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"हनुमान चालीसा का सात बार पाठ करने से क्या लाभ"  1. हनुमान चालीसा: कलयुग का कल्पवृक्षगोस्वामी तुलसीदास जी ने 16वीं शताब्...
30/05/2026

"हनुमान चालीसा का सात बार पाठ करने से क्या लाभ"

1. हनुमान चालीसा: कलयुग का कल्पवृक्ष

गोस्वामी तुलसीदास जी ने 16वीं शताब्दी में हनुमान चालीसा की रचना की। 40 चौपाइयाँ। हर चौपाई मंत्र है। तुलसीदास जी स्वयं कहते हैं:

"जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा।"

कलयुग में भगवान का नाम ही सबसे बड़ा सहारा है। और हनुमान जी को कहा गया है "कलियुग केवल नाम अधारा"। इसलिए हनुमान चालीसा कलयुग का सबसे जागृत स्तोत्र माना जाता है।

पर सवाल ये है कि एक बार नहीं, सात बार पाठ क्यों?

अंक 7 का रहस्य:
सनातन धर्म में 7 अंक बहुत शुभ है। 7 वार, 7 फेरे, 7 चक्र, सप्त ऋषि, सप्त लोक, सप्त धातु। 7 बार किसी मंत्र का जाप करने से वो शरीर के सातों चक्रों को जागृत करता है। हनुमान चालीसा का 7 बार पाठ एक पूर्ण अनुष्ठान माना जाता है।

2. शास्त्र क्या कहते हैं: 7 बार पाठ का विधान

क) पाराशर संहिता में उल्लेख:
"सप्तवारं पठेन्नित्यं यः स्तोत्रं मारुतात्मजम्।
ग्रहपीड़ा विनश्यन्ति भूतप्रेतादि दूरेतः॥"
अर्थात जो व्यक्ति रोज सात बार हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसके ग्रह दोष नष्ट होते हैं और भूत प्रेत दूर रहते हैं।

ख) तुलसीदास जी का स्वयं का अनुभव:
कहा जाता है कि जब तुलसीदास जी को औरंगजेब ने कैद किया था, तब उन्होंने 7 दिन तक रोज 7 बार हनुमान चालीसा पढ़ी। 7वें दिन हजारों बंदरों ने जेल पर हमला कर दिया और तुलसीदास जी मुक्त हुए। तभी से 7 की संख्या सिद्ध मानी गई।

ग) लाल किताब और ज्योतिष:
ज्योतिष में शनि, राहु, केतु और मंगल दोष के लिए 7 बार हनुमान चालीसा सर्वोत्तम उपाय है। मंगलवार, शनिवार या अमावस्या को 7 बार पाठ करने से 98% तक नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं।

3. सात बार पाठ के 21 बड़े लाभ - शरीर, मन, धन और आत्मा के लिए

A. शारीरिक लाभ: रोग और भय से मुक्ति

1. नासै रोग हरै सब पीरा
7 बार पाठ से शरीर की 72000 नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं। हनुमान जी को चिरंजीवी कहा गया है। उनकी ऊर्जा पाठ करने वाले के शरीर में उतरती है। ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन, नींद न आना, डरावने सपने, इन सब में 21 दिन तक 7 बार पाठ करने से फर्क दिखता है।

मेडिकल साइंस भी मानता है कि लगातार 15 मिनट तक लय में बोलने से ब्रेन में अल्फा वेव्स बनती हैं। 7 बार पाठ में लगभग 18-20 मिनट लगते हैं। ये एक तरह का साउंड हीलिंग है।

2. बल बुद्धि विद्या देहु मोहि
बच्चों का पढ़ाई में मन न लगे, तो सुबह 7 बार पाठ कराएँ। हनुमान जी बुद्धि के दाता हैं। याददाश्त बढ़ती है। UPSC, NEET, बोर्ड परीक्षा वाले छात्र इसे नियम से करते हैं।

3. दुर्गम काज जगत के जेते
कोर्ट केस, अस्पताल का ऑपरेशन, नौकरी का इंटरव्यू। कोई भी मुश्किल काम हो, 7 दिन तक रोज 7 बार पाठ करें। काम बनने के चांस 80% बढ़ जाते हैं। ये लाखों लोगों का अनुभव है।

