Sidh Baba Balak Nath & Swami Dayal Ji Maharaj Mandir Bathinda

Sidh Baba Balak Nath & Swami Dayal Ji Maharaj Mandir Bathinda Jai ho Baba ji di

08/03/2026

भंडारे में किसी ने कोई सेवा करनी हो तो इस नंबर 9888225932 पर संपर्क करें

22/10/2025
09/09/2025

🙇🙇🙇वाहेगुरूजी 🙇🙇🙇

✍️"सुमिरन" सँस्कृत शब्द 'स्मरण' का अपभ्रंश है। किसी को बार-बार याद करना ,उसके बारे में सोचना उसका सुमिरन करना है। परमार्थी भाषा में किसी गुरु मंत्र या प्रभु नाम का बार -बार जपना सुमिरन कहलाता है।
हम पल-पल किसी न किसी का सुमिरन करते हैं।दुनिया के शक्लों-पदार्थों का सुमिरन हमें इनके साथ बाँधता है ।दुनियावी शक्लें ,पदार्थ नश्वर हैं, अस्थायी हैं ! इनके स्मरण से सच्चा सुख कैसे मिल सकता है ??!!
परमात्मा के नाम का सुमिरण ,परमात्मा के साथ मिलाप करने में सहायता देता है । प्रभु-नाम-स्मरण से मन - आत्मा इनकी ओर पलटते हैं, हम बाहरमुखी होने के स्थान पर अंतर्मुखी हो जाते हैं!तीसरे तिल में पहुंच कर आत्मा अनहद शब्द को सुन कर आत्मिक आनन्द अनुभव करती है !!

ऐसी किरपा मोहि करहु ।।
संतह चरण हमारो माथा
नैन दरसु तनि धूरि परहु !!
गुर को शब्द मेरै हिअरै बासै
हरि नामा मन संगि धरहु!!

परमात्मा का सिमरण , भक्ति , नाम-जप भी वही जीव कर सकता है ,जिस पर परमात्मा की अनुकम्पा हो जाये ! सतगुरु की दया-मेहर हो जाये !! हमें तो कुलमालिक से ,सतगुरु से उनकी दया दृष्टि की याचना करते रहना है ! तभी सम्भव हो पायेगा कि हम श्वास-श्वास सिमरण में लगे रहें !!परमात्मा की दिव्य अलौकिक छवि को ,सतगुरु की पावन सूरत को अंतर में बसा कर ही कठिन रूहानी सफर को पूरा किया जा सकता है! हमें अपने सतगुरु से हमेशा उनका साथ, उनका मार्गदर्शन पाने की प्रार्थना करते रहना चाहिए!उनसे दिल से कहना चाहिए कि -----!
गुरु चरणी चित्त ला बंदया🙇

24/08/2025

🙇🙇🙇वाहेगुरुजी🙇🙇🙇

भजन-चिन्तन मोक्ष का मूल✍️
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एक महात्मा थे। जीवन भर उन्होंने भजन ही किया था। उनकी कुटिया के सामने एक तालाब था। जब उनका शरीर छूटने का समय आया तो देखा कि एक बगुला मछली मार रहा है। उन्होंने बगुले को उड़ा दिया। इधर उनका शरीर छूटा तो नरक गये। उनके चेले को स्वप्न में दिखायी पड़ा; वे कह रहे थे- "बेटा! हमने जीवन भर कोई पाप नहीं किया, केवल बगुला उड़ा देने मात्र से नरक जाना पड़ा। तुम सावधान रहना।"

जब शिष्य का भी शरीर छूटने का समय आया तो वही दृश्य पुनः आया। बगुला मछली पकड़ रहा था। गुरु का निर्देश मानकर उसने बगुले को नहीं उड़ाया। मरने पर वह भी नरक जाने लगा तो गुरुभाई को आकाशवाणी मिली कि गुरुजी ने बगुला उड़ाया था इसलिए नरक गये। हमने नहीं उड़ाया इसलिए नरक में जा रहे हैं। तुम बचना!

