुर्देका है ! धिक्कार है तेरी इस नीच वृत्तिको ! अरे, यदि तु इसी प्रकार उस मनमोहन श्यामसुन्दरपर आसक्त होता-यदि उससे मिलनेके लिये यों छटपटाकर दौड़ता तो अबतक उसको पाकर तू अवश्य ही कृतार्थ हो चुका होता !

वेश्याकी वाणीने बड़ा काम किया । बिल्वमङ्गल चुप होकर सोचने लगे । वाल्यकालकी स्मृति उसके मनमें जाग उठी । पिताजीकी भक्ति और उनकी धर्मप्राणताके दृश्य उसकी आँखोंके सामने मूर्तिमान् होकर नाचने लगे । बिल्वमङ्गउकी हृदयतन्त्री नवीन सुरोंसे बज उठी, विवेककी अग्निका प्रादुर्भाव हुआ, भगवत् प्रेमका समुद्र उमड़ा और उसकी आँखोंसे अश्रुओंकी अजस्र धारा बहने लगी । विल्वमङ्गउने चिन्तामणिक्े चरण पकड़ लिये और कहा कि 'माता ! तूने आज मुझको दिव्यदृष्टि देकर कृतार्थ कर दिया।' मन-ही-मन चिन्तामणिको गुरु मानकर प्रणाम किया और उसी क्षण जगच्चिन्तामणिकी चारु-चिन्तामें निमन् होकर उन्मत्तकी
भौँति चिन्ताके घरसे निकल पड़ा । विल्वमङ्गलके जीवन-नाटकको यवनिकाका परिवर्तन हो गया ।
श्यामसुन्दरको प्रेममयो मनोहर नूर्तिका दर्शन करनेके लिये विल्वमङ्गल पागलकी तरह जगह-जगह भटकने लगे । कई दिनोंके बाद एक दिन अकस्मात् उनको रात में एक परम रूपवती युवती दीख पड़ी, पूर्व-संस्कार अभी सर्वथा नहीं मिटे थे । युवतीका सुन्दर रूप देखते ही नेत्र चंचल हो उठे और नेत्रों के साथ ही मन भी खिंचा । श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है

यततो हापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ (२।६०)

'यत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुपके मनको भी ये प्रमथन खमाववाली इन्द्रियाँ जबरदस्ती हरण कर लेती हैं।

इसीके अनुसार विल्वमङ्गलको भी फिर मोह हुआ । भगवान्को भूलकर वह पुनः पतंग वनकर विषयाग्निकी ओर दौड़ा । बिल्वमङ्गल युवतीके पीछे-पीछे उसके मकानतक गया। युवती अपने घरके अन्दर चली गयी, बिल्वमङ्गल उदास होकर घरके दरवाजेपर बैठ गया । घरके मालिकने बाहर आकर देखा कि एक मलिनमुख अतिथि ब्राह्मण बाहर बैठा है। उसने कारण पूछा । विल्वमङ्गलने कपट छोड़कर सारी घटना सुना दी और कहा कि 'मैं एक बार फिर उस युवतीको प्राण भरकर देख लेना चाहता हूँ, तुम उसे यहाँ बुलवा दो ।' युवती उसी सेठको धर्मपत्नी थी, सेठने सोचा कि इसमें हानि ही क्या है, यदि उसके देखनेसे ही इसकी तृप्ति होती हो तो अच्छी बात है । अतिथिवत्सल सेठ अपनी पत्नीको बुलानेके लिये अन्दर गया । इधर विल्वमङ्गलके मनसमुद्रमें तरह तरहकी तरङ्गोंका तूफान उठने लगा।

