हरी ओम

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18/08/2025
बंगाल में एक बहुत अनूठे संन्यासी हुए, युक्तेश्वर गिरि। वे योगानंद के गुरु थे। योगानंद ने पश्चिम में फिर बहुत ख्याति पाई।...
05/06/2025

बंगाल में एक बहुत अनूठे संन्यासी हुए, युक्तेश्वर गिरि। वे योगानंद के गुरु थे। योगानंद ने पश्चिम में फिर बहुत ख्याति पाई। गिरि अदभुत आदमी थे। ऐसा हुआ एक दिन कि गिरि का एक शिष्य गांव में गया। किसी शैतान आदमी ने उसको परेशान किया, पत्थर मारा, मार-पीट भी कर दी। वह यह सोचकर कि मैं संन्यासी हूं क्या उत्तर देना, चुपचाप वापस लौट आया। और फिर उसने सोचा कि जो होने वाला है, वह हुआ होगा, मैं क्यों अकारण बीच में आऊं। तो वह अपने को सम्हाल लिया। सिर पर चोट आ गई थी। खून भी थोड़ा निकल आया था। खरोंच भी लग गई थी। लेकिन यह मानकर कि जो होना है, होगा। जो होना था, वह हो गया है। वह भूल ही गया।
जब वह वापस लौटा आश्रम कहीं से भिक्षा मांगकर, तो वह भूल ही चुका था कि रास्ते में क्या हुआ। गिरि ने देखा कि उसके चेहरे पर चोट है, तो उन्होंने पूछा, यह चोट कहां लगी? तो उसे एकदम से खयाल ही नहीं आया उसे कि क्या हुआ। फिर उसे खयाल आया। उसने कहा कि आपने अच्छी याद दिलाई। रास्ते में एक आदमी ने मुझे मारा। तो गिरि ने पूछा, लेकिन तू भूल गया इतनी जल्दी! तो उसने कहा कि मैंने सोचा कि जो होना था, वह हो गया। और जो होना ही था, वह हो गया, अब उसको याद भी क्या रखना! अतीत भी निश्चिंतता से भर जाता है, भविष्य भी। लेकिन एक और बड़ी बात इस घटना में है आगे।

गिरि ने उसको कहा, लेकिन तूने अपने को रोका तो नहीं था? जब वह तुझे मार रहा था, तूने क्या किया? तो उसने कहा कि एक क्षण तो मुझे खयाल आया था कि एक मैं भी लगा दूं। फिर मैंने अपने को रोका कि जो हो रहा है, होने दो। तो गिरि ने कहा कि फिर तूने ठीक नहीं किया। फिर तूने थोड़ा रोका। जो हो रहा था, वह पूरा नहीं होने दिया। तूने थोड़ी बाधा डाली। उस आदमी के कर्म में तूने बाधा डाली, गिरि ने कहा।

उसने कहा, मैंने बाधा डाली! मैंने उसको मारा नहीं, और तो मैंने कुछ किया नहीं। क्या आप कहते हैं, मुझे मारना था! गिरि ने कहा, मैं यह कुछ नहीं कहता। मैं यह कहता हूं जो होना था, वह होने देना था। और तू वापस जा, क्योंकि तू तो निमित्त था। कोई और उसको मार रहा होगा।

और बड़े मजे की बात है कि वह संन्यासी वापस गया। वह आदमी बाजार में पिट रहा था। लौटकर वह गिरि के पैरों में पड़ गया। और उसने कहा कि यह क्या मामला है?

गिरि ने कहा कि जो तू नहीं कर पाया, वह कोई और कर रहा है। तू क्या सोचता है, तेरे बिना नाटक बंद हो जाएगा!

तू निमित्त था।

बड़ी अजीब बात है यह। और सामान्य नीति के नियमों के बड़े पार चली जाती है।

कृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि जो होता है, तू होने दे। तू मत कह कि ऐसा करूं, वैसा करूं, संन्यासी हो जाऊं, छोड़ जाऊं। कृष्‍ण उसको रोक नहीं रहे हैं संन्यास लेने से। क्योंकि अगर संन्यास होना ही होगा, तो कोई नहीं रोक सकता, वह हो जाएगा।

इस बात को ठीक से समझ लें।

अगर संन्यास ही घटित होने को हो अर्जुन के लिए, तो कृष्ण रोकने वाले नहीं हैं। वे सिर्फ इतना कह रहे हैं कि तू चेष्टा करके कुछ मत कर। तू निश्चेष्ट भाव से, निमित्त मात्र हो जा और जो होता है, वह हो जाने दे। अगर युद्ध हो, तो ठीक। और अगर तू भाग जाए और संन्यास ले ले, तो वह भी ठीक। तू बीच में मत आ, तू स्रष्टा मत बन। तू केवल निमित्त हो!

