काली मंदिर , शक्ति पीठ

काली मंदिर , शक्ति पीठ KALI MANDIR SHAKTI PEETH This is an old altar dedicated to maa Kali whom people worshiped almost since the origin of the village Pure Ojha.

22/08/2025

#सत्संगके_प्रभावसे_पाँच_प्रेतोंके_उद्धारकी_कथा

'हारीतस्मृति' ने मानवमात्रके लिये कुछ सामान्य धर्मोका परिगणन किया है, जिनमें सत्संग भी है—

दानं दमस्तपः शौचमार्जवं क्षान्तिरेव च ।
आनृशंस्यं सतां संगः पारमैकान्त्यहेतवः ॥
वृद्धहारीत० ८| ३३७

संतोंकी संगतिसे लाभ-ही-लाभ होता है। संत तुलसीदासजीने कहा है कि एक क्षण भी सत्संग करनेसे जो सुख प्राप्त होता है, उसकी तुलनामें स्वर्ग और अपवर्गका सुख बिलकुल नगण्य है। यह तो हुआ सत्संगका आध्यात्मिक लाभ। आधिदैविक और आधिभौतिक लाभ भी इससे शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। रत्नाकर डाकूका देवर्षि नारदसे जो थोड़ी देरका संग हुआ, उसका परिणाम बहुत ही चौंकानेवाला है। वह व्यक्ति वाल्मीकि रूप महर्षि और आदिकवि बन गया। इसी तरह पद्मपुराण ( सृष्टिखण्ड ) से पता चलता है कि एक संतके साथ केवल बातचीत करनेसे कुछ ही देरमें पाँच प्रेतोंको प्रेतत्वसे छुटकारा मिल गया और वे दिव्य विमानोंपर चढ़कर ऊँचे लोकोंमें चले गये।

प्राचीन कालमें पृथु नामके एक आचारनिष्ठ ब्राह्मण थे। वे दिन-रात धर्मके ही कार्य किया करते थे। एक बार तीर्थयात्राके प्रसंगसे वे एक वनमें पहुँचे। वह वन वृक्ष और लतासे शून्य था। कहीं जल भी नहीं दिखायी देता। केवल काँटे-ही-काँटे वहाँ दिखायी पड़ते। सहसा ब्राह्मण देवताकी दृष्टि पाँच प्रेतोंपर पड़ गयी। वे देखनेमें बहुत ही भयंकर थे। देखते ही ब्राह्मण देवतामें भयका संचार हो गया, किंतु तुरंत ही उन्होंने धैर्य धारण कर लिया। उन्होंने पूछा— 'तुम लोग कौन हो? तुमसे ऐसे कौन-से कर्म हो गये हैं कि तुम्हारी आकृति इतनी विकृत हो गयी है ? इतने दुःखी एवं बेचैन क्यों हो?'

प्रेतोंमेंसे एकने कहा— 'आपने ठीक ही समझा है, सचमुच हमलोग निरन्तर दुःख-ही-दुःखमें डूबे रहते हैं। एक क्षण भी चैन नहीं पाते। हमारा ज्ञान भी लुप्त हो गया है। हम इतना भी नहीं जानते कि कौन दिशा किस ओर है। केवल दुःख-ही-दुःखका ज्ञान होता रहता है।' ब्राह्मणने याद दिलाया कि 'क्या आपको पता है कि आपलोगोंको किस-किस कर्मसे इस दुर्गतिकी प्राप्ति हुई है?' उनमेंसे एकने कहा कि 'मैं ताजा और स्वादिष्ट भोजन स्वयं खा जाता था और ब्राह्मणोंको बासी खिलाता था, इस कारण मेरा नाम पर्युषित पड़ गया है। इस पापसे मैं प्रेत बन गया हूँ और मेरा भयानक रूप हो गया है। मेरे दूसरे साथीने कुछ भूखे और अन्न माँगनेवाले ब्राह्मणोंकी हत्या कर दी। इस पापसे यह सूचीमुख नामका प्रेत हो गया है। इसका मुँह सुईकी तरह छोटा है। एक तो भोजन-पानी मिलता ही नहीं, मिलनेपर भी सुई-जितने छोटे छेदसे कितना पानी पिया जा सकता है और कितना भोजन किया जा सकता है। यह हमेशा भूख और प्याससे तड़पता ही रहता है। यह तीसरा प्रेत 'भूखे ब्राह्मणको कुछ देना न पड़े' इस भयसे शीघ्रतापूर्वक वहाँसे हट जाता था, इसलिये इसका नाम शीघ्रग हो गया। इस प्रेतयोनिमें इसको लँगड़ा बनना पड़ा। यह जो चौथा प्रेत है, वह देनेके डरसे केवल घरमें बैठकर स्वादिष्ट भोजन किया करता था, यह रोधक कहलाता है। इस प्रेतयोनिमें इसे सिर नीचा करके चलना पड़ रहा है। यह जो पाँचवाँ प्रेत है, वह किसीके माँगनेपर कुछ बोलता नहीं था, केवल सिर नीचा करके धरती कुरेदने लगता था। इसलिये इसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग विकृत हो गये हैं और इसका नाम लेखक पड़ गया।'

ब्राह्मणने पूछा— आखिर तुम लोग खाते-पीते क्या हो ? प्रेतोंने कहा कि 'हमको बहुत ही निन्दित भोजन करना पड़ता है। जिन घरोंमें पवित्रता नहीं होती, वहीं हमें विकृत पदार्थोंका भोजन प्राप्त होता है।'

अन्तमें प्रेतोंने ब्राह्मणसे प्रार्थना की कि 'आप तपस्वी हैं, आप बतायें कि वह कौन-सा कर्म है, जिस कर्मसे जीव प्रेतयोनिमें नहीं पड़ता।' ब्राह्मणने कहा— 'जो मनुष्य एक या तीन कृच्छ्र-चान्द्रायण-व्रत करता है, वह कभी प्रेतयोनिमें नहीं जाता। जो मान-अपमानमें और शत्रु-मित्रमें समानभाव रखता है, वह भी प्रेतयोनिमें नहीं जाता। जिसने क्रोध, ईर्ष्या, तृष्णा तथा लोभ आदिको जीत लिया है, वह प्रेत नहीं होता। जिसके हृदयमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति दया भरी हुई है तथा जो गौ, ब्राह्मण, तीर्थ, पर्वत, नदी और देवताओंको प्रणाम करता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं होता।'

पृथु जब इस प्रकार उपदेश दे रहे थे, उसी समय आकाशमें सहसा नगारे बजने लगे, आकाशसे पुष्प-वृष्टि होने लगी और चारों ओरसे उन पाँच प्रेतोंके लिये विमान आ गये। आकाशवाणी हुई— 'एक संतके साथ वार्तालाप करनेके कारण तुम सब प्रेतोंकी दिव्य गति हुई है।' इस प्रकार सत्संगके प्रभावसे उन प्रेतोंका उद्धार हो गया।