जो एक बार अनन्यचित्तसे उस अशरण-शरणकी शरणमें चला जाता है उसके योगक्षेम का सारा भार वह अपने ऊपर उठा लेता है। आज विल्वमङ्गलको सँभालनेकी भी चिन्ता उसीको पड़ी । दीनवत्सल भगवान्ने अज्ञानान्ध विल्वमङ्गलको दिव्यचक्षु प्रदान किये; उसको अपनी अवस्थाका यथार्थ ज्ञान हुआ, हृदय शोकसे भर गया और न मालूम क्या सोचकर उसने पासके बेलके पेड़से दो काँटे तोड़ लिये । इतनेमें ही सेठकी धर्मपत्नी वहाँ आ पहुँची, बिल्बमङ्गजने उसे फिर देखा और मन-ही-मन, अपनेको धिक्कार देकर कहने लगा कि 'अभागी आँखें ! यदि तुम न होती
तो आज मेरा इतना पतन क्यों होता!' इतना कहकर विच मङ्गटने, चाहे यह उसकी कमजोरी हो या और कुछ, उस समय उन चञ्चल नेत्रोंको दण्ड देना ही उचित समझा और तत्काल उन दोनों काँटोंको दोनों आँखोंमें भोंक लिया! ऑम्बास रुषिरकी अजन धारा बहने लगी ! बिल्वमङ्गल हॅनता और नाचता हुआ तुमुल हरिष्वनिसे आकाशको गुँजाने गा । सेठको और उनकी पत्नीको बड़ा दुःख हुआ, परन्तु थे बेचारे निरुपाय थे । विल्वनङ्गलका बचा-खुचा चित्तमल भी आज सारा नष्ट होगया और अब तो वे उस अनाथ के नाथको अति शीघ्र पानेके लिये बड़ा ही व्याकुल हो उठे, उनके जीवन-नाटकका यह तीसरा पट-परिवर्तन हुआ!
परम प्रियतम श्रीकृष्णके वियोगकी दारुण व्ययासे उनकी ফूटी आँखोंने चौबीसों घण्टे आँसुओंकी झड़ी लगा दी । न भूखका पता है न प्यासका, न सोनेका ज्ञान है और न जागनेका ! 'कृष्ण-कृष्ण की पुकारते दिशाओंको गुँजाता हुए विल्वमङ्गल जङ्गल-जङ्गल और गाँव-गाँवमें घूमने लगते हैं ! जिस दीनबन्धुके लिये जान-बूझकर आँखें फोड़ी, जिस प्रियतमको पानेके लिये ऐश आराम पर लात मारी, वह मिलने में इतना विलम्ब करे, यह भला किसीसे कैसे सहन हो ? यदि आजकलका-मेरे जैसा कोई होता तो वह भगवान्को कोसते-कोसते ही पिण्ड न छोड़ता,भक्तिका त्याग तो कभीका कर चुका होता ! परन्तु उन्हौनें दोषारोपण कदापि नहीं किया, उनको अपने प्रेमास्पदमें कभी कोई दोष दीखा ही नहीं मेघ जल न बरसाकर पत्थरोंकी वर्षासे चातककी एक-एक पाँखको तोड़ डाले तो भी क्या चातक उसपर नाराज होता है ? .
जहाँ निर्मल प्रेमका अगाध समुद्र है वहाँ तो एक प्रेमके अतिरिक्त और किसीका अस्तित्व ही नहीं रहता ! ऐसे प्रेमीके लिये प्रेमास्पदको भी कभी चैन नहीं पड़ती। उसे दौड़कर आना ही पड़ता है । आज अन्ध बिल्वमङ्गल कृष्ण प्रेममें मतवाला होकर जहाँ-तहाँ भटक रह् है । कहीं गिर पड़ता है, कहीं टकरा जाता है, अन्न-जलका तो कोई ठिकाना ही नहीं । ऐसी दशामें प्रेममय श्रीकृष्ण कैसे निश्चिन्त रह सकते हैं! एक छोटे-से गोप-बालकके वेशमें भगवान् विल्वमङ्गलके पास आकर अपनी मुनि-मन-मोहिनी मधुर वाणीसे बोले, 'सूरदासजी ! आपको बड़ी भूख लगी होगी, मैं कुछ मिठाई लाया हूँ, जल भी लाया हूँ, आप इसे ग्रहण कीजिये । बिल्वमङ्गल के प्राण तो बालक उस मधुर स्वरसे ही मोहे जा चुके थे, उसके हाथका दुर्लभ प्रसाद पाकर तो उनका हृदय हर्ष के हिलोरोंसे उछल उठा ! बिल्वमंगल ने बालक से कहा 'भैया ! तुम्हारा घर कहाँ है ? तुम्हारा नाम क्या है ? तुम क्या किया करते हो ?

वालकने कहा, 'मेरा घर पास ही है, मेरा कोई खास नाम नहीं, जो मुझे जिस नामसे पुकारता है, मैं उसीसे बोलता हूँ, गौएँ चराया करता हूँ, मुझसे जो प्रेम करते हैं मैं भी उनसे प्रेम करता हूँ ।' विल्वमङ्गल बालक की वीणा-विनिन्दित वाणी सुन कर विमुग्ध हो गये । बालक जाते-जाते कह गया कि 'मैं रोज आकर आपको भोजन करवा जाया करूँगा ।' बिल्वमङ्गलने कहा, 'बड़ी अच्छी बात है तुम रोज आया करो । बालक चला गया और बिल्वमङ्गलका मन भी साथ लेता गया । 'मनचोर' तो उसका नाम ही ठहरा ! अनेक प्रकारकी सामग्रियोंसे भोग लगाकर भी लोग जिनकी कृपाके लिये तरसा करते हैं वही कृपासिन्धु आज विल्वमङ्गलको अपने करकमलोंसे भोजन करवाने आते हैं ? धन्य है ! भक्तके लिये भगवान् क्या-क्या नहीं करते ?