~आचार्य रजनीश [ओशो]

"गीता दर्शन"

मैंने सुना है कि एक आदमी के घर मौत आई। उसने द्वार पर दस्तक दिया। आदमी ने भीतर से छिपे हुए पूछा, ‘कौन है?तो मौत ने कहा कि...
27/05/2025

मैंने सुना है कि एक आदमी के घर मौत आई। उसने द्वार पर दस्तक दिया। आदमी ने भीतर से छिपे हुए पूछा, ‘कौन है?

तो मौत ने कहा कि मैं हूं, यमदूत! मृत्यु तुम्हारी! उस आदमी ने कहा, ‘धन्यवाद भगवान का! मैं समझा कि इनकम-टैक्स के लोग आये!’

मौत आ जाये, चलेगी; इनकम-टैक्स आफिस के लोग न आ जायें।

एक आदमी को लोगों ने पकड़ लिया था रास्ते पर, लुटेरों ने। और उन्होंने कहा कि ‘सीधा विकल्प है: ‘यह बंदूक तुम्हारी छाती पर है। या तो चाबी दे दो अपने खजाने की, या हम गोली मार देंगें।’ उस आदमी ने कहा कि ‘थोड़ा सोचने दो।’ अब इसमें सोचने की क्या बात है? उन्होंने कहा, ‘जल्दी करो।’ उसने कहा, ‘तो तुम गोली मार दो। क्योंकि पैसा तो मैंने बुढ़ापे के लिए बचाया है, वह मैं तुम्हें नहीं दे सकता। मर जाना ठीक है।’

तुम सोचो, तुम्हारे पास जो है उसे तुम बचाना चाहोगे, अगर तुम्हारी मौत भी आ जाये तो भी! मौत की कीमत पर भी! अगर बचाना चाहोगे तो तुम उस आदमी की हालत में हो। और मूसा ठीक ही कह रहे हैं कि जा तू अपने को भी बेच दे, देर मत कर। जो भी दस-पांच रुपये मिल सकें, क्योंकि मरने पर एक पैसा नहीं मिलेगा। जानवर तो मर कर भी बिके तो कुछ मिल सकता है; हड्डी, मांस, मज्जा का कुछ मूल्य है। आदमी बिलकुल बेकार है, उसका कोई भी मूल्य नहीं है।

अकबर को आदत थी, कोई भी फकीर आये तो वह झुककर, सिर झुकाकर नमस्कार करता था। वजीरों को बुरा लगता था। कोई भी ऐरा-गैरा फकीर, पता-ठिकाना नहीं, और यह सिर झुकाता था। आखिर उसके बड़े वजीर ने कहा कि यह अशोभन है, और आप सम्राट हैं। आपकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं। ऐरे-गैरे भिखमंगे!

अकबर ने कहा, ‘तुम एक काम करो। एक आदमी को फांसी लगने वाली है कल, उसका सिर कटेगा; तुम उस सिर को लेकर बाजार में जाओ, कोई खरीददार मिलता है या नहीं! और मिल जाये तो कितना दाम देने को तैयार है उसकी खबर करो।’

आज्ञा हुई तो वजीर लेकर सिर गया, पूरे बाजार में घूमा। जहां भी गया–छिप कर गया था। क्योंकि वजीर के हैसियत से जायेगा तो शायद खुशामदी लोग खरीद ही लें लाखों में, क्योंकि पीछे मतलब निकाल लेंगे–छिप कर गया था। न मालूम कितनी! जिस दूकान पर गया उसी पर लोगों ने कहा, ‘भाग, हट यहां से; पागल हो गया है? इसका क्या करेंगे?’

सांझ को वह लौटा और उसने कहा कि क्षमा करें, कोई खरीददार नहीं मिलता। उलटे लोग नाराज होते हैं। जिससे भी कहो कि भई खरीद लो, कुछ भी चार पैसे दे दो। वह भी कहता है, ‘भागो यहां से, हटो। यहां मत लाओ, क्या करेंगे इसका?

तो अकबर ने कहा ‘यही मेरे सिर की हालत होगी। कोई खरीददार न मिलेगा। चार पैसे कोई देने को राजी न होगा। और इसको मैं झुकाता हूं तो तुम नाराज होते हो, जिसका कोई भी मूल्य नहीं है।’

मूसा ने ठीक ही कहा उस आदमी को कि तू लाभ का दीवाना है, पैसे की तेरी पकड़ है। जा, जल्दी से अपने को बेच दे, कुछ तो बच जायेगा; मरने पर वह भी न बचेगा, कोई खरीददार न मिलेगा।

