सनातन संस्कृति कि महानता

  • Home
  • India
  • Bhatwari
  • सनातन संस्कृति कि महानता

सनातन संस्कृति कि महानता सनातन संस्कृति कि महानता

भुवनेश्वर में लाल पत्थर से बना भगवान शिव जी का मुक्तेश्वर मंदिर सुंदर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है सोमवंशी राजाओं द्व...
30/03/2024

भुवनेश्वर में लाल पत्थर से बना भगवान शिव जी का मुक्तेश्वर मंदिर सुंदर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है
सोमवंशी राजाओं द्वारा वर्ष 950 AD में यह मंदिर बनाया गया
आदरणीय श्री Dr. Charudatta Pingale HJS जी कि पोस्ट

सेवा आश्रम संघ में नन्हे बच्चों के साथ मस्तियाँ
21/03/2024

सेवा आश्रम संघ में नन्हे बच्चों के साथ मस्तियाँ

17/03/2024

संत डोंगरे जी महाराज
कि भागवत
सुनकर मन
बहुत ही आह्लादित हो रहा है

26/02/2024

हमें किसी कि घर वापसी करवाने कि ज़रूरत नहीं है
आप अपने सनातन मूल्यों पर खड़े हो जाएँ
तो अच्छों अच्छों कि
घर वापसी स्वतः हो जायेगी

भारत के सबसे मज़बूत दुर्गों में से एक व स्वर्ण भंडार के लिए विख्यात - गोलकुंडा दुर्ग (हैदराबाद)आदरणीय श्री Dr. Charudatta...
20/02/2024

भारत के सबसे मज़बूत दुर्गों में से एक व स्वर्ण भंडार के लिए विख्यात - गोलकुंडा दुर्ग (हैदराबाद)
आदरणीय श्री Dr. Charudatta Pingale HJS जी कि post

माँ ज्वाला जी की दिव्य ज्योति के अलौकिक दर्शन 🙏🏻आदरणीय श्री Dr. Charudatta Pingale HJS जी
08/02/2024

माँ ज्वाला जी की दिव्य ज्योति के अलौकिक दर्शन 🙏🏻
आदरणीय श्री Dr. Charudatta Pingale HJS जी

भगवान जी के चेहरे के भावों में निरंतर बदलाव हो रहा है यह चमत्कार नहीं तो और क्या हैजय श्री राम
06/02/2024

भगवान जी के चेहरे के भावों में निरंतर बदलाव हो रहा है यह चमत्कार नहीं तो और क्या है
जय श्री राम

21/01/2024

मुझे तो सर्वत्र राम ही राम दिख रहे हैं
ऐसा अनुभव तो
पहली बार हो रहा है
राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम

19/01/2024

राम राम जय राजा राम
राम राम जय सीता राम

20/12/2023

DRDO के वैज्ञानिकों ने स्वदेशी IRON DOME (AKASH AIR DEFENCE SYSTEM ) तैयार किया विश्व के कई देशों ने भारत के IRON DOME को सराहा
DRDO के वैज्ञानिकों व समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ

अनेकों शोध से पता चलता है कीवनस्पति विज्ञान का पितामह होने का श्रेय किसी को दिया जाना चाहिए तो वह ''ऋषि पराशर'' हैं।   इ...
01/12/2023

अनेकों शोध से पता चलता है की
वनस्पति विज्ञान का पितामह होने का श्रेय किसी को दिया जाना चाहिए तो वह ''ऋषि पराशर'' हैं।

इस एक ग्रंथ में ही किसी बीच के पौधे बनने से लेकर पेड़ बनने तक संपूर्णता के साथ वैज्ञानिक विवेचन दिया गया है, वह विस्मयकारी है। इस ''वृक्ष आयुर्वेद'' पुस्तक के छह भाग हैं

अद्भुत ग्रंथ-पाराशर वृक्ष आयुर्वेद ::
इस पुस्तक के 6 भाग हैं-
(1). बीजोत्पत्ति काण्ड, (2). वानस्पत्य काण्ड, (3). गुल्म काण्ड, (4).वनस्पति काण्ड, (5). विरुध वल्ली काण्ड एवं (6) चिकित्सा काण्ड।

इस ग्रंथ के प्रथम भाग बीजोत्पत्ति काण्ड में आठ अध्याय हैं, जिनमें बीज के वृक्ष बनने तक का विवरण है। इसका, इसमें महर्षि पाराशर कहते हैं-

आपोहि कललं भुत्वा यत्‌ पिण्डस्थानुकं भवेत्‌। तदेवं व्यूहमानत्वात्‌ बीजत्वमघि गच्छति॥

(1). बीजोत्पत्ति सूत्राध्याय :: पहले पानी जैली जैसे पदार्थ को ग्रहण कर न्यूक्लियस बनता है और फिर वह धीरे-धीरे पृथ्वी से ऊर्जा और पोषक तत्व ग्रहण करता है। फिर उसका आदि बीज के रूप में विकास होता है और आगे चलकर कठोर बनकर वृक्ष का रूप धारण करता है। आदि बीज यानी प्रोटोप्लाज्म के बनने की प्रक्रिया है जिसकी अभिव्यक्ति बीजत्व अधिकरण में की गई है।

(2). भूमि वर्गाध्याय :: इसमें मिट्टी के प्रकार, गुण आदि का विस्तृत वर्णन है।

(3). वन वर्गाध्याय :: इसमें 14 प्रकार के वनों का उल्लेख है।

(4). वृक्षांग सूत्राध्याय :: इसमें प्रकाश संश्लेषण यानी फोटो सिंथेसिस की क्रिया के लिए कहा है :- पत्राणि तु वातातपरञ्जकानि अभिगृहन्ति। यह स्पष्ट है कि वात कार्बन डाय आक्साइड, सूर्य प्रकाश और क्लोरोफिल से अपना भोजन वृक्ष बनाते हैं।