बिल्वमङ्गल अबतक यह तो नहीं समझे कि मैंने जिसके लिये मैनें फकीरीका बाना लिया और आँखोंमें काँटे चुभाये, वह बालक वही कृष्ण हैं, परन्तु उस गोप-बालकने उनके हृदयपर इतना अधिकार अवश्य जमा लिया कि उनको दूसरी बातका सुनना भी असह हो उठा । एक दिन बिल्वमङ्गल मन-ही- मन विचार करने लगे कि 'सारी आफतें छोड़कर यहांतक आया, यहाँ यह नयी आफत आ गयी। संसार के मोहसे छूटा तो इस बालकने मोहमें घेर लिया' यों सोच ही रहे था कि वह रसिक बालक उनके पास आ बैठा और अपनी दीवानी बना देनेवाली वाणीसे बोला, 'वाबाजी ! चुपचाप क्या सोचते हो ! वृन्दावन चलोगे ! वृन्दावनका नाम सुनते ही विल्वमङ्गलका हृदय हरा हो गया परन्तु अपनी असमर्थता प्रकट करते हुआ बोले कि 'भैया, मैं अन्धा वृन्दावन कैसे जाऊँ ? बालकने कहा, 'यह लो मेरी लाठी, मैं इसे पकड़े-पकड़े तुम्हारे साथ चलता हूँ बिल्वमङ्गलका मुखड़ा खिल उठा, लाठी पकड़कर भगवान् भक्तके आगे-आगे चलने लगे । धन्य दयालुता ! भक्तकी लाठी पकड़कर मार्ग दिखाते हैं । थोड़ी-सी दूर जाकर बालकने कहा, 'लो ! वृन्दावन आ गया, अब मैं जाता हूँ।' बिल्वमङ्गलने बालक का हाथ पकड़ लिया, हाथका स्पर्श होते ही सारे शरीरमें बिजली-सी दौड़ गयी, सात्त्विक प्रकाशसे सारे द्वार प्रकाशित हो उठे, बिल्वमङ्गलने दिव्य दृष्टि पायी और उन्होंनें देखा कि बालकके रूपमें साक्षात् मेरे श्यामसुन्दर ही हैं । विल्वमङ्गलका शरीर रोमाञ्चित हो गया,आँखोंसे प्रेमाश्रुओंकी अनवरत धारा बहने लगी, भगवान्का हाथ उसने और भी जोरसे पकड़ लिया और कहा कि अब पहचान लिया है, बहुत दिनों के बाद पकड़ सका हूँ प्रभु ! अब नहीं छोड़नेका! भगवान नें कहा, 'छोड़ते हो कि नहीं ? बिल्वमङ्ने कहा, 'नहीं कभी नहीं, त्रिकालमें भी नहीं ।
भगवान्ने जोरसे झटका देकर हाथ छुड़ा लिया |। भला, जिसके बलसे बलान्विता होकर मायाने सारे जगत्को पदपलित कर रक्खा है उसके बलके सामने बेचारा अन्धा क्या कर सकता था? परन्तु उसने एक ऐसी रज्जुसे उनको बाँध लिया था कि जिससे छूटकर जाना उनके लिये बड़ी टेढ़ी खीर थी ! हाथ छुड़ाते ही बिल्वमङ्गलने कहा-जाते हो ? पर स्मरण रक्खो !

हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि यलात्कृष्ण किमद्भुतम् । हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते ॥
हाथ छुड़ाये जात हो, निबल जानिकै मोहि । हिरदयतें जब जाहुगे, मर्द बदौंगो तोहि ॥
आप मुझे निर्बल जानकर मुझसे बलपूर्वक हाथ छुड़ाकर तो जाते हो परंतु मेरे से जाकर दिखाओ मैं तभी आपको बलवान समझूंगा
भगवान् नहीं जा सके ! जाते भी कैसे ? प्रतिज्ञा कर

चुके हैं
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। '
जो मुझको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ। भगवान नें बिल्वमङ्गल की आँखोंपर अपना कोमल करकमल फिराया, उनकी आँखें खुल गयीं! नेत्रोंसे प्रत्यक्ष भगवान्को देखकर उनकी भुवनमोहिनी अनूप रूपराशिके दर्शन पाकर विल्वमङ्गल अपने आपको सँभाल नहीं सके । वह चरणोंमें गिर पड़े और प्रेमाश्रुओंसे प्रभु के पावन चरण कमलोंको धोने लगे!

भगवान्ने उठाकर उनको अपनी छातीसे लगा जिया । भक्त और भगवान के मधुर मिलनसे समस्त जगत में मधुरता छा गयी । देवता पुष्पवृष्टि करने लगे । सन्त-भक्तोंके दल नाचने लगे। हरिनामकी पवित्र ध्वनिसे आकाश परिपूर्ण हो गया । भक्त और भगवान् दोनों धन्य हुए । वेश्या चिन्तामणि, सेठ और उनकी पत्नी भी वहाँ आ गयीं, भक्तके प्रभावसे भगवान्ने उन सबको अपना दिव्य-दर्शन देकर कृतार्थ किया ।

विल्वमङ्गल जीवनभर भक्तिका प्रचारकर भगवान की महिमां बढाते रहे और अन्तमें गोलोकधामें पधारे !

साभार ब्रज के भक्तस्वामी श्रीस्वामिनीशरणजी(मोरकुटी, बरसाना)जिस समय स्वामी भगवानदासजी टटिया-स्थान में भजन करते थे, उसी सम...
08/10/2020

साभार ब्रज के भक्त
स्वामी श्रीस्वामिनीशरणजी
(मोरकुटी, बरसाना)