गुरुभाई का शरीर छूटने का समय आया तो संयोग से पुनः बगुला मछली मारता दिखाई पड़ा। गुरुभाई ने भगवान् को प्रणाम किया कि भगवन्! आप ही मछली में हो और आप ही बगुले में भी। हमें नहीं मालूम कि क्या झूठ है? क्या सच है? कौन पाप है, कौन पुण्य? आप अपनी व्यवस्था देखें। मुझे तो आपके चिन्तन की डोरी से प्रयोजन है। वह शरीर छूटने पर प्रभु के धाम गया।

नारद जी ने भगवान से पूछा, "भगवन्! अन्ततः वे नरक क्यों गये? महात्मा जी ने बगुला उड़ाकर कोई पाप तो नहीं किया?" उन्होंने बताया, "नारद! उस दिन बगुले का भोजन वही था। उन्होंने उसे उड़ा दिया। भूख से छटपटाकर बगुला मर गया अतः पाप हुआ, इसलिए नरक गये।" नारद ने पूछा, "दूसरे ने तो नहीं उड़ाया, वह क्यों नरक गया?" बोले, "उस दिन बगुले का पेट भरा था। वह विनोदवश मछली पकड़ रहा था, उसे उड़ा देना चाहिए था। शिष्य से भूल हुई, इसी पाप से वह नरक गया।" नारद ने पूछा, "और तीसरा?" भगवान् ने कहा, "तीसरा अपने भजन में लगा रह गया, सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर सौंप दी। जैसी होनी थी, वह हुई; किन्तु मुझसे सम्बन्ध जोड़े रह जाने के कारण, मेरे ही चिन्तन के प्रभाव से वह मेरे धाम को प्राप्त हुआ।।"

अतः-
पाप-पुण्य की चिन्ता में समय को न गँवाकर जो निरन्तर चिन्तन में लगा रहता है, वह पा जाता है। भगवान् का भजन ही पुण्य है, बाकी सब पाप है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- "यज्ञार्थात्कर्मणोsन्यत्र लोकोsयं कर्मबन्धन:''- यज्ञ के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक में बाँधकर रखने वाला है, जिसमें खाना-पीना सभी कुछ आ जाता है। जब बंधनकारी हर कार्य कर ही रहे हैं तो हत्या की ही इतनी चिंता क्यों? वह नियत कर्म कीजिये जो भव-बन्धन से छुड़ा दे !!

गुरुचरणी चित्त ला बंदया🙇

25/07/2025

🙇🙇🙇वाहेगुरूजी 🙇🙇🙇

✍️ईश्वर सबकी सुनता हैं! --हर पल हम सभी को देख रहा है!!
आज कहीं से यह लघुकथा पढ़ने को मिली , आपके साथ शेयर कर रही हूँ !

शहर के बीचोबीच एक हाइ सोसाइटी की बिल्डिंग थीं !
उसमें सबसे ऊपर वाले फ्लोर पर अविनाश रहता था । वो रोज खाना खाने के बाद रात को 9 से 10 बजे तक ऊपर छत पर घूमता था । और उस बिल्डिंग के पास ही कुछ झुग्गी झोपड़ी बनी हुई थी ।

पिछले एक-डेढ़ महीने से वो रोज उस बच्चे को देख रहा था, जो रोज एक गुब्बारे को छोड़ देता था और उसे तब तक देखता रहता जब तक वह आँखों से ओझल न हो जाए ।

एक दिन अविनाश दोस्त से बात करने में थोड़ा लेट हो गया । और जब ऊपर घूमने गया तो उसे वो बच्चा नहीं दिखा । अविनाश ने ऊपर देखा की कही गुब्बारा उड़ता हुआ दिख जाये । तो उसे वो गुब्बारा पानी की टंकी में अटका हुआ दिखा । अविनाश समझ गया की यह उस बच्चे का ही है । और उसने सोचा की उस गुब्बारे को निकालकर उड़ा दूँ । और वह टंकी पर चढ़ा उसने देखा गुब्बारे पर कुछ लिखा हुआ था। अविनाश उसे पढ़कर बैचेन हो गया । उस पर लिखा था कि .......

"हे ऊपर वाले ! मेरी माँ की तबियत बहुत खराब है और उसके इलाज के लिए किसी को भेज दें ! मेरे पास इतने सारे पैसे नहीं है ।"

यह पढ़कर अविनाश को रात भर नींद नहीं आयी । वह सबेरे उठकर उस लड़के से मिलने चला गया । उसने जाकर देखा तो सच में उसकी मां की तबियत खराब थीं ।

अविनाश ने उस लड़के से पुछा की तुम रोज गुब्बारे पर लिखकर क्यों भेजते हो और ये तुम्हें किसने बताया की ऐसा करने से ईश्वर तुम्हारी मदद करेगा ।

