15/05/2026
राजस्थान की पावन धरा सदियों से संतों, वीरों और चमत्कारों की साक्षी रही है। इसी धरती पर भगवान गुरु जंभेश्वर महाराज ने अवतार लेकर जीव-दया, प्रकृति संरक्षण और सत्य आचरण का संदेश दिया। उनकी अनेक दिव्य कथाओं में से “मेड़ता के दिव्य खाण्डे” की कथा श्रद्धा, विश्वास और अहंकार के पतन का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।
कहा जाता है कि मेड़ता के शासक राव दूदो राजनीतिक षड्यंत्रों और पारिवारिक विद्रोह के कारण अपना राज्य खो चुके थे। निराश और दुखी होकर वे बीकानेर की ओर जा रहे थे। मार्ग में पीपासर की रोही में उनकी भेंट एक तेजस्वी बालक से हुई, जो स्वयं गुरु जांभोजी महाराज का दिव्य स्वरूप थे।
राव दूदो ने अपनी पीड़ा सुनाई, तब गुरु महाराज ने उन्हें एक सूखी केर की लकड़ी देकर आशीर्वाद दिया। देखते ही देखते वह लकड़ी सप्तधातु के दिव्य खाण्डे में बदल गई। गुरु महाराज ने लाखोलाव तालाब पर गुप्त खजाने का संकेत भी दिया। राव दूदो को वहाँ स्वर्ण मुद्राएँ मिलीं, जिनकी सहायता से उन्होंने सेना तैयार कर पुनः मेड़ता का राज्य प्राप्त किया।
समय बीतने के साथ राव दूदो की सत्रहवीं पीढ़ी में राव जगन्नाथ का शासन आया। अहंकार में डूबे जगन्नाथ ने दिव्य खाण्डे की शक्ति का अपमान किया और एक बेजुबान बकरे पर वार करने का प्रयास किया। उसी क्षण खाण्डे की मूठ उनके हाथ में रह गई और दिव्य धार आकाश में उड़ गई। यह घटना अहंकार के विनाश का प्रतीक बन गई।
बाद में संत केसोजी गोदारा ने गुरु आज्ञा से उस दिव्य खाण्डे को रोटू गाँव में स्थापित किया, जहाँ आज भी श्रद्धालु आस्था के साथ शीश नवाने आते हैं।
यह कथा हमें सिखाती है कि श्रद्धा और विनम्रता मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति हैं, जबकि अहंकार हमेशा पतन का कारण बनता है।
।। जय गुरु जंभेश्वर भगवान ।।