जिस समय स्वामी भगवानदासजी टटिया-स्थान में भजन करते थे, उसी समय बरसाने में श्रीजी के मन्दिर के निकट पहाड़ी की चोटी पर ‘मोरकुटी’ नाम की एक छोटी-सी कुटिया में श्रीकृष्णदासजी के शिष्य और टटिया-स्थान के महन्त श्रीराधाप्रसादजी के प्रशिष्य श्रीस्वामिनीशरणजी भजन करते थे। यह कल्पना करना मुश्किल है कि इस निर्जन कुटी में, जिसके निकट जल की कोई व्यवस्था नहीं है, और जो पक्की ईंटों की बनी होने के कारण और चारों ओर पथरीली पहाड़ी से घिरी होने के कारण गर्मी में भट्टी की तरह तपती है, कोई रह सकता है। पर इस कुटी के पीछे इस स्थान पर घटी श्यामा-श्याम की एक मधुर लीला की स्मृति है, जिसके कारण इसका नाम ‘मोरकुटी’ पड़ा है सम्भवतः वह मधुर स्मृति ही स्वामिनीशरणजी के मन और प्राण को शीतल कर उन्हें कुटी की तपन को सहन करने के योग्य बनाती रही होगी।
लीला इस प्रकार है। श्यामाजी ने एक मोर पाला। उसे नृत्य की शिक्षा दी। एक दिन वे श्याम से बोलीं– ‘प्यारे, एक बात कहूँ, करोगे ?
नहीं करने का प्रश्न ही कहाँ प्यारी’ प्यारे ने उत्तर दिया।
‘तो तुम मेरे मोर के साथ नृत्य करो, देखें कौन अधिक अच्छा नृत्य करता है।
‘अच्छा, तो बताओ हमारे दोनों के बीच मध्यस्थ कौन होगा ?’
‘मध्यस्थ ललिता होगी।’
‘तू निष्पक्ष रहेगी ? श्याम ने ललिता की ओर मुड़कर उससे पूछा।
‘हाँ प्यारे, बिलकुल निष्पक्ष’, ललिता ने उत्तर दिया।
‘तो ठीक है, मैं तैयार हूँ’ श्यामने अपनी फेंट कसते हुए कहा।
श्यामाजी ने मोर पर अपना हस्त-कमल रखा। हस्त-कमल का स्पर्श पाते ही वह नाचने लगा। श्याम ने भी नाचना शूरू किया। कोकिल ने अलापना और पपीहे ने सुर मिलाना शुरू किया। मेघ गरजकर मृदंग बजाने लगा। दामिनी दमक-दमककर रजनीमें दीप दिखाने लगी। तभी श्यामा ने नृत्य से रीझ श्याम को हँसते-हँसते कण्ठ से लगा लिया-
नाचत मोर संग श्याम, मुदित श्यामाहि रिझावत।
तैसिय कोकिल अलापत, पपहिया देत सुर।
तैसोंइ भेघ गरज मृदंग बजावत।
तैसिय श्याम घटा निशि-सी कारी।
तैसिहं दामिनी कौंधे दीप दिखावत।
श्रीहरिदासके स्वामी श्यामा रीझ श्याम हँसि कण्ठ लगावत॥
श्याम ने ललिता से कहा, ‘बता सखी, किसका नृत्य अच्छा ?
ललिता ने कहा-प्यारे, तुम्हारा भी अच्छा, मोर का भी अच्छा। पर मोर ने एक फिरकैयां तुमसे अधिक दी।’
इस प्रकार श्याम की हार हो गयी। उनका मुख कुछ उदास हो गया। पर जब श्यामा ने उन्हें कण्ठ से लगाया तो वह खिल गया।
श्यामा-श्याम की इस लीला का स्मरणकर स्वामिनीशरणजी हर समय श्यामा-श्याम, श्यामा-श्याम, श्यामा-श्याम’ रटते हुए इस कुटी में करते। वे हर समय आवेश में रहते। खाने-पीने की भी सुध उन्हें मुश्किल से रहती। जिह्वा के स्वाद की तो वे परवाह ही न करते। भिक्षा में जो मिल जाता एक साथ मिलाकर पका लेते। जिह्वा बस ‘श्यामा-श्याम’ नाम के रस का आस्वादन कर छकी रहती। जीवन के अन्तिम १३ वर्ष उन्होंने अन्न बिना ही बिताये। उन दिनों वे केवल छाछ और फल पर रहते। फिर भी उनमें इतना बल था कि अपने कन्धे पर रखे एक बांस के दोनों सिरों पर दो पानी से भरे बड़े मटके लटकाये पहाड़ी पर स्वछन्द इस प्रकार चढ़़े चले जाते, जैसे उनके ऊपर कोई भार ही न हो। एक बार उन्हें एक जहरीले साँपने काट लिया। पर उनपर उसका कोई असर न हुआ।

अपनी कुटिया में वे कुछ चना-चबैना, गुड़ और मूँगफली अवश्य रखते, जिससे अभ्यागतों की सेवा करते। एक बार उनकी कुटिया में चोर आये। बाबाने उनसे कहा- भैया, मेरे पास चना-चबैना छोड़ और है ही क्या ! फिर जो है सो तुम्हारा ही है। तुम जो चाहो सो ले जाओ। इसमें संकोच की है क्या बात है ?
चोर गुड़, मूँगफली और चने की हड़िया तो खालीकर ही गये, उनका लोटा, बालटी और कम्बल आदि, जो भी दीखा सब ले गये। दूसरे दिन उन चोरों के घर भी चोरी हो गयी। तब उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने बाबा के पास जाकर दण्डवत् की और उनसे क्षमा माँगी। बाबा ने कहा, ‘क्षमा किस बात की भाई ? वह सब तो मैंने ही तुम्हें दिया था। तुम जबरदस्ती थोड़े ही ले गये थे। अब उसे चोर ले गये तो ले जाने दो। चिन्ता क्या है ? श्रीजी बड़ी कृपालु हैं, और देंगी।
पण्डित रामकृष्णदास बाबा स्वामिनीशरणजी जी के गुणों से मुग्ध थे। कभी-कभी स्वामिनीशरणजी वृन्दावन जाकर पण्डित बाबा के निवास से दाऊजी की बगीची के निकट ‘बाराद्वारी’ नाम के निर्जन स्थान में रहते थे। उस समय दोनों का एक-दूसरे के स्थान पर जाकर मिलना-बैठना और इष्ट-गोष्ठी होता था।
एक बार कलकत्ते के एक सेठ पण्डित बाबा के दर्शन को गये और बहुत-से फल-फूल उन्हें अर्पण किये। वे मधुकरी छोड़कर और कोई वस्तु, विशेष रूप से व्रज के बाहर के किसी व्यक्ति की वस्तु, ग्रहण नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने वह भेंट अस्वीकार कर दी। तब सेठ स्वामिनीशरणजी के पास गये और उन्हें वही फल भेंट किये। उन्होंने उन्हें ग्रहण कर प्रेम से ठाकुर का भोग लगाया। दैवयोग से थोड़ी देर बाद पण्डित बाबा वहाँ पहुँच गये। पण्डित बाबा को उन्होंने प्रसाद रूप में उसी में से कुछ फल देते हुए कहा- यह आज कलकत्ते के एक सेठ लाये थे।
बाबा ने उन्हें स्वीकार कर लिया। किसी ने उनसे कहा – यही फल तो आपने पहले लौटा दिये थे।
बाबा ने कहा-मैंने सेठ के फल लौटाये थे। पर यह तो एक सन्त का प्रसाद है, जो मैंने ग्रहण किया है।’
यह प्रसिद्ध है कि स्वामिनीशरण बाबा को मोरकुटी पर ललिताजी के दर्शन हुए थे। उनकी कुटिया में उन्हें दर्शन देते हुए ललिताजी का एक चित्र भी रहा करता था।
टटिया-स्थान के मुखिया श्रीनवेलीशरणजी, श्रीअमोलकराम शास्त्री,
श्रीलक्ष्मीदासजी मौनी और श्रीव्रजवासिनदासजी जैसे महात्मा उनके शिष्य थे।
ऊँच-नीच, भले-बुरे सब में अपने इष्ट का अधिष्ठान जान श्रीस्वामिनीशरणजी सबसे एक-सा प्रेम करते थे। निन्दा किसी की नहीं सुनते थे। पण्डित रामकृष्णदास बाबा को जब उनके निकुञ्ज पधारने का संवाद मिला, तो उन्होंने कहा – ‘जगत् से समता का जहाज उठ गया।
जय श्री राधे कृष्णा

