The Bishnoiism

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"जहां पेड़ और पशु सिर्फ जीव नहीं, पूज्य हैं — वहीं जन्मा है बिश्नोई समाज।
363 शहीदों का बलिदान और प्रकृति के प्रति अद्भुत समर्पण —
ये सिर्फ इतिहास नहीं, हमारी विरासत है।
सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण– यही है बिश्नोई समाज की पहचान!"

राजस्थान की पावन धरा सदियों से संतों, वीरों और चमत्कारों की साक्षी रही है। इसी धरती पर भगवान गुरु जंभेश्वर महाराज ने अवत...
15/05/2026

राजस्थान की पावन धरा सदियों से संतों, वीरों और चमत्कारों की साक्षी रही है। इसी धरती पर भगवान गुरु जंभेश्वर महाराज ने अवतार लेकर जीव-दया, प्रकृति संरक्षण और सत्य आचरण का संदेश दिया। उनकी अनेक दिव्य कथाओं में से “मेड़ता के दिव्य खाण्डे” की कथा श्रद्धा, विश्वास और अहंकार के पतन का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।

कहा जाता है कि मेड़ता के शासक राव दूदो राजनीतिक षड्यंत्रों और पारिवारिक विद्रोह के कारण अपना राज्य खो चुके थे। निराश और दुखी होकर वे बीकानेर की ओर जा रहे थे। मार्ग में पीपासर की रोही में उनकी भेंट एक तेजस्वी बालक से हुई, जो स्वयं गुरु जांभोजी महाराज का दिव्य स्वरूप थे।

राव दूदो ने अपनी पीड़ा सुनाई, तब गुरु महाराज ने उन्हें एक सूखी केर की लकड़ी देकर आशीर्वाद दिया। देखते ही देखते वह लकड़ी सप्तधातु के दिव्य खाण्डे में बदल गई। गुरु महाराज ने लाखोलाव तालाब पर गुप्त खजाने का संकेत भी दिया। राव दूदो को वहाँ स्वर्ण मुद्राएँ मिलीं, जिनकी सहायता से उन्होंने सेना तैयार कर पुनः मेड़ता का राज्य प्राप्त किया।

समय बीतने के साथ राव दूदो की सत्रहवीं पीढ़ी में राव जगन्नाथ का शासन आया। अहंकार में डूबे जगन्नाथ ने दिव्य खाण्डे की शक्ति का अपमान किया और एक बेजुबान बकरे पर वार करने का प्रयास किया। उसी क्षण खाण्डे की मूठ उनके हाथ में रह गई और दिव्य धार आकाश में उड़ गई। यह घटना अहंकार के विनाश का प्रतीक बन गई।

बाद में संत केसोजी गोदारा ने गुरु आज्ञा से उस दिव्य खाण्डे को रोटू गाँव में स्थापित किया, जहाँ आज भी श्रद्धालु आस्था के साथ शीश नवाने आते हैं।

यह कथा हमें सिखाती है कि श्रद्धा और विनम्रता मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति हैं, जबकि अहंकार हमेशा पतन का कारण बनता है।

।। जय गुरु जंभेश्वर भगवान ।।







खेजड़ी संरक्षण को लेकर आया यह ऐतिहासिक फैसला प्रकृति प्रेमियों के लिए बड़ी जीत है। 🌳
14/05/2026

खेजड़ी संरक्षण को लेकर आया यह ऐतिहासिक फैसला प्रकृति प्रेमियों के लिए बड़ी जीत है। 🌳

14/05/2026

मेड़ता के 'दिव्य खाण्डे' का वह रहस्य, जिसने इतिहास बदल दिया! 🚩

​"राजस्थान की इस वीर धरा पर संतों और महापुरुषों के कई चमत्कार दर्ज हैं। इन्हीं में से एक है— भगवान गुरु जंभेश्वर और राव दूदा की वह अद्भुत कथा, जब एक साधारण लकड़ी रातों-रात सप्त धातु की दिव्य तलवार बन गई!