B. मानसिक और भावनात्मक लाभ: डर का अंत

4. भूत पिशाच निकट नहिं आवै
डर, चिंता, अकेलापन, नेगेटिव थिंकिंग। ये सब भूत पिशाच के मानसिक रूप हैं। 7 बार पाठ एक सुरक्षा कवच बनाता है। घर में रोज शाम को 7 बार पाठ करने से नेगेटिव एनर्जी खत्म होती है। बच्चे रात को डरते नहीं हैं।

5. संकट तें हनुमान छुड़ावै
व्यापार में घाटा, नौकरी का संकट, कर्ज। हनुमान जी को संकटमोचन कहते हैं। 7 बार पाठ से रास्ते खुलते हैं। खासकर अगर 7 मंगलवार या 7 शनिवार नियम से किया जाए।

6. सब सुख लहै तुम्हारी सरना
मानसिक शांति। 7 बार पाठ के बाद 2 मिनट आँख बंद करके बैठें। मन हल्का हो जाता है। एंग्जायटी और पैनिक अटैक में बहुत लाभ होता है।

C. ग्रह दोष और तांत्रिक बाधा से रक्षा

7. शनि, राहु, केतु की शांति
साढ़ेसाती, ढैय्या, मांगलिक दोष, कालसर्प दोष। इन सबकी एक दवा है, 7 बार हनुमान चालीसा। शनिवार को सरसों के तेल का दीपक जलाकर 7 बार पढ़ें। शनि देव खुद हनुमान जी के भक्त हैं। वो हनुमान भक्त को कष्ट नहीं देते।

8. टोना, टोटका, नजर दोष
अगर लगता है कि घर बँधा हुआ है, दुकान नहीं चल रही, तबियत बार बार खराब होती है। 7 दिन तक लगातार सुबह 7 बार पाठ करें और आखिर में हनुमान जी को लाल लंगोट चढ़ाएँ। 90% केस में फर्क पड़ता है।

9. मंगल दोष और विवाह में बाधा
जिनकी शादी नहीं हो रही, मांगलिक हैं, वो 7 मंगलवार तक 7 बार पाठ करें और बूंदी का प्रसाद बाँटें। हनुमान जी मंगल के नियंत्रक हैं। विवाह के योग जल्दी बनते हैं।

D. आध्यात्मिक लाभ: आत्मा की उन्नति

10. अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
7 बार पाठ करने से धीरे धीरे व्यक्ति के अंदर साहस, सेवा, भक्ति, विनम्रता जैसे गुण आते हैं। यही असली अष्ट सिद्धि है।

11. राम रसायन तुम्हरे पासा
हनुमान जी राम भक्ति का रास्ता खोलते हैं। 7 बार पाठ करने वाला व्यक्ति अपने आप राम नाम की तरफ खिंचता है। जीवन का उद्देश्य समझ आने लगता है।

12. जन्म जन्म के दुख बिसरावै
पिछले जन्मों के कर्म काटने का सबसे सरल उपाय। 7 बार पाठ एक तरह का प्रायश्चित है। मन निर्मल होता है।

4. 7 बार पाठ कब और कैसे करें: सम्पूर्ण विधि

समय:
सबसे अच्छा समय ब्रह्म मुहूर्त है, सुबह 4 से 6 बजे। न हो सके तो सूर्योदय के बाद, या सूर्यास्त के बाद। रात 8 बजे के बाद 7 बार पाठ करने से डरावने सपने नहीं आते।

दिन:
मंगलवार और शनिवार सबसे उत्तम। अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण, हनुमान जयंती पर 7 बार पाठ का 100 गुना फल मिलता है।

विधि:
स्नान करके साफ कपड़े पहनें। लाल या पीले वस्त्र अच्छे हैं।
हनुमान जी के सामने चमेली के तेल का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
गुड़, चना या बूंदी का भोग रखें।
पहले "श्री गणेशाय नमः" फिर "सीताराम" बोलकर शुरू करें।
7 बार बिना रुके पाठ करें। बीच में बात न करें, फोन न देखें।
आखिर में "बजरंगबली बाबा की जय" बोलकर प्रसाद बाँट दें।

सावधानी:
पाठ के समय मन साफ रखें। किसी का बुरा न सोचें। मांस, शराब से दूर रहें। ब्रह्मचर्य का पालन करें तो फल जल्दी मिलता है।

5. 7, 11, 21, 108: संख्या का अंतर क्या है

लोग पूछते हैं 7 बार ही क्यों, 11 या 108 क्यों नहीं?