(5). पुष्पांग सूत्राध्याय :: इसमें कितने प्रकार के फूल होते हैं, उनके कितने भाग होते हैं, उनका उस आधार पर वर्गीकरण किया गया है। उनमें पराग कहाँ होता है, पुष्पों के हिस्से क्या हैं आदि का उल्लेख है।

(6). फलांग सूत्राध्याय :: इसमें फलों के प्रकार, फलों के गुण और रोग का वर्गीकरण किया गया है।

(7). वृक्षांग सूत्राध्याय :: इसमें वृक्ष के अंगों का वर्णन करते हुए पाराशर कहते है- पत्रं (पत्ते) पुष्प (फूल) मूलं (जड़) त्वक्‌ (शिराओं सहित त्वचा) काण्डम्‌ (स्टिम्‌) सारं (कठोर तना) सारसं र्नियासा बीजं (बीज) प्ररोहम्‌-इन सभी अंगों का परस्पर सम्बन्ध होता है।

(8). बीज से पेड़ का विकास :: पाराशर कहते हैं-

बीज मातृका तु बीजस्यम्‌ बीज पत्रन्तुबीजमातृकायामध्यस्थमादि।

पत्रञ्च मातृकाछदस्तु तनुपत्रकवत्‌ मातृकाछादनञ्च कञ्चुकमित्याचक्षते॥

बीजन्तु प्रकृत्या द्विविधं भवति एकमातृकं द्विमातृकञ्च।

तत्रैकपत्रप्ररोहानां वृक्षाणां बीजमेकमातृकं भवति। द्वि पत्र प्ररोहानान्तु द्विमातृकञ्च।

मोनोकॉटिलिडेन और डायकॉटिलिडेन। यानी एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री बीजों का वर्णन है। किस प्रकार बीज धीरे-धीरे रस ग्रहण करके बढ़ते हैं और वृक्ष का रूपधारण करते हैं। कौन सा बीज कैसे उगता है, इसका वर्गीकरण के साथ स्पष्ट वर्णन है। बीज के विभिन्न अंगों के कार्य अंकुरण (जर्मिनेशन) के समय कैसे होते हैं। [वृक्ष आयुर्वेद-द्विगणीयाध्याय]

अंकुरनिर्विते बीजमात्रकाया रस: संप्लवते प्ररोहांगेषु।

यदा प्ररोह: स्वातन्त्रेन भूम्या: पार्थिवरसं गृहणाति तदा बीज मातृका प्रशोषमा पद्यमे॥

वृक्ष रस ग्रहण करता है, बढ़ता है। जड़ बन जाने के बाद बीज मात्रिका यानी बीज पत्रों की आवश्यकता नहीं रहती, वह समाप्त हो जाती है। फिर पत्तों और फलों की संरचना के बारे में कहा है कि वृक्ष का भोजन पत्तों से बनता है। पार्थिव रस जड़ में से स्यंदिनी नामक वाहिकाओं के द्वारा ऊपर आता है। यह रस पत्तों में पहुंच जाता है। जहां पतली-पतली शिराएं जाल की तरह फैली रहती हैं। ये शिरायें दो प्रकार की हैं- “उपसर्प” और “अपसर्प”। वे रस प्रवाह को ऊपर भी ले जाती हैं और नीचे भी ले जाती हैं। दोनों रास्ते अलग-अलग हैं।

“रंजकेन पश्च्यमानात” किसी रंग देने वाली प्रक्रिया से यह पचता है-यानी फोटो सिंथेसिस। यह बड़ा महत्वपूर्ण है।

“उत्पादं-विसर्जयन्ति” पत्तियां फोटो सिंथेसिस से दिन में आक्सीजन निकालती हैं और रात में कार्बन डाय अक्साइड।

दिन में कार्बन डाय आक्साइड लेकर भोजन बनाती हैं। अतिरिक्त वाष्प का विसर्जन करती हैं, जिसे ट्रांसपिरेशन कहते हैं।

जब उसमें से वाष्प का विसर्जन होता है तब उसमें ऊर्जा उत्पन्न होती है, यानी श्वसन की क्रिया का वर्णन है। यह वर्णन बताता है कि किस प्रकार रस का ऊपर चढ़ना, पंक्तियों में जाना, भोजन बनाना, फिर श्वसन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करना होता है।

इस सारी क्रमिक क्रिया से पेड़ बनता है। इसके अतिरिक्त आज भी कोई दूसरी प्रक्रिया वृक्षों के बढ़ने की ज्ञात नहीं है।

अंग्रेजो ने इसलिए ही संस्कृत भाषा और हमारे प्रामाणिक ग्रंथ हटाकर यह भ्रम पैदा किया की
ये तो धार्मिक ग्रंथ है लोगो को विज्ञान पढ़ना चाहिए

क्या ये ग्रंथ विज्ञान के नही थे.....सोचिए हमने क्या खोया और क्या पाया...??

🚩 Soni

12/11/2023

हिजड़ो के झुंड स्यापा बंद करें।
मजहबी उग्रवादियों का समूल नाश करने की सामर्थ्य केवल जागृत वीर तेजस्वी हिंदुओं में है यह आज सारा विश्व मान रहा है ।
आदरणीय श्री Rameshwar Mishra Pankaj जी

Address

Bhatwari

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when सनातन संस्कृति कि महानता posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share