उस लड़के ने कहा ----ये सब मुझे भिखारी दादा ने कहा । एक दिन रात को मै आ रहा था तो उन्होंने कहा कि मेरी तबियत खराब है । और में भीख मांगने नही जा सकता और में दो दिन से भूखा हूँ । क्या तुम मुझे खाना खिलाओगे ? तो मैंने उन्हें खाना लाकर दे दिया तो उन्होंने कहा कि-- बेटा तेरी मदद ऊपरवाला करेगा । मैने पूछा वो सच में मेरी मदद करेगा क्या ? दादा ने कहा ---जैसे मेरे लिए उसने तुझे भेजा है न वैसे ही वो तेरे लिए भी किसी को भेज देगा ।

अविनाश ने पूछा---- तो गुब्बारे का किसने बोला और तुम रात को ही क्यों छोड़ते हो दिन में क्यों नहीं ।

वो लड़का बोला --- दादा ने कहा था ना कि ऊपरवाला मदद करेगा तो मै रोज सोचता था की उस तक बात कैसे पहुंचाउ । एक दिन मैने गुब्बारे को बहुत ऊंचा जाते हुए देखा तो मुझे यही रास्ता समझ में आया ।

और मै होटल में काम करता हूँ ना तो मुझे रोज रात को पैसे मिलते हैं इसलिए मै रात में गुब्बारा छोड़ता हूँ !

उस बच्चे की बातें सुनकर अविनाश के आँखों में आँसू आ गये और उसने उस बच्चे को गले लगाते हुए कहा ---की बेटा वो दादा सही कह रहे थे वो ऊपर वाले ने तेरी मदद के लिये मुझे भेज दिया ।

और अविनाश ने उसकी मां का इलाज कराया और उसका माँ के प्रति प्यार देखकर उसे बहुत सारी मदद करी और स्कूल में भी भर्ती करा दिया ।।

इस कहानी से हमें कुछ बातें समझ में आयी की ईश्वर उस बच्चे पर खुश क्यों हुआ । उसका माँ के लिए प्यार, गरीब होते हुए भी उसके मन में दूसरें के लिए दया ,उसका भोलापन और सबसे बड़ी बात उसका विश्वास जो उसने एक-डेढ़ महीने तक गुब्बारे में लिखकर ईश्वर के लिए भेजा ।

यदि ये बातें हम लोगों मे भी पैदा हो जाए तो इसमें कोई शक नहीं कि वो प्यारा ईश्वर हमारी तकलीफों में भी किसी ना किसी को भेज ही देगा ।

विश्वास करो वो ईश्वर हमें हर पल देख रहा हैं और हमें अच्छे से अच्छा जीवन देना चाहता हैं इसलिये हमे प्रभु पर भरोसा रखना चाहिये !!