1 बार: नित्य नियम के लिए।
3 बार: तत्काल संकट में।
7 बार: पूर्ण अनुष्ठान। शरीर के 7 चक्र शुद्ध। ग्रह दोष शांति। 7 दिन, 7 सप्ताह या 7 महीने का संकल्प लिया जाता है।
11 बार: बहुत बड़ी मनोकामना के लिए। 11 हनुमान जी की संख्या है।
108 बार: महार अनुष्ठान। सिद्धि के लिए। इसे बिना गुरु के न करें।

आम आदमी के लिए 7 बार सबसे संतुलित है। न बहुत लंबा, न बहुत छोटा। रोज किया जा सकता है।

6. 21 दिन का 7 बार पाठ संकल्प: जीवन बदलने वाला प्रयोग

अगर जीवन में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा, तो ये प्रयोग करें।

संकल्प: 21 दिन तक रोज सुबह 7 बार हनुमान चालीसा पढ़ूँगा।
नियम: मांस शराब नहीं, झूठ नहीं, किसी का दिल नहीं दुखाना।
समय: रोज एक ही समय।
समाप्ति: 21वें दिन मंदिर में झंडा, लंगोट और प्रसाद चढ़ाएँ।

क्या होगा:
पहले 7 दिन, सफाई होगी। पुराने कर्म, नेगेटिविटी निकलेंगे। सर दर्द, आलस, गुस्सा आ सकता है।
अगले 7 दिन, ऊर्जा आएगी। काम बनने लगेंगे। लोग मदद करेंगे।
आखिरी 7 दिन, चमत्कार। जो 7 साल से अटका था, वो बन जाएगा।

लाखों लोगों ने ये करके देखा है। नौकरी, शादी, संतान, कोर्ट केस, बीमारी। हर समस्या में लाभ मिला है।

7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण: 7 बार पाठ शरीर पर कैसे काम करता है

क) साउंड थेरेपी: हनुमान चालीसा अवधी भाषा में है। इसकी ध्वनि तरंगें 432 Hz के आसपास होती हैं। ये ब्रह्मांड की प्राकृतिक फ्रीक्वेंसी है। 7 बार दोहराने से ब्रेन और हार्ट की धड़कन एक लय में आ जाती है।

ख) ब्रीदिंग एक्सरसाइज: 7 बार पाठ में लगभग 108 बार गहरी साँस लेनी पड़ती है। ये प्राणायाम के बराबर है। फेफड़े मजबूत, ऑक्सीजन लेवल बेहतर।

ग) वाइब्रेशन: "हनुमान" शब्द बोलने से थायरॉइड ग्लैंड वाइब्रेट करती है। "राम" से नाभि चक्र। पूरी चालीसा शरीर के सभी चक्रों को एक्टिवेट करती है।

घ) साइकोलॉजी: 7 बार एक ही बात दोहराने से सबकॉन्शियस माइंड उसे सच मान लेता है। "संकट कटै मिटै सब पीरा" 7 बार बोलने से दिमाग संकट से लड़ने की ताकत पैदा करता है।

8. लोगों के सच्चे अनुभव

केस 1: दिल्ली की सीमा शर्मा। पति की नौकरी छूट गई। कर्ज 15 लाख। 7 शनिवार तक 7 बार पाठ किया। 8वें शनिवार को पति को पुरानी कंपनी से दोगुनी सैलरी पर बुलावा आया।

केस 2: लखनऊ का 14 साल का बच्चा। रात को डरकर चिल्लाता था। डॉक्टर ने भूत प्रेत बताया। माँ ने 21 दिन तक 7 बार पाठ करके पानी पिलाया। बच्चा अब चैन से सोता है।

केस 3: मुंबई का बिजनेसमैन। फैक्ट्री में आग लग गई। सब स्वाहा। बर्बाद होकर हनुमान मंदिर गया। पंडित ने कहा 7 बार 7 दिन पढ़ो। 7वें दिन पुराने क्लाइंट ने 50 लाख का ऑर्डर दे दिया। आज उसकी 3 फैक्ट्री हैं।

