24/12/2021
🙏🌺🙏🌺🙏 मैया दरबार 🙏🌺🙏🌺🙏
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माता महाश्मशानी उग्रकालिका सिद्ध शक्तिपीठ नगरह की धार्मिक पृष्ठभूमि :-
माता महाश्मशानी उग्रकालिका का यह मंदिर नगरह ग्राम (प्राचीन नाम-शुचिक्षेत्र) के उत्तर-पुर्वी कोणों पर अवस्थित है। यह मंदिर नवगछिया स्टेशन से 4-5Km उत्तर की ओर स्थित है।
यह मंदिर अनादिकालीन अर्थात् अति प्राचीन एवं अनुसंधेय भी है। यह मंदिर 52 शक्तिपीठ में से एक है। इस मंदिर के पीछे श्मशान भी है।
स्वामी आगमानंद जी के अनुसार यहाँ की भूमि जागृत है अर्थात् यहाँ सिद्धि कार्य में सफलता जल्द एवं अवश्य मिलती है। उन्होंने यहीं पर माता की कृपा प्राप्त की थी।
एक बार मंदिर परिसर में पार्श्व भाग स्थित एक विशाल पेड़ को कटवाने की योजना हुई, ताकि माता के मंदिर को विशालता प्रदान की जाए और माता के दरबार में अन्य देवी देवताओ के भी मंदिर बन सके, परंतु माता के मनोनुकूल यह कार्य नहीं होना था इसलिए उस पेड़ में रातों रात एक चमत्कार हुआ और पेड़ में सभी देवी देवताअों के स्वरूप उभर आए,तब से श्रद्घालु उस पेड़ की भी पुजा करने लगे।
यह चमत्कारी पेड़ अब भी बरकरार है,और बांकी मंदिरों का निर्माण भी धीरे-धीरे हो रहा है । हाल हीं में माता रानी के बगल में भगवान् भोलेनाथ के विशालकाय शिवाला का निर्माण वर्ष 2005 में हुआ है। स्वामी आगमानंद जी महाराज के निर्देशन में माता बग्लामुखी के मंदिर का भी निर्माण किया गया है। कुछ और मंदिर का निर्माण कार्य प्रगति पर है।
माता के इस शक्तिपीठ की एक प्रमुख विशेषता यह है कि माता कालिका की स्वस्थापित प्रतिमा हर साल चमत्कृत रूप से चार से पाँच ईंच बढ़ जाती है।
प्राचीन व प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर माता सती का अग्रदंत गिरा था, और यह पावन भूमि शक्तिस्थल बन गया। प्राचीन काल में यहां पर जंगल ही जंगल था और यह स्थल सिद्ध साधकों का शरण व सिद्ध स्थल था। किवदंती के अनुसार ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को वाममार्गीय तांत्रिक साधना के क्षेत्र में महिषी(वर्तमान - सहरसा) में हुई विक्षिप्तता के बाद यहीं एकान्त साधना से पूर्ण शान्ति व सर्वसिद्धि मिली ,और माता महाश्मशानी उग्रकालिका का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
एक और रहस्यमय जनश्रुति है कि महर्षि आदिशंकराचार्य को मंडन मिश्र की पत्नी विदुषी भारती से पराजित होने के पाश्चात् विक्षिप्ति हुई , तो मां तारा ने उन्हें नस्थित माता महाश्मशानी उग्रकालिका के दरबार में अराधना करने को कहा था। जैसै हीं वे यहां पहुंचे, तो माता कालिका ने एक बालिका का रूप धारण कर एक संस्कृत श्लोक पुछा था,और निज साधना संपन्न कराकर विश्व विजयी होने का आशीर्वाद दिया था।
यह स्थल अवधुत, दत्तात्रेय, दुर्वासा, विश्वामित्र ,विदेह,शुक्राचार्य आदि महाॠषियों की साधना का केंद्र रहा है । और भी कई मान्यताऐं हैं जैसे कि दयालपुर के जमींदार बिरंची सिंह का कामत यहीं पर था, और उसका मतवाला हाथी जंगल से सुढ़ में जल लाकर मैया को चढ़ाता था ,और जोड़ जोड़ से सुढ़ हिला कर पूजन करता तथा आँखों से आँसू भी बहाता था।
आज माता की महिमा व शक्ति के बारे में कौन नही जानता। जो मनुष्य/भक्त यहाँ आकर माथा टेकते है, माँ उनकी मनोकामना/इच्छा जल्द एवं अवश्य ही पूरा करती है । कोई भी व्यक्ति निराश होकर नही लौटता । माता के दरबार की अद्भुत अद्वितीय महिमा सदियों से बरकरार है और अब तो प्रसिद्धि दिन ब दिन बढ़ती/फैलती जा रही है जिससे माता कालिका का यह शक्तिस्थल पर्यटन के रूप में भी तेजी से उभर रहा है।
आधुनिक समय में भक्तजन पूजा-अर्चना के बाद (माता के साथ) फोटो/सेल्फी लेना नही भुलते। अक्सर मंदिर परिसर में लोग, युवा वर्ग, व महिलाएँ तस्वीरें खिंचवाते नजर आते हैं।
बदलते समय के साथ भी यहाँ नित-प्रतिदिन भक्तो की संख्या(पर्यटन के लिए भी) कम नहीं होती, बढती हीं जा रही है ।
माता कालिका के दर्शन व पूजन हेतु देश के कोने-कोने से लोग आते रहते हैं। खासकर माता के पुजन हेतु विशिष्ट दिन या वार शनिवार को मंदिर परिसर में भक्तजनों की काफी भीड़ लगी रहती है।
माता के दर्शन मात्र से ही सारी मनोकामना पूर्ण होती है, और सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।