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

11/07/2025

भगवान दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है, क्योंकि उन्होंने यह शिक्षा दी कि ज्ञान किसी भी स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरु बनाए, जिनमें मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति और विभिन्न जीव-जंतु भी शामिल थे। इन सभी से उन्होंने कुछ न कुछ महत्वपूर्ण सीखा। यह दर्शाता है कि सीखने की कोई सीमा नहीं होती और हर चीज में हमें गुरु तत्व दिख सकता है, बशर्ते हमारे पास विवेक और जिज्ञासा हो।
आइए जानते हैं भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु और उनसे मिली शिक्षाएँ:
दत्तात्रेय के 24 गुरु और उनसे प्राप्त शिक्षाएँ
* पृथ्वी: पृथ्वी से दत्तात्रेय ने सहनशीलता, क्षमा और परोपकार की शिक्षा ली। पृथ्वी सभी जीवों का भार सहन करती है और बिना किसी भेदभाव के उन्हें आश्रय और पोषण देती है। इससे उन्होंने सीखा कि व्यक्ति को संसार के सुख-दुख को सहन करते हुए, अपनी प्रकृति में दृढ़ रहना चाहिए और दूसरों का भला करना चाहिए।
* वायु: वायु हर जगह मौजूद होती है, लेकिन किसी से चिपकती नहीं। इससे उन्होंने निर्लिप्तता और अनासक्ति सीखी। जिस प्रकार वायु अच्छी-बुरी गंध से अप्रभावित रहती है, उसी प्रकार ज्ञानी को भी संसार के भोगों और दोषों से अप्रभावित रहना चाहिए।
* आकाश: आकाश सर्वव्यापी है और किसी भी चीज से दूषित नहीं होता। इससे दत्तात्रेय ने असंगता और निराकारता का ज्ञान प्राप्त किया। आत्मा भी आकाश की तरह सर्वव्यापी, असंग और शुद्ध है।
* जल: जल स्वाभाविक रूप से पवित्र और शुद्ध होता है, और दूसरों को भी पवित्र करता है। इससे उन्होंने सीखा कि व्यक्ति को स्वयं शुद्ध होकर दूसरों को भी पवित्रता की प्रेरणा देनी चाहिए।
* अग्नि: अग्नि जिस भी वस्तु को ग्रहण करती है, उसे स्वयं में समाहित कर लेती है और पवित्र कर देती है। इससे उन्होंने प्रकाश, तेज और समदर्शिता की शिक्षा ली। जिस प्रकार अग्नि चाहे किसी भी वस्तु को जलाए, उसका मूल स्वरूप नहीं बदलता, वैसे ही ज्ञानी को भी सभी अवस्थाओं में एक समान रहना चाहिए।
* चंद्रमा: चंद्रमा अपनी कलाओं को घटाता-बढ़ाता है, लेकिन उसका मूल स्वरूप कभी नहीं बदलता। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि शरीर का जन्म, विकास, क्षय और मृत्यु तो होती है, लेकिन आत्मा अजर-अमर है।
* सूर्य: सूर्य एक होते हुए भी विभिन्न पात्रों में अलग-अलग दिखाई देता है, और अपने प्रकाश से सभी को प्रकाशित करता है। इससे उन्होंने आत्मा की एकता और प्रकाश का ज्ञान प्राप्त किया।
* कबूतर: एक कबूतर जोड़ा अपने बच्चों के अत्यधिक मोह में इतना अंधा हो जाता है कि वह शिकारी के जाल में फंस जाता है। इससे दत्तात्रेय ने अत्यधिक मोह और आसक्ति से होने वाले दुखों को सीखा।
* अजगर: अजगर बिना किसी प्रयास के जो कुछ भी मिल जाए, उसी में संतोष करता है और बिना चले उसी स्थान पर रहता है। इससे उन्होंने संतोष, धैर्य और अपरिग्रह की शिक्षा ली।
* समुद्र: समुद्र की नदियाँ हमेशा भरती रहती हैं, लेकिन वह कभी अपनी सीमा नहीं लांघता। इससे दत्तात्रेय ने शांत मन, स्थिरता और असीम गहराई का पाठ पढ़ा। ज्ञानी का मन भी समुद्र की तरह शांत और गहरा होना चाहिए।
* पतंगा: पतंगा आग की लौ के प्रति इतना आकर्षित होता है कि स्वयं को जला लेता है। इससे दत्तात्रेय ने भौतिक इच्छाओं और इंद्रियों के वश में होने से होने वाले विनाश को समझा।
* मधुमक्खी: मधुमक्खी विभिन्न फूलों से थोड़ा-थोड़ा रस इकट्ठा करती है, और भिक्षुक भी अलग-अलग घरों से थोड़ा-थोड़ा भोजन ग्रहण करता है। इससे उन्होंने थोड़ा-थोड़ा संग्रह करने और आवश्यकतानुसार ग्रहण करने की शिक्षा ली। (यह भी सीखा कि अधिक संचय विपत्ति का कारण बन सकता है, जैसे मधुमक्खी का शहद छीन लिया जाता है)।
