Hanuman Mandir, Sector 2A.

Hanuman Mandir, Sector 2A. Hanuman mandir alongwith Durga Mandir was estiblished in the year of 1988 at sector 2A, Bokaro steel city.

चैत्र नवरात्र २०२६ का भक्तिमय आरंभ,🌸🌸 जय माता दी 🌸🌸
19/03/2026

चैत्र नवरात्र २०२६ का भक्तिमय आरंभ,
🌸🌸 जय माता दी 🌸🌸

मकर संक्रांति पर्व का महत्व* डॉ. श्रीकृष्ण "जुगनू"मकर संक्रांति का भारतीय जन जीवन में जितना महत्‍वपूर्ण स्‍थान है, वह बन...
15/01/2026

मकर संक्रांति पर्व का महत्व
* डॉ. श्रीकृष्ण "जुगनू"
मकर संक्रांति का भारतीय जन जीवन में जितना महत्‍वपूर्ण स्‍थान है, वह बनते-बनते हजारों सालों का समय लगा है। एक मिथक है कि आदमी की आंखों को आसमान पर लगे-लगे कई दिन हो गए। आंखें देखती रही कि सूरज बर्फ को पिघलाकर बहते जल को देखते देखते समंदर तक जाता है... जब भाप बनती है तो बादलों का खोल ओढे फिर अपनी जगह लौटता है मगर पानी उसे फिर समंदर की ओर लेकर जाता है...।

याद कीजिएगा कि इसी से उत्‍तरायण और दक्षिणायन की धारणा बनी। अयन माने रास्‍ता, जैसा कि छांदोग्‍योपनिषद (4, 15, 5) में आया है, यही अर्थ ऋग्‍वेद (3, 33, 7) में मिलता है। संक्रमण से मतलब है रास्‍ते को लांघना। इधर का उधर होना अयन माना गया, यह छह-छह महीने का वक्‍त है। जब आदमी ने बारह महीनों को जान लिया तो इस संक्रमण को भी बारह तरह से जाना गया। इसमें दो अयन की संक्रांतियां मानी गई जिनका नाम राशियों के आधार पर रखा गया, जो कि अनेकों के अनुसार मेसोपोटामियां की उपज बताई गई हैं और भारत में यहां के नामों से ख्‍यात हुईं।

अयन के लिए रेखाओं की कल्पना कहां हुई? कब और कहां से कर्क, विषुवत और मकर रेखाओं निर्धारण हुआ? अंश ( डिग्री) का पहला प्रयोग कहां और किसने किया? ये खगोल विद्या के प्रश्न हैं और हमारे पास सबसे अधिक खगोलीय ग्रंथ हैं लेकिन उनमें उत्तर नहीं!

अयन की संक्रांतियां मकर (उत्‍तरायण) और कर्क (दक्षिणायन) के नाम से जानी गई। दो संक्रांतियां जब दिन और रात बराबर होते हैं, विषुव के नाम से जानी गई, मेष् और तुला की। अन्‍य चार के नाम षडशीति हैं जब मिथुन, कन्‍या, धनु और मीन राशियां होती हैं और चार वे जो विष्‍णुपदी हैं, वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि वाली हैं।

छह-छह मासों का विवरण शतपथ ब्राह्मण में संक्षेप में आया है, किंतु तब तक राशियां अनजान ही थीं। सूर्य का धनु से मकर पर आना बहुत पहले से शुभ मान लिया गया था। इस घटना को धरतीवासी पत्‍थर के तीन चक्र एक दूसरे पर जमाकर गेंद से नीचे गिराते हुए देखते दिखाते अपना बल बताते थे।

यही खेल 'सतोलिया' का बना, खासकर पश्चिम भारत में यह खेल शुरु हुआ, यह आज भी है और संयोग से संक्रांति पर खेला भी जाता है। पहाडी प्रदेशों में पेडों की लकडियो से गेंद् को घुडाते हुए पारे या सीमा को लांघने का खेल विकसित हुआ। यह आज भी गीडा डोट के नाम से ख्‍यात है।

