28/07/2026
बौद्ध धर्म में वर्षावास का बहुत अधिक आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व है, जो मुख्य रूप से भिक्षुओं की सुरक्षा, प्रकृति की रक्षा और आत्मचिंतन से जुड़ा है। यह आषाढ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) से आश्विन पूर्णिमा तक तीन महीने की अवधि होती है।
वर्षावास का कारण और शुरुआतबुद्ध का आदेश:
भगवान बुद्ध ने इसकी शुरुआत की थी ताकि बारिश के दिनों में भिक्षु यात्रा न करें।जीव-जंतुओं की रक्षा: वर्षा ऋतु में छोटे कीड़े-मकौड़े और घास-फुस बाहर आते हैं। चलने से उन्हें या नई फसलों को नुकसान पहुँच सकता था।सुरक्षा: बाढ़ और खराब रास्तों से भिक्षुओं की रक्षा के लिए एक ही स्थान (विहार) पर रुकने का नियम बना।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्वसाधना और अध्ययन:
इन तीन महीनों में भिक्षु विहार में रहकर ध्यान (Meditation), विपश्यना और त्रिपिटक का गहन अध्ययन करते हैं।शील और अनुशासन: यह समय मन की शुद्धि, अनुशासन (विनय) और बौद्ध धर्म के वचनों को मजबूत करने का होता है।
गृहस्थों की भूमिका:
आम बौद्ध उपासक भी इस दौरान विहारों में जाकर बुद्ध वंदना करते हैं, पंचशील व अष्टशील का पालन करते हैं तथा भोजन व चीवर (वस्त्र) दान करते हैं।