Osgy Family

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!!प्रार्थना शक्ति !!

ईश्वर प्राप्ति का सहज मार्ग
भारत एक धर्मप्रधान देश है। यहां जनजीवन में धर्म व संस्कृति का बड़ा प्रभाव है। सुबह की दिनचर्या से निवृत्त होने के बाद व्यक्ति पूजा-पाठ हेतु ईश्वर के समक्ष होता है। पूजा पश्चात प्रार्थना का काफी महत्व है। प्रार्थना यानी ईश्वर से अपना सीधा संबंध जोड़ना।

*क्या है प्रार्थना?
प्रार्थना एक धार्मिक क्रिया है। यह अखिल ब्रह्मांड की किसी विराट शक्ति यानी ई

श्वर से जोड़ने का काम करती है। प्रार्थना व्यक्तिगत या सामूहिक दोनों हो सकती है। प्रार्थना निवेदन द्वारा ऊर्जा प्राप्त करने की शक्ति है।

*प्रार्थना का अर्थ
प्रार्थना का अर्थ है जीवात्मा के साथ सक्रिय, अनन्य भक्ति तथा प्रेममय संबंध। ईश्वर-प्राप्ति के लिए आदर्श प्रार्थना आर्तता या व्याकुलता की भावा‍भिव्यक्ति है अत: हृदय में जैसे भाव उठेंगे, ईश्वर तक प्रार्थना उसी रूप में फलीभूत होगी।

कमोबेश सभी धर्मग्रंथों में यह बात साफ तौर पर कही गई है कि आप ईश्वर से जिस भाव या भावना से प्रार्थना करते हैं, ईश्वर भी उसी रूप में उसे स्वीकार करता है। अत: मन तथा हृदय का पवित्र होना नितांत ही जरूरी है।

*परमेश्वर से बातें

प्रार्थना और कुछ नहीं, सिर्फ परमेश्वर से बातें करना है। परमेश्वर आपको जानता है तथा वह यह भी जानता है कि आपके हृदय का व्यवहार कैसा है। सच्चे मन से परमेश्वर से की गई बातों को वह भी स्वीकारता है तथा तदनुरूप फल भी प्रदान करता है।

*ईश्वर प्राप्ति का सहज मार्ग
ईश्वर व आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त करने हेतु दो विधियां हैं। ‍भक्ति मार्ग में प्रार्थना और ध्यान दोनों ही का महत्व बताया गया है। ध्यान प्रार्थना से थोड़ा कठिन है। प्रार्थना सहज है किंतु ध्यान में स्थि‍तप्रज्ञता व एकाग्रता की आवश्यकता होती है।

*भगवान से विनती
परमात्मा से हमेशा गुण ग्रहण की ही विनती की जानी चाहिए। प्रार्थना के साथ उसे आचरण में भी लाएं नहीं तो प्रार्थना फलीभूत नहीं होगी। अगर प्रार्थना भर ही की जाए तथा आचरण में नहीं लाया जाए, तो प्रार्थना का सुफल प्राप्त नहीं होगा। ईश्वर से कभी भी धन-दौलत, सोने-चांदी या गाड़ी-बंगले की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। यह उचित नहीं है।

*समस्याओं के समाधान में लाभदायी
सच्चे मन से की गई प्रार्थना से समस्या-समाधान में भी लाभ मिलता है। जब हमें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा हो और हम अगर सच्चे मन से प्रार्थना करें तो हमें ईश्वर से मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

गांधीजी, ईसा मसीह, महा‍त्मा बुद्ध आदि को ईश्वर पर अटूट आस्‍था थी। उनकी सच्ची प्रार्थना का ही कमाल था कि वे अपने मनोबल को काफी मजबूत कर पाए व अपने लक्ष्‍य से डिगे नहीं तथा उसकी प्राप्ति करके ही रहे।

*प्रार्थना से होती है सेहत ठीक
चिकित्सकों व मनोचिकित्सकों ने अपने अनुसंधान में पाया है कि जो व्यक्ति नियमित प्रार्थना करते हैं, वे उन व्यक्तियों की तुलना में अधिक जल्दी स्वस्‍थ होते हैं व जो नियमित प्रार्थना नहीं करते हैं या कम या कभी-कभार ही प्रार्थना करते हैं।

