श्री ठाकुर लक्ष्मीवेंकटेश मंदिर नगरह "विश्व का तीसरा श्रीपतिवेंकटेश्वर धाम"

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श्री ठाकुर लक्ष्मीवेंकटेश मंदिर नगरह "विश्व का तीसरा श्रीपतिवेंकटेश्वर धाम" तिरुपति बालाजी के तर्ज पर बनाई गई यह मंदिर नगरह (प्राचीन नाम-शुचिक्षेत्र) में स्थित है।

श्री वेंकटेश जी की आदमकद मूसा पत्थर से बनी 80 मन वजनी प्रतिमा की प्रतिष्ठा वर्ष 1903 ई में उस समय गाँव के जमींदार स्व ठाकुर नन्दकिशोर सिंह जी के द्वारा की गई थी। लगभग अठारहवीं सदी के चतुर्थ चरण अर्थात् 1875-76 ई की बात होगी।एक बार मौजे बैजनाथपुर जयदेव उर्फ नगरह के जमींदार स्व ठाकुर नन्दकिशोर सिंह जी एवं स्व ठाकुर बलदेव प्रसाद सिंह जी तिरूपति वेंकटेश जी के दर्शन करने गए।दर्शन के पाश्चात् स्व ठाकुर नन्दकिशोर सिंह जी के मन में विचार आया कि नगरह में भगवान श्री वैंकटेश जी की स्थापना हो।ऐसा वैचारिक मानस संकल्प लेकर वे घर लौट आए।इनका गुरूद्वारा अयोध्या था।श्री रामानुज संप्रदाय के तपोनिष्ठ वैष्णवाचार्य स्वामी श्री बलभद्राचार्य जी महाराज इनके अाध्यात्मिक गुरु थे।स्व नंद किशोर बाबू ने अपने मन की बात अयोध्या जाकर अपने गुरु महाराज को बताई।विचार विमर्श हुआ कि श्री वेंकटेश जी की दो प्रतिमा बनवायी जाए।इनमें कुछ छोटी प्रतिमा नगरह में और कुछ बड़ी प्रतिमा अयोध्या में स्थापित हो।स्व नंद किशोर बाबू ने अपने भाई स्व बलदेव प्रसाद सिंह के पुत्र स्व ठाकुर जनार्दन प्रसाद सिंह जी को इस कार्य को सम्पादित करने का भार सौंपा।स्व जनार्दन प्रसाद सिंह जी मुर्ति बनवाने जयपुर गए।वहाँ से बेसकीमती काला मूसा (Black Marble) के दो विशालकाय चट्टान खरीद कर साथ हीं वहाँ के कुछ कुशल कारीग़रों को लेकर वे श्री वृंदावन धाम आए।वृंदावन के रंग मंदिर में भगवान श्री वैंकटेश जी की प्रतिमा का स्नान प्रत्येक शुक्रवार को होता था।मुर्तिकार उसी प्रतिमा को देखकर वहाँ मुर्ति निर्माण करने लगे।कहा जाता है कि मुर्ति निर्माण में लगभग छह माह लगे।मुर्ति बनने के बाद एक मुर्ति नगरह के लिए तथा दूसरी अयोध्या के लिए रेल द्वारा पार्सल की गई।संयोगवश इनमें बड़ी प्रतिमा नगरह चली आई और छोटी प्रतिमा अयोध्या चली गई।जब नंद किशोर बाबू को पता चला तो उन्होंने स्वामी जी से प्रतिमा बदलने की बात की पर स्वामी जी ने इसे भगवान की ईच्छा मानकर यथावत रहने दिया।स्वामी जी के निर्देशानुसार और स्वo नंद किशोर सिंह जी के ईच्छानुसार स्व जनार्दन प्रसाद सिंह जी ने श्री देवी एवं भूदेवी सहित श्री निवास जी की उत्सवमूर्ति एवं श्री रामानुजाचार्य,श्री वरवर मुनि,श्री शठकोप स्वामी और श्री गरूड़ जी की भी छोटी मूर्ति का निर्माण जयपुर में रहकर वहीं के कुशल मूर्तिकारों से करवाया।ये सभी प्रतिमायें अष्टधातु की बनी है।इन सब मुर्तियों को भी रेल पार्सल द्वारा नगरह लाया गया।भगवान श्री वेंकटेश की प्रतिमा रेल द्वारा नवगछिया आई और उस समय नवगछिया के निकट हीं कोसी बहती थी।वहीं एक नाव में सरसों तेल डालकर मुर्ति को धनीमूत और चमकदार होने छोड़ दिया गया।फिर बाढ़ के समय में मुर्ति नाव द्वारा नगरह लायी गई।इस प्रतिमा का वजन लगभग 80 मन बताया जाता है।ईधर स्व नंद किशोर बाबू ने वास्तुशास्त्र के अनुसार कुशल कारीग़रों द्वारा मंदिर निर्माण कार्य भी शुरू करवा दिया था॥श्रीपतिवेंकटेश्वरदेवस्थानम्॥