मूसा का व्यंग बड़ा गहरा है। और अपनी छाती में सम्हाल के रख लेना कि जिस शरीर के लिए तुम सारी दौड़-धूप कर रहे हो, जिस धन के लिए सारा जीवन अपना समाप्त कर रहे हो, अमूल्य समय को नष्ट कर रहे हो, अवसर को खो रहे हो, जब मौत द्वार पर आ जायेगी तो तुम्हारा लाभ, लाभ सिद्ध न होगा; तुम्हारा धन, धन सिद्ध न होगा। तब कितना बैंक में बैलेंस है इसका कोई मूल्य न होगा, तब अचानक तुम्हारे सामने सारे जीवन का भ्रम टूट जायेगा। तब तुम पाओगे व्यर्थ ही दौड़ते रहे। खिलौने इकट्ठे किए, कागज की नावें चलाईं, सब सपने टूट गये; सब इंद्रधनुष गिर गये। तब तुम अपने को दीन-हीन पाओगे; बड़े से बड़े सम्राट भी उसी दीन-हीनता में अपने को पाते हैं।

इसके पहले सम्हल जाओ। इसके पहले जाग जाओ। और जगाने वाली एक ही चीज है जगत में, और वह इस निश्चय से भर जाओ कि तुम जो भी हो, जैसे हो अभी, यह अमृत नहीं है; यह मरणधर्मा है। तुम जैसे हो, यह तुम्हारा जो अहंकार और व्यक्तित्व है, यह खो जायेगा। पानी का बबूला है। यह फूटने को ही है। कितनी देर टिकेगा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सात साल कि सत्तर साल, क्या करोगे? यह बबूला टूटेगा, यह फूटने ही वाला है। कितने बबूले फूटते रहे। तुम भी उन्हीं बबूलों की संतति हो, तुम भी खो जाओगे।

इसके पहले कि यह बबूला टूटे, तुम उसकी खोज कर लो जो कभी नष्ट नहीं होता। तुम मरणधर्मा के भीतर हो, लेकिन अमृत का स्वर तुम्हारे केंद्र पर बज रहा है। तुम परिधि को थोड़ा छोड़ो, और केंद्र की थोड़ी सुध लो। तुम थोड़ा आंख बंद करो, बाहर कम देखो, और भीतर देखो। तुम थोड़ा भीतर सुनो, वह अनाहत नाद वहां बज रहा है।

घोड़े को बेच दो, खच्चर को बेच दो, गुलाम को बेच दो, फिर उस तर्क की संगति में तो खुद को भी बेचने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। वही तो मूसा ने कहा कि ‘तेरे तर्क के हिसाब से तू अब तक जो किया है वही कर। अब तू मेरे पास मत आ। समय रहे, कुछ हो सकता है।’

एक महिला को मैं जानता हूं। बूढ़ी महिला थी और उसके मरने के एक ही दिन पहले, वह मुझे मिलने आई। और बिलकुल साफ था कि वह मर जायेगी। तो मैं उसको कहा कि अब तू व्यर्थ की बातें छोड़। अब संन्यस्त हो जा। वह मुस्कुराई, उसने कहा कि सोचूंगी। अभी तो मैं दूसरा सवाल लेकर आई हूं, मेरी बहू से बनती नहीं। ‘उसकी तू फिक्र छोड़। ज्यादा देर जीना नहीं है।’ पर उसने सब बातें सिद्धांत की समझीं। उसने कहा कि ‘अच्छा सोचूंगी, कल आऊंगी।’

और कल वह नहीं आ सकी। उसका बेटा साथ आया था। वह कल भागा हुआ आया, उसने कहा, ‘मां तो चल बसी।’ वह रो रहा था और वह कहने लगा, ‘आपने संन्यास का कहा था। और उसकी भी इच्छा तो थी, टालती रही। और कल ही आपने कहा था तो आप चल कर उसे संन्यास दे दें।’ वह भी नहीं कहता कि मुझे संन्यास दे दो! यही मजा है। वह भी नहीं कहता कि मुझे संन्यास दे दो। तो मैंने कहा, ‘चलो। लेकिन तुम्हारा क्या खयाल है खुद का?’ उसने कहा कि अभी सोचूंगा, कभी न कभी तो इस रास्ते पर तो आना ही है, लेकिन अभी बड़ी उलझनें हैं।

तथ्य सामने भी खड़े हों, तो तुम अंधे हो। इसकी मां मर गई, इसके सामने ही कल मैंने कहा था कि जिंदगी थोड़ी है और तू अब राम में डूब जा, अब मत इधर-उधर भटक। यह सुना है वह भी, और यह खुद उसके लिए ही संन्यास मांगने आया है! मर कर तो तुम सभी संन्यासी होना चाहोगे। लेकिन इसका कोई उपयोग नहीं है। मुर्दे के गले में डाली हुई माला या गेरुवे वस्त्रों का क्या अर्थ है? जो भी करना हो, वह जीते जी किया जा सकता है। जीवन का उपयोग तो तुम कचरा इकट्ठा करने में करते हो। और फिर मर कर तुम परमात्मा को पाना चाहते हो।

इस कहानी को समझने की कोशिश करना। तुमने घोड़े, खच्चर, गुलाम सब बचा लिए हैं, ज्यादा देर न लगेगी। अब जब भी कहीं मुर्गा बोलता हुआ दिखाई पड़े तो उससे पूछना, ‘मैं कब मरूंगा?’