कई बार सुनाया जाता है कि फाहयान के साथ जो अन्‍य लोग इधर आए, गुड़ी या पतंग जैसा खेल लेकर आए। पतंग से आशय सूर्य होता है, जिसके नाम से पश्चिम भारत वाले भली भांति परिचित थे। ये खेल आज भी इधर लोकप्रिय हैं...। रही बात दान-पुण्‍य की वह तो उपज निपज के कारण कृषि प्रधान समाज में था ही, जलीय प्रदेशों में यह स्‍नान के पर्व के रूप में ख्‍यात हुआ और इस तरह एक मिला जुला पर्व बना मकर संक्रांति।

मध्‍यकाल में, खासकर 10वीं सदी के आसपास सक्रांति को देवी का रूप मान लिया गया और उसके बनाव, शृंगार सहित खान-पान, देखने, चलने आदि की क्रियाओं पर विचार करके मौसम और साल भर के लेखा जोखा पर विचार हुआ और फिर संहिता तथा मुहूर्त ग्रंथों में उन सबको लिखा गया और लिखा ही जाता रहा। लगभग तीन सौ सालों तक, भविष्‍यपुराण भी इससे न्‍यारा नहीं है। क्या आप जानते हैं कि भविष्यपुराण में कई भविष्यपुराण हैं!
*
अभी तो आपके शब्दों में मकर मंगलम् ...
*
पौषमासे मकरे च यदा सूर्यायनं भवेत् |
चत्वारिंशद्घटिका वै पुण्यकालो विशेषतः||
दानस्नानार्चनाद्यं तु कर्तव्यं तिललड्डुकाः|
मिष्टान्नानि च देयानि ह्यनाथेभ्यो विशेषतः|
गवां ग्रासादि देयं च श्राद्धं पुण्यप्रदं तथा||
जय जय।

ॐ हृां मित्राय नम:ॐ हृीं रवये नम:ॐ हूं सूर्याय नम:ॐ ह्रां भानवे नम:ॐ हृों खगाय नम: ॐ हृ: पूषणे नम:ॐ ह्रां हिरण्यगर्भाय न...
04/01/2026

ॐ हृां मित्राय नम:
ॐ हृीं रवये नम:
ॐ हूं सूर्याय नम:
ॐ ह्रां भानवे नम:
ॐ हृों खगाय नम:
ॐ हृ: पूषणे नम:
ॐ ह्रां हिरण्यगर्भाय नमः
ॐ मरीचये नमः
ॐ आदित्याय नमः
ॐ सवित्रे नमः
ॐ अर्काय नमः
ॐ भास्कराय नमः

ऊँ श्री गणेशाय नमः
ऊँ शिव पार्वती नमः
ऊँ श्री लक्ष्मी नारायण नमः
ऊँ हनुमतये नमः

जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे।जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥जय चन्द्रदिवाकरनेत्रध...
02/01/2026

जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे।
जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥

जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥

जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।
जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥

जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।
जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥

जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥Meaning:(We Meditate on Sri Vishnu) ...
01/01/2026

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

Meaning:
(We Meditate on Sri Vishnu) Who is Wearing White Clothes, Who is All-Pervading, Who is Bright in Appearance like the Moon and Who is Having Four Hands,Who is Having a Compassionate and Gracious face, Let us Meditate on Him To Ward of all Obstacles.

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Meaning:
(Salutations to Sri Vishnu) Who has a Serene Appearance, Who Rests on a Serpent (Adisesha), Who has Lotus on His Navel and Who is the Lord of the Devas, Who Sustains the Universe, Who is Boundless and Infinite like the Sky, Whose Colour is like the Cloud (Bluish) and Who has a Beautiful and Auspicious Body,

Who is the Husband of Devi Lakshmi, Whose Eyes are like Lotus and Who is Attainable to the Yogis by Meditation, Salutations to That Vishnu Who Removes the Fear of Worldly Existence and Who is the Lord of All the Lokas.

