Arya samaj Bhagwanpur

Arya samaj Bhagwanpur एक विचार, एक जीवन पद्धति, एक ईश्वर वेद मे सब सत्य बाते हैं

24.9.2023      "लोग एक दूसरे की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए उन्हें कुछ भौतिक वस्तुएं भेंट या गिफ्ट के नाम से देते हैं।...
24/09/2023

24.9.2023
"लोग एक दूसरे की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए उन्हें कुछ भौतिक वस्तुएं भेंट या गिफ्ट के नाम से देते हैं। वे वस्तुएं सस्ती या महंगी दोनों प्रकार की होती हैं।"
भेंट या गिफ्ट देने वाला व्यक्ति यदि गरीब हो, तो सस्ती वस्तु भेंट में देता है। यदि सामान्य स्तर का हो, तो सामान्य कीमत की वस्तु भेंट में देता है। जो व्यक्ति धनवान हो, वह महंगी वस्तु भेंट में देता है। "अनेक धनवान लोग अपनी पत्नी को मंहगी कार या मंहगे आभूषण तक भी भेंट में देते हैं।"
"वे लोग ये वस्तुएं भेंट में इसलिए देते हैं, ताकि दूसरे लोग उनकी इस भेंट को प्राप्त करके प्रसन्न हो जाएं।" यदि दूसरे लोग इस भेंट या गिफ्ट से प्रसन्न हो जाएंगे, तो वे भी भविष्य में इनको सहयोग देंगे। "चाहे गिफ्ट दें, चाहे आर्थिक सहयोग दें, या अन्य किसी प्रकार का सहयोग दें, इसी आशा से लोग एक दूसरे को गिफ्ट देते रहते हैं।"
परंतु वास्तव में सबसे अधिक मूल्यवान भेंट या गिफ्ट यह होती है कि "एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को समझे, और उसे उसकी योग्यता अनुसार यथोचित सम्मान देवे।" यह सबसे अधिक मूल्यवान गिफ्ट या भेंट होती है।
हो सकता है, "आपके पास अधिक धन न हो। आप अपने मित्रों आदि को ऊंची महंगी वस्तु भेंट में न दे पाएं। तो भी कोई चिंता की बात नहीं है।" "यदि आप दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को समझते हैं, और उसे यथोचित सम्मान देते हैं, तो यही सबसे उत्तम भेंट है." अन्य किसी भौतिक वस्तु वस्त्र आभूषण आदि की भेंट आप देवें, या न देवें, वह गौण है। "परन्तु यह उत्तम गिफ्ट दूसरों को अवश्य देवें। यही सबसे मुख्य और मूल्यवान गिफ्ट है। और यही उत्तम गिफ्ट आपको भविष्य में अनेक प्रकार का सहयोग भी दिलाएगी।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"

09/07/2023

🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️
🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷

दिनांक - - ०९ जुलाई २०२३ ईस्वी
दिन - - रविवार

🌗 तिथि - - सप्तमी ( १९:५९ तक तत्पश्चात अष्टमी )

🪐 नक्षत्र - - उत्तराभाद्रपद ( १९:२९ तक तत्पश्चात रेवती )

पक्ष - - कृष्ण
मास - - श्रावण
ऋतु - - वर्षा
सूर्य - - दक्षिणायन

🌞 सूर्योदय - - प्रातः ५:३० पर
🌞 सूर्यास्त - - १९:२२ पर
🌗 चन्द्रोदय - - २३:५४ पर
🌗 चन्द्रास्त - - ११:४१ पर

सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२४
कलयुगाब्द - - ५१२४
विक्रम संवत् - - २०८०
शक संवत् - - १९४५
दयानंदाब्द - - १९९

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🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🔥महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुयायी क्यों बनें ?
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🌷( १) दयानन्द का सच्चा अनुयायी भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी आदि कल्पित पदार्थों से कभी भयभीत नहीं होता ।

🌷(२ ) आप फलित ज्योतिष, जन्म-पत्र, मुहूर्त, दिशा-शूल, शुभाशुभ ग्रहों के फल, झूठे वास्तु शास्त्र आदि धनापहरण के अनेक मिथ्या जाल से स्वयं को बचा लेंगें ।

🌷 ( ३) कोई पाखण्डी साधु, पुजारी, गंगा पुत्र आपको बहका कर आपसे दान-पुण्य के बहाने अपनी जेब गरम नहीं कर सकेगा ।

🌷 ( ४ ) शीतला, भैरव, काली, कराली, शनैश्चर आदि अप-देवता, जिनका वस्तुतः कोई अस्तित्व ही नहीं है, आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकेंगे । जब वे हैं ही नहीं तो बेचारे करेंगे क्या ?

