शिव शक्ति धाम-मोइया शिवाला

  • Home
  • India
  • Biswan
  • शिव शक्ति धाम-मोइया शिवाला

शिव शक्ति धाम-मोइया शिवाला ॐ नमः शिवाय।
भगवान शिव आप सबकी रक्षा करें।।

15/10/2024

ाकाल

09/10/2024
जय शिव
29/02/2024

जय शिव

28/02/2024

सभी भक्तों का शिव शक्ति धाम मोइया शिवाला में स्वागत है ....

 #गाँवये जो तस्वीर है वो दो भाइयों के बीच बंटवारे के बाद बने घर की तस्वीर है। बाप-दादा के घर की देहली को जिस तरह बांटा ग...
16/09/2020

#गाँव

ये जो तस्वीर है वो दो भाइयों के बीच बंटवारे के बाद बने घर की तस्वीर है।

बाप-दादा के घर की देहली को जिस तरह बांटा गया है, वह समाज के हर गांव-घर की असलियत को भी दर्शाता है।

दरअसल हम गांव के लोग अब जितने खुशहाल दिखते हैं उतने हैं नहीं और जिन घरों में ऐसी स्थिति नहीं है वह आज भी खुशहाल हैं,

जमीनों के केस, पानी के केस, खेत-मेढ के केस, रास्ते के केस, मुआवजे के केस, व्याह शादी के झगड़े, दीवार के केस, आपसी मनमुटाव, चुनावी रंजिशों ने समाज को खोखला कर दिया है।


अब गांव वो नहीं रहे कि जब, बस में गांव की लडकी को देखते ही सीट खाली कर देते थे बच्चे।

दो चार थप्पड गलती करने पर किसी बुजुर्ग या ताऊ ने टेक दिए तो इश्यू नहीं बनता था तब।

अब हम पूरी तरह बंटे हुए लोग हैं। गांव में अब एक दूसरे के उपलब्धियों का सम्मान करने वाले, प्यार से सिर पर हाथ रखने वाले लोग संभवत अब मिलने मुश्किल हैं।

हालात इस कदर खराब है कि अगर पडोसी फलां व्यक्ति को वोट देगा तो हम नहीं देंगे।

इतनी नफरत कहां से आई है समाज के लोगों में ये सोचने और चिंतन का विषय है।

गांवों में कितने मर्डर होते हैं, कितने झगडे होते हैं और कितने केस अदालतों व संवैधानिक संस्थाओं में लंबित है इसकी कल्पना भी भयावह है।

संयुक्त परिवार अब गांवों में एक आध ही हैं, लस्सी-दूध जगह वहां भी पेप्सी कोका पिलाई जाने लगी है।

बंटवारा केवल भारत का नहीं हुआ था, आजादी के बाद हमारा समाज भी बंटा है और शायद अब हम भरपाई की सीमाओं से भी अब दूर आ गए हैं। अब तो वक्त ही तय करेगा कि हम और कितना बंटेंगे।
इस दुर्दशा के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है तो वह है प्रधानी के चुनाव प्रधानी के चुनाव में गांव के लोग एक दूसरे के प्रति इतना खूंखार रवैया अपनाते हैं जैसे शेर के इलाके में कोई दूसरा शेर घुस आया हो
प्रधानी के चुनाव में बनी दुश्मनी अगले 5 साल तक चलती रहती है और धड़ाधड़ लाशे गिरती रहती है
एक दिन यू ही एक मित्र ने बातचीत में कहा कि जितना हम पढें हैं दरअसल उतना ही हम बेईमान बने है।
गहराई से सोचे तो ये बात सही लगती है पढें लिखें लोग हर चीज को मुनाफे से तोलते हैं और ये बात हमारे समाज को तोड रही है,,

मैं रिवायत से थोड़ा पुराना हूँ ,,
इस दौर के लोगों को शायद पसंद नहीं आऊंगा..