ो_नारायणाय_______ॐ_नमो_भगवते_वासुदेवाय
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यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि
नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति ।
ते नैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा
संयान्त्यपावृतमृतं तमजं प्रपद्ये 💞🙏💞

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‼️ २१ अगस्त २०२५ ‼️

📜🏵️ #पञ्चाङ्गम् 🏵️📜

🔯 #पुष्य रा. १|६ यावद् तदुपरि—
🔯 #श्लेषा रा. १|६ उ. ⏩ |
🌝 #कर्कराशिः ति. १२ बुधे रा. ७|४६ उ. ⏩ |
👉 दधिभाद्रपदे त्यजेत | नात्रत्यागस्तक्रादीनाम् |
🕉️ #मासशिवरात्रि_१३_व्रतम् |
◍ भवेद्यत्र त्रयोदश्यां भूतव्याप्ता महानिशत्युक्तेः |
🪩 #कलियुगादिः_१३ |
🚩 #अघोरचतुर्दशी_१४ ( प्रदोषे ) |
■ सर्वार्थामृतसिद्धियोगः रा. १|६ या. |
🌅 #सूर्योदयः प्रा. ५|३६ वादने |
🌄 #सूर्यास्तः सा. ६|२४ वादने | ------------------------------------------------------------------------

🌞 #विविधमुहूर्त्ताः🌞

🌳 ❈ ति. १३ गुरौ मासान्तादिदोषः।

🌀 ❈ ति. १३ गुरु को मासान्तदोष है।

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🔴 #मूलविचार 🔴

#रेवती/ #अश्विनी — ति. ४ बुधे दि. १२|४९ उ. — ति. ७ शुक्रे दि. ९|४८ या. |

#श्लेषा/ #मघा — ति. १३ गुरौ रा. १|६ उ. — ति. ३० शनौ रा. १|३५ या. |
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🎊🏵️🕉️ #व्रत_पर्व_एवं_त्योहार 🕉️🏵️🎊

👉 फलम् - षष्ठी तिथि का क्षय हो जाने के कारण यह पक्ष १४ दिन का ही है। ऐसा माना जाता है कि भादों के महीने में सजाव दही नहीं खाना चाहिए किन्तु मट्ठे का सेवन कया जा सकता है।

🎊🏵️🎊▪️मास शिवरात्रि व्रत का मान आज २१ अगस्त गुरुवार को होगा ।

🎊🏵️🎊▪️सन्त अघोराचार्य का अवतरणोत्सव २२ अगस्त शुक्रवार को मनाया जायेगा। काशी के क्रीं कुण्ड एवं पड़ाव तथा सबसे बढ़कर सन्त कीनाराम की जन्मस्थली चन्दौली (वाराणसी) जनपद के रामगढ़ नामक गाँव में विशेष समारोह मनाया जायेगा।

🎊🏵️🎊▪️ श्राद्ध के लिये अमावस्या का मान २२ अगस्त शुक्रवार को होगा।

🎊🏵️🎊▪️ जबकि स्नानदान के लिए अमावस्या तथा कुशोत्पाटिनी अमावस्या २३ अगस्त शनिवार को होगी। 'ॐ हूँ फट्‌कर' मन्त्रोच्चार के साथ उखाड़ा गया कुशा पूजनादि कार्य में वर्ष भर प्रयोग में लाया जायेगा।

👉 मघा नक्षत्र सिंह राशि की सूर्य संक्रान्ति १७ अगस्त रविवार को दिन ४।१ बजे से आयेगी। इससे अच्छी वृष्टि होने की सम्भावना बन रही है। शनिवार की अमावस्या भारी पड़ेगी। दैवी-प्राकृतिक घटनाएँ घट सकती हैं।

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📜 #श्रीशुभ_कालयुक्त_संवत्_२०८२_भाद्रपदकृष्णपक्षःI
#याम्यायनं_सौम्यगोलःl #वर्षर्त्तुःl #गुरुवारl
#त्रयोदशी दिन १२|२६ यावद् तदुपरि— #चतुर्दशीl
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❀༺꧁||🙏जय माँ🙏||꧂༻❀
#दुर्गा_मन्दिर_शक्ति_पीठ_वाटिका

15/08/2025

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भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिर्न वदनैः
प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथनः पञ्चभिरपि ।
न षड्भिः सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपति-
स्तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसरः ॥

❝ हे भवानि ! प्रजापति ब्रह्माजी अपने चार मुखोंसे भी तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, त्रिपुरविनाशक महादेवजी पाँच मुखोंसे भी तुम्हारा स्तवन नहीं कर सकते, कार्तिकेयजी तो छः मुखोंके रहते हुए भी असमर्थ हैं, इने-गिने मुखवालोंकी तो बात ही क्या है, नागराज शेष हजार मुखोंसे भी तुम्हारा गुणगान नहीं कर पाते, फिर तुम्हीं बताओ, जब इनकी यह दशा है तो दूसरे किसीको और किस प्रकार तुम्हारी स्तुतिका अवसर प्राप्त हो सकता है ?❞

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❀༺꧁||🙏जय माँ🙏||꧂༻❀
#दुर्गा_मन्दिर_शक्ति_पीठ_वाटिका

15/08/2025

#भगवान्_विष्णुके_हयग्रीवावतारकी_कथा

एक समयकी बात है। हयग्रीव नामका एक परम पराक्रमी दैत्य हुआ। उसने सरस्वती नदीके तटपर जाकर भगवती महामायाकी प्रसन्नताके लिये बड़ी कठोर तपस्या की। वह बहुत दिनोंतक बिना कुछ खाये भगवतीके मायाबीज एकाक्षर महामन्त्रका जप करता रहा। उसकी इन्द्रियाँ उसके वशमें हो चुकी थीं। सभी भोगोंका उसने त्याग कर दिया था। उसकी कठिन तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवतीने उसे तामसी शक्तिके रूपमें दर्शन दिया। भगवती महामायाने उससे कहा— 'महाभाग ! तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुमपर परम प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो भी इच्छा हो मैं उसे पूर्ण करनेके लिये तैयार हूँ। वत्स! वर माँगो।'

भगवतीकी दया और प्रेमसे ओतप्रोत वाणी सुनकर हयग्रीवकी प्रसन्नताका ठिकाना न रहा। उसके नेत्र आनन्दके अश्रुओंसे भर गये। उसने भगवतीकी स्तुति करते हुए कहा— 'कल्याणमयी देवि ! आपको नमस्कार है। आप महामाया हैं। सृष्टि, स्थिति और संहार करना आपका स्वाभाविक गुण है। आपकी कृपासे कुछ भी असम्भव नहीं है। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अमर होनेका वरदान देनेकी कृपा करें।'