🌷( ५ ) आप मदिरापान, धूम्रपान, विभिन्न प्रकार के मादक से बचे रह कर अपने स्वास्थ्य और धन की हानि से बच जायेंगे ।

🌷( ६ ) बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, नारी-प्रताडना, पर्दा-प्रथा, अस्पृश्यता आदि सामाजिक बुराइयों से दूर रहकर सामाजिक सुधार के उदाहरण बन सकेंगे ।

🌷 ( ७ ) जीवन का लक्ष्य सादगी को बनायेंगे और मित व्यवस्था के आदर्श को स्वीकार करने के कारण दहेज, मिलनी, विवाहों में अपव्यय आदि पर अंकुश लगाकर आदर्श उपस्थित करेंगे ।

🌷( ८ ) दयानन्द का अनुयायी होने के कारण अपने देश की भाषा, संस्कृति, स्वधर्म तथा स्वदेश के प्रति आपके हृदय में अनन्य प्रेम रहेगा ।

🌷 ( ९ ) आप पश्चिम के अन्धानुकरण से स्वयं को तथा अपनी सन्तान को बचायेंगे तथा फैशन परस्ती, फिजूलखर्ची, व्यर्थ के आडम्बर तथा तडक-भडक से दूर रहेंगे ।

🌷 ( १० ) आप अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालेंगे ताकि आगे चलकर वे शिष्ट, अनुशासन प्रिय, आज्ञाकारी बनें तथा बडों का सम्मान करें ।

🌷 ( ११ ) आप अपने कार्य, व्यवसाय, नौकरी आदि में समय का पालन, ईमानदारी, कर्त्तव्यपरायणता को महत्त्व देंगे ताकि लोग आपको मिसाल के तौर पर पेश करें ।

🌷 ( १२ )वेदादि सद् ग्रन्थों के अध्ययन में आपकी रुचि बढेगी, फलतः आपका बौद्धिक स्तर ऊंचा होगा ।

इसलिए आओं लौट चले वेदों की ओर ।

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💐🙏आज का वेद मंत्र 💐🙏

🌷ओ३म् स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भग: स्वस्ति देव्यदितिरनर्वण: । स्वस्ति पूषा असुरो दधातु न: स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना।( ऋग्वेद ५|५१|११ )

💐 अर्थ :- परमेश्वर हमारा कल्याण करें ।ऐश्वर्यरूप । आपका जल और वायु सुख का सम्पादन करें ।अखण्डित प्रकाश वाली विधुत- विद्या हम लोगों का कल्याण करक।पुष्टिकारक अन्न, दुग्धादि पदार्थ तथा प्राणों को बल देने वाले मेघादि हमें कल्याण को देने वाले हों
।द्यौ तथा पृथ्वी उत्तम् विज्ञान के साथ हमारे लिए कल्याणकारी हो।

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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- चतुर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२४ ) सृष्ट्यब्दे】【 अशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८०) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, पिंगल-संवत्सरे, रवि- दक्षिणायने, वर्षा -ऋतौ, श्रावण - मासे, कृष्ण - पक्षे, सप्तम्यां
तिथौ, उत्तराभाद्रपद
नक्षत्रे, रविवासरे
तद्नुसार ०९ जुलाई , २०२३ ईस्वी , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे
आर्यावर्तान्तर्गते.....प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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शिष्य - मुझे कोई गुरुमंत्र दीजिए। स्वामी दयानन्द - सदा ही सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करो, और इसी को अपना गुरुमंत्र ...
04/07/2023

शिष्य - मुझे कोई गुरुमंत्र दीजिए।

स्वामी दयानन्द - सदा ही सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करो, और इसी को अपना गुरुमंत्र जानो।