भगवान विष्णु के चार महीने तक योग निद्रा में रहने की परंपरा को 'चातुर्मास' के नाम से जाना जाता है। आषाढ़ महीने के शुक्ल प...
26/07/2026

भगवान विष्णु के चार महीने तक योग निद्रा में रहने की परंपरा को 'चातुर्मास' के नाम से जाना जाता है। आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी (जिसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है) से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी एकादशी) को जागते हैं।

इस चार महीने की योग निद्रा से जुडी पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्यराज बलि (जो प्रहलाद के पौत्र थे) अत्यंत पराक्रमी, दानवीर और धर्मनिष्ठ राजा थे। उन्होंने अपने तपोबल और पराक्रम से तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना अधिकार कर लिया था। स्वर्ग पर बलि के अधिकार से चिंतित होकर देवराज इंद्र और अन्य देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे।

देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) का अवतार लिया। राजा बलि उस समय एक महान यज्ञ करवा रहे थे। वामन देव बलि की यज्ञशाला में पहुंचे और दान में तीन पग भूमि मांगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य समझ गए कि यह स्वयं नारायण हैं और उन्होंने बलि को दान देने से रोका, लेकिन अपनी वचनबद्धता के कारण राजा बलि नहीं माने।

जैसे ही बलि ने दान का संकल्प लिया, भगवान वामन ने अपना आकार अत्यंत विशाल कर लिया

पहला पग: पूरी पृथ्वी और नीचे के लोकों को नाप लिया।

दूसरा पग: पूरे स्वर्ग लोक और आकाश को नाप लिया।

अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा। तब राजा बलि ने अपना सिर वामन देव के आगे झुका दिया और कहा, "हे प्रभु! तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए।"

भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति, सत्यनिष्ठा और दानवीरता से अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना तीसरा कदम बलि के सिर पर रखा, जिससे बलि पाताल लोक चले गए। भगवान ने बलि को पाताल लोक का राजा बना दिया।

प्रसन्न होकर विष्णु जी ने बलि से वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने वरदान मांगा
"हे प्रभु! आप सदैव मेरे साथ पाताल लोक में निवास करें। मैं जब भी आंखें खोलूं, मुझे आपके ही दर्शन हों।"

अपने भक्त के वश में होकर भगवान विष्णु ने पाताल लोक में रहना स्वीकार कर लिया।

जब भगवान विष्णु वैकुंठ छोड़कर पाताल लोक चले गए, तो माता लक्ष्मी और समस्त देवता चिंतित हो गए। तब माता लक्ष्मी एक गरीब स्त्री का रूप धारण करके पाताल लोक पहुंचीं और राजा बलि को राखी बांधी।

बलि ने उन्हें अपनी बहन स्वीकार किया और बदले में मनचाहा उपहार मांगने को कहा। माता लक्ष्मी ने अपने वास्तविक रूप में आकर बलि से भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ लौटने का वचन मांग लिया

राजा बलि ने अपनी बहन लक्ष्मी जी की बात मान ली, लेकिन वह दुखी हो गए। भगवान विष्णु अपने भक्त बलि को निराश नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने एक व्यवस्था बनाई
भगवान विष्णु ने वचन दिया कि वे प्रतिवर्ष आषाढ़ एकादशी से कार्तिक एकादशी तक के चार महीने (चातुर्मास) पाताल लोक में राजा बलि के द्वारपाल/अतिथि के रूप में योग निद्रा में बिताएंगे। शेष आठ महीने वे वैकुंठ में निवास करेंगे।

जब भगवान विष्णु योग निद्रा में जाते हैं, तब इस दौरान सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव संभालते हैं। इसीलिए चातुर्मास के शुरुआती महीने (सावन) में भगवान शिव की विशेष पूजा होती है।

इन चार महीनों में शादी-विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं, क्योंकि इन शुभ कार्यों के फलदाता (विष्णु जी) योग निद्रा में होते हैं।

यह समय आध्यात्मिक दृष्टि से जप, तप, ध्यान, व्रत और सात्विक जीवन शैली अपनाने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
🙏🪷🙏 ॐ नमो नारायणाय 🙏🪷🙏

01/07/2026

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08/06/2026
वार्षिक उत्सव -2026
24/01/2026

वार्षिक उत्सव -2026

"सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि। विद्यारंभं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥"🥰🙏🏻वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏❤️ 🙏🏻...
23/01/2026

"सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
विद्यारंभं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥"🥰🙏🏻

वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏❤️
🙏🏻🌸माँ शारदे की कृपा आप पर सदैव बनी रहे और आपके जीवन में ज्ञान, बुद्धि और विवेक का प्रकाश फैला रहे। 📚✨

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥

विद्या की देवी माँ सरस्वती आपके सभी शुभ संकल्पों को सिद्ध करें।
जय माँ सरस्वती! 🥰🚩

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