30/05/2021

*कभी कभी उदासी की आग हैं जिंदगी*
*कभी कभी खुशियों का बाग हैं जिंदगी*
*हंसता और रुलाता राग हैं जिंदगी*
*कड़वे और मीठे अनुभवों का स्वाद हैं जिंदगी*
*पर अंत मे तो अपने किये हुए कर्मो का हिसाब है जिंदगी*
*🙏🏼🚩🚩जयश्री महाँकाल🚩🚩🙏🏼🙏🏼
🙏🏼🙏🏼🙏🏼राहुलनाथ, भिलाई🙏🏼🙏🏼🙏🏼

29/05/2021

🚩अलख आदेश
जब हमारे भीतर की दिव्य चेतना जागृत होती है
तब संसार की मोहमाया खत्म होती है।
🙏🏼🚩🚩जयश्री महाँकाल🚩🚩🙏🏼

29/05/2021

🚩अलख आदेश
*स्वीकार* करने की *हिम्मत*,
और *सुधार* करने की *नियत* हो तो
*इंसान* बहुत कुछ *सीख* सकता है,,
🙏🏼🚩जयश्री महाकाल🚩🚩🙏🏼

14/11/2020

🙏🏻🚩"दीपावली" की हार्दिक शुभकामनाएं🙏🏻🚩
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ालक्ष्मै_च_विद्महे_विष्णुपत्नी_च_धीमहि_तन्नो_लक्ष्मीः_प्रचोदयात्_||
समस्त सनातन विश्व को "दीपावली " की हार्दिक शुभकामनाएं। भगवती मां महालक्ष्मी आप को एवं आप सभी के परिवार को सुख समृद्धि वैभव प्रदान करें एवं निरोगी रखें।
🙏🏻🚩जै श्री महाकाल🚩🙏🏻
।।राहुलनाथजी।
भिलाई,छत्तीसगढ़, भारत
+917999870013,+919827374074 (w)

