30/10/2024
*जो लोग कर रहे थे जिन शासन के सूर्य पर,*
*लांछन लगाने का कुप्रयास,*
*वे झूठे ट्रस्टी, ख़ुद के षड्यंत्र में फ़स कर*
*ख़ुद का ही बना बैठे उपहास।*
कोटा |
श्रुतसंवेगी श्रमणरत्न श्री 108 आदित्यसागर जी महाराज ससंघ की सन्निधि में कोटा नगर में आये दिन नवीन आध्यात्मिक कीर्तिमान स्थापित किये जा रहे हैं। उनके इन जिनशासन उन्नायक कार्यों से समस्त साधुवृन्द एवं संपूर्ण भारत वर्ष की जैन समाज गौरवान्वित है। श्रमणरत्न श्री 108 आदित्यसागर जी ससंघ के किन्ही भी साधु-विशेष अथवा संघ विशेष से कोई द्वेष परिणाम नहीं है।
परंतु स्वयं के मिथ्या-अस्तित्व को स्थापित करने की लालसा एवं मंदिरों-धर्मायतनों पर क़ब्ज़ा बनाये रखने की दरिद्र-मानसिकता, साधुता की परिभाषा कहे जाने वाले निर्दोष साधुओं को भी बदनाम करने में शर्म महसूस नहीं करती।
ऐसा ही हुआ जब श्री 1008 चन्द्रप्रभु दि. जैन मंदिर, ऋद्धि-सिद्धि नगर, कोटा (राज) में मुनिसंघ के द्वारा मंदिर जी की वेदी को रजतमय बनाने हेतु आशीर्वाद एवं प्रेरणा दी गई तब सारी समाज, चातुर्मास कमेटी एवं मंदिर कमेटी ने सहर्ष स्वीकृति प्रदान की और जिनेंद्र प्रभु के मंदिर के वैभव में वृद्धि की इस विचार का स्वागत किया।
परंतु अपने अहंकार की पुष्टि ना हो पाने पर, तथाकथित-स्वघोषित ट्रस्टियों द्वारा इस कार्य में बाधा डालने का भरसक प्रयास किया गया। और जब समाज ने इन हीन-मानसिकता वाले लोगों को आड़े हाथों ले लिया तब अंत में फेमिनिज्म का पत्ता फैंक कर अपने ही घर की महिलाओं को प्यादा बना कर इस घटना को तिल का ताड़ बनाने का प्रयास किया गया।
मंदिर प्रांगण में देव-शास्त्र-गुरु की उपस्थिति के पूज्य स्थान में तथाकथित ट्रस्टी के घर की बहू के द्वारा मुनिराज से पिच्छी-कमंडल छीनने का प्रयास करना, बुजुर्ग महिला से हाथापाई करना, अभद्र शब्दों का प्रयोग करना आदि ये सब चीजें एक सोचा समझा षड्यंत्र है। जिसका उद्देश्य मात्र मुनिराज के यश को कलंकित करके स्वयं के परिवार के झूठे अस्तित्व को स्थापित करना है।
जब मुनिसंघ का पिछला चातुर्मास *राजस्थान के भीलवाड़ा* नगर में हुआ, तब भी मुनिसंघ की प्रेरणा से वहाँ पाषाण की वेदी को स्वर्णजड़ित वेदी में परिवर्तन हुआ, सैकड़ों युवाओं का नियमित रूप से अभिषेक-पूजन से जुड़ाव हुआ, एवं पंचकल्याणक आदि के माध्यम से अनेकों कीर्तिमान रचे गये। समग्र भीलवाड़ा समाज पूज्य श्रुतसंवेगी के चातुर्मास को अपने ऊपर गुरु का बड़ा उपकार मानती है। और वर्तमान में कोटा में होने वाले सभी कार्यक्रम एवं अनुष्ठानों में बृहद संख्या में अपनी उपस्थिति रखती है।
संपूर्ण कोटा एवं भारत वर्ष का जैन समाज इन हीन-मानसिकता वाले लोगों की कड़ी निंदा करता है एवं श्रुतसंवेगी श्रमण श्री 108 आदित्यसागर जी मुनिराज ससंघ की जिनशासन उन्नायक सोच एवं आध्यात्मिकता इस संपूर्ण धरा को किसी वरदान की तरह है। जिसे पा कर संपूर्ण भारत वर्ष गौरवान्वित है।
भवदीय : समस्त दिगम्बर मुनिराजों के चरण सेवक 🙏