और हर मुर्गा यही कह रहा है कि तुम मरोगे। और भाषा भी तुम समझते हो। चारों तरफ एक ही बात तो गूंज रही है कि मृत्यु के सिवाय यहां कुछ भी नहीं घटता। जन्म के साथ ही मौत जुड़ी है। तुम एक अर्थ में मर ही चुके हो, आधे उसी दिन मर गये जिस दिन पैदा हुए; आधा काम बाकी है, वह किसी दिन भी पूरा हो जायेगा। जिस शरीर में तुम बैठे हो, यह प्रतिपल मर रहा है। किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो? और थोड़ा लाभ कर लेना, और थोड़ा दूसरों की हानि कर देनी है। और थोड़ा इकट्ठा कर लेना, फिर तुम बदलोगे? तो तुम कभी भी न बदलोगे। और फिर अगर तुम मेरे पास आये तो मैं भी तुमसे यही कहूंगा कि जाओ, और अपने को भी बेच दो।

अभी वक्त है। अभी तुमने घोड़ा बेचा, खच्चर बेचा, गुलाम बेचा, अभी थोड़ा वक्त है, ज्यादा देर नहीं लगेगी। वह वक्त भी प्रतिपल खोया जा रहा है। रेत तुम्हारे पैर के नीचे से खिसकती जा रही है। क्यू आगे बढ़ता जा रहा है। लोग वहां सामने क्यू में हटते जाते हैं, मरते जाते हैं। तुम उसी क्यू में खड़े हो, जल्दी ही तुम भी आ जाओगे। देर नहीं है मौत के आने में। और जो व्यक्ति सजग हो जाता है, और मौत को अपने जीवन के एक वास्तविक तथ्य की तरह स्वीकार कर लेता है कि वह घटेगी, उसके जीवन में क्रांति शुरू हो जाती है।

तुम मौत को याद रखो, वही तुम्हारा ध्यान बन जाये। तुम पाओगे जीवन बदलने लगा। क्रोध मुश्किल हो जायेगा, किस पर क्रोध करना है? शोषण मुश्किल हो जायेगा, किसका शोषण करना है? किसके लिए शोषण करना है? हानि-लाभ बच्चों की बातें हो जायेंगी।

तुम जीओगे यहीं, लेकिन अगर मौत तुम्हें याद रहे, तो तुम सारा…चारों तरफ पाओगे कि एक बड़ा सपना है। लंबा चलता है, लेकिन है सपना। तुम्हारे भीतर द्रष्टा धीरे-धीरे जगने लगेगा। मौत की जिसे याद आई, वह साक्षी बन जाता है। मौत को जो भूला, वह कर्ता बन जाता है। मौत की जिसे याद आई, वह असली लाभ की तरफ लग जाता है; मौत जिसे भूली, वह व्यर्थ के लाभ में उलझा रह जाता है। और मौत के पीछे छिपा है अमृत का द्वार। वह तुम्हें याद आ जाये तो अमृत ज्यादा दूर नहीं है। वह उसी का दूसरा पहलू है।

आज इतना ही।

ओशो; दीया तले अंधेरा-(प्रवचन-13)

युगों-युगों से ही लोगों में परमात्मा को जानने की जिज्ञासा चली आ रही हैं, हमारे धार्मिक ग्रंथों में वर्णित मिलता हैं की य...
19/05/2025

युगों-युगों से ही लोगों में परमात्मा को जानने की जिज्ञासा चली आ रही हैं, हमारे धार्मिक ग्रंथों में वर्णित मिलता हैं की यह संसार एक जीवन और मृत्यु का चक्र हैं जिसमे जीवात्मा झुझती हैं, पुण्यकर्म के फलस्वरूप जीवात्मा सुखदायक योनि में जन्म लेती और और पापकर्म करने पर नर्क के कष्ट और यातना भोगती है या कष्टदायक योनि में जन्म लेती हैं। लेकिन यह तो बात हुई कर्मबंधन और सांसारिक विषयों के आसक्ति की जो जीवात्मा को जीवन में भोगने पड़ते हैं।

साधकों इस जीवन मरण के चक्र से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति अपने जीवन में मोक्ष या परमात्मा को उपलब्ध होना चाहते हैं, और वह व्यक्ति परमात्मा की भक्ति में लग जाता हैं।

परमात्मा कौन हैं –

परमात्मा वह है जिसने इस समस्त संसार और इस संसार के समस्त जीवों को अपने पर धारण किया हैं और समस्त जीवों का पालनहार है, धर्म ग्रंथों और श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार परमात्मा निर्गुण, निर्लेप, अविनाशी, अद्वैत सर्वव्यापी और परमसत्य है, परमात्मा हमारे मन बुद्धि से भी परे हैं।

