09/08/2026
स्कन्द पुराण में एक अद्भुत श्लोक वर्णित है:
अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं
न्यग्रोधमेकं दश चिञ्चिणीकान्।
कपित्थबिल्वामलकत्रयं च
पञ्चाम्रमुप्त्वा नरकं न पश्येत्॥
अर्थ:
अश्वत्थ = पीपल
पिचुमन्द = नीम
न्यग्रोध = बरगद
चिञ्चिणी = इमली
कपित्थ = कैथा (कवठ)
बिल्व = बेल
आमलक = आँवला
आम्र = आम
इस श्लोक का भावार्थ है कि जो व्यक्ति इन पवित्र एवं उपयोगी वृक्षों का रोपण करता है और उनकी देखभाल करता है, उसे नरक का दर्शन नहीं करना पड़ता। यदि हम इस संदेश की उपेक्षा करते हैं, तो प्रकृति हमें सूखे, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में उसके दुष्परिणाम दिखाती है।
अभी भी समय है। आइए, अपनी भूलों को सुधारें और आने वाली पीढ़ियों को हरित, स्वस्थ एवं समृद्ध पर्यावरण प्रदान करने का संकल्प लें।
गुलमोहर, नीलगिरी (यूकेलिप्टस) और सुबबूल जैसे वृक्षों के अत्यधिक एवं अनियंत्रित रोपण से स्थानीय जैव-विविधता और जल संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए अंधानुकरण करने के बजाय पीपल, बरगद, नीम, आम, इमली, बेल और आँवला जैसे भारतीय एवं पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्षों का अधिकाधिक रोपण करना चाहिए।
क्या सूखे का एक कारण बड़े देशी वृक्षों का कम होना भी है?
यह बात सुनकर आश्चर्य हो सकता है कि पीपल, बरगद और नीम जैसे वृक्षों का कम होना भी पर्यावरणीय असंतुलन में योगदान देता है। ये वृक्ष वायु की गुणवत्ता सुधारने, छाया प्रदान करने, स्थानीय तापमान कम करने तथा अनेक जीव-जंतुओं के लिए आवास उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
(ध्यान दें: अक्सर यह दावा किया जाता है कि पीपल 100%, बरगद 80% और नीम 75% कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। इन प्रतिशतों की वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह सत्य है कि ये वृक्ष पर्यावरण संरक्षण और हरित संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।)
यूकेलिप्टस (नीलगिरी) तेज़ी से बढ़ने वाला वृक्ष है और कई स्थानों पर जलभराव वाली भूमि को सुखाने के उद्देश्य से लगाया जाता है। कुछ परिस्थितियों में इसके व्यापक रोपण से भूजल एवं स्थानीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए वृक्षारोपण करते समय स्थानीय परिस्थितियों और देशी प्रजातियों को प्राथमिकता देना अधिक उपयुक्त माना जाता है।
पीपल की महिमा
मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णुः शाखा शंकर एव च।
पत्रे पत्रे सर्वदेवाः वृक्षराजाय नमो नमः॥
अर्थ:
पीपल के मूल में ब्रह्मा, तने में विष्णु, शाखाओं में भगवान शिव तथा प्रत्येक पत्ते में समस्त देवताओं का निवास माना गया है। इसलिए इस वृक्ष को प्रणाम किया जाता है।
यदि आने वाले वर्षों में प्रत्येक 500 मीटर की दूरी पर पीपल, बरगद और नीम जैसे देशी वृक्ष लगाए जाएँ तथा उनकी नियमित देखभाल की जाए, तो पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और हरित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
आइए, अधिक से अधिक पीपल, बरगद, नीम, बेल, आँवला, आम और इमली जैसे जीवनदायी वृक्ष लगाएँ। जहाँ पर्याप्त स्थान हो, वहाँ तुलसी भी लगाएँ।
आइए, हम सब मिलकर वृक्षारोपण करें, प्रकृति का संरक्षण करें और अपने भारत को पर्यावरणीय संकटों से बचाने में अपना योगदान दें। 🌱