देवीने कहा—'दैत्यराज ! संसारमें जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। प्रकृतिके इस विधानसे कोई नहीं बच सकता है। किसीका सदाके लिये अमर होना असम्भव है। अमर देवताओंको भी पुण्य समाप्त होनेपर मृत्युलोकमें जाना पड़ता है। अतः तुम अमरत्वके अतिरिक्त कोई और वर माँगो।'

हयग्रीव बोला—'अच्छा तो हयग्रीवके हाथों ही मेरी मृत्यु हो । दूसरे मुझे न मार सकें। मेरे मनकी यही अभिलाषा है। आप उसे पूर्ण करनेकी कृपा करें।' 'ऐसा ही हो' यह कहकर भगवती अन्तर्धान हो गयीं। हयग्रीव असीम आनन्दका अनुभव करते हुए अपने घर चला गया। वह दुष्ट देवीके वरके प्रभावसे अजेय हो गया। त्रिलोकीमें कोई भी ऐसा नहीं था, जो उस दुष्टको मार सके। उसने ब्रह्माजीसे वेदोंको छीन लिया और देवताओं तथा मुनियोंको सताने लगा। यज्ञादि कर्म बन्द हो गये और सृष्टिकी व्यवस्था बिगड़ने लगी। ब्रह्मादि देवता भगवान् विष्णुके पास गये, किन्तु वे योगनिद्रामें निमग्न थे। उनके धनुषकी डोरी चढ़ी हुई थी। ब्रह्माजीने उनको जगानेके लिये वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया। ब्रह्माजीकी प्रेरणासे उसने धनुषकी प्रत्यंचा काट दी। उस समय बड़ा भयंकर शब्द हुआ और भगवान् विष्णुका मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। सिररहित भगवान्‌के धड़को देखकर देवताओंके दुःखकी सीमा न रही। सभी लोगोंने इस विचित्र घटनाको देखकर भगवतीकी स्तुति की। भगवती प्रकट हुईं। उन्होंने कहा—'देवताओ चिन्ता मत करो। मेरी कृपासे तुम्हारा मङ्गल ही होगा। ब्रह्माजी एक घोड़ेका मस्तक काटकर भगवान्‌के धड़से जोड़ दें। इससे भगवान्‌का हयग्रीवावतार होगा। वे उसी रूपमें दुष्ट हयग्रीव दैत्यका वध करेंगे।' ऐसा कहकर भगवती अन्तर्धान हो गयीं।

भगवतीके कथनानुसार उसी क्षण ब्रह्माजीने एक घोड़ेका मस्तक उतारकर भगवान्‌के धड़से जोड़ दिया। भगवतीके कृपाप्रसादसे उसी क्षण भगवान् विष्णुका हयग्रीवावतार हो गया। फिर भगवान्‌का हयग्रीव दैत्यसे भवानक युद्ध हुआ। अन्तमें भगवान्‌के हाथों हयग्रीवकी मृत्यु हुई। हयग्रीवको मारकर भगवान् ने वेदोंको ब्रह्माजीको पुनः समर्पित कर दिया और देवताओं तथा मुनियोंका संकट निवारण किया।

#श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

|| REPUBLISHED ||

#नमः_पार्वती_पतये ादेव

ाँ #श्री_विष्णवे_नमः
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अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्य-शिरोऽधि निवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठ-कुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूतिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
🙏💞🌼🌹🏵️🌺🌼🌹🏵️🌺🌼🌹🏵️🌺💞🙏

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‼️ ८ अगस्त २०२५ ‼️

📜🏵️ #पञ्चाङ्गम् 🏵️📜

🔯 #उ०षा० दि. ३|७ यावद् तदुपरि—
🔯 #श्रवण दि. ३|७ उ. ⏩ |
🌝 #मकरराशिः ति १३ गुरौ रा. ८|२७ उ. ⏩ |
💥 #भद्रा दि. १|४२ उ. — रा. १|३२ या. |
👉 श्रवणे वर्जयेच्छाकम् |
🪷 श्री काशीविश्वनाथाय नित्यविल्वपत्रार्पणम् |
👉 #नैमित्तिक_पार्थिवार्चन ।
🕉️ #व्रताय_१५_पूर्णिमा |
🎊 #हयग्रीवोत्पत्तिः ( सायाह्ने ) |
● काश्यां भदैनीस्थित मन्दिरे दर्शनं पूजनञ्च |
■ सर्वार्थसिद्धियोगः दि. ३|७ उ. ⏩ |
■ रवियोगः दि. ३|७ या. |
🌅 #सूर्योदयः प्रा. ५|२८ वादने |
🌄 #सूर्यास्तः सा. ६|३२ वादने | ------------------------------------------------------------------------

🌞 #विविधमुहूर्त्ताः🌞

🌳 ❈ ति. १४ शुक्रे उ.षा. भे रिक्ताततो विष्टिदोषः ।

🌀 ❈ ति. १४ शुक्र को उ.षा. में रिक्ता के बाद भद्रादोष है।
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🎊🏵️🕉️ #व्रत_पर्व_एवं_त्योहार 🕉️🏵️🎊

👉 फलम् - अष्टमी तिथि की वृद्धि हो जाने के कारण यह पक्ष १६ दिन का हो गया है। पक्ष के ३ शुक्रवार शुभफलकारक है। शनिवार मघा नक्षत्र एवं सिंह राशि का चन्द्रदर्शन मु.३० बाजार भाव स्थिर रखेगा।

🎊🏵️🎊▪️सावन के महीने में प्रतिदिन भोले शंकर भगवान को जल चढ़ाकर बेलपत्र अर्पण करने से उनकी विशेष अनुकम्पा प्राप्त होती है।

🎊🏵️🎊▪️सर्वविदित है कि सावन का महीना देवाधिदेव भगवान शिव का अत्यन्त प्रिय महीना है। इसकी व्याख्या विद्वान मनीषी साधुसन्त अनेक प्रकार से करते हैं। देश भर में विशेष कर उत्तर-भारत में काँवरियें गंगा स्नान कर कॉवर में लटकते पात्र में गंगा जल भरकर बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक करते है। काँवरियों के 'बोल बम्' उ‌द्घोष से वातावरण शिवमय हो जाता है।

🎊🏵️🎊▪️सावन का प्रत्येक सोमवार शिवाराधना के लिए विशेष पुण्यफलदायक होता है।

🎊🏵️🎊▪️ रक्षा बन्धन का परमपुनीत पर्व ९ अगस्त शनिवार को होगा। बहनें अपने भाइयों की कलाईमें राखी बाँधकर तथा भाई अपनी बहन को उपहार सम्मान देकर एक दूसरे को प्रति अपने परस्पर स्नेह भाव को करेंगे। विप्रजन अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बाँधकर उचित दक्षिणा प्राप्त करेंगे।