* हाथी: हाथी मादा हाथी के मोह में फंसकर बंदी बना लिया जाता है। इससे दत्तात्रेय ने इंद्रिय-भोग, विशेषकर कामवासना से होने वाले पतन को सीखा।
* हिरण: हिरण मधुर संगीत पर मोहित होकर शिकारी का शिकार बन जाता है। इससे उन्होंने शब्द (श्रवण) इंद्रिय के प्रति अधिक आसक्ति से होने वाले खतरे को समझा।
* मछली: मछली कांटे में फँस जाती है, क्योंकि वह स्वाद के लालच को नहीं छोड़ पाती। इससे उन्होंने जिह्वा (स्वाद) इंद्रिय के वश में होने से होने वाले बंधन को सीखा।
* पिंगला वेश्या: एक वेश्या (पिंगला) रात भर एक धनी ग्राहक का इंतजार करती रही, लेकिन कोई नहीं आया। अंत में, उसने सभी आशाएँ त्याग दीं और ईश्वर में मन लगाया, जिससे उसे परम शांति मिली। इससे दत्तात्रेय ने निराशा से वैराग्य और सच्ची शांति की शिक्षा ली।
* कुरर पक्षी: कुरर पक्षी अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा लेकर उड़ रहा था, जिसे देखकर दूसरे पक्षी उसका पीछा कर रहे थे। जब उसने मांस का टुकड़ा छोड़ दिया, तो उसे शांति मिली। इससे उन्होंने अपरिग्रह (संग्रह न करना) और त्याग से मिलने वाली शांति का महत्व सीखा।
* बालक (शिशु): एक बालक हमेशा आनंदमय, चिंतामुक्त और निरपेक्ष होता है। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि व्यक्ति को संसार की चिंताओं से मुक्त होकर सहज आनंद में रहना चाहिए।
* कुमारी कन्या: एक अकेली कुमारी कन्या धान कूट रही थी। जब उसकी चूड़ियाँ बजने लगीं तो उसने एक-एक करके सारी चूड़ियाँ उतार दीं और केवल एक ही पहनी रखी, जिससे शोर न हो। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि एकान्त में रहकर ध्यान करना चाहिए और अत्यधिक संगति से बचना चाहिए, क्योंकि अधिक लोग होने पर अनावश्यक विवाद या शोर हो सकता है।
* बाण बनाने वाला (तीरंदाज): एक तीरंदाज बाण बनाने में इतना तल्लीन था कि उसे पास से गुजरती हुई एक बारात का भी आभास नहीं हुआ। इससे दत्तात्रेय ने एकाग्रता और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की शिक्षा ली।
* सर्प (साँप): साँप किसी एक घर में नहीं रहता, बल्कि बिना घर बनाए बिलों में रहता है और अपने लिए कुछ भी इकट्ठा नहीं करता। इससे उन्होंने अनासक्ति, अपरिग्रह और बिना किसी स्थायी निवास के विचरने की शिक्षा ली।
* मकड़ी: मकड़ी अपने भीतर से ही जाल बुनती है और फिर उसी में स्वयं को बांध लेती है, या उसे तोड़कर बाहर निकल जाती है। इससे दत्तात्रेय ने ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना और संहार का रहस्य और योगियों द्वारा माया से मुक्ति का मार्ग समझा।
* भृंगी (भौंरा): भृंगी एक छोटे कीड़े (इल्ली) को अपने बिल में लाकर उसे बार-बार डंक मारता है, जिससे वह कीड़ा भी भृंगी जैसा बन जाता है। इससे उन्होंने ध्याता (ध्यान करने वाला) और ध्येय (जिसका ध्यान किया जा रहा है) के एक हो जाने के सिद्धांत को समझा (जैसा सोचोगे, वैसे बन जाओगे)।
* शरीर: स्वयं अपने शरीर से दत्तात्रेय ने सीखा कि यह नाशवान है और इसे अत्यधिक महत्व नहीं देना चाहिए। यह केवल आत्मा का एक अस्थायी वाहन है और यह दुख का मूल भी हो सकता है। इससे उन्होंने वैराग्य और आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त होने की प्रेरणा ली।
दत्तात्रेय का यह अद्वितीय दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि ज्ञान का कोई निश्चित स्रोत नहीं है। एक सच्चा जिज्ञासु व्यक्ति हर छोटी-बड़ी घटना, हर प्राणी और प्रकृति के हर कण से जीवन के गूढ़ रहस्यों को सीख सकता है। यह उनकी अवधूत स्थिति को दर्शाता है, जिसमें वह सभी बंधनों से मुक्त होकर, हर अनुभव से सीखते हुए परम ज्ञान को प्राप्त करते हैं।