लेखक के प्रति आभार सहित प्रेषितसुंदर कथा १०९ (श्री भक्तमाल – श्री रघुनाथ शरण जी) Sri Bhaktamal – Sri Raghunath sharan ji...
06/05/2020

लेखक के प्रति आभार सहित प्रेषितसुंदर कथा १०९ (श्री भक्तमाल – श्री रघुनाथ शरण जी) Sri Bhaktamal – Sri Raghunath sharan ji
आज स्मृति मे एक अद्भुत संत की लीला आयी-
हमारे नामजपक संत की वह लीला सुनता हूं । श्री रघुनाथ शरण बाबा एक बार संत मंडली के साथ कथा के निमित्त मुंबई आये थे । विचरण करते एक हॉस्पिटल (नाम नही लिखूंगा) सामने कोई संतप्रेमी मिला तो भगवान नाम महत्व पर उससे बात कर रहे थे । हाल ही मे नया नया हॉस्पिटल बनाया था और अच्छा चलने भी लगा था ।
इतने में वहां का मालिक बडा डॉक्टर निकला और चिल्लाया – ए यहां क्या बात कर रहे हो, क्यो आये हो यहां, कामधाम होता नही बाबाजी लोगो को दिनभर राम राम करते डोलते है , राम राम करने से सब हो जाता है क्या ?
संत जी ने उसको प्रेम से राम नाम का महात्म्य बताया पर वह घमंड दिखाने लगा । संत ने कहा- डॉक्टर साहब, राम नाम की शक्ति देखनी है तो ठीक है । हाथ मे जल लिया और कहां सीताराम -जल छोड़ दिया । डॉक्टर से बोले अब कुछ दिन छुट्टी ले लो, कुछ दिन यहां कोई इलाज कराने नही आएगा -ऐसा बोलकर चले गए । डॉक्टर को कुछ समझ मे आया नही और वो घर चला गया ।
कुछ देर मे उसके हॉस्पिटल के बाबू (सेवक) ने घर जाकर विस्मित होकर बताया कि साहब आज पता नही क्या हो गया , सारे मरीज एकदम स्वस्थ हो गए -बड़े बड़े गंभीर बीमारी में पड़े मरीज भी अचानक उठ खड़े हुए और जांच करने पर शरीर पूरा अच्छा रोगमुक्त मिला । कई दिनों से बेहोश पड़े लोग भी पता नही कैसे उठ खड़े हुए । कुछ दिन तक वहां जो आता, वह आते ही स्वस्थ हो जाता और उसकी जांच कराने पर कुछ नही मिलता । अंत मे वो डॉक्टर समझ गया की मै तो संतो को दरिद्री-भिक्षुक- बेकार सनाझता था पर मै तो मूर्ख और अपराधी हूं, उसने भगवान से क्षमा मांगी । कुछ दिन बाद बाबा अपने आश्रम वापस जाने को थे उस दिन हॉस्पिटल गए, डॉक्टर अपने कक्ष के बाहर परेशान हुए बैठा था।
बाबा सरकार को देखते ही चरण पकड़ लिया। बाबा बोले एक राम नाम मे कितनी शक्ति है यह तुम देख चुके, अब भजन खूब करो – संत कभी चमत्कार नही दिखाते पर कुछ लोगो को मार्ग पर लाने के लिए ठाकुर जी लीला करते है । नाम का महात्म्य जानकर वह सब छोड़कर कही भजन करने निकल गया और पुनः नही आया ।

सुंदर कथा १०७ (श्री भक्तमाल – श्री टीला जी ) Sri Bhaktamal – Sri Teela ji (  साभार कॉपी पेस्ट )बाबा श्री गणेशदास जी के श...
12/04/2020