👉 श्लेषा नक्षत्र का सूर्य ३ अगस्त रविवार को सायं ५।२१ बजे से आयेगा। इसमें साधारण वृष्टि होने के ही योग प्राप्त हो रहे है। पुनः ८ अगस्त के आसन्न भी वर्षा होने की सम्भावना है

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🌼 ्रावणे_सोमवासरे_व्रतं_काम्यम्🌼

सोमवार व्रतं कार्यं श्रावणे वै यथाविधिः।
शक्तेनोपोषणं कार्यमथवा निशिभोजनमिति।

▪️ श्रावण मास में सोमवार व्रत तथा कृत्य ▪️

श्रावण मास में विधि पूर्वक सोमवार व्रत करना चाहिए, सक्षम रहने पर सम्पूर्ण उपवास पूर्वक तथा अक्षम रहने पर रात्रि में भोजन कर सकते हैं।
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🏵️ श्रावणमासकृत्यम् 🏵️

श्रावणे नियतोमासमेक भक्तेनयः क्षिपेत् ।
तत्र तत्राभिषेकेण पूज्यतेज्ञातिवर्द्धनः ॥

श्रावण मास में मासपर्यन्त एक समय भोजन करने और भगवान का अभिषेक करने से वंश तथा जाति की वृद्धि होती है I
—महाभारत

घृतं च क्षीरं कुम्भांश्च घृत धेनु फलानि च ।
श्रावणे श्रीधरप्रीत्यैदातव्यानि विपश्चिता।
श्रावणे एक भक्तं व्रतं वा विष्णु शिवाद्याभिषेकश्च
कार्यः ।

श्रावण मास में दूध, घी, धेनु का दान करने से भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ऐसा विद्वानों ने कहा है। श्रावण मास में एक बार भोजन करना तथा विष्णु और शिव का अभिषेक कराना चाहिये l
—वामनपुराण
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📜 #श्रीशुभ_कालयुक्त_संवत्_२०८२_श्रावणशुक्लपक्षःI
#याम्यायनं_सौम्यगोलःl #वर्षर्त्तुःl #शुक्रवारl
#चतुर्दशी दिन १|४२ यावद् तदुपरि— #पूर्णिमाl
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❀༺꧁||🙏जय माँ🙏||꧂༻❀
#दुर्गा_मन्दिर_शक्ति_पीठ_वाटिका

04/11/2024

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|| भगवान् महामृत्युंजयका ध्यान ||

हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम् ।
अङ्कन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकान्तं शिवं
स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे ॥

त्र्यम्बकदेव अष्टभुज हैं। उनके एक हाथमें अक्षमाला और दूसरेमें मृगमुद्रा है, दो हाथोंसे दो कलशोंमें अमृतरस लेकर उससे अपने मस्तकको आप्लावित कर रहे हैं और दो हाथोंसे उन्हीं कलशोंको थामे हुए हैं। शेष दो हाथ उन्होंने अपने अंकपर रख छोड़े हैं और उनमें दो अमृतपूर्ण घट हैं। वे श्वेत पद्मपर विराजमान हैं, मुकुटपर बालचन्द्र सुशोभित है, मुखमण्डलपर तीन नेत्र शोभायमान हैं। ऐसे देवाधिदेव कैलासपति श्रीशंकरकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

महामृत्युंजय- मन्त्र

ॐ हौं ॐ जूँ ॐ सः ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात्
ॐ स्वः ॐ भुवः ॐ भूः ॐ सः ॐ जूं ॐ हौं
ॐ स्वाहा ॥

ॐ नमो नारायणाय 🙏
07/04/2023

ॐ नमो नारायणाय 🙏

#कच्छपावतार

पुराने समयकी बात है— देवताओं और राक्षसोंमें आपसी मतभेदके कारण शत्रुता बढ़ गयी । आये दिन दोनों पक्षोंमें लड़ाई होती रहती थी । एक दिन राक्षसोंके आक्रमणसे सभी देवता भयभीत हो गये । वे भागते-भागते ब्रह्माजीके पास गये । ब्रह्माजीकी रायसे सभी लोग जगद्गुरुकी शरणमें जाकर प्रार्थना करने लगे । देवताओंकी प्रार्थनासे प्रसन्न होकर भगवान् ने कहा— 'देवताओ ! तुम लोग दानवराज बलिसे प्रेमपूर्वक मिलो । उनको ही अपना नेता मानकर समुद्र मथनेकी तैयारी करो । समुद्र-मन्थनके अन्तमें अमृत निकलेगा । उसे पीकर तुम लोग अमर हो जाओगे ।' यह कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये ।

इसके बाद देवताओंने बलिको नेता मानकर वासुकि नागको रस्सी और मन्दराचलको मथानी बनाकर समुद्र मन्थन शुरू किया । परन्तु जैसे ही मन्थन शुरू हुआ कि मन्दराचल ही समुद्रमें डूबने लगा । सभी लोग परेशान हो गये । अन्तमें निराश होकर लोगोंने भगवान्‌का सहारा लिया । भगवान् तो सब जानते ही थे । उन्होंने हँसकर कहा—'सब कार्योंके प्रारम्भमें गणेशजीकी पूजा करनी चाहिये । बिना उनकी पूजाके कार्य सिद्ध नहीं होता ।' यह सुनकर वे लोग गणेशजीकी पूजा करने लगे । उधर गणेशजीकी पूजा हो रही थी, इधर लीलाधारी भगवान् ने कच्छपरूप धारणकर मन्दराचलको अपनी पीठपर उठा लिया ।

तत्पश्चात् समुद्र-मन्थन शुरू हुआ । मथते-मथते बहुत देर हो गयी । अमृत न निकला । तब भगवान् ने सहस्रबाहु होकर स्वयं ही दोनों तरफसे मथना प्रारम्भ किया । उसी समय हलाहल विष निकला, जिसे पीकर भगवान् शिव नीलकण्ठ कहलाये ।

इसी प्रकार कामधेनु , उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभमणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, भगवती लक्ष्मी, वारुणी, धनुष, चन्द्रमा, शङ्ख, धन्वन्तरि और अन्तमें अमृत निकला ।

अमृतके लिये देवता और दानव दोनों झगड़ने लगे । तब भगवान् ने अपनी लीलासे अमृत देवताओंको ही दिया । अमृत पीकर देवता लोग अमर हो गये। वे युद्धमें विजयी हुए ।

विजयी देवता बार-बार कच्छप भगवान्‌की स्तुति करने लगे । उनकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान् ने कहा— 'देवताओ ! जो लोग भगवान्‌के आश्रित होकर कर्म करते हैं; वे ही देवता कहलाते हैं । उन्हें ही सच्ची सुख-शान्ति और अमृत या अमृत-तत्त्वकी प्राप्ति होती है । किंतु जो अभिमानके सहारे कर्म करते हैं; उन्हें कभी भी अमृतकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।' यह कहकर भगवान् कच्छप अन्तर्धान हो गये । भक्तोंके परम हितैषी कच्छपभगवान्‌को हम सब नमस्कार करते हैं ।