20/05/2025

इस गुमान में मत रहना कि मैंने आज ढ़ाई घंटे पूरे भजन सुमिरन कर लिया है। मैं रोज भजन सुमिरन में ढ़ाई घंटे रोज़ बैठता हूॅं। इस बात का गुमान या अभिमान भी हमें नीचे खींच लाता है। ये तो फ़कीरियत है साहब, इसमें जितनी ज़्यादा कमाई करो उतना ही हमारा फ़ायदा है। इसलिए भजन सुमिरन में सतगुरु से अरदास करो कि हे ! मेरे समर्थ सतगुरु जितना भजन सुमिरन किया है तूने करवाया है, अपनी दया और रहमत और ज़्यादा कर ताकि मेरे अंदर गुमान न आये और मैं ज़्यादा से ज़्यादा भजन सुमिरन कर सकुॅं और जीते जी असल मकसद हासिल कर लूं। "
जय श्री राम जी 🙏जय जय माँ 🙏जय गुरु देव महाराज जी 🙏

18/05/2025

-------🙏-------
एक बार एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ एकांत मे बैठ कर परमार्थ की बात कर रहे थे। एक शिष्य ने उठ कर महात्मा से पूछा कि गुरु जी हम जीवात्मा जब से इस संसार में आई है ,तब से हम कर्मों के जाल में फंसे हैं! मन और माया हमारी दिन और रात हानि कर रही है। क्या इस मातलोक से हमारा पार उतारा हो सकता है। क्या हम इस भवसागर से पार हो सकते हैं।
इस पर महात्मा ने कहा कि अवश्य हो सकते हैं। जैसे दूध पानी के ऊपर तैरता है ऐसे ही जीवात्मा भी भवसागर को तर जाती है।
शिष्य ने कहा कि महात्मा कृपया मेरे इस संशय का निवारण करें कि दूध अगर पानी मे डालेंगें तो दूध पानी के ऊपर नही तैरेगा बल्कि दूध पानी मे मिल जायेगा।
इस पर महात्मा ने शिष्य को अपने पास बिठाया और समझाया की देखो। पहले दूध को गर्म करना पड़ेगा फिर दूध को जाग लगानी पड़ेगी और फिर उसको एक जगह पर बिना हिलाऐ - डुलाऐ स्थिर करना पड़ेगा फिर जब उसमे दही बन जाऐ तो फिर उसमें मदानी डालनी पड़ेगी जब मदानी से दही बेलोगे तो उसमे से मक्खन निकलेगा। मक्खन को पानी में डालो फिर देखो कैसे तैरता है।
महात्मा ने शिष्य को समझाया कि जीवात्मा को भी ऐसा ही करना पड़ेगा जैसे दूध को गर्म किया वैसे ही जीव के अन्दर पहले प्यास पैदा होगी फिर जब कोई शब्द सवरूप संत सत्तगुरू जीवात्मा को नाम की बख्शिष करेगा तो इसको जाग लग जाऐगी फिर जीवात्मा एक जगह एक चित्त एक मन होकर बिना नागा अपने मन में सिमरन की मदानी चलानी पड़ेगी फिर एक दिन यह मक्खन बन जाऐगा यानि अपने निज घर जाने के योग्य हो जाऐगा। और जीवआत्मा भवसागर से पार हो जाऐगी।
🙏सतगुरु आयो शरण तुम्हारी !!
Satguru Aaiyo Sharan Tumhaari!!

15/05/2025

🙇🙇🙇वाहेगुरुजी🙇🙇🙇

✍️हम रोज़ हज़ारों ऐसे काम करते हैं, जो हमारा मन नहीं चाहता, फिर भी करते हैं...वरना नुकसान हो जाएगा।
हमे किसी रिश्तेदार के यहां शादी में जाना है, मन नहीं करता जाने को, पर जाते हैं... क्यों? रिश्ता टूट जाएगा नुकसान हो जायेगा।
हमको किसी बड़े आदमी ने एयरपोर्ट पर सुबह 5 लाख रुपये देने के लिए बुलाया है...मन तो नहीं है इतना जल्दी उठ कर जाने का, पर जाते हैं, वरना नुकसान हो जाएगा।
ऐसे हज़ारों काम है रोज़ के, जो हम करना तो नहीं चाहते, पर मन को मार के करते हैं क्यों कि नहीं करेंगे तो नुकसान हो जाएगा।
पर वो एक काम जो हमारी ज़िंदगी संवार सकता है, अमृत वेले उठकर नाम जपने का, हमसे नहीं होता...उसके लिए हम मन को नहीं मार सकते...क्यों ? क्यों कि हम अज्ञानी हैं उस से होने वाले नुकसान से, हम नहीं जानते इसके फायदे के बारे में।
सतगुरु ने सब तो साफ साफ समझा दिया है...इसका मतलब ज्ञान तो है हमे, पर शायद अपने गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं है।
टटोलकर देखो अपने मन को, सारे जवाब मिल जाएंगे।

गुरु चरणी चित्त ला बंदया🙇
🙏🙇🙏🙇🙏🙇🙏🙇🙏🙇🙏🙇🙏

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