Established in Mohanpur, a small village in Bijnor district of Uttar Pradesh, attracts devotees of the world. जय माता दी भक्तो आईये जानते है महालक्ष्मी मंदिर मोहनपुर की स्थापना कैसे ओर कब हुई ?
एक समय की बात है के उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के एक गांव मोहनपुर में दिनांक 8/12/2005 दिन बृहस्पतिवार को एक किसान नीरज कुमार जी सुपुत्र श्री छतरपाल सिंह जी अपने खेत पर मेढ डाल रहे थे। जैसे ही फावड़ा नीरज
कुमार जी ने जमीन पर मारा तो देवी माँ वहां प्रकट हुई उन्होंने कहा की बच्चा यहां क्या कर रहे हो। यह मेरा युगों पुराना स्थान हैं। ये कहते ही देवी माँ ने हाथ उठाया और रोशनी निकाली। वह सीधा जाकर नीरज कुमार जी के माथे पर टक राई ओर वह बेहोश हो गए ओर ज़मीन पर गिर गए।
तभी कुछ समय के पश्चात एक गांव के किसान वहां से गुज़रते हुए जा रहे थे उनकी नजर जमीन पर बेहोश पड़े नीरज कुमार जी पर पड़ी तो वह दौड़ कर नीरज कुमार जी के पास पहुंचे। नीरज कुमार जी को उठाया और उनके घर पर ले जाया गया। नीरज जी को बेहोश देख सब घर वाले भयभीत हो उठे ओर किसी की कुछ समझ नहीं आ रहा था। चिकित्सक बुलाए गए लेकिन किसी भी दवा का कोई असर नहीं हुआ। फिर लगभग चार घंटे बाद नीरज जी को होश आया और तब नीरज जी ने यह घटना सुनाई लेकिन किसी घर वाले व गांव वालों को विश्वास नहीं हुआ।
फिर उसी दिन रात्रि 7:55 बजे नीरज कुमार जी के मुख से (देवी माँ) की वाणी हुई के सभी गांव वाले अपने घरों की छत पर ठीक 8 बजे पहुंचे और मेरे दर्शन करें। सभी गांव वाले समय से अपने छतों पर पहुँच गए और उसके बाद आँखों देखा चमत्कार हुआ। खेत की उसी जगह से ऊपर आकाश की और देवी माँ ने एक अद्भुत प्रकाश के रूप में सभी गांव वालों को दर्शन दिए। सभी गांव वालों को नीरज कुमार जी की बातों का विश्वास हुआ और देवी माँ के भव्य दर्शन की खबर रातों रात आग की तरह पुरे जिले में फैल गयी
अगले दिन शुक्रवार दिनांक 9/12/2005 सुबह गांव, क्षेत्र व जिला प्रशासन पुरातत्व विभाग के लोग वहां पहुंचे उसी जगह नीरज कुमार के कहने पर खुदाई आरंभ की जैसी ही खुदाई हुई सबसे पहले 'दक्षिणावर्ती शंख', 'माता लक्ष्मी' जी व 'गणेश जी' की प्रतिमा, 'एक चिराग', 'एक चम्मच' ओर आठ 'सिक्के' प्राप्त हुए। जिला प्रशासन ने जमीन से प्राप्त हुई सभी अष्टधातु सामग्री को अपने साथ ले जाना चाहा तो अचानक उप प्रभागीय न्यायाधीश के कमर में दर्द हो उठा ओर उन्हें उपचार के लिए ले जाया गया।
जिला प्रशासन व गांव वालों ने नीरज कुमार जी से पूछा के क्या किया जाये तो (देवी माँ) की वाणी से नीरज कुमार ने मंदिर निर्माण की बात कही। मंदिर निर्माण कार्य आरंभ कर दिए गया ओर मंदिर के प्रांगण में एक पवित्र जल स्तोत्र का नल स्थापित किया गया। मान्यता हैं की इस नल का जल कभी खराब नहीं होता हैं जोकि गंगा जल की तरह पवित्र हैं। 14 वर्ष की आयु के नीरज कुमार जी ने मंदिर पर रहने का संकल्प लें लिया ओर आज 16 वर्ष हो गये ओर नीरज कुमार दीक्षा ओर ज्ञान प्राप्त करके श्री श्री108 पीठाधीश्वर महंत नरेंद्र गिरि जी महाराज बन चुके हैं।
आज देश विदेश से यहाँ भक्त देवी माँ के दर्शन करने आते है ओर मन कि कामना पूर्ण होती हैं ऐसा माने जाने के कारण मंदिर को मनोकामना पूर्ण सिद्ध पीठ महालक्ष्मी मंदिर का नाम दिया गया। मंदिर में प्रत्येक शुक्रवार को भक्तों के द्वारा भंडारे का आयोजन किया जाता हैं ओर प्रत्येक सोमवार को भक्तों के द्वारा हवन किया जाता हैं।
मंदिर प्रांगण मे प्रचीन श्री विष्णु भगवान का स्थान हैं यह माना जाता है कि श्री महालक्ष्मी के दर्शन विष्णु मंदिर (महालक्ष्मी मंदिर के ठीक बगल में) मोहनपुर की देवी महालक्ष्मी के दर्शन के बिना अधूरा हैं।
अमृत जल वाला नल
प्रचीन श्री विष्णु भगवान के दर्शन कर माता महालक्ष्मी जी व श्री गणेशजी के दर्शन करने के पश्चात मंदिर प्रांगण में एक विशेष नल लगा हुआ है दर्शन करने के बाद नल का जल ग्रहण करना अवश्य होता हैं।
मनोकामना पूर्ण सिद्ध पीठ महालक्ष्मी मंदिर अब एक नॉन प्रौफिट चैरिटेबल ट्रस्ट बन चूका हैं। जिसके संयोजक श्री श्री108पीठाधीश्वर महंत नरेंद्र गिरि जी महाराज हैं। हर साल दिनांक 8 दिसंबर को भव्य जागरण ओर भंडारे के साथ स्थापना दिवस समरोह आयोजित किया जाता हैं जिसमें दर्शन ओर पूजा करने आने वाले श्रद्धालुओं कि बहुत बड़ी संगत लगती हैं।
इस तरह मनोकामना पूर्ण सिद्ध पीठ महालक्ष्मी मंदिर चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना हुई । ।।जय माता दी ।।