27/05/2025
मैंने सुना है कि एक आदमी के घर मौत आई। उसने द्वार पर दस्तक दिया। आदमी ने भीतर से छिपे हुए पूछा, ‘कौन है?
तो मौत ने कहा कि मैं हूं, यमदूत! मृत्यु तुम्हारी! उस आदमी ने कहा, ‘धन्यवाद भगवान का! मैं समझा कि इनकम-टैक्स के लोग आये!’
मौत आ जाये, चलेगी; इनकम-टैक्स आफिस के लोग न आ जायें।
एक आदमी को लोगों ने पकड़ लिया था रास्ते पर, लुटेरों ने। और उन्होंने कहा कि ‘सीधा विकल्प है: ‘यह बंदूक तुम्हारी छाती पर है। या तो चाबी दे दो अपने खजाने की, या हम गोली मार देंगें।’ उस आदमी ने कहा कि ‘थोड़ा सोचने दो।’ अब इसमें सोचने की क्या बात है? उन्होंने कहा, ‘जल्दी करो।’ उसने कहा, ‘तो तुम गोली मार दो। क्योंकि पैसा तो मैंने बुढ़ापे के लिए बचाया है, वह मैं तुम्हें नहीं दे सकता। मर जाना ठीक है।’
तुम सोचो, तुम्हारे पास जो है उसे तुम बचाना चाहोगे, अगर तुम्हारी मौत भी आ जाये तो भी! मौत की कीमत पर भी! अगर बचाना चाहोगे तो तुम उस आदमी की हालत में हो। और मूसा ठीक ही कह रहे हैं कि जा तू अपने को भी बेच दे, देर मत कर। जो भी दस-पांच रुपये मिल सकें, क्योंकि मरने पर एक पैसा नहीं मिलेगा। जानवर तो मर कर भी बिके तो कुछ मिल सकता है; हड्डी, मांस, मज्जा का कुछ मूल्य है। आदमी बिलकुल बेकार है, उसका कोई भी मूल्य नहीं है।
अकबर को आदत थी, कोई भी फकीर आये तो वह झुककर, सिर झुकाकर नमस्कार करता था। वजीरों को बुरा लगता था। कोई भी ऐरा-गैरा फकीर, पता-ठिकाना नहीं, और यह सिर झुकाता था। आखिर उसके बड़े वजीर ने कहा कि यह अशोभन है, और आप सम्राट हैं। आपकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं। ऐरे-गैरे भिखमंगे!
अकबर ने कहा, ‘तुम एक काम करो। एक आदमी को फांसी लगने वाली है कल, उसका सिर कटेगा; तुम उस सिर को लेकर बाजार में जाओ, कोई खरीददार मिलता है या नहीं! और मिल जाये तो कितना दाम देने को तैयार है उसकी खबर करो।’
आज्ञा हुई तो वजीर लेकर सिर गया, पूरे बाजार में घूमा। जहां भी गया–छिप कर गया था। क्योंकि वजीर के हैसियत से जायेगा तो शायद खुशामदी लोग खरीद ही लें लाखों में, क्योंकि पीछे मतलब निकाल लेंगे–छिप कर गया था। न मालूम कितनी! जिस दूकान पर गया उसी पर लोगों ने कहा, ‘भाग, हट यहां से; पागल हो गया है? इसका क्या करेंगे?’
सांझ को वह लौटा और उसने कहा कि क्षमा करें, कोई खरीददार नहीं मिलता। उलटे लोग नाराज होते हैं। जिससे भी कहो कि भई खरीद लो, कुछ भी चार पैसे दे दो। वह भी कहता है, ‘भागो यहां से, हटो। यहां मत लाओ, क्या करेंगे इसका?
