प्राचीन महाविज्ञान

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14/03/2023

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06/07/2019

हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्।

त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंकुलम् ।
पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां स्थूलं निन्द्यमिदं वपुः।।
अनुक्षणं यत्परिहृत्य कृत्य-
मनाद्यविद्याकृतबन्धमोक्षणम् ।
देहः परार्थोऽयममुष्य पोषणे
यः सज्जते स स्वमनेन हन्ति।।
शरीरपोषणार्थी सन् य आत्मानं दिदृक्षति ।
ग्राहं दारुधिया धृत्वा नदीं तर्तुं स इच्छति।।
मोह एव महामृत्युर्मुमुक्षोर्वपुरादिषु ।
मोहो विनिर्जितो येन स मुक्तिपदमर्हति।।

त्वचा, मांस, रक्त, स्नायु, मेद, मज्जा और अस्थियों का समूह तथा मल- मूत्र से भरा हुआ यह स्थूल देह अति निंदनीय है। जो अनादि अविद्याकृत बन्धन को छुड़ाना रूप अपना कर्त्तव्य त्याग कर प्रतिक्षण इस परार्थ देह के पोषण में ही लगा रहता है, वह अपनी इस प्रवृत्ति से स्वयं अपना घात करता है। जो शरीर पोषण में लगा रहकर आत्म तत्व को देखना चाहता है, वह मानों काष्ठ बुद्धि से ग्राह को पकड़ कर नदी पार करना चाहता है। शरीर आदि में मोह रखना ही मुमुक्षु की बड़ी भारी मौत है। जिसने मोह को जीता है, वही मुक्तिपद का अधिकारी है।

…… वैराग्य मार्तण्ड

06/07/2019

हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्।।

मातापित्रोर्मलोद्भूतं मलमांसमयं वपुः।
त्यक्त्वा चाण्डालवद्दूरं ब्रह्मभूय कृती भव॥

माता पिता के रज वीर्य रुप मल से उत्पन्न इस मल मांसमय अनात्म शरीर को चाण्डाल के समान दूर से ही त्याग कर स्वरुप भूत ब्रह्म को स्वात्मरुपेण अनुभव कर ब्रह्मभूत होकर कृतकृत्य जीवन-मुक्त हो जाओ।

……… वैराग्य मार्तण्ड

01/02/2018

हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्॥

नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः।
जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्॥

अर्थात्
बुद्धिमान को चाहिए कि बिना पूछे और अन्याय से पूछने पर कोई उत्तर नहीं दे। वह जानता हुवा भी लोक में मूढ़ के समान आचरण करे।
- मनुस्मृति २/११०

नारायण हरिः॥

08/12/2017

हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्।।

योगशास्त्र के अनुसार पातंजल योग का आश्रय सभी के लिए है, वहीं हठयोग संहिता के अनुसार योग का आश्रय साधना के लिए तत्पर साधकों के लिए है। दोनों ही योगमार्ग में समानता होते हुए भी कई असमानताएं है। अष्टांगयोग पूर्ण रूप से क्रमबद्ध चलने का निर्देश देता है, परन्तु हठयोग के अंग श्री गुरु के निर्देशन के अनुसार चलने का आदेश देता है।

नारायण हरिः।

08/12/2017

हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्।।

अष्टांगयोग- हठयोग-
१ यम १ आसन
२ नियम २ प्राणायाम
३ आसन ३ प्रत्याहार
४ प्राणायाम ४ धारणा
५ प्रत्याहार ५ ध्यान
६ धारणा ६ समाधि
७ ध्यान
८ समाधि ।

नारायण हरिः।

17/08/2017

हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्।

रात्रौ न विन्दते निद्रां कामाग्निपरिखेदितः ।
दिवाSपि च कुतः सौख्यमर्थोपार्जनचिन्तया ।।

स्त्रीष्वध्यासितचित्तस्य ये पुंसः शुक्रविन्दवः ।
न ते सुखाय मन्तव्या स्वेदजा इव विन्दवः ।।

कृमिभिः पीड्यमानस्य कुष्ठिनः पामरस्य च ।
कण्डूयनाभितापेन यद् भवेत्स्त्रीषु तद्विदः ।।

यादृशं मन्यते सौख्यं गण्डे पूतिविनिर्गमात् ।
तादृशं स्त्रीषु मन्तव्यं नाधिकं तासु विद्यते।।

अर्थात्,
कामाग्नि से संतप्त होता हुवा वह रात्रि में नींद नहीं ले पाता और अर्थोपार्जन की चिंता के कारण दिन में भी कहाँ सुख पाता है?
स्त्रियों में रमे हुए चित्त वाले पुरूष के जो वीर्यबिन्दु हैं, वे भी उसे सुख प्रदान करते हुए नहीं कहे जाते, अपितु पतले होकर स्वेद बिन्दुओं की भाँति निकलते रहते हैं।
कृमियों द्वारा पीड्यमान पामर कुष्ठ रोग के रोगी को खुजलाने की जलन से जो सुख प्राप्त होता है, वही सुख स्त्री संसर्ग से भी समझना चाहिये।
जैसा सुख फोड़े में पीब के निवारण से माना जाता है, वैसा ही सुख स्त्री में समझना चाहिए, उससे अधिक सुख स्त्री में नहीं होता।
..... वैराग्य मार्तण्ड।
नारायण हरिः।