21/06/2023

🌼🌼 *।।ओ३म्।।* 🌼🌼
🙏 *21.06.23 वेदवाणी* 🙏

अनुवाद महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी द्वारा, प्रचारित आर्य जितेंद्र भाटिया द्वारा, ऑडियो रिकॉर्डिंग सुकांत आर्य द्वारा 🙏🌼

*दुहन्ति सप्तैकामुप द्वा पञ्च सृजतः।*
*तीर्थे सिन्धोरधि स्वरे॥ ऋग्वेद ८-७२-७॥*🙏🌼

पांच ज्ञानेंद्रियां, मन और बुद्धि ये सात शरीरस्थ ऋषि परमेश्वर रूपाणी मां से ज्ञान दुहते हैं। जिस प्रकार की सात दूधिये पवित्र नदी के किनारे गाय को दुहते हैं। 🙏🌼

The five senses of perception, the mind, and the intellect—these seven sages of the body—milk knowledge from the mother God. As seven milkmen milk the cow on the banks of the sacred river.
(Rig Ved 8-72-7)
🙏🌼 🙏🌼

संसार में कुछ लोग आलसी बनकर बैठे रहते हैं, पुरुषार्थ नहीं करते, सब कुछ भाग्य भरोसे छोड़ देते हैं, और यह सोचते हैं, कि *"...
13/06/2023

संसार में कुछ लोग आलसी बनकर बैठे रहते हैं, पुरुषार्थ नहीं करते, सब कुछ भाग्य भरोसे छोड़ देते हैं, और यह सोचते हैं, कि *"जो हमारी किस्मत में लिखा होगा, वही हमें मिलेगा।"* ऐसा सोचना बुद्धिमत्ता नहीं है। क्योंकि ऐसा सोचने वाले लोग जीवन में असफल हो जाते हैं।
हम यह नहीं कहते, कि *"भाग्य कुछ नहीं होता।"* वेदों और ऋषियों के अनुसार भाग्य की परिभाषा यह है, *"जो हमारे द्वारा किए गए कर्म हैं, वह हमारा भाग्य है।" "वे कर्म इस जन्म के भी हो सकते हैं, और पिछले जन्मों के भी हो सकते हैं. उन दोनों प्रकार के कर्मों का नाम भाग्य है।"*
हमारे पिछले जन्म के कर्मों का फल हमें ईश्वर हमारे जन्म के साथ ही दे देता है। वह फल है, जाति आयु और भोग। जैसे कि *"जिस देश में जिस प्रांत में जिस नगर में जिस परिवार में हमें पुरुष या स्त्री का जो भी जन्म मिला, उसे 'जाति' कहते हैं। अर्थात मनुष्य पशु पक्षी आदि 'शरीर।' यह हमारा पूर्व जन्म का कर्म फल है।"*
*"जन्म से ही ईश्वर ने हमारे शरीर में जो शक्ति भर दी, उस शक्ति के कारण हमारा शरीर जब तक जीवित रहेगा, उतने समय का नाम 'आयु' है। वह हमारा पूर्व जन्म का कर्म फल है।"*
*"हमारे माता-पिता जितने बलवान बुद्धिमान धार्मिक धनवान आदि आदि गुणों वाले हैं, और उनके पास जो भी खाना पीना जमीन मकान मोटर गाड़ी धन संपत्ति आदि साधन हैं, उनकी वे सारी सुविधाएं हमें जन्म से ही प्राप्त हुई, इसका नाम 'भोग' है। यह हमारा पूर्व जन्म का कर्म फल है। इसे भाग्य या किस्मत कहते हैं।"*
*"चालू जीवन में जो जो सुख-दुख आते हैं, वे सब के सब हमारे पूर्व जन्म के कर्मों का फल नहीं हैं। बल्कि उसमें कुछ वर्तमान जन्म के कर्मों का फल भी है।" "वर्तमान जीवन में जो जो सुख दुख न्यायपूर्वक मिलता है, उतना ही हमारे कर्मों का फल है।"*
*"और इस जीवन में बहुत सा सुख दुख तो हमें दूसरे लोगों के अन्याय से भी भोगना पड़ता है, "जो कि हमारा न तो पिछले जन्म का कर्म फल है, और न ही इस जन्म का।" "अज्ञानी लोग इस सारे सुख दुख को किस्मत या भाग्य के नाम पर थोप देते हैं।"* यह बात झूठी है।
जन्म से आपको जो जो सुख सुविधाएं अथवा कमियां मिलीं, वह सब आपके पूर्व जन्म के कर्मों का फल है। वह आपका भाग्य है। *"और जो इस जन्म में न्यायपूर्वक आपको सुख-दुख मिला, वह भी आपका भाग्य है। उसको पिछले जन्म से न जोड़ें। वह इसी जन्म का कर्म फल है।" "जैसे पुरुषार्थ करके पढ़ाई करना और डिग्री प्राप्त करना पुरुषार्थ करके धन कमाना कार खरीदना बंगला बनाना इत्यादि। यह इस जन्म का कर्म फल है। इसका नाम भी भाग्य है। परंतु यह हमारे वर्तमान पुरुषार्थ या कर्मों का फल है, पिछले जन्म के कर्मों का नहीं।"*
इसके अतिरिक्त *"यदि आपने इस जन्म में कोई गलती नहीं की, और फिर भी कोई व्यक्ति आपकी धन-संपत्ति को छीन लेता है, आप पर झूठे आरोप लगाकर आपको व्यर्थ बदनाम करता है, तो इसे पिछली किस्मत या भाग्य के साथ न जोड़ें। यह वर्तमान में उस दुष्ट व्यक्ति द्वारा किया गया अन्याय है।"* ऐसा समझना चाहिए।
*"अतः यदि आप पुरुषार्थ नहीं करेंगे, तो आपका भविष्य अंधकारमय/दुखमय होगा। उस से बचने के लिए और सुखी होने के लिए भाग्य के भरोसे न बैठे रहें। सदा पुरुषार्थी बनें। आने वाले दुखों से बचें, अच्छे कर्म करें और सदा सुखी रहें।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