औषधे चिंतये विष्णुम ,भोजने च जनार्धनम |
शयने पद्मनाभं च, विवाहे च प्रजापतिम||
युद्धे चक्रधरम देवं, प्रवासे च त्रिविक्रमं|
नारायणं तनु त्यागे, श्रीधरं प्रिय संगमे||
दुःस्वप्ने स्मर गोविन्दम,संकटे मधुसूधनम|
कानने नारासिम्हम च,पावके जलाशयिनाम||
जलमध्ये वराहम च, पर्वते रघु नन्दनं|
गमने वामनं चैव , सर्व कार्येशु माधवं||

Meaning:
Think him as Vishnu while taking medicine,
As Janardhana while eating food,
As Padmanabha while in bed,
As Prajapathi at time of marriage,
As Chakra dhara while engaged in war,
As Trivikrama while on travel,
As Narayana on death bed,
As Sreedhara while meeting with the beloved,
As Govinda while tossing with bad dreams,
As Madhu Sudhana while in trouble,
As Narasimha while in the forest,
As Jala Sayina while fire is ravaging,
As Varaha while struggling in water,
As Raghu nandana while lost in a mountain,
As Vamana while on the move,
And as Madhava while doing everything.

षोडशैतानी नमानी प्रातरुत्थाय यह पठेत
सर्वपापा विर्निमुक्तो विष्णुलोके महीयते ||

Meaning:
As soon as one wakes up in the morning,If these sixteen names are read,
He would be bereft of all sins, And reach the world of Vishnu at the end.

श्री संकट नाशन गणेश स्तोत्रनारद उवाच प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुः कामार्थसिद्धये ...
31/12/2025

श्री संकट नाशन गणेश स्तोत्र
नारद उवाच
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुः कामार्थसिद्धये ।।1।।

प्रथमं वक्रतुडं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ।।2।।

लम्बोदरं पंचमं च षष्ठ विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ।।3।।

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ।।4।।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विध्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम् ।।5।।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ।।6।।

जपेग्दणपतिस्तोत्रं षड् भिर्मासैः फ़लं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ।।7।।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ।।8।।

|| इति श्री नारदपुराणे संकटनाशनम गणेश स्तोत्रम सम्पूर्णम ||

30/12/2025
आशुतोष शशाँक शेखर,चन्द्र मौली चिदंबरा,कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,कोटि नमन दिगम्बरा ॥निर्विकार ओमकार अविनाशी,तुम्ही देवाधि दे...
29/12/2025

आशुतोष शशाँक शेखर,

चन्द्र मौली चिदंबरा,

कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,

कोटि नमन दिगम्बरा ॥

निर्विकार ओमकार अविनाशी,

तुम्ही देवाधि देव,

जगत सर्जक प्रलय करता,

शिवम सत्यम सुंदरा ॥

निरंकार स्वरूप कालेश्वर,

महा योगीश्वरा,

दयानिधि दानिश्वर जय,

जटाधार अभयंकरा ॥

शूल पानी त्रिशूल धारी,

औगड़ी बाघम्बरी,

जय महेश त्रिलोचनाय,

विश्वनाथ विशम्भरा ॥

नाथ नागेश्वर हरो हर,

पाप साप अभिशाप तम,

महादेव महान भोले,

सदा शिव शिव संकरा ॥

जगत पति अनुरकती भक्ति,

सदैव तेरे चरण हो,

क्षमा हो अपराध सब,

जय जयति जगदीश्वरा ॥

जनम जीवन जगत का,

संताप ताप मिटे सभी,

ओम नमः शिवाय मन,

जपता रहे पञ्चाक्षरा ॥

आशुतोष शशाँक शेखर,

चन्द्र मौली चिदंबरा,

कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,

कोटि नमन दिगम्बरा ॥

कोटि नमन दिगम्बरा..

कोटि नमन दिगम्बरा..

कोटि नमन दिगम्बरा..

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