30/07/2026
कितना अद्भुत है ये प्रेम कि यहाँ कोई शब्द नहीं बोलता, फिर भी सब कुछ कह दिया जाता है। एक ओर अनंत का स्वामी मौन होकर निहार रहा है, दूसरी ओर समर्पण की प्रतिमूर्ति आँखें मूँदकर उसी मौन में विलीन है। यहाँ चाहत माँगती नहीं, जताती नहीं, अधिकार नहीं जताती, बस एक-दूसरे के अस्तित्व में स्वयं को भूल जाती है।
कहते हैं प्रेम में सबसे सुंदर क्षण वह नहीं होता जब कोई "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ" कहे, बल्कि वह होता है जब दोनों के बीच इतनी गहरी शांति उतर आए कि शब्दों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए। जहाँ एक की धड़कन दूसरे का मंत्र बन जाए, जहाँ एक की मुस्कान दूसरे की साधना बन जाए, जहाँ एक की उपस्थिति ही दूसरे के जीवन का सम्पूर्ण उत्तर बन जाए।
तुम्हें पाने की इच्छा से कहीं अधिक सुंदर है तुम्हें महसूस कर पाना। तुम्हारे साथ बैठकर संसार जीत लेने से कहीं अधिक सुखद है तुम्हारे साथ बैठकर संसार को भूल जाना। क्योंकि सच्चा प्रेम किसी मंज़िल का नाम नहीं, वह तो वह यात्रा है जिसमें हर कदम पर आत्मा थोड़ी और निर्मल होती जाती है।
यदि प्रेम केवल साथ रहने का नाम होता, तो समय उसे कभी न कभी हर लेता। पर जो प्रेम आत्मा से जन्म लेता है, उसे दूरी नहीं बाँट सकती, समय नहीं थका सकता और मृत्यु भी समाप्त नहीं कर सकती। वह हर जन्म में किसी न किसी रूप में फिर लौट आता है, कभी स्मृति बनकर, कभी प्रार्थना बनकर, कभी विश्वास बनकर और कभी उस मौन की तरह, जिसे केवल प्रेम करने वाले ही सुन सकते हैं।
तुम्हारी ओर देखना मानो स्वयं को देखना है। तुम्हारे पास बैठना मानो सारी बेचैनियों का अंत है। तुम्हारा मौन भी उतना ही मधुर है जितनी तुम्हारी मुस्कान। तुम्हारी साँसों की लय में जैसे पूरा ब्रह्मांड धड़कता है और तुम्हारी शांति में जैसे समस्त सृष्टि विश्राम करती है।
ऐसा प्रेम किसी सौदे का परिणाम नहीं होता। इसमें न जीत होती है, न हार। न कोई बड़ा होता है, न छोटा। यहाँ केवल दो अस्तित्व धीरे-धीरे अपने अहंकार को उतारकर एक-दूसरे की आत्मा में घर बना लेते हैं। यही प्रेम की सबसे ऊँची अवस्था है जहाँ "मैं" और "तुम" का अंतर मिट जाता है और केवल "हम" शेष रह जाते हैं।
दुनिया प्रेम को पाने की कोशिश करती है, पर प्रेम कभी पाया नहीं जाता। प्रेम तो तब मिलता है जब मन से अपेक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं। जब अधिकार की जगह विश्वास आ जाता है। जब शिकायतों की जगह स्वीकार आ जाता है। जब शब्दों की जगह मौन बोलने लगता है और जब दो हृदय बिना किसी शर्त के एक-दूसरे की शरण बन जाते हैं।
यदि कभी इस संसार में प्रेम को देखना हो, तो उसे उपहारों, वादों और शोर में मत ढूँढ़ना। उसे उस नज़र में ढूँढ़ना जो बिना पलक झपकाए अपने प्रिय को देखती रहती है। उसे उस मुस्कान में ढूँढ़ना जो बिना किसी कारण खिल उठती है। उसे उस प्रतीक्षा में ढूँढ़ना जो वर्षों तक शिकायत नहीं करती और उसे उस समर्पण में ढूँढ़ना जो बदले में कुछ भी नहीं चाहता।
प्रेम तब पूर्ण होता है जब एक-दूसरे को बदलने की इच्छा समाप्त हो जाती है और एक-दूसरे को उसी रूप में स्वीकार कर लिया जाता है जैसे सृष्टि ने बनाया है। वहाँ सुंदरता चेहरे में नहीं रहती, आत्मा में बस जाती है। वहाँ स्पर्श हाथों से नहीं, भावनाओं से होता है। वहाँ मिलन केवल शरीरों का नहीं, चेतनाओं का होता है।
यही वह प्रेम है जो समय की धूल से कभी धुंधला नहीं पड़ता। जो हर युग में नया रहता है, जो हर जन्म में फिर खिल उठता है। जो हर प्रार्थना के अंत में मुस्कुराता है और जो ये सिखाता है कि संसार की सबसे बड़ी शक्ति न क्रोध है, न वैभव, न सामर्थ्य, सबसे बड़ी शक्ति केवल निष्कलंक, निस्वार्थ और अनंत प्रेम है।
और शायद इसी प्रेम के आगे पूरा ब्रह्मांड भी मौन होकर झुक जाता है, क्योंकि जहाँ प्रेम अपनी सबसे पवित्र अवस्था में उपस्थित होता है, वहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, समय ठहर जाता है, और केवल अनंत की धड़कन सुनाई देती है। वहीं आत्मा को अपना घर मिलता है, वहीं प्रार्थना को अपना उत्तर, और वहीं प्रेम अपने सबसे सुंदर, सबसे पवित्र और सबसे अमर स्वरूप में सदैव जीवित रहता है। ादेव हर हर महादेव 🚩 🙏