सुंदर कथा १०७ (श्री भक्तमाल – श्री टीला जी ) Sri Bhaktamal – Sri Teela ji ( साभार कॉपी पेस्ट )
बाबा श्री गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी ने दास को जैसा सुनाया वैसा लिख रहा हूं :

नाभादास जी वर्णन करते है – संसार में भरतखंड रुपी सुमेरुपर्वत के शिखर से समान श्री टीलाजी एवं उनके विरक्त शिष्य श्री लाहा जी की परंपरा बहुत प्रसिद्ध हुई ।ब्रह्माण्ड में सबसे ऊँचा पर्वत सुमेरु पर्वत कहा जाता है । पर्वतो का राजा सुमेरु जम्बुद्वीप के मध्य में इलावृत देश में स्थित है ।यह पूरा पर्वत स्वर्णमयी है । इसके शिखर पर २१ स्वर्ग है जहां देवता विराजते है । सभी देवताओ के लोक और ब्रह्मा जी का लोक भी सुमेरु पर्वत पर स्थित है । जैसे सभी देशो में भारत और सभी पर्वतो में सुमेरु ऊँचा है उसी प्रकार श्री कृष्णदास पयहारी जी के शिष्य टीला जी के भजन की पद्धति सुमेरु के सामान है अर्थात सर्वोपरि पद्धति है । यह भजन की पद्धति कौनसी है ? वह है संतो और गौ माता की सेवा।

जन्म और बाल्यकाल :

श्रीटीला जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल १०, सं १५१५ वि.को राजस्थान के किशनगढ़ राज्यान्तर्गत सलेमाबाद मे हुआ था । कुछ संतो का मत है की जन्म खाटू खण्डेला के पास कालूड़ा गाँव में हुआ था । इनकेे पिता श्री हरिराम जी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ पण्डित और माता श्रीमती शीलादेवी साधु-सन्त सेवी सद्गृहिणी थी । पिता परम प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध जोशी गोत्रीय ब्राह्मण थे । इनके माता-पिता को बहुत समयतक कोई संतान नहीं थी, बादमे आबूराज निवासी एक सिद्ध संत के आशीर्वाद से इनका जन्म हुआ था । सन्तकृपा, तीर्थक्षेत्र का प्रभाव, पूर्वजन्म के संस्कारो और और माता – पिता की भक्ति के सम्मिलित प्रभाव से बालक टीलाजी मे बचपन से ही भक्ति के दिव्य संस्कार उत्पन्न हो गये थे, जो आयु और शस्त्रानुशीलन के साथ-साथ बढते ही रहे ।

श्री गायत्री महामंत्र जप के प्रभाव सेे टीला जी को श्री गायत्री और सरस्वती जी का साक्षात् दर्शन हुआ । ४ वेद ६ शास्त्र १८ पुराण उनके अंतःकरण में प्रकट हो गए । बचपन मे ही यह बालक किसी ऊँचे टीलेपर (ऊँची जगह अथवा रेत के पहाड़ के ऊपर )चढकर बैठ जाता और किसी सिद्ध सन्त की भाँति समाधिस्थ हो जाता, इस प्रवृत्ति को देखकर ही लोगो ने इनका नाम टीलाजी रख दिया ।

बालक टीला को भगवान के दर्शन :

एक बार की बात है, टीला जी के पिताजी ने उनको बालक ध्रुव की कथा सुनायी; फिर क्या था, बालक टीलाने भी तपस्या करके भगवान् के दर्शन करने का दृढ निश्चय का लिया । बालक टीला की भक्ति और दृढता देखका माता-पिता ने भी तपस्याकी अनुमति दे दी । टीला जी को तपके लिये उद्यत देखकर श्रीहनुमान जी ने मथुरा स्थित श्री ध्रुवटीला पर तपस्या करने का सुझाव दिया । उस सिद्ध स्थानपर बालक टीला तपस्या करने लगा । कई प्रकार की प्रतिकूलताएँ व प्रलोभन आये पर बालक ने तपस्या करना नहीं छोड़ा ।उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने दर्शन दिये और वरदान माँगने को कहा ।

टीला ने कहा – हे नाथ ! आपका दर्शन करके मैं धन्य हो गया परंतु अभी तक मेरा मनरूपी अश्व मेरे वश में नहीं हुआ है । मैंने बहुत साधनाएं की किन्तु मन अभी भी मुझे बहुत भटकाता है । तपस्या करने पर मन की इच्छाएं समाप्त होती है परंतु फिर भी मुझे ऐसा लगता है की जीवन में अभी भी कुछ पाना शेष रह गया है ।
भगवान ने कहा – टीला ! यह तो तबी संभव है जब तुम किसी भजनानंदि सद्गुरु कें चरणों का आश्रय ग्रहण करो ।तुम्हारे जीवन में उन्ही की कमी है जो तुम महसूस करते हो । टीला जी ने कहा -तो मुझे सद्गुरु की प्राप्ति हो ,ऐसा ही वरदान दीजिये । भगवान् ने कहा – एवमस्तु ! ऐसा ही होगा । सद्गुरु स्वयं तुम्हारे पास आकर कृपा करेंगे ।

संत श्री टीलाचार्य जी
श्री कृष्णदास पयहारी जी के दर्शन :