🏵️ #कूर्मस्तोत्रम् 🏵️

देवा ऊचुः

नमाम ते देव पदारविन्दं प्रपन्नतापोपशमालपत्रम् ।
यन्मुलकेता यतयोऽञ्जसोर-संसारदुःखं वहिरुत्क्षिपन्ति ॥
धातर्यदस्मिन् भव ईश जीवास्तापत्रयेणोपहता न शर्म ।
आत्मंल्लभन्ते भगवंस्तवांत्रिच्छायां सविद्यामत आश्रयेम ॥
मार्गन्ति यत्ते मुखपद्मनी डैश्छन्दः सुपर्णेऋषयो विविक्ते ।
यस्याधमर्षोद-सरिद्वरायाः पदं पदं तीर्थपदः प्रपन्नाः ॥
यच्छ्रद्धया श्रुतवत्या च भक्त्या संमृज्यमाने हृदयेऽवधार्यं ।
ज्ञानेन वैराग्यवलेन धीरा व्रजेम तत्तेंऽघ्रिसरोजपीठम् ॥
विश्वस्य जन्म-स्थिति-संयमार्थे कृतावतारस्य पदाम्बुजं ते ।
व्रजेम सर्वे शरणं यदीश स्मृतं प्रयच्छत्यभयं स्वपुंसाम् ॥
यत्सानुबन्धेऽसति देह गेहे ममाऽहमित्यूढ - दुराग्रहाणाम् ।
पुंसां सुदूरं वसतोऽपि पुर्यां भजेम तत्ते भगवन् पदाब्जम् ॥
तान् वा असद्वृत्तिभिरक्षिभिर्ये पराहृतान्तर्मनसः परेश ।
अथो न पश्यन्त्युरुगाय नूनं ये ते पदन्यास-विलास-लक्ष्म्या ॥
पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये ।
वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाऽञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥
तथाऽपरे चात्मसमाधियोगबलेन जित्वा प्रकृति बलिष्ठाम् ।
त्वामेव धीराः पुरुषा विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्नतु सेवया ते ॥
तत्ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य त्वयाऽनुसृष्टास्त्रिभिरात्मभिः स्म ।
सर्वे वियुक्ताः स्वविहारतन्त्रं न शक्नुमस्तत्प्रतिहर्तवे ते ॥
यावद्बल तेऽज हराम काले यथा वयं चाऽन्नमदाय यत्र ।
यथोभयेषां त इमे हि लोका बलि हरन्तोऽन्नमदन्त्यनूहाः ॥
त्वं नः सुराणामसि सान्वयानां कूटस्थ आद्यः पुरुषः पुराणः ।
त्वं देवशक्त्यां गुणकर्मयोनौ रेतस्त्वजायां कविमादधेऽजः ॥
ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे बभूविमात्मन् करवाम किं ते ।
त्वं नः स्वचक्षुः परिदेहि शक्त्या देवक्रियार्थे तदनुग्रहाणाम् ॥

॥ इति श्रीमद्भागवतान्तर्गतं कूर्मस्तोत्रं समाप्तम् ॥

ो_भगवते_वासुदेवाय ादेव
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ॐ नमो भगवते अकूपाराय
सर्वसत्त्वगुणविशेषणायानुपलक्षितस्थानाय
नमो वर्ष्मणे नमो भूम्ने नमो नमोऽवस्थानाय
नमस्ते ॥ 💞🙏💞

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‼️७ अप्रैल २०२३‼️

🌞 #विविधमुहूर्त्ताः🌞

🌳 ▪️ति.१ शुके #चित्रा भे जातकर्मनामकरण शिशुताम्बूलभक्षण अन्नप्राशन ( द्वितीयायाम् ) शय्यासनाद्युपभोग नववस्त्रधारण लतापादपारोपण शिल्पविद्या भैषज्य नौकाघटन विपणि व्यापार वस्तुक्रय गजकृत्य धान्यच्छेदन मुहूर्त्तः। #स्वात्यां केतुयुतिः I

🌀▪️ ति. १ शुक्र को चित्रा में जातकर्मनामकरण शिशुताम्बूलक्षण अन्नप्राशन (द्वितीया में) नवीन खटिया चौकी आदि का उपभोग नववस्त्रधारण वाटिकारोपण शिल्पविद्या औषध सेवन नावनिर्माण विपणि व्यापार वस्तुक्रय वाहन खरीदने फसल काटने का मुहूर्त है। स्वाती में केतुयुति है I

👉📜✡️ #चित्रा दि. १|२३ यावद् तदुपरि
✡️ #स्वाती दि. १|२३ उ. ⏩ I
🌝 #तुलाराशिः ति. १५ रा. १२|५८ वादने ⏩ l
🕉️🎊 🚩 #यावन्मासं_प्रपा_दानम् (पौसरा) ।
अशक्तौ जलकुम्भादेर्दैनिकं दानम् l
🚩 🏵️ #अश्वत्थमूले_सेचनम्।
🚩🍂 #तुलसी_पत्रेण_श्रीविष्णुपूजनम् I
🎊🕉️ #कच्छपावतारः_१ I
🎊 #फसली_वैशाख_मासारम्भः I
🎊🚩▪️अश्वत्थ (पीपल) नीम्बमूले जलदानम्
विद्यारोग्यार्थं तिलक व्रतम् I
🎊▪️तैलाभ्यङ्ग दैनिक स्नानम् I
🕉️🎊🚩 #गलन्तिका विशेष :
वसन्त-ग्रीष्मयोर्मध्ये यः पानीयं प्रयच्छति।
पले पले सुवर्णस्य फलमाप्नोति मानवः ।
तथा च—
सर्वदानेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम्।
तत्फलं समवाप्नोति माधवे जलदानतः II
▪️शुक्र-नन्दा सिद्धयोगः १० ।३२ (दि.१०1०) या. I

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🎊🏵️🎊▪️आज से पूरे वैशाख मास पीपल और नीम के वृक्ष में जल देना प्रारम्भ हो जायेगा ।

🎊🏵️🎊▪️वैशाख का महीना अत्यन्त पुण्यकारी मास माना जाता है। चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से वैशाख शुक्ल पूर्णिमा तक प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व किसी तीर्थस्थान नदी या कुंआ, बावली, सरोवर अथवा अपने घर पर ही शुद्ध जल से स्नान करें। इसके अतिरिक्त "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या "हरे राम हरे राम' मन्त्र का यथा शक्ति जप करके एक बार भोजन करें। इकतीस दिन तक ऐसा क्रम बनाये रखने से अनेक प्रकार के रोग और दोष दूर होते हैं एवं प्रभाव तथा पुण्य में वृद्धि होती है। देव विग्रहों के ऊपर परम्परागत तरीके से जल-निक्षेप गलन्तिका कार्य प्रारम्भ हो जायेगा।
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🌼 II वैशाखमासकृत्यम् II 🌼

