22/04/2019
अनोखी, वीणा वारी नारि।।
जाकी लखि श्रृंगार माधुरी, अगनित रति बलिहारि।
चिबुक पाणि धरि कुसुम सरोवर, बैठी वीणावारि।
पूछति लली, ‘अली तू को है? काकी है घरवारि?'।
‘हौं लाली! हौं देवलोक की, अब लौं अहौं कुमारि।
यह संसार असार जानि हम, उर विराग लिय धारि।
लली कहीं 'चल, महल हमारे, करिहौं टहल तिहारि'।
'हमहिं लली! लै चलि सक जो मम, आदेशहिं नहिं टारि'।
'हाँ' करि, चलीं ‘कृपालु' छली सँग, भोरी भानुदुलारि।।
भावार्थ- श्यामसुन्दर वीणा वाली नारी का भेष बनाये हुए हैं। जिनके सोलहों श्रृंगार के माधुर्य को देखकर अनन्त कामदेव की स्त्रियाँ बलिहार जाती हैं। वह अनोखी वीणा वाली नारी ठोढ़ी पर हाथ रखे हुए कुसुम सरोवर पर बैठी है। किशोरी जी अचानक वहीं पहुँचकर उससे पूछती हैं। अरी वीणावाली! तू कौन है एवं किसकी स्त्री है? वीणा वाली ने कहा कि मैं देव लोक की हूँ और अभी तक कुमारी हूँ। इस संसार को असार समझ कर मैंने वैराग्य धारण कर लिया है। किशोरी जी ने कहा अरी वीणा वाली ! तू मेरे महल में चल कर रह, मैं स्वयं तेरी सेवा करूँगी। वीणावाली ने कहा, हे किशोरी जी ! हमको वही अपने घर ले जा सकता है जो मेरी एक भी आज्ञा न टाले। किशोरी जी ने स्वीकार कर लिया एवं 'कृपालु' के कथनानुसार अपने भोलेपन के कारण श्यामसुन्दर से ठगी गयीं।