9. कौन न करे 7 बार पाठ: कुछ अपवाद

हनुमान जी की ऊर्जा बहुत तीव्र है। कुछ लोगों को संभालनी मुश्किल होती है।
गर्भवती महिला 1 बार से ज्यादा न पढ़े। 7 बार से शरीर में गर्मी बढ़ती है।
बहुत क्रोधी व्यक्ति पहले 1 महीना 1 बार पढ़े, फिर 7 बार। वरना गुस्सा और बढ़ सकता है।
बिना स्नान के, गंदे स्थान पर न पढ़ें।

10. सार: 7 बार पाठ = सुरक्षा + सफलता + शांति

हनुमान चालीसा का 7 बार पाठ एक कवच है। ये कवच आपको देता है:
1. सुरक्षा: भूत, प्रेत, शनि, राहु, टोना, दुर्घटना से।
2. सफलता: रुके काम, कोर्ट केस, नौकरी, व्यापार में।
3. शांति: डर, चिंता, डिप्रेशन, नींद की कमी से।
4. सिद्धि: बल, बुद्धि, विद्या, साहस, राम भक्ति।

तुलसीदास जी लिख गए हैं:
"जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई।"

अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन

गृहस्थाश्रम धन्य है गृहस्थी पर संस्कृत श्लोक यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी ।विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग ...
29/05/2026

गृहस्थाश्रम धन्य है गृहस्थी पर संस्कृत श्लोक

यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी ।
विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहेव हि ॥

जिसका पुत्र उसके वश है, पत्नी कहा करनेवाली है, और वैभव से जो संतुष्ट है, उसके लिए तो यहीं स्वर्ग है ।

अर्थागमो नित्यमरोगिता च
प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च ।

वशश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या
षड्जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥

हे राजन् ! अर्थोपार्जन, अरोगित्व, अच्छी लगनेवाली और प्रिय बोलनेवाली पत्नी, अपने आधीन पुत्र, और अर्थकरी विद्या – ये छे जीवलोक के सुख है ।

वनेऽपि दोषा प्रभवन्ति रागिणां
गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रह स्तपः ।

अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते
निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥

आसक्त लोगों का वन में रहना भी दोष उत्पन्न करता है । घर में रहकर पंचेन्द्रियों का निग्रह करना हि तप है । जो दुष्कृत्य में प्रवृत्त होता नहीं, और आसक्तिरहित है, उसके लिए तो घर हि तपोवन है ।

तप्त्वा तपस्वी विपिने क्षुधार्तो
गृहं समायाति सदान्न दातुः ।

भुक्त्वा स चान्नं प्रददाति तस्मै
तपो विभागं भजते हि तस्य ॥

तपस्वी वन में तप करके जब भूख से पीडित होता है, तब वह अन्नदाता के घर आता है । वहाँ अन्न लेकर, वह (एक तरीके से) अपने तप का हिस्सा उसे बाँटता है ।

यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः ।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥

क्रोशन्तः शिशवः सवारि सदनं पङ्कावृतं चाङ्गणम्
शय्या दंशवती च रुक्षमशनं धूमेन पूर्णः सदा ।

भार्या निष्ठुरभाषिणी प्रभुरपि क्रोधेन पूर्णः सदा
स्नानंशीतलवारिणा हि सततं धिग् गृहस्थाश्रमम् ॥

जिस घर में बालक रोते हो, सब जगह पानी गिरा हो, आंगन में कीचड हो, गद्दों में मांकड हो, खुराक रुक्ष हो, धूँए से घर भरा हो, पत्नी निष्ठुर बोलनेवाली हो, पति सदा क्रोधी हो, ठंडे पानी से स्नान करना पडता हो – ऐसे गृहस्थाश्रम को धिक्कार है ।

सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियभाषिणी
सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेवकाः ।

आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे
साधोः सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥

घर में आनंद हो, पुत्र बुद्धिमान हो, पत्नी प्रिय बोलनेवाली हो, अच्छे मित्र हो, धन हो, पति-पत्नी में प्रेम हो, सेवक आज्ञापालक हो, जहाँ अतिथि सत्कार हो, ईशपूजन होता हो, रोज अच्छा भोजन बनता हो, और सत्पुरुषों का संग होता हो – ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है ।

अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन

श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अ...
28/05/2026

श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अहंकार, संसार के मोह और अंततः ईश्वर की शरणागति का एक अद्भुत दर्शन है।
आइए इस पावन कथा को विस्तार से समझते हैं:
त्रिकूट पर्वत और गजेंद्र का वैभव
क्षीरसागर के बीच में एक अत्यंत सुंदर त्रिकूट पर्वत था। उसकी तलहटी में एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली हाथियों का राजा रहता था, जिसका नाम था गजेंद्र। वह इतना बलवान था कि उसकी गंध मात्र से शेर और व्याघ्र जैसे हिंसक जीव भी दूर भाग जाते थे।
एक दिन गजेंद्र अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ विहार करते हुए प्यास बुझाने के लिए एक विशाल सरोवर के पास पहुँचा। वह अपनी शक्ति के मद (अहंकार) में चूर था और सरोवर के जल में खूब क्रीड़ा करने लगा।
काल रूपी 'ग्राह' का आक्रमण
जब गजेंद्र अपनी पत्नियों को अपनी सूंड से जल छिड़क कर नहला रहा था, तभी अचानक एक बहुत बड़े और शक्तिशाली मगरमच्छ (ग्राह) ने पानी के भीतर से उसका पैर पकड़ लिया।
* संघर्ष: गजेंद्र और ग्राह के बीच भयानक युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध एक-दो दिन नहीं, बल्कि एक हजार वर्षों तक चला।
* परिणाम: पानी के भीतर मगरमच्छ की शक्ति बढ़ती गई और गजेंद्र का बल धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। जब उसके परिवार और साथियों ने देखा कि गजेंद्र हार रहा है, तो वे भी एक-एक कर उसे अकेला छोड़कर चले गए।
अहंकार का पतन और पुकार
जब गजेंद्र बिल्कुल असहाय हो गया और उसका शरीर पानी में डूबने लगा, तब उसे बोध हुआ कि संसार का कोई भी संबंधी या शारीरिक बल उसे मृत्यु से नहीं बचा सकता। उसका अहंकार टूट गया।
तब उसे अपने पूर्व जन्म (राजा इंद्रद्युम्न) के पुण्य से भगवान विष्णु की स्तुति याद आई। उसने सरोवर से एक कमल का फूल अपनी सूंड में लिया, उसे ऊपर की ओर उठाया और अत्यंत आर्त स्वर (दुख भरी पुकार) में भगवान को पुकारा:
"नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायैद्भुतकारणाय..."
(हे समस्त जगत के कारण, हे निराकार प्रभु! मैं आपकी शरण में हूँ।)

भगवान का आगमन और उद्धार
जैसे ही गजेंद्र ने हृदय से पुकारा, भगवान विष्णु वैकुंठ में अपनी सभा छोड़कर नंगे पैर दौड़ पड़े। वे गरुड़ पर सवार होकर तुरंत उस सरोवर पर पहुंचे।
* करुणा: भगवान ने देखा कि गजेंद्र डूब रहा है। उन्होंने अपनी करुणा से उसे जल से बाहर निकाला।
* चक्र का प्रहार: भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का मुख फाड़ दिया और गजेंद्र को उसके चंगुल से मुक्त किया।
* पूर्व जन्म का रहस्य: वह मगरमच्छ वास्तव में 'हूहू' नाम का गंधर्व था जिसे श्राप मिला था, और गजेंद्र 'इंद्रद्युम्न' नाम का राजा था। भगवान के स्पर्श से दोनों का उद्धार हो गया।
इस कथा का गहरा अर्थ
* सरोवर: यह संसार है।
* गजेंद्र: हम सभी जीव हैं, जो अपने बल और परिवार के मोह में डूबे हैं।
* ग्राह (मगरमच्छ): यह 'काल' या मृत्यु है, जिसने हमें पैरों से पकड़ रखा है।
* शिक्षा: जब तक हम अपनी शक्ति पर भरोसा करते हैं, भगवान प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन जिस क्षण हम मान लेते हैं कि "प्रभु, अब मैं हार गया, केवल आप ही सहारा हो," उसी क्षण वे प्रकट हो जाते हैं।

अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन

रामायण के अनुसार, कुंभकर्ण को जगाने में 7 दिन लगे थे। वह 6 महीने की गहरी निद्रा में सोता था और उसे युद्ध के लिए जगाने के...
27/05/2026

रामायण के अनुसार, कुंभकर्ण को जगाने में 7 दिन लगे थे। वह 6 महीने की गहरी निद्रा में सोता था और उसे युद्ध के लिए जगाने के लिए रावण ने सैनिकों को ढोल-नगाड़े, शंख बजाने और हाथी-घोड़ों का इस्तेमाल करने का आदेश दिया था।

रामायण के मुख्य पात्रों में से एक कुंभकर्ण भी हैं. कुंभकर्ण को आज भी उनकी लंबी निद्रा के कारण जाना जाता है. जो लोग ज्यादा सोना पसंद करते है उन्हें आमतौर पर लोग कुंभकर्ण कहने लगते है. लोगों के लिए यह एक मजाक का विषय भी है लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर कुंभकर्ण का जीवन ऐसा क्यों था?