08/06/2023

*🌿🌿🌿🌿ओ३म्🌿🌿🌿🌿*
🌹🌼🍃🌼🌺🌿🌺🌻🌺🌹

*🌿🌹मानवता के सद्गुण🌹🌿*

मानवता के लक्षणों का वर्णन गीता में दैवी सम्पदा के अन्तर्गत किया है, सच्चे आदर्श रुप में ढल कर मानव अधिकारी बन सकते हैं।

*अभयं सत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: ।*
*दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ।।*
*अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् ।*
*दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ।।*
*तेज: क्षमाधृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता ।*
*भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ।।*
―(गीता १३/१-३)

*भावार्थ―*_जिन व्यक्तियों को दैवी सम्पदाएँ प्राप्त हैं, उनके लक्षण इस प्रकार हैं―१. *"अभयम्"* मन में भय का अभाव सर्वथा हो। २. *"सत्वसंशुद्धि"* अन्त:करण की अच्छी प्रकार से स्वच्छता हो। ३. *"ज्ञानयोगव्यवस्थिति:"* तत्व-ज्ञान के लिए ध्यानयोग में निरन्तर दृढ़ स्थिति हो। ४. *"दानम्"* बिना फल की इच्छा किये देश-कालपात्रानुसार सात्विक दान हो। ५. *"दम:"* इन्द्रियों का दमन हो। ६. *"यज्ञ"* ईश्वर-भक्ति और अग्निहोत्रादि उत्तम कर्मों का आचरण हो। ७. *"स्वाध्याय"* वेद-शास्त्रों के पठन पूर्वक ईश्वर के "ओ३म्" नाम और गुणों का कीर्तन हो। ८. *"तप:"* स्वधर्म पालन के लिये कष्ट एवं प्रतिकूलताएं सहन करना, ९. *"आर्जवम्"* शरीर और इन्द्रियों सहित अन्त:करण की सरलता, १०. *"अहिंसा"*–मन, वाणी और शरीर किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना। ११. *"सत्यम्"*–यथार्थ और प्रिय भाषण। १२. *"अक्रोध:"*―अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोधित न होना। १३. *"त्याग"*–कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान का त्याग। १४. *"शान्ति"*–चित्त की चञ्चलता का अभाव। १५. *"अपैशुनम्"*–किसी की निन्दा न करना। १६. *"भूतेषुदया"*–सब भूत-प्राणियों में हेतुरहित दया। १७. *"अलोलुप्त्वम्"*–इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी आसक्ति का न होना। १८. *"मार्दवम्"* मन-वाणी, कर्म और स्वभाव की कोमलता। १९. *"ह्री:"*–लोक और शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा। २०. *"अचापलम्"*–व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव। २१. *"तेज:"*–वह शक्ति जिसके प्रभाव से श्रेष्ठ पुरुषों के सामने विषयासक्त और नीच प्रवृति वाले मनुष्य भी प्राय: अन्यायाचरण से रुक कर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत होते हैं। २२. *"क्षमा"*–अपने अपकार करने वाले के दोष को क्षमा करके उसका भला करना। २३. *"धैर्य"*–किसी भी विपत्ति में धैर्य रखना। २४. *"शौच"*–बाहर-भीतर की पवित्रता। २५. *"अद्रोह"*–किसी भी प्राणी में शत्रु-भाव न होना। २६. *"नातिमानिता"*–अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव।_