तो अकबर ने कहा ‘यही मेरे सिर की हालत होगी। कोई खरीददार न मिलेगा। चार पैसे कोई देने को राजी न होगा। और इसको मैं झुकाता हूं तो तुम नाराज होते हो, जिसका कोई भी मूल्य नहीं है।’
मूसा ने ठीक ही कहा उस आदमी को कि तू लाभ का दीवाना है, पैसे की तेरी पकड़ है। जा, जल्दी से अपने को बेच दे, कुछ तो बच जायेगा; मरने पर वह भी न बचेगा, कोई खरीददार न मिलेगा।
मूसा का व्यंग बड़ा गहरा है। और अपनी छाती में सम्हाल के रख लेना कि जिस शरीर के लिए तुम सारी दौड़-धूप कर रहे हो, जिस धन के लिए सारा जीवन अपना समाप्त कर रहे हो, अमूल्य समय को नष्ट कर रहे हो, अवसर को खो रहे हो, जब मौत द्वार पर आ जायेगी तो तुम्हारा लाभ, लाभ सिद्ध न होगा; तुम्हारा धन, धन सिद्ध न होगा। तब कितना बैंक में बैलेंस है इसका कोई मूल्य न होगा, तब अचानक तुम्हारे सामने सारे जीवन का भ्रम टूट जायेगा। तब तुम पाओगे व्यर्थ ही दौड़ते रहे। खिलौने इकट्ठे किए, कागज की नावें चलाईं, सब सपने टूट गये; सब इंद्रधनुष गिर गये। तब तुम अपने को दीन-हीन पाओगे; बड़े से बड़े सम्राट भी उसी दीन-हीनता में अपने को पाते हैं।
इसके पहले सम्हल जाओ। इसके पहले जाग जाओ। और जगाने वाली एक ही चीज है जगत में, और वह इस निश्चय से भर जाओ कि तुम जो भी हो, जैसे हो अभी, यह अमृत नहीं है; यह मरणधर्मा है। तुम जैसे हो, यह तुम्हारा जो अहंकार और व्यक्तित्व है, यह खो जायेगा। पानी का बबूला है। यह फूटने को ही है। कितनी देर टिकेगा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सात साल कि सत्तर साल, क्या करोगे? यह बबूला टूटेगा, यह फूटने ही वाला है। कितने बबूले फूटते रहे। तुम भी उन्हीं बबूलों की संतति हो, तुम भी खो जाओगे।
इसके पहले कि यह बबूला टूटे, तुम उसकी खोज कर लो जो कभी नष्ट नहीं होता। तुम मरणधर्मा के भीतर हो, लेकिन अमृत का स्वर तुम्हारे केंद्र पर बज रहा है। तुम परिधि को थोड़ा छोड़ो, और केंद्र की थोड़ी सुध लो। तुम थोड़ा आंख बंद करो, बाहर कम देखो, और भीतर देखो। तुम थोड़ा भीतर सुनो, वह अनाहत नाद वहां बज रहा है।
घोड़े को बेच दो, खच्चर को बेच दो, गुलाम को बेच दो, फिर उस तर्क की संगति में तो खुद को भी बेचने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। वही तो मूसा ने कहा कि ‘तेरे तर्क के हिसाब से तू अब तक जो किया है वही कर। अब तू मेरे पास मत आ। समय रहे, कुछ हो सकता है।’
एक महिला को मैं जानता हूं। बूढ़ी महिला थी और उसके मरने के एक ही दिन पहले, वह मुझे मिलने आई। और बिलकुल साफ था कि वह मर जायेगी। तो मैं उसको कहा कि अब तू व्यर्थ की बातें छोड़। अब संन्यस्त हो जा। वह मुस्कुराई, उसने कहा कि सोचूंगी। अभी तो मैं दूसरा सवाल लेकर आई हूं, मेरी बहू से बनती नहीं। ‘उसकी तू फिक्र छोड़। ज्यादा देर जीना नहीं है।’ पर उसने सब बातें सिद्धांत की समझीं। उसने कहा कि ‘अच्छा सोचूंगी, कल आऊंगी।’
और कल वह नहीं आ सकी। उसका बेटा साथ आया था। वह कल भागा हुआ आया, उसने कहा, ‘मां तो चल बसी।’ वह रो रहा था और वह कहने लगा, ‘आपने संन्यास का कहा था। और उसकी भी इच्छा तो थी, टालती रही। और कल ही आपने कहा था तो आप चल कर उसे संन्यास दे दें।’ वह भी नहीं कहता कि मुझे संन्यास दे दो! यही मजा है। वह भी नहीं कहता कि मुझे संन्यास दे दो। तो मैंने कहा, ‘चलो। लेकिन तुम्हारा क्या खयाल है खुद का?’ उसने कहा कि अभी सोचूंगा, कभी न कभी तो इस रास्ते पर तो आना ही है, लेकिन अभी बड़ी उलझनें हैं।
तथ्य सामने भी खड़े हों, तो तुम अंधे हो। इसकी मां मर गई, इसके सामने ही कल मैंने कहा था कि जिंदगी थोड़ी है और तू अब राम में डूब जा, अब मत इधर-उधर भटक। यह सुना है वह भी, और यह खुद उसके लिए ही संन्यास मांगने आया है! मर कर तो तुम सभी संन्यासी होना चाहोगे। लेकिन इसका कोई उपयोग नहीं है। मुर्दे के गले में डाली हुई माला या गेरुवे वस्त्रों का क्या अर्थ है? जो भी करना हो, वह जीते जी किया जा सकता है। जीवन का उपयोग तो तुम कचरा इकट्ठा करने में करते हो। और फिर मर कर तुम परमात्मा को पाना चाहते हो।
इस कहानी को समझने की कोशिश करना। तुमने घोड़े, खच्चर, गुलाम सब बचा लिए हैं, ज्यादा देर न लगेगी। अब जब भी कहीं मुर्गा बोलता हुआ दिखाई पड़े तो उससे पूछना, ‘मैं कब मरूंगा?’