क्षत्रिय परिवारों में देवताओं की प्रार्थना पर इंद्रासन ग्रहणकर देवताओं पर शासन करने वाले  #ययाति, देवताओं को अपनी प्रजा ...
16/09/2020

क्षत्रिय परिवारों में देवताओं की प्रार्थना पर इंद्रासन ग्रहणकर देवताओं पर शासन करने वाले #ययाति, देवताओं को अपनी प्रजा घोषित कर वसूल करने वाले #रघु, गाय की रक्षा के लिए स्वधर्म पालन की कामना से प्रेरित हो स्वयं के शरीर का दान देने #दिलीप, कबूतर के प्राणों की रक्षा करने के लिए स्वयं के शरीर का दान देने वाले #शिवि, तपस्या के बल पर भगवान नारायण के कमण्डल से गंगा को धरती पर लाने वाले #भगीरथ, अपनी तपस्या के बल पर ब्रह्माण्ड को हिला देने वाले #विश्वामित्र, सत्य की रक्षा के लिए डोम के घर बिक जाने वाले #हरीशचंद्र, बाल्यावस्था में तपस्या से भगवान को प्रसन्न करने वाले #ध्रुव, अपनी प्रतिज्ञा व वचनो पर सदा दृढ रहने वाले #भीष्म, महान् धनुर्धर #अर्जुन, कवच व कुण्डल का दान देने वाले #दानवीर_कर्ण और न जाने एक से एक अद्भुत विभूतियाँ पैदा हुई।

स्वतंत्रता व स्वधर्म की रक्षा करने वाले #प्रताप, #दुर्गादास व #चंद्रसेन, विदेशी आतताइयों से लोहा लेने वाले #दाहिर, #विक्रमादित्य, #पृथ्वीराज, #पंजवनराय, #चामुण्डराय, #हमीर और न जाने कैसे-कैसे अद्भुत योद्धा इन्ही घरो से उत्पन्न हुए। यह कोई पुरानी बातें नही है जब इन्ही घरो में पैदा हुए लोगों ने संसार के वीरों के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। लोग युद्ध क्षेत्र में उन योद्धाओं देखकर आश्चर्यचकित हो गए, जिनके मस्तक शत्रुओं की तलवारो से काटे जा चुके थे, फिर भी दोनों हाथो से तलवारे चलाते हुए शत्रुओं की सेना में हाहाकार मच जाया करता था, इनको देखकर संसार में वीर कहलाने वाले लोगों व उनकी वंश परम्पराओं ने भी श्रद्धा से अपने मस्तक नीचे झुका लिए, आज इन्हीं वीरों को लोग नहीं जानते और पूर्वजों का अपमान करने से नहीं थकतें,

इसी राजपूताना इतिहास पढ़ते-पढ़ते 7 पीढ़ी गुजर जायेंगी लेकिन समाप्त नहीं होगा।

यह कैसी विडम्बना है? अपना अस्तित्व, अपना स्वधर्म, अपनी संस्कृति, अपने स्वाभिमान को खो कर इस फिल्मी दुनिया को श्रेष्ठ माना बैठे हैं जिसका कोई अस्तित्व नहीं।

जय क्षत्रिय रक्त 🙏
क्षात्रधर्म युगे युगे 🙏

आज ये तस्वीर देखते ही साझा करने की इच्छा कर गई।बाज पक्षी जिसे हम ईगल या शाहीन भी कहते है। जिस उम्र में बाकी परिंदों के ब...
25/08/2020

आज ये तस्वीर देखते ही साझा करने की इच्छा कर गई।

बाज पक्षी जिसे हम ईगल या शाहीन भी कहते है। जिस उम्र में बाकी परिंदों के बच्चे चिचियाना सीखते है उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है। पक्षियों की दुनिया में ऐसी Tough and tight training किसी और की नही होती।

मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग 12 Km ऊपर ले जाती है। जितने ऊपर अमूमन हवाई जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज 7 से 9 मिनट का समय लेती है। यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा। उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है ? तेरी दुनिया क्या है ? तेरी ऊंचाई क्या है ? तेरा धर्म बहुत ऊंचा है और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है।

धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग 2 Km उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है। 7 Kmt. के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते है, वह खुलने लगते हैं। लगभग 9 Kmt. आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते है। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है।