दीर्घकालीन अभ्यास से इनका निश्चय ही आप में विकास होगा और आप सच्चे मानव बन सकेंगे।

*[ 'वेदमाता गायत्री' पुस्तक से, लेखक: _स्वामी भूमानन्द सरस्वती_ ]*

06/06/2023

*🔥 ओ३म् 🔥*

*🍃🌷जीवन―लक्ष्य🌷🍃*

_*मानव जीवन का उदेश्य क्या है? मनुष्य इस संसार में क्यों आया है? कहाँ से आया है? किसलिये आया है? उसे कहाँ जाना है? ये प्रश्न हैं जो चिन्तनशील प्राणी के समक्ष आते हैं। साधारण मनुष्य तो कभी इन पर विचार ही नहीं करता। आज के व्यस्त मानव की अवस्था तो कुछ विचित्र ही है। एक व्यक्ति भागा जा रहा था। किसी ने पूछा, 'क्यों भाई ! कहाँ जा रहे हो?' दौड़ने वाले व्यक्ति ने उत्तर दिया 'पता नहीं' । फिर पूछा, 'आ कहाँ से रहे हो?' उसने कहा, 'यह भी पता नहीं' । ठीक ऐसी ही अवस्था आज के मानव की है। उसे कुछ पता नहीं वह कहाँ से आया है और उसे कहाँ जाना है; बस भाग रहा है। वेद मनुष्य के समक्ष उसका जीवन-लक्ष्य उपथित करता है। वेद भक्त कहते हैं―*_

*उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम् ।*
*देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ।।*
―(यजु० २०/२१)
हम *तमसः परि*―प्रकृति से ऊपर उठकर, *उत्तरं स्वः पश्यतः*―उसकी अपेक्षा उत्कृष्ट आत्मज्योति को देखते हुए, *देवत्रा देवम्*―देवों में देव, *उत्तमं ज्योतिः सूर्यं अगन्म*―सर्वोत्कृष्ट, परम ज्योतिस्वरुप सूर्य के समान प्रकाशमान परमात्मा को प्राप्त हों।

प्रकृति से ऊपर उठकर आत्मदर्शन करते हुए परमात्मा की प्राप्ति, यह है हमारा जीवन-लक्ष्य। यह लक्ष्य कैसे पूर्ण हो? वेद उसके लिए साधनों का भी उल्लेख करता है। उस प्रभु को पाने के लिए―

*ओ३म् क्रतो स्मर ।―(यजु० ४०/१५)*
हे कर्मशील मनुष्य ! तू ओ३म् का स्मरण कर।

इस ओम् के स्मरण से, जप से प्रभु के दर्शन कैसे होंगे यह बात रुपक-अलंकार द्वारा मुण्डकोपनिषद् में बड़े सुन्दर ढंग से समझाई गई है―