निश्चरेदेकभक्तेन वैशाखे यो जितेन्द्रियः ।
प्रातः स्नायी नरः स्त्री वा जातीनां श्रेष्ठतां व्रजेत् ॥
#महाभारते
गंधमाल्यानि च तथा वैशाखे सुरभीणि च ।
देयानि द्विजमुख्येभ्यो मधुसूदन तुष्टये ।
#वामनपुराणे

🌼 वैशाखमासे देवस्य जलाधिवास विधिः🌼

वैशाखे ज्येष्ठे वा यत्र मासे ऊष्मबाहुल्यम्। तत्र प्रातर्नित्यपूजां कृत्वा गंघोदकपूर्णपात्रे विष्णुं संस्थाप्य पंचोपचारैः संपूज्य तत्रैव जले सूर्यास्तपर्यंतमधिवास्य रात्रौ स्वस्थाने स्थापयित्वा पंचोपचारैः संपूजयेत्तेन तीर्थोदकेन गृहदारादि युक्तमात्मांन पावयेत्। एतच्च द्वादश्यां दिवा न कार्यम् । रात्रौ किंचित्कालं जलस्थं पूजयित्वा स्वस्थाने स्थापयेत् ॥ अथानुदिनं स्मरणीयः पाठः ।। अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः । जयः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः।१। सप्तैतान्संस्मरेत्रित्यं मर्कण्डेयमथाष्टमम् । जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युर्विनश्यति । २ । वैशाखस्नान मन्त्र ।। वैशाखं । सकलं मासं मेषसंक्रमणं रवेः । प्रातः सनियमं स्नास्ये प्रीयतां मधुसूदन। मधुहन्तुः प्रसादेन ब्राह्मणानामनुग्रहात् । निर्विघ्नमस्तु मे पुण्यं वैशाखस्नानमन्वहम् ॥१। माधवे मेषगे भानौ मुरारे मधुसूदन । प्रातः स्नानेन मे नाथ फलदो भव पापहन् ।वैशाखे त्याज्यम् ।। कास्यं मांस मसूरानं चणकं कोद्रवं तथा शाकं मधुपरान्नं च पुनर्भोजन मैथुनमिति। मेषार्के दानविशेषः।। यो मेषस्थेऽर्के ददाति सक्तूनम्बुघटान्वितान् उद्दिश्य पित्तॄन् देवांश्च सर्वपापैः प्रमुच्यते । दानमन्त्रः- सक्तवो धर्मदा नित्यं ब्राह्मणप्रीति कारकाः। त्वद्दानान्ममपापानां क्षयोऽस्तु सुखमस्तु च। वैशाखे संपूर्ण स्नानाशक्तावन्ते त्रयोदश्यादि दिनत्रयेऽपि स्नानस्य विशेष फलमुक्तम् । त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां वैशाख्यां वा दिनत्रयम् । अपि सम्यग्विधानेन नारी वा पुरुषोऽपि वा ।। प्रात: स्नायी स नियमः सर्वपापैः प्रमुच्यते इति ।।

🎊 वैशाख या ज्येष्ठ मास में जब गर्मी अत्यधिक पड़ने लगे तो प्रातः काल नित्यपूजन पूर्वक संपोदक से परिपूर्ण पात्र में विष्णु भगवान को स्थापित करे पंचोपचार पूजन करके सूर्यास्त तक जलाधिवास कराना चाहिए। पुनः सायं काल गन्धपूर्ण जल से बाहर निकालकर चिंचोपचार पूजन करना चाहिए तथा उस जल से गृहजनों सहित समस्त गृह को पवित्र करना चाहिए। द्वादशी तिथि के दिन विष्णु का जलाधिवास नहीं करें, अपितु सायं काल कुछ समय तक जल में स्थापित कर पूजन करके पुनः स्व स्थान पर स्थापित कर देना चाहिए। प्रतिदिन के लिए स्मरणीय पाठ अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमां विभीषणः । जयः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ||१|| सप्तैतान्संस्मरेन्नित्यं मर्केण्डेयमथाष्टमम् । जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युर्विनश्यति ॥२॥ वैशाखस्तान का मन्त्र- वैशाखं सकलं भासं मेष संक्रमणं रवेः । प्रातः सनियमं स्नास्ये प्रीयतां मधुसूदन। मधुहन्तुः प्रसादेन ब्राह्मणानामनुग्रहात्। निर्विघ्नमस्तु मे पुण्यं वैशाखस्नानमन्वहम् ।१ । माघवे मेघगे मानौ मुरारेमधुसूदन। प्रातः स्नानेन मे नाथ फलदो भवपापहन् । वैशाख में त्याज्य- कांसे का पात्र, मांस, मसूर दाल, चना, कोदो (अत्र विशेष) शाक, मधुपरान्न भोजन तथा मैथुन क्रिया का वैशाख में त्याग करना चाहिए। मेष के सूर्य में दान विशेष - जो मनुष्य मेष के सूर्य में देवों तथा पितरों को उद्देश्य कर सत्तू तथा जल पूर्ण घड़े का दान करता है उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। दान के मन्त्र—
सक्तवो धर्मदा नित्यं ब्राह्मणप्रीतकारकाः ।
त्वद्दद्यनान्ममपापानां क्षयोऽस्तु सुखमस्तु च।।

जो लोग परिस्थित वश सम्पूर्ण वैशाख में तीर्थ स्थान नहीं कर सकते वे (त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा) माह के अन्तिम तीन दिनों के नियम पूर्वक स्नान से भी समस्त पापों से मुक्त होकर सम्पूर्ण फल को प्राप्त करते हैं। ______________________________________________

📜 #श्रीशुभ_नल_संवत्_२०८०_वैशाख_कृष्ण_पक्षःl
#सौम्यायनं_याम्यगोलःl #वसन्त_ऋतुःI #शुक्रवारl
#प्रतिपदा दिन १०|१ यावद् तदुपरि #द्वितीयाI
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❀༺꧁॥🙏जय माँ🙏॥꧂༻❀
#दुर्गा_मंदिर_शक्तिपीठ_वाटिका