13/06/2018

*ज्ञानेश्वरी*
*कश्यप ऋषि से सम्पूर्ण जाति की उत्पत्ति*

महर्षि कश्यप ब्रम्हा के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र थे. इस प्रकार वे ब्रम्हा के पोते हुए. महर्षि कश्यप ने ब्रम्हा के पुत्र प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया. संसार की सारी जातियां महर्षि कश्यप की इन्ही १७ पत्नियों की संतानें मानी जाति हैं. इसी कारण महर्षि कश्यप की पत्नियों को लोकमाता भी कहा जाता है. उनकी पत्नियों और उनसे उत्पन्न संतानों का वर्णन नीचे है. अदिति: आदित्य (देवता). ये १२ कहलाते हैं. ये हैं अंश, अयारमा, भग, मित्र, वरुण, पूषा, त्वस्त्र, विष्णु, विवस्वत, सावित्री, इन्द्र और धात्रि या त्रिविक्रम (भगवन वामन). दिति: दैत्य और मरुत. दिति के पहले दो पुत्र हुए: हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप. इनसे सिंहिका नमक एक पुत्री भी हुई. इन दोनों का संहार भगवन विष्णु ने क्रमशः वराह और नरसिंह अवतार लेकर कर दिया. इनकी मृत्यु के पश्चात् दिति ने फिर से आग्रह कर महर्षि कश्यप द्वारा गर्भ धारण किया. इन्द्र ने इनके गर्भ के सात टुकड़े कर दिए जिससे सात मरुतों का जन्म हुआ. इनमे से ४ इन्द्र के साथ, एक ब्रम्ह्लोक, एक इन्द्रलोक और एक वायु के रूप में विचरते हैं. दनु: दानव जाति. ये कुल ६१ थे पर प्रमुख चालीस माने जाते हैं. वे हैं विप्रचित्त, शंबर, नमुचि, पुलोमा, असिलोमा, केशी, दुर्जय, अयःशिरी, अश्वशिरा, अश्वशंकु, गगनमूर्धा, स्वर्भानु, अश्व, अश्वपति, घूपवर्वा, अजक, अश्वीग्रीव, सूक्ष्म, तुहुंड़, एकपद, एकचक्र, विरूपाक्ष, महोदर, निचंद्र, निकुंभ, कुजट, कपट, शरभ, शलभ, सूर्य, चंद्र, एकाक्ष, अमृतप, प्रलब, नरक, वातापी, शठ, गविष्ठ, वनायु और दीघजिह्व. इनमें जो चंद्र और सूर्य नाम आए हैं वै देवता चंद्र और सूर्य से भिन्न हैं. काष्ठा: अश्व और अन्य खुर वाले पशु. अनिष्ठा: गन्धर्व या यक्ष जाति. ये उपदेवता माने जाते हैं जिनका स्थान राक्षसों से ऊपर होता है. ये संगीत के अधिष्ठाता भी माने जाते हैं. गन्धर्व काफी मुक्त स्वाभाव के माने जाते हैं और इस जाति में विवाह से पहले संतान उत्पत्ति आम मानी जाती थी. गन्धर्व विवाह बहुत ही प्रसिद्ध विवाह पद्धति थी जो राक्षसों और यक्षों में बहुत आम थी जिसके लिए कोई कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती थी. प्रसिद्ध गन्धर्वों या यक्षों में कुबेर और चित्रसेन के नाम बहुत प्रसिद्ध है. सुरसा: राक्षस जाति. ये जाति विधान और मैत्री में विश्वास नहीं रखती और चीजों को हड़प करने वाली मानी जाति है. कई लोगों का कहना है की राक्षस जाति की शुरुआत रावण द्वारा की गयी. दैत्य, दानव और राक्षस जातियां एक सी लगती जरुर हैं लेकिन उनमे अंतर था. दैत्य जाति अत्यंत बर्बर और निरंकुश थी. दानव लोग लूटपाट और हत्याएं कर अपना जीवन बिताते थे तथा मानव मांस खाना इनका शौक होता था. राक्षस इन दोनों जातियों की अपेक्षा अधिक संस्कारी और शिक्षित होते थे. रावण जैसा विद्वान् इसका उदाहरण है. राक्षस जाति का मानना था कि वे रक्षा करते हैं. एक तरह से राक्षस जाति इन सब में क्षत्रियों की भांति थी और इनका रहन सहन, जीवन और ऐश्वर्य दैत्यों और दानवों की अपेक्षा अधिक अच्छा होता था. इला: वृक्ष और समस्त वनस्पति. मुनि: समस्त अप्सरागण. ये स्वर्गलोक की नर्तकियां कहलाती थीं जिनका काम देवताओं का मनोरंजन करना और उन्हें प्रसन्न रखना था. उर्वशी, मेनका, रम्भा एवं तिलोत्तमा इत्यादि कुछ मुख्य अप्सराएँ हैं. क्रोधवषा: सर्प जाति, बिच्छू और अन्य विषैले जीव और सरीसृप. सुरभि: सम्पूर्ण गोवंश (गाय, भैंस, बैल इत्यादि). इसके आलावा इनसे ११ रुद्रों का जन्म हुआ जो भगवान शंकर के अंशावतार माने जाते हैं. भगवान शंकर ने महर्षि कश्यप की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपने अंशावतार के पिता होने का वरदान दिया था. वे हैं: कपाली, पिंगल, भीम, विरूपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुधन्य, शम्भू, चंड एवं भव. सरमा: हिंसक और शिकारी पशु, कुत्ते इत्यादि. ताम्रा: गीध, बाज और अन्य शिकारी पक्षी. तिमि: मछलियाँ और अन्य समस्त जलचर. विनता: अरुण और गरुड़. अरुण सूर्य के सारथि बन गए और गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन. कद्रू: समस्त नाग जाति. कद्रू से १००० नागों की जातियों का जन्म हुआ. इनमे आठ मुख्य नागकुल चले. वे थे वासुकी, तक्षक, कुलक, कर्कोटक, पद्म, शंख, चूड, महापद्म और धनञ्जय. सर्प जाति और नाग जाति अलग अलग थी. सर्पों का मतलब जहाँ सरीसृपों की जाति से है वहीँ नाग जाति उपदेवताओं की श्रेणी में आती है जिनका उपरी हिस्सा मनुष्यों की तरह और निचला हिस्सा सर्पों की तरह होता था. ये जाति पाताल में निवास करती है और सर्पों से अधिक शक्तिशाली, लुप्त और रहस्यमयी मानी जाती है. पतंगी: पक्षियों की समस्त जाति. यामिनी: कीट पतंगों की समस्त जाति. इसके अलावा महर्षि कश्यप ने वैश्वानर की दो पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया. पुलोमा से पौलोम नमक दानव वंश चला और कालका से ६०००० दैत्यों ने जन्म लिया जो कालिकेय कहलाये. रावण की बहन शूर्पनखा का पति विद्युत्जिह्य भी कालिकेय दैत्य था जो रावण के हाथों मारा गया था.
संकलित पोस्ट