*प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।*
*अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ।।*
―(मुण्डक० २/२/४)
*भावार्थ―*प्रणव=ओम् धनुष है। साधक का आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है, प्रमाद को त्यागकर शर की भाँति जप में तन्मय होकर उस लक्ष्य का वेध करना चाहिए।

04/06/2023

तुमने दाँव पूरा न लगाया

04/06/2023

4.6.2023
*"जैसे कंप्यूटर में आपने जो जो फाइलें जमा की हैं, मॉनिटर पर वही फाइलें खुलेंगी। जो फाइलें आपके कंप्यूटर में नहीं हैं, वे कभी नहीं खुलेंगी।" इसी प्रकार से "यदि आपके कंप्यूटर के मॉनिटर पर अच्छी फाइलें खुलती हैं, तो इसका अर्थ है, कि आपने कंप्यूटर में अच्छी फाइलें जमा की हैं।" "यदि खराब फाइलें खुलती हैं, तो इसका अर्थ है, कि आपने कंप्यूटर में ख़राब फाइलें जमा की हुई हैं।"*
जब मॉनिटर पर खराब फाइलें खुलें, तो इसमें दूसरों का दोष नहीं मानना चाहिए, आपको स्वयं अपना ही दोष मानना चाहिए। *"क्योंकि आपने ही वे ख़राब फाइलें अपने कंप्यूटर में जमा की थी।"*
*"इसी प्रकार से दिनभर में जो घटनाएं होती हैं, उन घटनाओं के होने पर, यदि आपके अंदर से सेवा नम्रता दया दान परोपकार आदि गुण प्रकट होते हैं, तो इसका अर्थ यह है, कि आपने अपने अंदर अच्छे गुण धारण किए हुए हैं।" "और यदि क्रोध लोभ ईर्ष्या जलन अभिमान अन्याय शोषण आदि दोष प्रकट होते हैं, तो इसका अर्थ है कि आपने ऐसे ही दोष अपने अंदर धारण कर रखे हैं।" "क्रोध आने वाली कोई घटना घटने पर, जब इस प्रकार के दोष आपके अंदर से बाहर आएं, तब दूसरों पर आरोप न लगाएं, कि "यह व्यक्ति मुझे क्रोध दिलाता है।" क्योंकि आप ही ने क्रोध अपने अंदर जमा कर रखा है। वही तो बाहर आएगा।" "और जब आपके अंदर का क्रोध बाहर आता है, तब आपको कष्ट और परेशानी होती है।"* उससे बचने के लिए यही उपाय है, कि *"अपने अंदर सेवा नम्रता दया दान परोपकार आदि उत्तम गुणों को धारण करें; क्रोध लोभ ईर्ष्या जलन अभिमान अन्याय शोषण आदि दोषों को नहीं।" "और यदि आपने अपने अंदर ये क्रोध लोभ ईर्ष्या आदि दोष धारण कर रखे हों, तो उन्हें शीघ्र ही दूर करें। तभी आप दुखों से बचकर शांतिपूर्वक जीवन जी पाएंगे।"*
----- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"*