अन्य – जीवात्मा, आत्मा और परमात्मा में अंतर

परमात्मा सृष्टि के कण-कण में तथा क्षण-क्षण विराजमान है, सम्पूर्ण सृष्टि में गतिशीलता है यह परमात्मा के कारण हैं। सम्पूर्ण जगत परमात्मा के अनुसार वर्तता है यह परमात्मा के माया शक्ति से उत्त्पन होता है, गतिशील रेहेता हैं तथा लय को प्राप्त हो जाता हैं । परमात्मा समस्त कार्यों का कर्ता है, संसार में जो कुछ होता है यह परमात्मा के कारण ही हैं, किन्तु इसके अलावा भी परमात्मा अकर्ता ही हैं। परमात्मा अपने अनुसार सभी कार्यों का कर्ता नहीं हैं, बल्कि यह सभी समस्त कार्य माया के कारण परमात्मा के अनुसार संपन्न होते हैं।

भौतिक संसार माया के अधीन हैं किंतु परमात्मा माया के अधीन नहीं परमात्मा भौतिक संसार माया के परे हैं। माया परमात्मा पर शासन नहीं कर सकती, इसका सृजन ही परमात्मा के कारण हैं, माया परमात्मा के अधीन हैं।

जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का वर्चस्व स्थापित होने लगता है साधुओं का उद्धार और दृष्टों का संहार करने के लिए तथा धर्म की स्थापना के लिए परमात्मा सगुण रूप लेकर संसार में प्रकट होता हैं, इसे इश्वर ( भगवान ) भी कहा जाता हैं । परमात्मा के जन्म और कर्म दिव्य है यह माया के अनुसार नहीं कार्यरत होते है बल्कि माया को अधीन कर कार्यरत होते हैं।

परमात्मा समस्त जीवों के हृदय के आसिन हैं और सबका पालन पोषण करता हैं। परमात्मा के ये शरीर असत् (नाशवान) हैं, किंतु परमात्मा शाश्वत हैं। जीवों की तरह परमात्मा जन्म और मृत्यु के चक्र में नहीं होता हैं , जीवात्मा संसार में जन्म लेता हैं परमात्मा परम सत्य हैं, जीवात्मा समस्त संसार का शरीर भोक्ता मानता है, कर्म के फल , आसक्तियां और अहंकार के कारण जन्म प्राप्त करता है परमात्मा इसे धारण करता है किंतु परमात्मा इसके परे हैं।

स्वयं में परमात्मा की झलक कैसे पाए?

साधकों परमात्मा कौन है? या परमात्मा क्या हैं? यह सवाल आपके अंदर से आया हैं और इसका उत्तर प्राप्त करने के लिए आपको किसी और को आवश्कता नहीं है, इस प्रश्न का उत्तर भी आपको आपके भीतर से ही प्राप्त होता हैं, क्योंकि परमात्मा आपके भीतर ही है फिर इसे जानने के लिए आपको किसी और की क्या आवश्कता हैं।

अगर आपके मन में यू ही परमात्मा को जानने की जिज्ञासा हुई और आपको पता चला कि परमात्मा को आप स्वयं के द्वारा ही जान सकते हैं और आप लग गए परमात्मा तक पहुंचने में तो यह संभवतः कठिन हो सकता हैं।

परमात्मा आपके भीतर विराजमान है। परमात्मा को हम आत्मा ही बोल सकते है। यह आपके जीवन का कारण है। जब योगी आत्मा के दर्शन करता है या आत्मज्ञान प्राप्त करता है । तो उसे परमात्मा के दर्शन होते है । आत्मा में परमात्मा को झलक पाने के लिए या परमात्मा तक पहुंचने के लिए आपको ध्यान, साधना, भक्ति, या परमात्मा के प्रति प्रेम और पूर्णसमर्पण की आवश्कता हैं।

जब योगी ध्यान करता हैं तब वह स्वयं के अहंकार को नष्ट करके परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण करता है , स्वयं का अहंकार ( स्वयं को “मैं” मानना ) नष्ट हो जाता है। तब योगी परम चेतना के अस्तित्व को जनता है। भौतिक शरीर का हमारा अहंकार नष्ट होते है योगी आत्म साक्षत्कार करता है ।

जब योगी आत्मा के दर्शन करता है तो वह इस आत्मा में परमात्मा की झलक पता है। और “मै” को भूल कर परमात्मा के साथ एक हो जाता हैं या यूं कह सकते हैं की योगी स्वयं परमात्मा बन जाता हैं।

अगर आज के युग के किसी व्यक्ति की बात करें तो उसे परमात्मा को उपलब्ध होना थोड़ा कठिन हो सकता हैं और इसका कारण आपसे छिपा नहीं हैं, फिर भी ऐसे कई योगी है । जिन्होंने परमात्मा को पा लिया हैं।

जब योगी ध्यान अवस्था में होता हैं कोई मंत्र जाप करता हैं। तब वह एकाग्र होकर अपने मन और मस्तिष्क के विचारों से पूर्ण रूप से मुक्त हो जाता हैं। और स्वयं को इस भौतिक संसार के सभी मोह, कर्म, रिश्तेनातों अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियों से परें परम चेतना के रूप में जनता है, और चेतना में ही स्थित हो जाता है। ध्यान की इस उच्चतम अवस्था को चैतन्य समाधी कहा जाता हैं।