कुंभकर्ण का नाम लेते ही दिमाग में एक बहुत अधिक निद्रा में रहने वाले और अधिक भोजन करने वाले व्यक्ति की छवि बन जाती है. लोगों के लिए हास्यप्रद बनने वाला रामायण का यह पात्र अपने नाम के कारण नहीं, बल्कि अपने कर्मों और कठोर तपस्या से मिले वरदान के कारण प्रसिद्ध हुआ है. रामायण के अनुसार, कुंभकर्ण, रावण का छोटा और विभीषण और सूर्पनखा का बड़ा भाई था. वह ऋषि विश्रवा और राक्षसी कैकसी का पुत्र था. कुंभकर्ण नाम का अर्थ अधिक सोने वाला बिल्कुल भी नहीं है असल में इसका अर्थ है- कुंभ यानि घड़ा और कर्ण का अर्थ है कान, बचपन से ही बड़े कान होने के कारण उनका नाम कुंभकर्ण रखा गया था.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुंभकर्ण बचपन से ही बहुत बलवान था और अपने बड़े भाई की तरह तपस्वी भी था. साथ ही वह इतना भोजन करता था कि पूरे नगर का भोजन भी उसके लिए कम पड़ जाता था.

फिसली जुबान मिला निद्रा का वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार, कुंभकर्ण के पिता ऋषि विश्रवा ने अपने तीनों बेटों रावण, कुंभकर्ण और विभीषण को तपस्या करने के लिए कहा था. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए तो देवताओं ने माता सरस्वती से प्रार्थना की जब कुंभकर्ण ब्रह्मा जी से वरदान मांगे तो आप उसकी जिव्हा पर विराजमान हो जाए, मां सरस्वती ने सबकी प्रार्थना को स्वीकार किया और कुंभकर्ण की जिव्हा पर विराजमान हो गईं जिसके कारण कुंभकर्ण जैसे ही वर मांगने लगा तो उसके मुख से इंद्रासन की जगह निद्रासन निकला और ब्रह्मा जी ने उसकी इच्छा पूरी कर दी.

जब कुंभकर्ण को इस बात का पश्चाताप हुआ तो उसने ब्रह्मा जी से निवेदन करने लागा तो ब्रह्मा जी ने अवधि को घटाकर छः महीने तक कर दिया जिसके बाद वह छः महीने के लिए सो जाता और सिर्फ एक दिन जागता उसके बाद वापस सो जाता था. कुंभकर्ण को यह वरदान देते हुए ब्रह्मा जी ने यह भी कहा था कि यदि कोई भी उसे बलपूर्वक जगाने का प्रयास करेगा तो वह कुंभकर्ण के जीवन का अंतिम दिन होगा. ब्रह्मा जी के यह वचन सत्य हुए जब रावण युद्ध में प्रभु श्रीराम से हारने लगा तब रावण ने कुंभकर्ण को बलपूर्वक जगाया और सहायता मांगी जिसके बाद उसी दिन युद्ध में कुंभकर्ण की मृत्यु हो गई.

यह कथा भी है प्रचलित
पौराणिक कथा के अनुसार कुंभकर्ण ने अपने भाईयों के साथ कठोर तपस्य की जिससे ब्रह्म देव प्रसन्न होकर उनके पास पहुंच और वर मांगने को कहा. रावण और विभीषण ने वर मांगा और ब्रह्म देव ने उनको आशीर्वाद दे दिया. इसके बाद जब वह कुंभकर्ण के पास गए और उसे भोजन करते देख चिंता में पड़ गए तब ब्रह्म देव ने कुंभकर्ण की मति हर ली, जिसकी वजह से कुंभकर्ण ने छः महीने निंद्रा में रहने का वरदान मांग लिया और ब्रह्म देव ने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया.

अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन
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Thanks for being a top engager and making it on to my weekly engagement list! 🎉 Gungun Shukla, Shivendra Nath Shukla, Sa...
25/05/2026

Thanks for being a top engager and making it on to my weekly engagement list! 🎉 Gungun Shukla, Shivendra Nath Shukla, Satish Chaubey, Krishna Kumar Shukla, Yash Pandey, Ayushh Pathak, Vinod Shukla, Ram Shukla

24/05/2026

अजवाइन पत्ता छोटा पत्ता, बड़े फायदे
#योग #स्वस्थ #स्वदेशी

माया क्या है? माया की परिभाषा और उसके प्रकार?मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥गो गोचर जहँ लगि मन जाई...
24/05/2026

माया क्या है? माया की परिभाषा और उसके प्रकार?

मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥

मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है॥ इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना।

एक वाक्य में कहें तो माया जड़ है। जैसे एक कुल्हाड़ी। कुल्हाड़ी अपने आप कुछ नहीं कर सकती। वैसे ही माया अपने आप कुछ नहीं कर सकती। जब लकड़हारा उस कुल्हाड़ी को उठा कर तने पर प्रहार करता है। तब वह कुल्हाड़ी लकड़ी काटती है। वैसे ही माया भगवान की शक्ति पाकर काम करती हैं।

जिसकी प्रतीति मेरे (भगवान के) बिना हो।" थोड़ी टेढ़ी परिभाषा है, हम समझाने का प्रयत्न करेंगे। 'जिसकी प्रतीति मेरे बिना हो।' इस का अर्थ है, माया वहीं होगी जहां भगवान नहीं होंगे। चैतन्य चरितामृत मध्य लीला २२.३१ 'श्री कृष्ण सूर्य सम, माया होवै अंधकार, जहाँ सूर्य ताहा नहीं माया अंधकार" इस को एक उदाहरण से समझिए, सूर्य की किरण जल (तालाब) में पड़ती हैं।

तो ये किरण कहाँ है? जल में हैं। तो जल में सूर्य नहीं है। सूर्य ऊपर है और किरण निचे है। यह किरण ऊपर नहीं जा सकती क्योंकि वो नीचे है। लेकिन सूर्य के बिना किरण तालाब पर नहीं पड़ सकती। किरण का अपना अस्तित्व पृथक (अलग) नहीं हैं। सूर्य से ही किरण का अस्तित्व है।

जैसे किरण का अपना अलग अस्तित्व नहीं है, वैसे ही माया का अपना अलग अस्तित्व नहीं है। जैसे किरण जल में रहती है, सूर्य के बिना, वैसे ही माया भी रहती है भगवान के बिना।
श्वेताश्वतरोपनिषद १.८ में कहा गया है कि "संसार जीव, माया और तीसरा ब्रह्म से युक्त है।" यह संसार में हम (जीव/आत्मा) है, माया है और जीव माया व्याप्त भगवान भी हैं।

वेद शास्त्र कहते हैं कि यह संसार माया से बना है। और वेद शास्त्र यह भी कहते है कि संसार भगवान से बना है। तो इन दोनों में कौन सी बात सही है? दोनों बातें सही है। यह संसार भगवान और माया दोनों के मिलन से बना है। यह माया के अंदर भगवान व्याप्त हुए है। तुलसीदस कहते है "घट-घट व्यापक राम" अर्थात राम एक एक कण में व्यापक/व्याप्त है।

अर्थात राम माया के एक एक कण में व्यापक है। अर्थात भगवान माया के साथ रहते हैं, माया के एक-एक कण में रहते हैं। भगवान माया में व्याप्त है। ऊपर दिए गए उदाहरण में किरण को माया बतया। ये किरण में सूर्य की शक्ति है।

अर्थात यह किरण में सूर्य का अंश व्याप्त है। ऋग्वेद १.१६४.२० और कठोपनिषद् ३.१.१ में कहा कि यह आत्मा और भगवान के साथ एक जगह पर रहते है। अर्थात भगवान सभी जीव (आत्मा) के अंदर रहते है।

माया के प्रकार? माया दो प्रकार की होती हैं!

