04/09/2026
संतवाणी — अंतर्मुखी साधना का गूढ़ रहस्य
आँखें बंद करने पर सामने अंधकार का एक दायरा दिखाई देता है। यह दायरा कितना बड़ा है, कहना कठिन है। इसके भीतर काम, क्रोध, मद, लोभ आदि अनेक विकार भरे हुए हैं।
संतों ने इस अंधकार को पार करने का मार्ग अन्तर्मुखी साधना के रूप में बताया है। किसी शास्त्र में इसका वास्तविक भेद स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं है। यह गूढ़ रहस्य केवल संतों के पास है।
भेद यह गुप्त पाना किसी ग्रंथ से,
है असंभव, समझ लो किसी संत से।।
यह ज्ञान बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है। जो लोग इस रहस्य को जानते हैं, उन्हें इसका अभ्यास करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात है—करना। केवल जान लेना पर्याप्त नहीं है।
जैसे कोई व्यक्ति बार-बार “पानी, पानी” पुकारता रहे, तो केवल पुकारने से पानी उसके पास नहीं आ जाएगा; जब तक वह पानी लाने का प्रयास नहीं करेगा, उसकी प्यास नहीं बुझेगी। उसी प्रकार भेद जान लेने के बाद भी यदि उसका अभ्यास नहीं किया जाए, तो उस ज्ञान का क्या लाभ?
हाँ, यह भेद किसी अनुभवी और जानकार संत से ही प्राप्त करना चाहिए, क्योंकि सही मार्गदर्शन के अभाव में साधना का गलत तरीका अपनाने से अनर्थ भी हो सकता है।
एक बार मैं गुरु महाराज के साथ रायबरेली गया था। वहाँ एक साधु से भेंट हुई। उनकी आँखें ऊपर की ओर उलट गई थीं और वे सदैव ऊपर ही देखते रहते थे। गुरु महाराज ने कृपापूर्वक उनसे इसका कारण पूछा।
उन्होंने बताया—
“महाराज! मुझे एक साधु ने भौंहों के ऊपर की ओर देखने के लिए कहा था। मैंने कई वर्षों तक उसी प्रकार अभ्यास किया, जिसके कारण मेरी आँखें ऊपर की ओर ही रहने लगीं। अब जब भी देखता हूँ, ऊपर की ओर ही देखता हूँ।”
तब श्री सद्गुरु महाराज ने उन्हें सीधे देखने का सही मार्ग बता दिया। इससे स्पष्ट होता है कि सही ज्ञान और मार्गदर्शन के अभाव में मनुष्य अनजाने में गलत मार्ग भी पकड़ सकता है।
एक बार एक सज्जन आश्रम में आए और उन्होंने गुरु महाराज से निवेदन किया—
“महाराज! मेरी प्राणवायु तो सदैव सुषुम्णा में ही रहती है, लेकिन प्रकाश कहाँ मिलता है?”
गुरु महाराज ने कृपापूर्वक कहा—
“आपकी प्राणवायु ही सुषुम्णा में रहती है; दृष्टि और मन तो सुषुम्णा में नहीं रहते हैं।”
यह सुनते ही वे विद्वान सज्जन तुरंत श्रीचरणों में गिर पड़े और उस गूढ़ भेद को प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करने लगे।
— पूज्यपाद स्वामी श्री श्रीधर दासजी महाराज