परमात्मा आपसे ज्यादा दूर नहीं है बल्कि यह आपके इतना पास है जितना इस संसार में कोई भी आपके पास नही हो सकता हैं, बस देरी है तो परमात्मा को उपलब्ध होने की या यूं कह लें परमात्मा में एक हो जाने की तो अब शुरवात करने के लिए आपको परमात्मा की भक्ति करने से आप परमात्मा को पा कर सकते है। परमात्मा के प्रति समर्पण भाव से आप परमात्मा को उपलब्ध होते हैं।

अपने ऐसे कई लोगों को देखा होगा जो भगवान की भक्ति पूजा, जाप करते हैं लेकिन यह लोग ईश्वर से कामना रखते हैं जिसे उन्हें ईश्वर द्वारा जीवन में सभी सुख प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन क्या यह भक्ति सच में भक्ति हैं ,नहीं यह स्वार्थ हैं। अगर कोई स्वयं के लिए किसीसे कामना रखता है तो वो इस परम चेतना को कैसे पा सकता है।

भक्ति प्रेम और समर्पण से की जाती हैं जिससे भक्त परमात्मा को उपलब्ध होता हैं जब भक्त को अपने भगवान के भक्ति में ही चरम सुख मिले तब समझलेना भक्त को परमात्मा को पाना ज्यादा दूर नहीं हैं। क्योंकि भक्त भीतर का यह प्रेम और भक्ति ही परमात्मा हैं।

जय श्री राधे 🙏

अगर कर्ता का भाव गिर जाये, तो जीवन की सारी बीमारियां गिर जाती हैं; अन्यथा जीवन में बड़े जाल हैं। धन की दौड़ भी कर्ता की दौ...
18/05/2025

अगर कर्ता का भाव गिर जाये, तो जीवन की सारी बीमारियां गिर जाती हैं; अन्यथा जीवन में बड़े जाल हैं। धन की दौड़ भी कर्ता की दौड़ है। पद की दौड़ भी कर्ता की दौड़ है। प्रतिष्ठा की दौड़ भी कर्ता की दौड़ है। तुम दुनिया को कुछ करके दिखाना चाहते हो।

मेरे पास कई लोग आ जाते हैं, वे कहते हैं कि ऐसा कुछ मार्ग दें कि दुनिया में कुछ करके दिखा जायें। क्या करके दिखाना चाहते हो? कि नहीं, वे कहते हैं कि ‘नाम रह जाये। हम तो चले जायेंगे, लेकिन नाम रह जाए!’ नाम रहने से क्या प्रयोजन? तुम्हारे नाम में और किसी की कोई उत्सुकता नहीं है, सिवाय तुम्हारे। जब तुम्हीं चले गये, कौन फिक्र करता है! जब तुम्हीं न बचोगे, तो तुम्हारा नाम क्या खाक बचेगा?

तुम न बचे, जीवंत, तो नाम तो केवल तख्ती थी, वह क्या खाक बचेगा? कौन फिक्र करता है तुम्हारे नाम की? और नाम बच भी गया तो क्या सार है? किन्हीं किताबों में दबा पड़ा रहेगा, तड़फेगा वहां! सिकंदर का नाम है, नेपोलियन का नाम है—क्या सार है? नहीं, लेकिन हमें बचपन से ये रोग सिखाये गये हैं। बचपन से यह कहा गया है : ‘कुछ करके मरना, बिना करे मत मर जाना! अच्छा हो तो अच्छा, नहीं तो बुरा करके मरना, लेकिन नाम छोड़ जाना।

‘ लोग कहते हैं, ‘बदनाम हुए तो क्या, कुछ नाम तो होगा ही। अगर ठीक रास्ता न मिले, तो उलटे रास्ते से कुछ करना, लेकिन नाम छोड़ कर जाना!’ लोग ऐसे दीवाने हैं कि पहाड़ जाते हैं, तो पत्थर पर नाम खोद आते हैं। पुराना किला देखने जाते हैं, तो दीवालों पर नाम लिख आते हैं। और जो आदमी नाम लिख रहा है, वह यह भी नहीं देखता कि दूसरे नाम पोंछ कर लिख रहा है। तुम्हारा नाम कोई दूसरा पोंछ कर लिख जायेगा। तुम दूसरे का पोंछ कर लिख रहे हो। दूसरों के लिखे हैं, उनके ऊपर तुम अपना लिख रहे हो—और मोटे अक्षरों में; कोई और आ कर उससे मोटे अक्षरों में लिख जायेगा। किस पागलपन में पड़े हो?