अब धरती से वह लगभग 3000 मीटर दूर है लेकिन अभी वह उड़ना नहीं सीख पाया है। अब धरती के बिल्कुल करीब आता है जहां से वह देख सकता है अपने इलाके को। अब उसकी दूरी धरती से महज 700/800 मीटर होती है लेकिन उसका पंख अभी इतना मजबूत नहीं हुआ है की वो उड़ सके। धरती से लगभग 400/500 मीटर दूरी पर उसे अब लगता है कि उसके जीवन की शायद अंतिम यात्रा है। फिर अचानक से एक पंजा उसे आकर अपनी गिरफ्त मे लेता है और अपने पंखों के दरमियान समा लेता है।

यह पंजा उसकी मां का होता है जो ठीक उसके उपर चिपक कर उड़ रही होती है। और उसकी यह ट्रेनिंग निरंतर चलती रहती है जब तक कि वह उड़ना नहीं सीख जाता। यह ट्रेनिंग एक कमांडो की तरह होती है, तब जाकर दुनिया को एक बाज़ मिलता है अपने से दस गुना अधिक वजनी प्राणी का भी शिकार करता है।

हिंदी में एक कहावत है... "बाज़ के बच्चे मुँडेरों पर नही उड़ते....."

बेशक अपने बच्चों को अपने से चिपका कर रखिए पर उसे दुनियां की मुश्किलों से रूबरू कराइए, उन्हें लड़ना सिखाइए। बिना आवश्यकता के भी संघर्ष करना सिखाइए।

वर्तमान समय की अनन्त सुख सुविधाओं की आदत व अभिवावकों के बेहिसाब लाड़ प्यार ने मिलकर, आपके बच्चों को "ब्रायलर मुर्गे" जैसा बना दिया है जिसके पास मजबूत टंगड़ी तो है पर चल नही सकता। वजनदार पंख तो है पर उड़ नही सकता क्योंकि..

"गमले के पौधे और जमीन के पौधे में बहुत फ़र्क होता है।"
अहिंसा परमो धर्म ।
धर्म हिंसा तदैव च ।

क़ौआ एकमात्र पक्षी हैं जो बाज़ पर चोंच मारने की हिम्मत करता है, वह बाज़ की पीठ पर बैठता है और उसकी गर्दन पर काटता है, ले...
20/08/2020

क़ौआ एकमात्र पक्षी हैं जो बाज़ पर चोंच मारने की हिम्मत करता है, वह बाज़ की पीठ पर बैठता है और उसकी गर्दन पर काटता है,

लेकिन बाज़ जवाब नहीं देता है, और न ही कौवा से लड़ता है और न ही कौवा पर समय बर्बाद करता है वह बस अपने पंख खोलता है।
और आसमान में ऊंचा उठना शुरू कर देता है, उड़ान जितनी ऊंची होती है, उतना ही मुश्किल होता है ऊपर साँस लेना और फिर

ऑक्सीजन की कमी के कारण कौआ गिर जाता हैं ! कौवे के साथ अपना समय बर्बाद करना बंद करो, बस आप ख़ुद ऊंचाइयों पर चले जाओं और विरोधी ऐसे ही मिट जाएंगे !! 😊

 िन_पावन"17 अगस्त/ #पुण्य_तिथि" #आधुनिक_भगीरथ :  ांझीस्वर्ग से धरती पर गंगा लाने वाले तपस्वी राजा भगीरथ को कौन नहीं जानत...
17/08/2020

िन_पावन
"17 अगस्त/ #पुण्य_तिथि"
#आधुनिक_भगीरथ : ांझी

स्वर्ग से धरती पर गंगा लाने वाले तपस्वी राजा भगीरथ को कौन नहीं जानता। उनके प्रयासों के कारण ही भारत के लोग लाखों साल से माँ गंगा में स्नान, पूजन और आचमन से पवित्र हो रहे हैं। आज भी यदि कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से लगातार किसी सद् संकल्प को लेकर काम करता रहे, तो उसे भगीरथ ही कहते हैं। ऐसे ही एक आधुनिक भगीरथ थे, दशरथ मांझी।

