17/01/2024
यह चित्र धन है राष्ट्र का। इस चित्र की स्मृतियाँ अमिट हैं। यह चित्र तेज का स्रोत है। बचपन से मेरा सर्वाधिक प्रिय चित्र रहा है। इस चित्र के गहन आकर्षण ने करोड़ों हिन्दुओं को रामकार्य में खींच लिया। यह चित्र देखते ही मन उत्साह व आतुरता से भर उठता था। ऐसा लगता मानो जाकर उस समुद्र में प्रभु को पकड़ने कूद पड़ें।
यह चित्र देखते ही बालपन की वह सब स्मृतियाँ झंकृत हो गईं। राममंदिर से जुड़ी 90% खबरों के साथ यही चित्र लगाया जाता था। पाथेय कण आदि संघ की पत्रिकाओं में यह चित्र हमेशा छपता था। विश्व हिन्दू परिषद् की तो यही पहचान रहा है। रामजन्मभूमि सम्बन्धी किसी भी खबर का बेसब्री से इंतज़ार, विपरीत खबर से उत्पन्न निराशा, और शुभ खबरों से उत्पन्न आशा की किरणों के बीच यह चित्र ही सम्बल था, आधार था।
यह चित्र श्रीरामजन्मभूमि आन्दोलन का आइकॉनिक चित्र है। यह चित्र स्वयं में एक आन्दोलन है। इसमें क्रान्ति का भाव है। इसमें रणकर्कश राम की कर्कशता उनकी बाह्य प्रकृति में दिख रही है। उनके मुख का स्मित हास उनका औदार्य दिखा रहा है।
शब्दायमान महासमुद्र भगवान् के घुटनों से नीचे हो गया है, कि देखा है इसने वह रूप जहाँ भय के बिना प्रीति नहीं होती। उसे है समर्पण न करने पर सूख जाने का डर, कि इन राजपुरुष के आगे सिर झुकाना अनिवार्य है, अपरिहार्य है। जिन्होंने प्रभु की अपेक्षा का अपराध किया उनकी ओर देख रहे हैं भुजंग जैसे तीर। इसलिए समुद्र में शेषनाग पर शयन करने वाले प्रभु श्री राम के चरण समुद्र में रख देने भर से लहरें लंका की प्राचीरों को तोड़ती हुई असुरों को बाढ़ में बहा ले जाती हैं।
रुद्राक्ष की उमड़ती घुमड़ती मालाएं और बाजूबंद शिव की ठहरी हुई प्रलय का प्रतीक हैं, कि विष्णु की सौम्यता का तिरस्कार बनकर आएगा रुद्र का कोप। देवताओं ने भगवान् के गले में ऐसी माला डाली है जो कभी मुरझाती नहीं है।
हिन्दूराष्ट्र के शत्रुओं के कुल भगवान् के धनुष को देखकर ही कम्पायमान हो उठे हैं। यह कमल जैसे हाथ इतनी दृढ़ता से पकड़े हैं कोदण्ड, मानो मेरु पर्वत ने पृथ्वी को पकड़ रखा हो। आज तो यह धनुष ऐसा झुक है जैसे द्वितीया का चाँद झुकता है, पर इसमें से शीतल चन्द्ररश्मियाँ नहीं आग बरसाने वाले करोड़ों तीर निकल पड़ते हैं। इस तपस्वी धनुष को अन्यायियों पर रोष और भक्तों पर करुणा बरसाने का अधिकार दिया गया है।
हिन्दूराष्ट्र को रामराज्य का आदर्श बनाने वाले भारतरक्षक भगवान् श्री राम के सनातन शासन का आश्वासन है यह चित्र। प्रभु रामचन्द्र का यह चित्र सघन मेघों और सागर की उत्ताल तरंगों के बीच हिन्दुत्व की अजेयता की उद्घोषणा कर रहा है। अतः "रामलला हम आएंगे, मन्दिर भव्य बनाएंगे", यह कहने वालों को कोई शंका नहीं थी, सन्देह नहीं था, कोई भय भी नहीं था, अटूट विश्वास अवश्य था क्योंकि उनके हृदय में यही चित्र अंकित था। यह रामसेतु जैसा शत्रुंजय चित्र बनाने वाले नलनील के वंशज चित्रकार को नमन।
जय श्री राम