​इस वीडियो में आप जानेंगे:
​ कैसे एक बालक के रूप में भगवान जंभेश्वर ने राव दूदा का भाग्य बदला।
​लाखों-लाव तालाब के पास मिले उस गुप्त खजाने का सच।
​वह क्षण, जब अहंकार के कारण दिव्य खाण्डा आकाश में उड़ गया।

​आज वह पवित्र खाण्डा कहाँ स्थित है और उसकी महिमा क्या है?
​यह कहानी मात्र एक राज्य की स्थापना की नहीं, बल्कि 'अहंकार' पर 'अटूट श्रद्धा' की जीत की गाथा है।

​पूरा वीडियो जरूर देखें और अपने विचार कमेंट्स में साझा करें। 🙏


14/05/2026

हर बूंद पानी
किसी बेजुबान जीव के लिए जीवन की उम्मीद बन सकती है।
इस गर्मी, पानी और दाना रखना न भूलें। 💧





13/05/2026

क्या एक साधारण लकड़ी किसी का भाग्य बदल सकती है? 🗡️

जानिए राव दूदा और गुरु जंभेश्वर भगवान की वो चमत्कारी कथा, जिसने मेड़ता का इतिहास बदल दिया। अहंकार का अंत और श्रद्धा की जीत की यह अनूठी कहानी अब हमारे YouTube चैनल पर उपलब्ध है। You Tube में सर्च करे The Bishnoiism चैनल और पूरी कथा देख कर टिप्पणी में अपने विचार रखे ।

https://youtu.be/GufGB7IE6rU?si=PyB1tO3dkelurfQt

बिश्नोई पंथ के प्रवर्तक गुरु जम्भेश्वर भगवान ने पर्यावरण और मानवता की रक्षा के लिए 'उनतीस' (29) नियम निर्धारित किए थे। इ...
13/05/2026

बिश्नोई पंथ के प्रवर्तक गुरु जम्भेश्वर भगवान ने पर्यावरण और मानवता की रक्षा के लिए 'उनतीस' (29) नियम निर्धारित किए थे। इन्हीं नियमों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम है— प्रत्येक महीने की अमावस्या का उपवास रखना। बिश्नोई समाज में इसे केवल एक तिथि नहीं, बल्कि "जाम्भाणी अमावस्या" के रूप में एक महापर्व की तरह मनाया जाता है।

गुरु महाराज ने आदेश दिया कि अमावस्या के दिन सांसारिक कार्यों जैसे खेती-बाड़ी, व्यापार, हल चलाना, कटाई-बुनाई आदि को विश्राम देकर केवल ईश-भक्ति करनी चाहिए।
इस दिन बिश्नोई बाहुल्य क्षेत्रों के मंदिरों और साथरियों में हवन (पाहल) किया जाता है। सामूहिक भजन-कीर्तन और सत्संग के माध्यम से समाज के लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है। हवन के धुएं से न केवल वातावरण शुद्ध होता है, बल्कि व्यक्ति के अंतर्मन के विकारों का भी नाश होता है।

बिश्नोई समाज में अमावस्या के व्रत के पीछे गहरा विज्ञान छिपा है। खगोल विज्ञान के अनुसार, अमावस्या को सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में होते हैं।
— चंद्रमा पृथ्वी पर जल और वनस्पतियों (औषधियों) को नियंत्रित करता है। अमावस्या के समय चंद्रमा का प्रभाव क्षीण हो जाता है, जिससे वनस्पतियों में 'रस' या ऊर्जा की कमी हो जाती है।
— चंद्रमा के निस्तेज होने के कारण इस दिन का अन्न ऊर्जाहीन माना जाता है। ऐसा अन्न ग्रहण करने से बुद्धि और वीर्य में मलीनता आती है। इसीलिए ऋषियों और गुरु जम्भेश्वर भगवान ने इस दिन 'निराहार' रहने का विधान बनाया ताकि शरीर दूषित ऊर्जा से बच सके।

बिश्नोई धर्म प्रकृति केंद्रित है। अमावस्या के दिन कृषि कार्यों (जैसे हल चलाना या फसल काटना) पर रोक लगाने का एक बड़ा कारण सूक्ष्म जीवों की रक्षा भी है। हल चलाने से जमीन के भीतर के सूक्ष्म जीव मर सकते हैं, और कटाई से पेड़ों पर आश्रित पक्षियों या कीड़ों को कष्ट हो सकता है। यह नियम मनुष्य को एक दिन के लिए पूर्णतः 'अहिंसक' और 'प्रकृति प्रेमी' बना देता है।

आधुनिक विज्ञान भी अब 'इंटरमिटेंट फास्टिंग' के लाभ मान रहा है, जिसे हमारे गुरु महाराज ने सदियों पहले लागू कर दिया था।
— हम प्रतिदिन बिना भूख के भी खाते रहते हैं, जिससे पाचन तंत्र (जठराग्नि) मंद पड़ जाता है। महीने में एक बार का पूर्ण उपवास पेट को आराम देता है और शरीर के विषाक्त पदार्थों (Toxins) को बाहर निकालता है।
— उपवास से मन एकाग्र होता है। यदि हम हर दिन व्रत करेंगे तो शरीर कमजोर हो जाएगा । लेकिन महीने में एक बार (अमावस्या को) व्रत रखने से स्वास्थ्य का संतुलन सटीक बना रहता है।

#महत्व #अमावस्या

क्या आपको पता है कि जांभोजी ने एक राजा को छाज (सूप) और खांडा (तलवार) भेंट की थी । 🤔अगर आपको ज्ञात है तो टिप्पणी में अपना...
12/05/2026

क्या आपको पता है कि जांभोजी ने एक राजा को छाज (सूप) और खांडा (तलवार) भेंट की थी । 🤔
अगर आपको ज्ञात है तो टिप्पणी में अपना जवाब जरूर दें।
जय गुरु जंभेश्वर भगवान 🙏

( इसका सही जवाब 12 घंटे बाद टिप्पणी में दिया जाएगा)





#खांडा

12/05/2026

एक छोटा सा पानी का पात्र
कई बेजुबान जिंदगियों के लिए उम्मीद बन सकता है।
इस गर्मी, पानी और दाना रखना न भूलें। 💧





साखी' शब्द का मूल संस्कृत का 'साक्षी' शब्द है। अध्यात्म और लोक साहित्य में साखी का अर्थ होता है— वह सत्य जिसे स्वयं देखा...
11/05/2026

साखी' शब्द का मूल संस्कृत का 'साक्षी' शब्द है। अध्यात्म और लोक साहित्य में साखी का अर्थ होता है— वह सत्य जिसे स्वयं देखा गया हो या जिसका अनुभव किया गया हो।
आसान भाषा में कहें तो, गुरु या संत द्वारा अपने अनुभवों से प्राप्त ज्ञान को जब संक्षिप्त और काव्यात्मक रूप में दोहा या छंद द्वारा व्यक्त किया जाता है, तो उसे 'साखी' कहते हैं। साखी को 'गुरु वचन' भी माना जाता है।

जाम्भोजी ने जो 'शब्द' कहे, उनके प्रभाव और उनसे जुड़ी घटनाओं को बाद के संतों (जैसे वील्होजी, सुरजनजी) ने 'साखियों' के रूप में लिखा।

मुझे लगता है बहुत से साथी जिनको साखी का मतलब नहीं पता था अब उन्हें समझ आ गया होगा ।

नोट – मेरे से अगर कुछ त्रुटि हुई है तो आप सुधार के लिए सादर आमंत्रित है । मेरा मानना है कि हमारे पास हमारे समाज से जुड़ा किसी भी विषय पर ज्ञान है तो वो आपस में साझा करना चाहिए और The Bishnoiism पेज एक मंच के लिए ही बनाया गया है ।

✍🏻 The Bishnoiism

#साखी

11/05/2026

छोटी-छोटी कोशिशें ही
प्रकृति और बेजुबान जीवों की जिंदगी बचाती हैं।
इस गर्मी, पानी और दाना रखना न भूलें। 🌿💧





11/05/2026

बिश्नोई साहित्य में "साखी" का बहुत महत्व है ।
कितने लोग जानते है साखी का मतलब क्या होता है ? कमेंट में परिभाषित करे ।

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