श्री टीला जी महान् गो भक्त थे, एक बार वे गोचारण करते हुए वन मे ही भजन कर रहे थे । इसी बीच एक तेजयुक्त महान सिद्ध सन्त पधारे और बोले कि मुझे दूध की भिक्षा कराओ । ये महात्मा और कोई नहीं अपितु गलता (जयपुर ) पीठ के महान् संत श्री कृष्णदास पयहारी जी ही थे। श्री पयहारी जी ने आजीवन गौ दुग्ध ही पाया , अन्न ग्रहण नहीं करते थे ।टीला जी ने श्री सन्त जी को भगवान के तुल्य मानकर साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया और कहा -हे श्री संत महाराज ! आप कृपा करके थोडी देर इस स्थानपर ही विराजें, मैं अभी दूध लेकर आता हूँ । सन्त ने कहा – कही लेने मत जाओ, यह सामने जो गौमाता खड़ी है ,उसी गाय को दुहकर ले आओ । हमें इसी गौ माता का दूध पाने की इच्छा है । श्री टीला जी ने कहा भगवन् ! यह गाय देखने में बड़ी हष्ट -पुष्ट है परंतु यह गाय तो बांझ है ।आजतक इसने कोई बछड़ा बछिया दिया ही नहीं : यह गौ दूध ही नही देती । संत ने कहा – तुम गौ माता को प्रार्थना करके हमारे पास लाओ तो सही ।

संत ने टीला जी के हाथ में कमंडल दे दिया और गौ माता की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा – माताजी ! बड़ी भूख लगी है । कृपा करके दूध पिलाओ । तब श्री टीला जी ने देखा तो गौ माता के स्तन दुग्धयुक्त दिखायी पड़े । चारो थानो से दूर की धार सहज ही बहने लगी । टीला जी ने आश्चर्यचकित होकर दूध दुहकर सन्त जी को दिया । सन्त ने दुग्धपान किया और शेष थोडा सा प्रसाद टीला जी को भी उन्होने दिया । उसे पीते ही टीलाजी को सब सिद्धियां प्राप्त हो गयीं । श्रीटीलाजी तो विभोर हो गये और सन्त भगवान् अन्तर्धान हो गये । वस्तुत: इस रूप से श्री पयहारी जी ने ही टीला जी पर कृपा की थी परंतु उस समय टीला जी श्री कृष्णदास पयहारी जी से परिचित नहीं थे । इसके बाद टीला जी ध्रुवटीला ,मथुरा में आकर भजन में लग गए। कालान्तर में पयहारी जी ने सन्तो की प्रेरणा से स्वयं टीला जी के पास आकर इन्हे दीक्षा भी दी । वह प्रकरण इस प्रकार है :

श्री कृष्णदास पयहारी जी का टीला जी को शिष्य बनाना :

टीला जी की प्रसिद्धि धीरे धीरे बढ़ने लगी ।बहुत से साधू संत आकर इनके दर्शन करते । महात्मा लोग इनसे कहते की – टीला जी , आप गायत्री ,जप, भजन ,साधन , शास्त्र अध्ययन करके सिद्ध तो हो गए परंतु किसी समर्थ सद्गुरु के चरणों में शरणागति जब तक नहीं होगी तब तक भक्ति और ज्ञान परिपूर्ण कदापि नहीं हो सकता । टीला जी उन संतो से कहते की – हमको शिष्य बनाने लायाक गुरुजी मिले तभी तो हम शरणागति ग्रहण कर सकेंगे । कुछ महात्मा टीला जी से कहते – हम बनाएंगे तुम्हे अपना शिष्य और जैसे ही वह तुलसी का हीरा पहनाने और गोपीचंदन लगाने को हाथ बढाते , उसी क्षण टीला जी जिस टीले पर बैठकर भजन करते, वह आकाश की ओर ऊपर बढ़ने लगता । इस प्रकार से कोई संत उन्हें दीक्षा प्रदान ही नहीं कर सकते थे । गुरूजी रह जाते थे निचे और टीला चला जाता था ऊपर । इस दृष्य को देखने बहुत से महात्मा पधारते थे ।

एक दिन संतो की टोली विचरण करती हुई, गलता गादी (जयपुर ) पहुंची । वहाँ सिद्ध महात्मा श्री कृष्णदास पयहारी जी महाराज विराजते थे । संतो ने पयहारी जी से कहा – महाराज ! एक नया नया ब्रह्मचारी योगी है ,बहुत बड़ा तपस्वी है ,सारी सिद्धियां उसे प्राप्त है । ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुआ है , भजन तो बहुत करता है परंतु इस भारतवर्ष में कोई महात्मा ही नहीं है जो इसे अपना शिष्य बनाये । आप कृपा करके उसे अपना शिष्य बनाएं , साधुओं की बड़ी नाक कट रही है । साधुओं के वेष की लज्जा बचाने के लिए आप कृपा करके उसको शिष्य बनाएं । श्री कृष्णदास पयहारी जी बोले – जो साधुओं का ऐसा अपमान करता है उसे हम शिष्य कैसे बनाएं, हमें कोई शिष्य बनाने की लालसा थोडे है ।

तब संतो ने पयहारी जी से कहा – महाराज अपमान नहीं ,उस बालक का भी विचार ठीक है । शिष्य से अधिक गुरु का सामर्थ्यवान होना आवश्यक है , तभी तो शिष्य अपने को गुरु के चरणों में समर्पण करेगा और तभी तो शिष्य गुरु के चरणों में श्रद्धा रख पायेगा । वह बालक इतने सिद्ध कोटि का हो गया है ,तब वह किसके चरणों में अपना सर झुकाये ? एक आप ही ऐसे सामर्थ्यवान महापुरुष है जो उसे अपना शिष्य बना सकते है । उसे उचित मार्गदर्शन मिलने पर वह स्वयं का भी कल्याण करेगा और समाज का भी कल्याण करेगा । श्री कृष्णदास पयहारी ने संतो की प्रार्थना स्वीकार की और संतो सहित टीला जी के पास पधारे । संतो ने टीला जी से कहा की यह महात्मा आये है तुम्हे अपना शिष्य बनाने ।