और हर मुर्गा यही कह रहा है कि तुम मरोगे। और भाषा भी तुम समझते हो। चारों तरफ एक ही बात तो गूंज रही है कि मृत्यु के सिवाय यहां कुछ भी नहीं घटता। जन्म के साथ ही मौत जुड़ी है। तुम एक अर्थ में मर ही चुके हो, आधे उसी दिन मर गये जिस दिन पैदा हुए; आधा काम बाकी है, वह किसी दिन भी पूरा हो जायेगा। जिस शरीर में तुम बैठे हो, यह प्रतिपल मर रहा है। किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो? और थोड़ा लाभ कर लेना, और थोड़ा दूसरों की हानि कर देनी है। और थोड़ा इकट्ठा कर लेना, फिर तुम बदलोगे? तो तुम कभी भी न बदलोगे। और फिर अगर तुम मेरे पास आये तो मैं भी तुमसे यही कहूंगा कि जाओ, और अपने को भी बेच दो।
अभी वक्त है। अभी तुमने घोड़ा बेचा, खच्चर बेचा, गुलाम बेचा, अभी थोड़ा वक्त है, ज्यादा देर नहीं लगेगी। वह वक्त भी प्रतिपल खोया जा रहा है। रेत तुम्हारे पैर के नीचे से खिसकती जा रही है। क्यू आगे बढ़ता जा रहा है। लोग वहां सामने क्यू में हटते जाते हैं, मरते जाते हैं। तुम उसी क्यू में खड़े हो, जल्दी ही तुम भी आ जाओगे। देर नहीं है मौत के आने में। और जो व्यक्ति सजग हो जाता है, और मौत को अपने जीवन के एक वास्तविक तथ्य की तरह स्वीकार कर लेता है कि वह घटेगी, उसके जीवन में क्रांति शुरू हो जाती है।
तुम मौत को याद रखो, वही तुम्हारा ध्यान बन जाये। तुम पाओगे जीवन बदलने लगा। क्रोध मुश्किल हो जायेगा, किस पर क्रोध करना है? शोषण मुश्किल हो जायेगा, किसका शोषण करना है? किसके लिए शोषण करना है? हानि-लाभ बच्चों की बातें हो जायेंगी।
तुम जीओगे यहीं, लेकिन अगर मौत तुम्हें याद रहे, तो तुम सारा…चारों तरफ पाओगे कि एक बड़ा सपना है। लंबा चलता है, लेकिन है सपना। तुम्हारे भीतर द्रष्टा धीरे-धीरे जगने लगेगा। मौत की जिसे याद आई, वह साक्षी बन जाता है। मौत को जो भूला, वह कर्ता बन जाता है। मौत की जिसे याद आई, वह असली लाभ की तरफ लग जाता है; मौत जिसे भूली, वह व्यर्थ के लाभ में उलझा रह जाता है। और मौत के पीछे छिपा है अमृत का द्वार। वह तुम्हें याद आ जाये तो अमृत ज्यादा दूर नहीं है। वह उसी का दूसरा पहलू है।
आज इतना ही।
ओशो; दीया तले अंधेरा-(प्रवचन-13)