15/01/2023

#सूर्योपासना

भगवान् सूर्य परमात्मा नारायणके साक्षात् प्रतीक हैं,इसीलिये वे सूर्य नारायण कहलाते हैं। वैसे भी भगवान् सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं और समस्त चराचर प्राणियों के आधार हैं। इसलिये त्रिकाल संध्यामें सूर्यरूपसे भगवान् नारायण की ही आराधना की जाती है। उनकी उपासनासे तेज, बल, आयु एवं नेत्रज्योतिकी वृद्धि होती है। भगवान् सूर्यका अवतरण ही संसारके कल्याण के लिय है। वे नित्य सभीको चेतनता प्रदान करते हैं। चराचर जगत् पर कृपा करना ही उनका स्वभाव है। अपने भक्तों और उपासकोंपर तो उनकी विशेष प्रीति रहती है। पञ्चदेवोपासना में उनका विशिष्ट स्थान है। भगवान् भास्कर समस्त बुराइयों को दूर कर कल्याण तथा मङ्गल प्रदान करनेवाले हैं। इसीलिये उनसे प्रार्थना की जाती है --
" विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद् यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥ "

सहस्त्रों किरणोंवाले द्वादशात्मा भगवान् सूर्य हमें असत् से सत् की ओर, अन्धकारसे प्रकाशकी ओर तथा मृत्युसे अमरत्वकी ओर ले जाते हैं। उनका अनुग्रह प्राप्त होनेपर व्यक्ति शतायु ही नहीं दीर्घायु हो जाता है। उनकी उपासना से बुद्धि अत्यन्त निर्मल हो जाती है, अंतःकरण पवित्र हो जाता है और साधक भगवत्प्राप्तिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है। बुद्धिके प्रेरक भगवान् सविता ही हैं। इसीलिये गायत्री-मंत्रमें भगवान् से सद्बुद्धिके लिये ही प्रार्थना की गयी है -- " धियो यो नः प्रचोदयात् ।" वैदिक मन्त्रोंके द्रष्टा सभी ऋषि-महर्षि आदित्योपासनाके द्वारा ही आर्ष-मेधा और अध्यात्मज्ञानसे संपन्न हुए । भगवान् सूर्य स्वल्प उपासनासे ही प्रसन्न होकर भक्तको अपनी महनीय कृपाका अवलम्बन प्रदान करते हैं। उनकी कृपासे न जाने कितनोंका उद्धार हुआ, इसकी कोई गणना नहीं है। औपनिषदिक ऋषियोंको भगवान् सूर्यकी कृपा प्राप्त हुई। उपनिषदोंमें वर्णित मधुविद्या, ब्रह्मविद्या, दहरविद्या, उपकोशलविद्या आदि के पीछे भगवान् सूर्यकी उपासना ही है।

भगवान् सूर्यको गुरु भी कहा गया है। श्रीहनुमानजीने इन्हींसे शिक्षा ग्रहण की थी। इन्हींकी कृपा से महायोगी याज्ञवल्क्यको ब्रह्मविद्या और चाक्षुष्मती विद्याका ज्ञान हुआ था। भगवान् श्रीरामने आदित्यहृदयस्तोत्रके पाठ से रावण पर विजय पायी थी। कुष्ठरोगसे आक्रान्त मयूरकविने सूर्यशतककी रचना करके उससे छुटकारा पाया था। भगवान् श्रीकृष्णके पुत्र साम्ब की सूर्योपासनाका चमत्कार प्रसिद्ध ही है। इस प्रकार शास्त्रोंमें सूर्योपासनाके अनेक चमत्कार बिखरे पड़े हैं।

भगवान् सूर्यके अर्घ्यदानकी विशेष महत्ता है। प्रत्येक व्यक्तिको प्रातः काल ताम्रपात्रमें जल, लाल चन्दन, रक्त पुष्प रखकर प्रसन्न मनसे प्रतिदिन सूर्यमन्त्रका जप करते हुए सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। इस अर्घ्यदान से प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य उपासकको आयु, आरोग्य, धन-धान्य, पुत्र, मित्र, कलत्र, तेज, वीर्य, यश, कान्ति, विद्या, वैभव एवं सौभाग्य आदिसे संपन्न करते हैं। भगवान सूर्य अत्यन्त उपकारक और दयालु हैं, वे अपने उपासकको सब कुछ प्रदान करते हैं। उसके लिए मुक्ति भी सहज ही सुलभ हो जाती है।

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🌞 #श्रीशिवप्रोक्तं_सूर्याष्टकम्🌞

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुते ॥ १ ॥
सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ २ ॥
लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥
बृंहितं तेज:पुञ्जं च वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥ ५ ॥
बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् ।
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥
तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ७ ॥
तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥

हे आदिदेव भास्कर ! आपको प्रणाम है । हे दिवाकर ! आपको नमस्कार है ! हे प्रभाकर ! आपको प्रणाम है । आप मुझ पर प्रसन्न हों ॥ १ ॥ सात घोड़ोंवाले रथ पर आरूढ़, हाथमें श्वेत कमल धारण किए हुए, प्रचण्ड तेजस्वी कश्यपकुमार सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥
लोहित वर्णके रथपर आरूढ़, सर्वलोकपितामह, महापापहारी श्रीसूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥ जो त्रिगुणमय -- ब्रह्मा, विष्णु और शिवस्वरूप हैं, उन महापापहारी महान् वीर श्रीसूर्यदेवको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ जो बढ़े हुए तेजके पुञ्ज और वायु तथा आकाशके स्वरूप हैं, उन समस्त लोकोंके अधिपति भगवान् सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥ जो बन्धूक ( दुपहरिया ) पुष्पके समान रक्तवर्ण हैं और हार तथा कुण्डलोंसे विभूषित हैं, उन एक चक्रधारी श्रीसूर्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥ महान् तेजके प्रकाशक, जगत् के कर्ता, महापापहारी उन सूर्य भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥ ज्ञान-विज्ञान तथा मोक्षके प्रदाता, बड़े-से-बड़े पापोंके अपहरणकर्ता जगत् के स्वामी उन भगवान् सूर्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८ ॥

ित्याय_नमः_भास्कराय_नमः_सवित्रे_नमः
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आपको और आपके परिवार को #मकरसंक्रान्ति महापर्व एवं #लोहड़ी , #बिहू और #पोंगल की हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएं💐
💞🙏💞

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‼️१५ जनवरी २०२३‼️

🌞 #विविधमुहूर्त्ताः🌞

🌳 ति. ८ रवौ #चित्रा भे दि.२|११ या. शय्यासनाद्युपभोग नववस्त्रधारण नौकाघटन लतापादपारोपण नवान्नभक्षण भैषज्य नौकाघटन विपणि वस्तुक्रय गजाश्वकृत्य शिरामोक्षण धान्यच्छेदन मुहूर्त्तः।

🌀 ति.८ रवि को चित्रा में नवीन खटिया-चौकी आदि का उपभोग नवीनवस्त्रधारण वाटिकारोपण नवान्नभक्षण औषध सेवन नावनिर्माण विपणि वस्तुक्रय वाहन खरीदने ऑपरेशन फसल काटने का मुहूर्त्त है।