टीला जी ने देखकर पहचान लिया की ये तो वही महापुरुष है जिनके हाथ फेरते ही हमारी बाँझ गाय दूध देने लगी थी और इन्ही संत की सीथ प्रसादी ( जूठन प्रसादी ) से हमें समस्त सिद्धियां प्राप्त हुई थी । टीला जी ने चरणों में प्रणाम् किया ।श्री कृष्णदास पयहारी जी में कहा – बेटा ! शिष्य बनोगे , श्रीराम मंत्र की दीक्षा और कंठी लोगे ? टीला जी बोला – हाँ ! हमें कोई शिष्य बनाने वाला सामर्थ्यवान गुरु मिले तो शिष्य अवश्य बनूँगा । श्री पयहारी जी बोले – अब हम आ गए है , सावधान हो जाओ ।जैसे ही पयहारी जी ने आचमन करके चन्दन हथेली पर घिसना प्रारम्भ किया , टीला बढ़ना शुरू हो गया । टीला जितना बढ़ता था , उससे ऊँचे हो जाते थे पयहारी जी महाराज। बहुत ऊंचाई पर जाकर पयहारी जी ने तिलक लगाया । फिर जब तुलसी की कंठी पहनाने गए तब कंठ बहुत चौड़ा होता गया ।

अंत में पयहारी जी ने कहा – ठहर जा ! ठहर जा ! ऐसा कहते ही सिद्धि ठहर गयी । टीला जी ने अपना पूरा समर्पण पयहारी जी के चरणों में कर दिया । श्री कृष्णदास पयहारी जी महाराज ने उन्हें उपासना का रहस्य समझाया और श्रीराम मन्त्र राज की दीक्षा देकर उनका नाम श्री साकेतनिवासाचार्य रख दिया । श्री सकेतनिवासाचार्य जी ने बहुत दिनोतक गलतागादी (जयपुर) मे रहते हुए श्री पयहारी जी महाराज की सेवा की, फिर उनकी आज्ञा लेकर भारत के सम्पूर्ण तीर्थो का परिभ्रमण एवं भगवद्भक्ति का प्रचार किया ।

राजस्थान के प्रयागपुरा नामक ग्राम के पास टीला जी की भजन स्थली है । कोसो दूर तक रेतीला क्षेत्र है और पानी की कमी है। कही कही बस खेजड़ी के पेड़ है । एक ऊँचे रेत के टीले पर एक अत्यंत विशाल पीलू का वृक्ष है । यही पर एक गुफा है जहां टीला जी (साकेत निवासाचार्य) आसान लगाकर भजन किया करते थे। उन्होंने अंतर्ध्यान होने से पहले कहा था – जब तक यह पीलू का वृक्ष हरा भरा रहेगा तब तक समझना की हम यही विराजमान होकर भजन कर रहे है । जब यह वृक्ष सुख जायेगा तब समझना की साकेतनिवासाचार्य (टीला ) जी साकेत( श्री राम का धाम) पधार गए । आज भी टीला जी और उनके गुरुदेव श्री पयहारी जी सह शरीर विराजमान है । अधिकारी पुरुषों को आज भी उनका दर्शन होता है ।

श्री टीला जी की गृहस्थ एवं विरक्त दोनों परम्पराएं प्राप्त होती है , दोनो में महान् सिद्ध सन्त हुए है । इनके पुत्र श्री परमानन्द दास जी का जन्म भी वहीं हुआ । उनके एक पुत्री भी थी, जिसका नाम लाडाबाई था । उसके पतिदेव श्री खेमजी भी महान् भक्त थे । दोनों ही सिद्ध भक्त थे, दम्पतीने चक्रतीर्थ गाँव में रहकर भजन एवंं भक्ति-प्रचार किया । श्रीटीला जी की भक्ति के अतुल प्रभाव से उनके पुत्र श्री परमानन्द दास जी एवं उनके चार पुत्र १. श्री जोगी दास, २ श्री रिदास ३ श्री ध्यानदास ४ श्री केशवदास जी हुए । ये सब बड़े सन्तसेवी एवं भगवाप्रेमी हुए ।

मनोहरपुरा के राव लूणकरण जी ने श्री टीलाजी की भक्ति एवं सन्त-सेवा से प्रभावित होकर वि सं १६०२ में इन्हें ४०० बीघा भूमि भेट की । श्री टीला जी के पौत्र श्री केशवदास जी का जन्म यहीं खोरी मे हुआ था क्योंकि इनके पिता परमानन्द दास जी यहीं आ गये थे । खोरी गाँव जयपुर राज्य में शाहपुरा के पास है । यहीपर श्री परमानंद दास जी की छतरी है । भावुक भक्त वहाँ पहुंचकर दर्शन-प्रणाम करके अपने को कृतकृत्य मानते है । परमानन्द दास जी के पुत्रो में एक श्री जोगीदास जी भी बड़े सिद्ध महात्मा हुए, खेलणा ग्राम मे इन्होंने एक मन्दिर बनाया । इनके जीवन में कई चमत्कार हुए ,इनके चमत्कारो से प्रभावित होकर बादशाह ने हन्हें जागीर दी ।

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