05/07/2016

हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम् ।

श्री महादेव उवाच।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
अज्ञानतिमिराSन्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
स्थावरं जंगमं व्याप्तं यत्किन्चित्सचराSचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
चिन्मयं व्याप्नुवन्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
सर्व्व श्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाSम्बुजः ।
वेदान्ताSम्बुजसूर्य्यो यस्तस्मै श्री गुरवे नमः।।
चेतनः शाश्वतः शान्तो व्योमाSतीतो निरञ्जनः ।
बिन्दुनादकलातीतस्तस्मै श्री गुरवे नमः।।
ज्ञानशक्तिसमारूढ़स्तत्वमालाविभूषितः ।
भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्री गुरवे नमः।।
अनेकजन्मसंप्राप्त कर्म्मबन्धविदाहिने ।
आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापनं सारसम्पदः ।
गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
न गुरोरधिकं तत्वं न गुरोरधिकं तपः ।
तत्त्वज्ञानात्परं नाSस्ति तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मद्गुरुः श्रीजद्गुरुः ।
मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम्ं ।
गुरोः परतरं नाSस्ति तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
ध्यान मूलम् गुरोर्मूर्तिः पूजामूलम् गुरोः पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यम् मोक्षमूलं गुरोः कृपा।।
सप्तसागरपर्य्यन्ततीर्थस्नानादिकैः फलम् ।
गुरोरंघ्रिपयोबिन्दुसहस्रांशेन दुर्ल्लभम् ।।
गुरुरेव जगत्सर्व्वं ब्रह्माविष्णुशिवात्मकम् ।
गुरोः परतरं नाSस्ति तस्मात् सम्पूजयेद्गुरुम् ।।
ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभते गुरुभक्तितः ।
गुरोः परतरं नाSस्ति ध्येयोSसौ गुरुमार्गिणा ।।
गुरोः कृपाप्रसादेन ब्रह्माविष्णुसदाशिवाः ।
सृष्ट्यादिकसमर्थास्ते केवलं गुरुसेवया ।।
देवकिन्नरगन्धर्व्वाः पितरो यक्षचारणाः ।
मुनयोSपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणाविधिम् ।।

गुरु गीता से प्रकाशित ।

नारायण हरिः ।

14/06/2016

हरिः शरणम् हरिः शरणम् हरिः शरणम् हरिः शरणम् ।

शुभ सन्ध्या आदरणीय,
योगाभ्यासी मनःश्रेष्ठो अन्तस्त्यागी बहिर्जडः ।
अन्तस्त्यागी बहिस्त्यागी जीवन्मुक्तः स उच्यते ।।

अर्थात्
मन से अन्तर्वृत्तियों का त्याग और बाह्य वृत्तियों की उपेक्षा करने वाला योगाभ्यासी श्रेष्ठ है, किन्तु अन्तः और बाह्य दोनों वृत्तियों का मन से त्याग करने वाला ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है।

नारायण हरिः ।

11/06/2016

महाभारत के 18 दिन व्यापी युद्ध में
श्री कृष्ण ने अर्जुन को रथ पर बैठा कर
साक्षात् रूप में उपदेश दिया था। किन्तु इस देह-रथ
की प्रकृति एवं निवृति का युद्ध 18 जन्म में
भी समाप्त नहीं होने वाला।
श्री कृष्ण उस देह को त्याग-कर चले गए ,
किन्तु उसके भीतर जिन कृष्ण का अस्तित्व
वर्तमान है वे तो अंदर भी प्रत्येक देह-
रथ में वर्तमान है ,-और चिर काल तक रहेंगे, क्यों कि वे
अविनाशी हैं . उनकी
वर्तमानता के कारण ही हम सबकुछ
अनुभव करते हैं , वे ही इस देह-रथ के
भीतर बैठ कर उपदेश कर रहे हैं....!!!!

11/06/2016

Good evening!!

08/06/2016

हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम् ।

यो वै न पापे निरतो न पुण्ये
नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे ।
विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनो
विमुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ।।

अर्थात्
जो न पाप में लगा हो और न पुण्य में, न तो अर्थोपार्जन में तत्पर हो न धर्म में , न काम में ही । वह सब प्रकार के दोषों से रहित मनुष्य दुःख और सुख को देने वाली सिद्धियों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टी के ढेले और स्वर्ण में उसका समान भाव हो जाता है।

नारायण हरिः ।

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