दशरथ मांझी का जन्म कब हुआ, यह तो पता नहीं; पर वे #बिहार के #गया प्रखण्ड स्थित #गहलौर_घाटी में रहते थे। उनके गांव अतरी और शहर के बीच में एक पहाड़ था, जिसे पार करने के लिए 20 कि.मी का चक्कर लगाना पड़ता था। 1960 ई. में दशरथ मांझी की पत्नी फगुनी देवी गर्भावस्था में पशुओं के लिए पहाड़ से घास काट रही थी कि उसका पैर फिसल गया। दशरथ उसे लेकर शहर के अस्पताल गये; पर दूरी के कारण वह समय पर नहीं पहुंच सके, जिससे उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी।

बस, बात दशरथ के मन को लग गयी। उन्होंने निश्चय किया कि जिस पहाड़ के कारण मेरी पत्नी की मृत्यु हुई है, मैं उसे काटकर उसके बीच से रास्ता बनाऊंगा, जिससे भविष्य में किसी अन्य बीमार को अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत्यु का ग्रास न बनना पड़े। उसके बाद सुबह होते ही दशरथ औजार लेकर जुट जाते और पहाड़ तोड़ना शुरू कर देते। सुबह से दोपहर होती और फिर शाम; पर दशरथ पसीना बहाते रहते। अंधेरा होने पर ही वे घर लौटते। लोग समझे कि पत्नी की मृत्यु से इनके मन-मस्तिष्क पर चोट लगी है। उन्होंने कई बार दशरथ को समझाना चाहा; पर वे उनके संकल्प को शिथिल नहीं कर सके।

अन्ततः 22 साल के लगातार परिश्रम के बाद पहाड़ ने हार मान ली। दशरथ की छेनी, हथौड़ी के आगे 1982 में पहाड़ ने घुटने टेक दिये और रास्ता दे दिया। यद्यपि तब तक दशरथ मांझी का यौवन बीत चुका था; पर 20 कि.मी की बजाय अब केवल एक कि.मी. की पगडण्डी से शहर पहुंचना संभव हो गया। तब मजाक उड़ाने वाले लोगों को उनके दृढ़ संकल्प के आगे नतमस्तक होना पड़ा। अब लोग उन्हें 'साधु बाबा' के नाम से बुलाने लगे।

दशरथ बाबा इसके बाद भी शान्त नहीं बैठे। अब उनकी इच्छा थी कि यह रास्ता पक्का हो जाये, जिससे पैदल की बजाय लोग वाहनों से इस पर चल सकें। इससे श्रम और समय की भारी बचत हो सकती थी; पर इसके लिए उन्हें शासन और प्रशासन की जटिलताओं से लड़ना पड़ा। वे एक बार गया से पैदल दिल्ली भी गये; पर सड़क पक्की नहीं हुई। उनके नाम की चर्चा पटना में सत्ता के गलियारों तक पहुंच तो गयी; पर निष्कर्ष कुछ नहीं निकला।

इन्हीं सब समस्याओं से लड़ते हुए दशरथ बाबा बीमार पड़ गये। क्षेत्र में उनके सम्मान को देखते हुए राज्य प्रशासन ने उन्हें दिल्ली के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां 17 अगस्त, 2007 को उन्होंने अन्तिम सांस ली।

देहांत के बाद उनका पार्थिव शरीर गांव लाया गया। गया रेलवे स्टेशन पर बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी कर्मभूमि गहलौर घाटी में ही पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें भू समाधि दी गयी। राज्य शासन ने ‘पद्मश्री’ के लिए भी उनके नाम की अनुशंसा की।

दशरथ मांझी की मृत्यु के बाद बिहार के बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में एक पाठ जोड़ा गया है। उसका शीर्षक है - पहाड़ से ऊंचा आदमी। यह बात दूसरी है कि पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने वाले इस आधुनिक भगीरथ के संकल्प का मूल्य उनके जीवित रहते प्रशासन नहीं समझा।
.................................

Address

शिव शक्ति धाम-मोइया शिवाला
Biswan
261202

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when शिव शक्ति धाम-मोइया शिवाला posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to शिव शक्ति धाम-मोइया शिवाला:

Share

Category