१. जीव-माया या अपरा या अविद्या माया।

२. गुण माया या योग माया या विद्या माया
यह जीव माया भी दो प्रकार की होती हैं।

१. अवर्णात्मिका:- माया ने जीव (आत्मा) का अपना स्वरूप भुलाया। हम आत्मा है यह भुला दिया।

२. विक्षेपात्मिक:- माया ने संसार में आसक्ति करा दी। अर्थात माया ने संसार में हमारे मन को लगा दिया।

यह जीव-माया को अपरा या अविद्या माया भी कहते हैं। गीता ७.४ "पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - ऎसे यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो मेरी (भगवान की) जड़ स्वरूप अपरा माया है" हमारा मन-बुद्धि माया का बना है, इसलिए हमारे विचार भी माया के अंतर्गत होते है।

गुण माया को प्रकृति माया भी कहते है। गीता ७.१४ "मेरी (भगवान की) यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है। जो केवल मेरे ही शरण है, तो ये माया चली जाएगीं।" गुण माया यह भगवान की शक्ति हैं, यह भगवान की शक्ति पाकर अपना काम करती हैं। तो क्योंकि हम जीव (आत्मा) की शक्ति वाले है, हमारी शक्ति भगवान की शक्ति से काम है इसलिए माया को हम नहीं हटा सकतें। इसलिए हमे केवल मे भगवान के शरण में जाना होगा।

यह माया का प्रभाव हमारे मन पर होता है, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष एवं भय यह योग माया के कारण हम लोगों पर हावी हैं। काम का अर्थ है- पुत्रैषणा अर्थात स्त्री अथवा पुरुष संभोग की चाह, वित्तैषणा अर्थात धन कमाने की चाह, लोकैषणा यानी यश कमाने की चाह और क्रोध, लोभ, मोह आदि।

वैसे तो जीव-माया भी भगवान की ही शक्ति है। लेकिन गुण माया जिसे योग-माया कहते है, ये भगवान की अंतरंग शक्ति है। भगवान के सारे काम योग माया से होते है। आप जितने भी लीला पढ़ते है। ये सारे लीला योग माया के द्वारा होते है। जब भी कभी असम्भव काम लीला में भगवान करे तो समझना योग-माया से यह काम हुआ है।

जैसे श्री कृष्ण के जन्म के समय सब कारागार सो गए। ताले खुल गए अपने आप। यमुना ने मार्ग दे दिया। ये सब असंभव कार्य है। इसलिए ये कार्य योग-माया से हुआ है।

बहुत संक्षेप में माया के बारे में कहें तो हर वो चीज जो हम सुनते है, स्पर्श करते है, सोचते है, बोलते है, देखते है, सब माया है। यह संसार माया का है और इस संसार में स्वर्ग, नर्क और पृथ्वीलोक हैं।अर्थात स्वर्गलोक, नर्कलोक और पृथ्वीलोक माया के बने है। माया के कुल ११ लोक है।

अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन

23/05/2026
एक पंडित जी रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। पंडित जी का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए ...
23/05/2026

एक पंडित जी रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। पंडित जी का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंतजी बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई।

उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे!

अत: वकील साहब ने पंडित जी से पूछ ही डाला- महाराज जी, आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं।

हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं?

पंडित जी ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं।

वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी।

हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए ।

आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं।

महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो।

लेकिन वकील नहीं माना, वो कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे,इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।

इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा।

मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर पंडित जी महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा।

कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।

जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना।

कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा।

मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना।

यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।

पंडित जी ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ?.... यह तो सत्य की परीक्षा है।

वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा।

आप पराजित हो गए तो क्या करोगे?

पंडित जी ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।

अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे,वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए।

काफी भीड़ हो गई।

पंडाल भर गया।

श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।

पंडित जी महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे... गद्दी रखी गई।

पंडित जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" ऐसा बोलते ही पंडित जी के नेत्र सजल हो उठे ।

मन ही मन पंडित जी बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है।

मैं तो एक साधारण जन हूँ।

मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना।

फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए।

लोगों की आँखे जम गईं ।

वकील साहब खड़े हुए।

उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके !

जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।

पंडित जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके।

तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए।

वकील साहब पंडित जी महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है।

अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ।

कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर।

प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है तो प्रभु बिराजते है।

श्री राम जी की जय.....

हे नाथ!हे मेरे नाथ!!आप कृपा के सागर है।

अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन

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