बिल्हौर रेलवे स्टेशन से दो मील दूर ग्राम-निबौरी और खजुरी के बीच में एक महुआ के वृक्ष में ऐसी ईश्वरीय शक्ति पैदा हुई, जिसकी कृपा से अब तक हजारों दुखी इंसानों को फायदा पहुँचा ।
श्री महुआ बाबा का शुभ आगमन:-
सन् 1967 ई0 आश्विन अथवा क्वार के महीने की बात हैें, (राम रतन लोधी) निवासी निबौरी पुरखा के रहने वाला और बाई के दर्द से ग्रसित था, एक दिन अपने पशुओ को इस महुआ के वृक्ष के पास चरा रहा था। वहीँ पास
में एक नीम के वृक्ष के नीचे वह लेट गया, धीरे धीरे वह महुआ की ओर सरकने लगा और महुआ के पास पहुँच गया, उसको ऐसा मालूम हुआ कि दर्द में कुछ कमी महसूस हुई। अब वह यह क्रिया रोज तीन चार दिन तक करता रहा, उसका दर्द उसके शरीर से बिलकुल जाता रहा ।
यह बात उसने अपने गाँव में बताई । तब इस बात को सुन कर उसी गाँव के निवासी महिपाल की माताश्री स्वर्गीय पूरन की धर्म पत्नी श्रीमाती गुलाबो देवी के शरीर में गठिया का दर्द था, वह महुआ बाबा के पास चारपाई पर लिटा कर लायी गयी। महुआ का पूजन करने मात्र से उनके शरीर का दर्द जाता रहा और बिलकुल ठीक हो गई।
अब इस बात को जो भी सुनता है, वह दर्शन करने के लिए महुआ बाबा के पास आता है।
अब क्या था जो सुनता है वही दौड़ा चला आता है। धीरे धीरे दिन दूनी रात चौगुनी श्री महुआ बाबा की शक्ति का प्रचार हुआ और प्रति इतवार, सोमवार व मंगलवार को मेल सा लगने लगा जिसमें हजारों की संख्या में लोगों की आस्था उमड़ पड़ी।
श्री महुआ बाबा स्थल पर श्री हनुमान जी के मंदिर का होना:-
ग्राम-बरौली निवासी श्री कश्मीर सिंह उर्फ़ लल्लू बाबू एक दिन मेला देखने आए, श्री महुआ बाबा के वृक्ष में पूर्व बैठे थे कि उसी वृक्ष की पूर्व शाख में श्री हनुमान जी का सर्व प्रथम आभास हुआ, उन्होंने आगे आने वाले मंगल को 1000 गुलाब के फूल मंगवा कर श्री हनुमान जी का पूजन विधि से किया और पुष्पांजलि अर्पित कर सभी को श्री हनुमान जी के आगमन की बात बताई।
(तथ्यों को बिलकुल भी बदला नहीं गया है, सारे तथ्य लेखक-श्री राम प्रसाद सक्सेना, गुरधरा, बिल्हौर (कानपुर) की पुस्तक से लिए गए है, जिसे सन् 1967 ई0 में छापा गया था।)