31/08/2026
यदि ईश्वर वास्तव में निष्पक्ष, न्यायकारी और करुणामय हैं, तो जन्म लेते ही किसी को धन, स्वास्थ्य और अनुकूल परिस्थितियाँ क्यों मिलती हैं, जबकि किसी को गरीबी, बीमारी या कठिनाइयाँ?
हिन्दू दर्शन का उत्तर कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्त में निहित है।
ईश्वर पक्षपाती नहीं, कर्मफलदाता हैं।
भगवद्गीता (4.11) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
"जो मुझे जिस भाव से ग्रहण करता है, मैं भी उसे उसी प्रकार फल देता हूँ।"
अर्थात् भगवान किसी के साथ पक्षपात नहीं करते; वे केवल कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।
फिर गीता (9.29) में भगवान स्पष्ट कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
"मैं सभी प्राणियों में समभाव रखता हूँ। न कोई मेरा शत्रु है, न कोई विशेष प्रिय।"
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार आत्मा केवल एक जन्म तक सीमित नहीं रहती। वह अनेक जन्म लेती है और प्रत्येक जन्म के कर्मों का संस्कार साथ लेकर आगे बढ़ती है।
इसी कारण दो बच्चों का जन्म एक ही समय पर होने पर भी उनके जीवन की परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं। यह ईश्वर की मनमानी नहीं, बल्कि कर्मों का न्याय है।
जैसे न्यायाधीश किसी को दण्ड और किसी को पुरस्कार देता है, पर वह पक्षपाती नहीं कहलाता क्योंकि उसका निर्णय कर्मों पर आधारित होता है। उसी प्रकार ईश्वर भी कर्मों के अनुसार फल देते हैं।
हिन्दू दर्शन भाग्यवाद नहीं सिखाता। वर्तमान के सत्कर्म, भक्ति, सेवा, ज्ञान और साधना से मनुष्य अपने भविष्य को श्रेष्ठ बना सकता है।
गीता (2.47) में कहा गया है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
"तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।"
यदि केवल एक ही जन्म माना जाए, तो जन्म से मिलने वाली असमानताएँ अन्याय प्रतीत हो सकती हैं। परन्तु हिन्दू दर्शन के अनुसार आत्मा अनादि है, कर्म निरंतर चलते हैं और ईश्वर निष्पक्ष न्यायाधीश हैं। इसलिए जन्म से मिलने वाला सुख-दुःख ईश्वर के पक्षपात का नहीं, बल्कि कर्मों के न्यायपूर्ण फल का परिणाम माना जाता है।
इस दृष्टि से ईश्वर सबके प्रति समान हैं अंतर केवल जीवों के कर्मों का है। यही कारण है कि हिन्दू शास्त्र ईश्वर को "समदर्शी,निष्पक्ष और न्यायकारी" कहते हैं।
~ॐ हरि~
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अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन