31/12/2025
बुद्धि, धैर्य और सूक्ष्म उपाय से असंभव भी संभव बन जाता है।
गुरुकुल के शांत प्रांगण में पीपल के वृक्ष की छाया तले आचार्य चाणक्य अपने शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य को जीवन का गूढ़ पाठ पढ़ा रहे थे। शिष्यों की आँखों में जिज्ञासा थी और आचार्य की वाणी में अनुभव का तेज।
आचार्य चाणक्य बोले—
“वत्स चन्द्रगुप्त, एक समय की बात है। एक राजा ने क्रोध में आकर अपने वज़ीर को एक ऊँची मीनार पर कैद कर दिया। वह मीनार इतनी ऊँची थी कि न भोजन पहुँच सकता था, न वहाँ से कूदकर भागने की कोई आशा थी। यह दण्ड मृत्यु से कम न था।”
चन्द्रगुप्त ने पूछा,
“आचार्य, तब वह वज़ीर अवश्य भयभीत हुआ होगा?”
चाणक्य मंद मुस्कान के साथ बोले—
“यही तो शिक्षा है, वत्स। जब उसे मीनार पर ले जाया जा रहा था, वह भयभीत नहीं था, बल्कि शांत और प्रसन्न था। उसकी पत्नी ने रोते हुए पूछा—
‘तुम इतने निश्चिन्त कैसे हो?’
वज़ीर ने कहा—
‘यदि रेशम का एक अत्यन्त पतला धागा भी मुझ तक पहुँच जाए, तो मैं स्वतंत्र हो सकता हूँ।’”
शिष्य विस्मय से एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
आचार्य ने कथा आगे बढ़ाई—
“पत्नी ने बहुत उपाय सोचे, पर इतनी ऊँची मीनार तक धागा पहुँचाना असंभव लगा। तब वह एक साधु के पास गई। साधु ने उपाय बताया—
‘एक भृंग पकड़ो। उसके पैर में रेशम का धागा बाँध दो। उसकी मूँछों पर शहद की एक बूँद रखकर उसका मुख मीनार की ओर कर दो।’”
“भृंग,” चाणक्य ने समझाया,
“मधु की गंध के लोभ में धीरे-धीरे ऊपर चढ़ा और अंततः मीनार की चोटी तक पहुँच गया। रेशम का धागा वज़ीर के हाथ में आ गया। उसी पतले धागे से सूत, सूत से डोरी और डोरी से मोटा रस्सा बना। उसी रस्से के सहारे वह वज़ीर मुक्त हो गया।”
अंत में आचार्य चाणक्य ने गम्भीर स्वर में कहा—
“वत्स चन्द्रगुप्त, जीवन में बड़ी उपलब्धियाँ बड़े साधनों से नहीं, बल्कि सही दिशा में उठाए गए छोटे से पहले कदम से प्राप्त होती हैं।
सूर्य तक पहुँचने के लिए प्रकाश की एक किरण ही पर्याप्त है—और वह किरण प्रत्येक मनुष्य के भीतर पहले से विद्यमान होती है। गुरु का कार्य केवल उसे पहचानना सिखाना है।”
गुरुकुल में मौन छा गया। शिष्यों के मन में यह शिक्षा सदा के लिए अंकित हो चुकी थी—
बुद्धि, धैर्य और सूक्ष्म उपाय से असंभव भी संभव बन जाता है।