अष्टावक्र महागीता~
भाग-१ ~
प्रवचन-८ ~

ओशो.....♡

जब अपमान किया जाए, तब क्रोध में न आना कठिन हैक्रोध बहुत आसान है — बिल्कुल यांत्रिक। आपको उसमें कोई सजगता नहीं चाहिए, यह ...
20/04/2025

जब अपमान किया जाए, तब क्रोध में न आना कठिन है

क्रोध बहुत आसान है — बिल्कुल यांत्रिक। आपको उसमें कोई सजगता नहीं चाहिए, यह स्वचालित होता है। किसी ने आपका अपमान किया, और आप क्रोधित हो गए।
बुद्ध कहते हैं — कोशिश करो, जब कोई तुम्हारा अपमान करे, तब शांत और स्थिर बने रहो। इसे एक अवसर के रूप में देखो, अपने यांत्रिक ढर्रे से बाहर आने का अवसर। यह तुम्हारी चेतना को गहरा करने का एक सुंदर अवसर है — इसे मत गंवाओ।

जब भी तुम्हें कोई ऐसा क्षण मिले जहां स्वाभाविक रूप से तुम यांत्रिक बन सकते हो, वहां जागो, सजग हो जाओ। यही तुम्हारी आत्म-विकास की सीढ़ी बनेगा।

जानवर भी क्रोधित हो जाते हैं, इसमें क्या विशेष बात है? विशेष तो तब है जब कोई तुम्हारा अपमान करे और तुम भीतर से शांत रहो। भीतर जो यांत्रिक क्रिया चल रही है, उसे देखो, उससे अलग हो जाओ। यही तुम्हारी चेतना की शुरुआत होगी।

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अपने अधिकार का दुरुपयोग न करना कठिन है

कठिन है, क्योंकि अक्सर वही लोग सत्ता की ओर आकर्षित होते हैं जो उसे दुरुपयोग करना चाहते हैं।
अगर तुम्हारे पास कोई भी अधिकार है — ध्यान दो।
यह देखा गया है कि बहुत छोटी-सी सत्ता भी व्यक्ति को भ्रष्ट कर देती है।
मान लो, तुम एक ट्रैफिक कांस्टेबल हो, फिर भी तुम अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर सकते हो।

हर मानवीय संबंध में लोग अपनी सत्ता का प्रयोग कर रहे हैं — किसी पर हुक्म चलाकर या किसी के हुक्म को सहकर।
अगर बॉस ऑफिस में तुम्हें डांट देता है, तो तुम घर आकर पत्नी पर गुस्सा निकालते हो। अगर पत्नी दब्बू है, तो वह बच्चे पर चिल्लाती है। और बच्चा? वह खिलौनों को तोड़ता है क्योंकि उसी पर उसका हक चलता है!
यह सतत चक्र चलता रहता है। यही राजनीति है।

अगर तुम अपनी सत्ता का दुरुपयोग नहीं करते, तो तुम असली अर्थों में अराजनीतिक (non-political) हो।
जैसे ही तुम सजग हो जाते हो कि मैं अपनी शक्ति का उपयोग कैसे कर रहा हूँ — एक नयी रोशनी आती है। वह तुम्हें भीतर से शांत, स्थिर और सहज बना देती है।

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दूसरों से व्यवहार करते समय समभाव और सरलता बनाए रखना कठिन है

जब तुम अकेले हो, तो सरल होना आसान है। शायद इसलिए लोग हिमालय चले जाते हैं या मठों में बस जाते हैं — दुनिया से अलग होकर।
लेकिन जब तुम अकेले हो तो तुम झूठ नहीं बोल सकते, छल नहीं कर सकते, अहंकार नहीं दिखा सकते — पर इसका मतलब यह नहीं कि तुम बदल गए।

वास्तविक परीक्षा तो संसार में है।

दुनिया से भागने से कुछ नहीं बदलता। परिस्थिति को नहीं, अपने भीतर की चेतना को बदलो।
लोगों के बीच रहकर सरल रहना, ईमानदार रहना, समभाव में रहना — यही असली साधना है।

ओशो

कल मैं एक कहानी पढ़ रहा था, एक यहूदी कहानी। दो यहूदी मित्र, दोनों ने धंधा शुरू किया। एक तो गरीब ही था बीस साल के बाद। दूस...
09/01/2025

कल मैं एक कहानी पढ़ रहा था, एक यहूदी कहानी। दो यहूदी मित्र, दोनों ने धंधा शुरू किया। एक तो गरीब ही था बीस साल के बाद। दूसरा बहुत अमीर हो गया था। कभी—कभी अमीर मित्र गरीब के द्वार पर आकर रुकता था।

एक सांझ आकर रुका। रविवार है। उसने अपनी केडिलक गाड़ी आकर रोकी मित्र के द्वार पर। अंदर आया। उसके कपड़े शानदार। इत्र की खुशबू। मित्र की दुकान तो हालत खस्ता। आधी दुकान तो खाली सी पड़ी। अलमारियों में भी कुछ नहीं, धूल जमी।

धनी मित्र ने कहा कि भई, बात क्या है? हम दोनों ने एक सा ही काम शुरू किया था और एक सी पूंजी से काम शुरू किया था। मेरी हालत देख—धन है कि बढ़ता चला जाता है। तू गरीब क्यों हुआ चला जाता है?