04/06/2023
03/06/2023

3.6.2023
जानना और समझना दो अलग-अलग बातें हैं। दोनों में बहुत अंतर है। यदि कोई व्यक्ति आपको 10 वर्षों से जानता है, तो भी यह आवश्यक नहीं है, कि वह आपको 'समझता' भी हो। समझने का तात्पर्य होता है, *"जो आपकी भावनाओं को समझे, जो आपके उद्देश्य को समझे, जो आपकी क्रियाओं को समझे, उसी को 'समझना' कहते हैं।"*
मान लीजिए, वह आपका मित्र है। वह आप से प्रतिदिन नहीं मिलता, आपका उसके साथ विचारों का आदान प्रदान प्रतिदिन तो नहीं होता, परन्तु महीने में 8 / 10 बार आपसे मिलता है। आप के साथ बातचीत भी करता है। इससे वह आपके विषय में थोड़ा बहुत जान पाता है, कि *"आप क्या करते हैं, क्या आपका व्यवसाय है। क्या आपके शौक हैं?"* कुछ इतना भी जान लेता है कि *"आप अधिकतर सत्य बोलते हैं। परन्तु कभी-कभी झूठ भी हो जाता है।"* मोटे स्तर पर तो वह आपके विषय में जान जाता है। *"परन्तु इतने मात्र से वह आपकी भावनाओं को पूरी तरह से नहीं समझ पाता, कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है? आप कब किस प्रकार का व्यवहार लोगों के साथ करते हैं? आप लोगों का कितना भला चाहते हैं, इत्यादि।"* यह तो हुई आपके मित्र की बात।
दूसरी बात - आपके परिवार के सदस्यों की भी हो सकती है। *"आपके परिवार के लोग जो प्रतिदिन आपके साथ रहते हैं, और वे आपका जीवन प्रतिदिन देखते हैं। हो सकता है, कि वे भी आपकी भावनाओं को ठीक प्रकार से पूरी तरह न समझ पाते हों।" "परिवार के कुछ लोग आपको समझते भी होंगे। परंतु कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जो आपको जानते तो हों, परंतु समझते न हों।" "लोग आपको क्यों नहीं समझ पाते?" "इसलिए कि सबके पूर्व जन्मों के संस्कार अलग-अलग हैं। उसके कारण सबकी बुद्धि का स्तर भी अलग-अलग है। सब के विचार, सबकी इच्छाएं, सब के माता-पिता का प्रशिक्षण, सबका खानपान आदि आदि सब अलग अलग है। इस कारण से लोग आपको पूरी तरह से ठीक ठीक नहीं समझ पाते।" "कोई बात नहीं। यह संसार है। यह ऐसे ही चलता है और ऐसे ही चलेगा।"*
मुझे तो ऐसा लगता है, कि *"आपको 100 प्रतिशत तो केवल ईश्वर ही समझता है। मनुष्यों में कोई एक व्यक्ति भी ऐसा आपको नहीं मिलेगा, जो आपको पूरी तरह से समझता हो।"* बस इसीलिए आपको कष्ट होता है, आश्चर्य होता है, कि *"मुझे कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से नहीं समझता।"*
अब बुद्धिमत्ता की बात यह है, कि *"जब यही सत्य है, कि "आपको पूरी तरह से कोई भी नहीं समझता।" तो इस सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए। इस बात पर दुखी नहीं होना चाहिए, कि "लोग आपको समझते नहीं हैं।"*
क्यों इस बात पर दुखी नहीं होना चाहिए? क्योंकि यही नियम आप पर भी लागू होता है। *"आप भी तो दूसरों को मोटा मोटा ही जानते हैं। आप भी तो दूसरों को 100 प्रतिशत नहीं समझते।" "इसलिए इस सत्य को स्वीकार कर के संतोष का पालन करना चाहिए। तभी आप सुखी हो सकते हैं, अन्यथा नहीं।"*
तो फिर जीवन को सुख से कैसे जीएं? *"चाहे आपके घर का सदस्य हो, चाहे बाहर का व्यक्ति हो, जो भी आपकी भावनाओं को अधिक मात्रा में समझता हो, आपको सहयोग देता हो, आप के प्रति सद्भावना रखता हो, उसके साथ अपना संबंध बनाए रखें। उसके साथ लेना देना उठना बैठना खाना पीना आदि अधिक मात्रा में जारी रखें। जो व्यक्ति आपको कम मात्रा में समझता हो, उसके साथ व्यवहार भी कम ही रखें। थोड़ा बहुत व्यवहार (नमस्ते नमस्ते आदि) तो सबके साथ बनाए रखें। ऐसा करने से आप अधिकतम सुखपूर्वक जीवन जी सकेंगे।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।"*

07/03/2023

होली पर्व क्या है ? वास्तव मे

इस पर्व का प्राचीनतम नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है अर्थात् बसन्त ऋतु के नये अनाजों से किया हुआ यज्ञ, परन्तु होली होलक का अपभ्रंश है।

क्योंकि
*तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक: (शब्द कल्पद्रुम कोष) अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह।*(भाव प्रकाश)

*अर्थात्*―तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है।

*(ब) होलिका*―किसी भी अनाज के ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं-जैसे-चने का पट पर (पर्त) मटर का पट पर (पर्त), गेहूँ, जौ का गिद्दी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूँ, जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते हैं कि वह चनादि का निर्माण करती *(माता निर्माता भवति)* यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूँ व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूँ, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात् होलिका रुपी पट पर (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया।