👉✡️ #चित्रा दि. २|२६ या. तदुपरि ✡️ #स्वाती दि. २|२६ उ. ⏩ I🌝 #तुलाराशिः ति. ७ रा. २|१२ वादने ⏩ I #अष्टकाश्राद्धम् I सूर्योदयात् सूर्यास्तं यावत् #मकरसंक्रान्तिजन्य_पुण्यकालः I कृसरान्नमुद्गमोदकादिदानम् l गंगा सागरे गंगायाम् सर्वत्र नद्यां तीर्थे वा स्नानम् I प्रयागेगोदावर्याम् वा स्नानम् lI ▪️सौरमाघमासारम्भः l ▪️मृत्युबाणारम्भः रा. २|२९ I ▪️यायिजययोग: दि. २|२६ उ.⏩ I #मघा_बिहू आसाम,बंगाल I #पोंगल I #लोहड़ी पंजाब, जम्मू-काश्मीर I

🔸सूर्योदय से सूर्यास्त तक मकरसंक्रान्ति का पुण्यकाल I चावल-तिल-लड्डू का दान I प्रयाग या गोदावरी में स्नान I

🎊 ंक्रान्ति ( खिचड़ी ) का पुण्यकाल एवं स्नानदान का महापर्व आज १५ जनवरी रविवार को मनाया जायेगा। आज पूरे दिन ही पर्व का मान होगा । मध्यान्ह तक का समय स्नान दान के लिए विशेष पुण्यफलदायक माना जायेगा । सर्वत्र गंगा नदी, अन्यत्र नदी तीर्थ एवं कुँआ सरोवर आदि में स्नान किया जायेगा । आज के दिन खिचड़ी खाना, खिलाना एवं दान करना पुण्यफलकारी माना गया है । ऊनी वस्त्र, दुशाला, कम्बल, जूता तथा धार्मिक पुस्तकें एवं पंचांग का दान विशेषफलकारक होता है ।

✍️आज अष्टमी है▫️▫️▫️▫️▫️▫️▫️

🔸यत्र कुत्रापि यो माघेस्मरणन्वितः। करोति मज्जनं तीर्थे सलभेत् गाङ्गमज्जनम्। माघेमूलकं भक्षणं न कार्यम्। मासपर्यंत स्नाने प्यशक्तत्रयहं एकाहं वा स्यात्।*

🧿 #मूल_विचार :

#श्लेषा/ #मघा>ति.२ रवौ रा.४|३८ उ.
➖ति.४ बुधे दि.९|२८ या. I
#ज्येष्ठा/ #मूल> ति.११ बुधे दि.१|१४ उ. ➖
ति.१३ शुक्रे दि.१०|४२ या. I

🕉️ 🔹 माघे_प्रयागस्नानमाहात्म्यम् : प्रयागे माघ मासे तु त्र्यहं स्नानस्य यत्फलम् अश्वमेधसहस्त्रेण तत्फलम् लभते भुवि॥ [ पृथ्वी पर माघमास में मात्र तीन दिन प्रयाग स्नान करने मात्र से भी १ हजार अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है । ]

🔸यावान्माघं स्नानाशक्तौ त्र्यहं स्नायात् ॥ महामाघीं पुरस्कृत्य स्नायात्तत्रदिनत्रयमिति। [ सम्पूर्ण माघ में तीर्थ स्नान न कर पाने की स्थिति में माघी पूर्णिमा से पूर्व तीन दिनों में विधि पूर्वक अस्थान करें। ]

🍂अथ मकर संक्रान्तौ देयाः🍂

स्कन्दे - धेनुं तिलमयीं राजन् यो दद्दाच्चोत्तरायणे । सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दने परमं सुखम्। माघे देयाः - तैलमामलकञ्चैव तीर्थे देयास्तु नित्यशः। ततः प्रज्वालयेद्वन्हिं सेवनार्थं द्विजन्मनाम्॥ एवं स्नानावसाने तु भोज्यं देयमवारितम्। भोजयेद्द्विजदाम्पत्यं भूषयेद्वस्त्रभूषणैः। कम्बलाजिन रत्नानि वासांसि विविधानि च। चोलकानि च देयानि प्राच्छादन पटानथ।उपानहौ तथा गुल्ममोचकौ पाप मोचकौ। अनेन विधिना स्नानान्माधवः प्रीयतामिति। [ गाय एवं तिल का उत्तरायण सूर्य अर्थात मकर संक्रान्ति में दान करने से समस्त कार्यों की सिद्धि तथा परम सुख की प्राप्ति होती है । माघ मास में तीर्थ क्षेत्र में तैल एवं आँवले का नित्य दान, तथा ब्राह्मणों की सेवा के लिए अग्नि प्रज्वलित करना चाहिए तथा स्नान के बाद जल रहित भोज्य पदार्थों का दान करना चाहिए । ब्राह्मण दम्पति को भोजन कराकर वस्त्र तथा आभूषणों का दान करें, दान में कम्बल, वस्त्र, काजल, कर्णपूर, नीलवस्त्र, स्त्रियों का ललाटाभरण, उपानह एवं रत्नों का गुप्त रूप में दान करते हुए माघ स्नान से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। ]

🪷माघसनियमाः🪷

भूमौ शयीतहोतव्यं साज्यं तिलसमन्वितम्।
सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दते परमं सुखम्॥

🥀पक्ष फलम्🥀

🔸सौरश्चवारे रविसंक्रमश्चेद्दुर्भिक्षमायाति चसर्वधान्यम्।
पृथ्वी सरोगानृपतेः प्रजासुभवेन्महायुद्ध भयं तदानीम्॥

[ शनिवार को सूर्य संक्रान्ति से फसलों की हानि, पृथ्वी पर लोग रोगग्रस्त, युद्ध एवं प्रजा में भय का वातावरण होता है।]

🔹द्वितीय तिथि की वृद्धि हुई है एवं चतुर्दशी तिथि का क्षय इस प्रकार पक्ष १५ दिन का है । पक्ष के तीन शनिवार एवं शनिवार की अमावस्या भारी पड़ेगी। दैवी- प्राकृतिक घटना से दुर्भिक्ष के योग हैं। अग्निभय की भी सम्भावना बन रही है।
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*माघमास में जो कहीं से भी प्रयाग का स्मरण करके स्नान करता है, उसे प्रयाग स्नान का फल प्राप्त होता है । माघमासमें मूली नहीं खाना चाहिए।

📜 #श्रीशुभ_राक्षस_संवत्_२०७९_माघ_कृष्ण_पक्षःl
#सौम्यायनं_याम्यगोलःl #शिशिर_ऋतुःl #रविवारl
#अष्टमी दिन २|१६ यावत् तदुपरि #नवमीI
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❀༺꧁॥🙏जय माँ🙏॥꧂༻❀

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