उस गरीब मित्र ने कहा कि जो कुछ मैं कर सकता हूं, करता हूं। आप ही बताओ राज क्या है? तुम्हारी सफलता का राज क्या है?

तो धनी मित्र ने कहा कि मेरी सफलता का राज यह है कि जिस दिन मैंने धंधा शुरू किया, मैंने परमात्मा की याद से शुरू किया। मैंने उसको साझीदार बना लिया है। मैं अकेला नहीं हूं; उसको साझीदार बना लिया है। और दस रुपये महीने चर्च को भी देता हूं। और हर साल एक दिन उपवास भी करता हूं। इसी से सब ठीक चल रहा है।

परमात्मा की कृपा है। उसको साझीदार बना लिया; अब उसकी ही इज्जत का सवाल है। मेरी हार, उसकी हार; मेरी जीत, उसकी जीत।

गरीब चुप रहा। सोचने जरूर लगा कि यह कैसा मामला हुआ। यद्यपि उसने जब दुकान शुरू की थी तो परमात्मा को याद करके शुरू की थी, लेकिन परमात्मा को साझीदार नहीं बनाया था।

क्योंकि बात ही बेहूदी है। हम तो पड़े ही हैं कीचड़ में, उसे भी कीचड़ में खींचें! प्रार्थना यह की थी कि मुझे कीचड़ से निकालना; मगर सोचा कि यह कुछ समझ में नहीं आया। और जितना भी कमाता था, उसमें से आधा पैसा तो गरीबों को जाता, अस्पताल को देता, चर्च को देता, मंदिरों को देता, जहां जरूरत होती वहां देता।

इसलिए गरीब भी रह गया था। हर महीने उपवास भी करता। हर रोज जाकर पूजागृह में पूजा भी करता। सोचने लगा कि यह खूब हुआ कि एक आदमी कहता है कि एक दिन उपवास करता है साल में और दस रुपये महीने दान भी करता है—और लाखों कमा रहा है!

और कहता है मैंने परमात्मा को भागीदार बना लिया है।

वह हंसा, मुस्कुराया। कहा कि जैसी तेरी मर्जी, जरूर इसमें ही मेरा हित होगा, नहीं तो तू मुझे गरीब रखता? इसमें ही मेरा हित होगा। धन्यवाद।

उस रात भी हृदयपूर्वक उसने प्रार्थना की। दूसरे दिन, हैरानी की बात, संयोग की बात, अमीर का मकान जल गया, उसमें आग लग गई, दुकान जल गई। सब राख हो गया।

तो इस गरीब ने उसे पत्र लिखा कि मेरी कोई सामर्थ्य तो नहीं है कि तुम्हें साथ दूं, लेकिन जो भी मेरे पास है, उसमें से आधा तुम ले लो। फिर काम शुरू कर दो। और भगवान तुम्हारे साथ है, तो जल्दी ही सब फिर ठीक हो जाएगा।

अमीर ने उत्तर में सिर्फ इतना ही लिखा: कोई भगवान नहीं। सब धोखा है। मैंने इतना भरोसा किया और वक्त पर दगा दे गया। कोई भगवान नहीं। ईश्वर इत्यादि सब बकवास है।

यह अंतरतम बात है। वह जो साझीदार इत्यादि बनाया था, वह सब ऊपर—ऊपर था। सफलता मिल रही थी तो ठीक था; असफलता आई तो कठिन हो गया।

तुम्हारी प्रार्थनाएं, तुम्हारी स्तुतियां, तुम्हारी पूजा—अगर उनके पीछे कुछ वासना है, कुछ मिलने का लोभ है—ज्यादा देर टिकने वाली नहीं। क्योंकि जहां वासना है, वहां क्रोध है। क्योंकि जहां काम है, वहां क्रोध है। क्रोध काम की छाया है।

प्रार्थना और वासना का फर्क यही है। प्रार्थना का अर्थ होता है: जो दिया है, इतना है कि धन्यवाद मेरा ले।

वासना का अर्थ होता है: जो दिया है, यह कुछ भी नहीं है। मेरी योग्यता के योग्य ही नहीं है। कहां मैं पात्र आदमी, और क्या मुझे दिया है!

अन्याय हो रहा है। सुध ले मेरी! बहुत हो चुका। सुनते थे कि तेरे द्वार पर देर है, अंधेर नहीं। देर भी हो गई, अब अंधेर भी हुआ जा रहा है।

जहां वासना है, जहां मांग है—वहां क्रोध खड़ा ही है, तत्पर है। क्योंकि वासना का मतलब यह है कि मुझे कुछ मिले; जब तक मिलता रहे तब तक ठीक।

ओशो; पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--12)

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