*(स)* अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम *होलिकोत्सव* है और बसन्त ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम *वासन्ती नव सस्येष्टि* है। यथा―वासन्तो=वसन्त ऋतु। नव=नये। येष्टि=यज्ञ। इसका दूसरा नाम *नव सम्वतसर* है। मानव सृष्टि के आदि से आर्यों की यह परम्परा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात् स्वयं भोग करते थे। हमारा कृषि वर्ग दो भागों में बँटा है―(1) वैशाखी, (2) कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय एवं रबी और खरीफ की फसल कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। अब तक चना, मटर, अरहर व जौ आदि अनेक नवान्न पक चुके होते हैं। अत: परम्परानुसार पितरों देवों को समर्पित करें, कैसे सम्भव है। तो कहा गया है–
*अग्निवै देवानाम मुखं* अर्थात् अग्नि देवों–पितरों का मुख है जो अन्नादि शाकल्यादि आग में डाला जायेगा। वह सूक्ष्म होकर पितरों देवों को प्राप्त होगा।

हमारे यहाँ आर्यों में चातुर्य्यमास यज्ञ की परम्परा है। वेदज्ञों ने चातुर्य्यमास यज्ञ को वर्ष में तीन समय निश्चित किये हैं―(1) आषाढ़ मास, (2) कार्तिक मास (दीपावली) (3) फाल्गुन मास (होली) यथा *फाल्गुन्या पौर्णामास्यां चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जीत मुखं वा एतत सम्वत् सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी आषाढ़ी पौर्णमासी* अर्थात् फाल्गुनी पौर्णमासी, आषाढ़ी पौर्णमासी और कार्तिकी पौर्णमासी को जो यज्ञ किये जाते हैं वे चातुर्यमास कहे जाते हैं आग्रहाण या नव संस्येष्टि।

*समीक्षा*―आप प्रतिवर्ष होली जलाते हो। उसमें आखत डालते हो जो आखत हैं–वे अक्षत का अपभ्रंश रुप हैं, अक्षत चावलों को कहते हैं और अवधि भाषा में आखत को आहुति कहते हैं। कुछ भी हो चाहे आहुति हो, चाहे चावल हों, यह सब यज्ञ की प्रक्रिया है। आप जो परिक्रमा देते हैं यह भी यज्ञ की प्रक्रिया है। क्योंकि आहुति या परिक्रमा सब यज्ञ की प्रक्रिया है, सब यज्ञ में ही होती है। आपकी इस प्रक्रिया से सिद्ध हुआ कि यहाँ पर प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ की परम्परा रही होगी इस प्रकार चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस होली रुपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते थे। आप जो गुलरियाँ बनाकर अपने-अपने घरों में होली से अग्नि लेकर उन्हें जलाते हो। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हवनों की है। सामूहिक बड़े यज्ञ से अग्नि ले जाकर अपने-अपने घरों में हवन करते थे। बाहरी वायु शुद्धि के लिए विशाल सामूहिक यज्ञ होते थे और घर की वायु शुद्धि के लिए छोटे-छोटे हवन करते थे दूसरा कारण यह भी था।

*ऋतु सन्धिषु रोगा जायन्ते*―अर्थात् ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होते हैं, उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किये जाते थे। यह होली शिशिर और बसन्त ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम साधन है। अब होली प्राचीनतम वैदिक परम्परा के आधार पर समझ गये होंगे कि होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है।

*पौराणिक मत में कथा इस प्रकार है―होलिका हिरण्यकश्यपु नाम के राक्षस की बहिन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का प्रह्लाद नाम का आस्तिक पुत्र विष्णु की पूजा करता था। वह उसको कहता था कि तू विष्णु को न पूजकर मेरी पूजा किया कर। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठे। वह प्रह्लाद को आग में गोद में लेकर बैठ गई, होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। होलिका की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है जो नितान्त मिथ्या है।इसलिए आओ सब मिलकर अपने इस पवित्र पर्व को इसके वास्तविक स्वरूप मे मनाये।

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