12/06/2018

*अलख आदेश*
*इंसान ख्वाइशों से बंधा हुआ*
*एक जिद्दी परिंदा है*
*उम्मीदों से ही घायल है*
*और उम्मीदों पर ही जिंदा है*
*सुप्रभात*
*जैश्री_महाकाल*

11/06/2018

*अलख आदेश*
*वक्त नूर को भी बेनूर बना देता है*
*वक्त फ़क़ीर को भी हुज़ूर बना देता है*
*वक़्त की कद्र कर ऐ- बन्दे*
*वक्त कोयले को भी कोहिनूर बना देता हैं*
*सुप्रभात*
*जैश्री_महाकाल*

25/05/2018

*कितना भी ज्ञानियो के साथ बैठ लो*
*तजुर्बा पागल बनने के बाद ही मिलता है*
*सुप्रभातं_जैश्रीमहाकाल*
*
*
*राहुलनाथ_भिलाई*

20/05/2018

#मनुष्य' में.. #द्रढ़ता होनी चाहिए.. #जिद्" नहीं..!!
#बहादुरी होनी चाहिए.. #जल्दबाजी" नहीं..!!
#दया होनी चाहिए.. #कमजोरी" नहीं..!!
#ज्ञान होना चाहिए.. #अहंकार" नहीं..!!
जो.. #अपनेलिए'.. #नियम नहीं "बनाता".., उसे..
#दूसरों के'... #नियमों पर.. "चलना" पड़ता है...!!!

...!! ॐ नमो आदेश !!...
...!! शिव-गोरख!!...

19/05/2018

*जीवन में अगर 'खुश' रहना है तो,*
*स्वयं को एक 'शांत सरोवर' की तरह बनाए.....*
*जिसमें कोई 'अंगारा' भी फेंके तो..*
*खुद बख़ुद ठंडा हो जाए.....*

18/05/2018

ज्ञानेश्वरी
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*भगवान के पास दो शक्तियां हैं दोनों भगवान की हैं एक है माया और दूसरी है भक्ति, जब कोई भगवान के समक्ष जाता है भगवान को प्रणाम करता है तो वह पूछते हैं बोलो क्या चाहिए ?माया चाहिए या भक्ति ?*
*भक्त पूछता है महाराज दोनों में अंतर क्या है ?भगवान बोले देखो दोनों में एक ही अंतर है अगर तुम्हें नाचना हो तो माया ले जाओ और अगर मुझे नचाना हो तो भक्ति ले जाओ ।*
*क्योंकि जीव जिसके वशमें रहे उसका नाम माया और भगवान जिसके वश में हो जाएं उसका नाम भक्ति।*
*और भक्ति के राज्य में तो भगवान नृत्य करते हैं और भगवान के राज्य में समस्त संसार नाचता है जबकि भक्ति के राज्य में भगवान नाचते है।*

*जय श्री कृष्णा*🙏🙏

18/05/2018

*"व्यवहार" घर का शुभ कलश है।*
*और "इंसानियत" घर की "तिजोरी"।*

*"मधुर वाणी" घर की "धन-दौलत" है।*
*और "शांति" घर की "महा लक्ष्मी"।*

*"पैसा" घर का "मेहमान" है।*
*और "एकता" घर की "ममता।*

*"व्यवस्था" घर की "शोभा" है*
*और समाधान "सच्चा सुख"।*

🌹 Good Morning👏

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