Har Har Narmadae

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01/03/2018

You can change

Great
15/02/2018

Great

Happy Mahashivratri
13/02/2018

Happy Mahashivratri

13/02/2018
12/02/2018

महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि पर्व इस बार दो दिन 13 व 14 फरवरी को होगा। दो दिनों में व्रत किस दिन किया जाए इसे लेकर श्रद्धालु असमंजस में हैं। ज्योतिषियों के अनुसार 13 फरवरी को प्रदोष के साथ मध्य रात्रि में चतुर्दशी भी है। ऐसे में 13 फरवरी को व्रत रखना अधिक फलदायक होगा।फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। 13 फरवरी मंगलवार को रात 10:22 बजे के बाद चतुर्दशी तिथि लग जाएगी जो अगले दिन 14 फरवरी की रात 12:17 बजे तक रहेगी।
धर्मशास्त्रों में प्रदोष एवं अर्ध रात्रि में चतुर्दशी को ज्यादा महत्व दिया गया है। इस वर्ष महाशिवरात्रि का व्रत पर्व 13 एवं 14 दोनों दिन किया जा सकता है। क्योंकि दोनों के धर्मशास्त्रीय प्रमाण मिल जाएंगे। 13 फरवरी को महाशिवरात्रि का व्रत रखने वालों को 14 की सुबह पारण करना होगा और 14 को व्रत रखने वाले को 14 तारीख की शाम को ही चतुर्दशी तिथि में पारण करना होगा। प्रदोष के साथ चतुर्दशी तिथि के महत्त्व ज्यादा होने के कारण 13 को ही महाशिवरात्रि व्रत करना ज्यादा ठीक होगा। सुख समृद्धि के लिए : शिवरात्रि पर बैल को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में सुख-समृद्धि आएगी और परेशानियों का अंत होगा।

गाय पशु नही माता है
02/02/2018

गाय पशु नही माता है

ये नफरत बुरी है ना पालो इसे
दिलों में खालिश है निकालों इसे
ना तेरा ना मेरा ना इसका ना उसका
ये सबकी गौमाता है बचा लो इसे
चलो दिल्ली
रामलीला मैदान
मिशन 18 फरवरी, 2018
गौमाता राष्ट्रमाता

13/01/2018
13/01/2018

धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व -
इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है तो वहीं इस दिन खास तौर पर तिल का दान किया जाता है।

कहा जाता है कि संक्रान्ति के लिए तिल का दान सबसे शुभ माना गया है क्योंकि मान्यता है कि तिल शनि का द्रव्य है, तिल के जरिए इंसान अपने पूर्व जन्मों में किए गए पापों की माफी मांगता है, इस कारण लोग आज के दिन काला और सफेद दोनों तिल दान करते हैं।

आर्थिक स्थिति ठीक होती है तिल का लड्डू दान करने से आर्थिक स्थिति ठीक होती है, लोग निरोगी होते हैं और उन्हें मानसिक शांति मिलती है। हो सके तो संक्रांति के दिन बहते जल में तिल और गुड़ का प्रवाह करें, इससे आपके सारे कष्टों का अंत जल्द ही हो जाएगा।

उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति के दिन भोजन के रूप में खिचड़ी खाने की परम्परा है, दरअसल यूपी में चावल की पैदावार अधिक होती थी। मकर संक्रांति को नए वर्ष के रूप में मनाया जाता है इसलिए नए चावल से नए साल का स्वागत किया जाता है।

दान करते वक्त निम्नलिखित मंत्रों का जाप करना चाहिए... माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम, स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥
- SHIVANJU -9300800780

Pathmeda gou dham
03/01/2018

Pathmeda gou dham

28/11/2017

दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीक

28/11/2017

dashrath ne racha shani strotra
दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥

नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सि विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र



हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।

कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥

स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।

सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।

हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥

भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।

कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥

तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।

हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥

हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।

हैं पूज्य चरणतेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।

हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥

विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हे पूज्य देव मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।

तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥

संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।

हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥

हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।

स्वीकारो भजन मेरे।

स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की
वृष्टि।

वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥

उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।

मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥

डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

शनि पूज्य चरण तेरे॥

हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।

हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥

देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।

स्वीकारो नमन मेरे।

स्वीकारो भजन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।

बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥

सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।

स्वीकारो नमन मेरे।

हैं पूज्य चरण तेरे॥

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