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यदि ईश्वर वास्तव में निष्पक्ष, न्यायकारी और करुणामय हैं, तो जन्म लेते ही किसी को धन, स्वास्थ्य और अनुकूल परिस्थितियाँ क्...
31/08/2026

यदि ईश्वर वास्तव में निष्पक्ष, न्यायकारी और करुणामय हैं, तो जन्म लेते ही किसी को धन, स्वास्थ्य और अनुकूल परिस्थितियाँ क्यों मिलती हैं, जबकि किसी को गरीबी, बीमारी या कठिनाइयाँ?

हिन्दू दर्शन का उत्तर कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्त में निहित है।

ईश्वर पक्षपाती नहीं, कर्मफलदाता हैं।

भगवद्गीता (4.11) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

"जो मुझे जिस भाव से ग्रहण करता है, मैं भी उसे उसी प्रकार फल देता हूँ।"

अर्थात् भगवान किसी के साथ पक्षपात नहीं करते; वे केवल कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।

फिर गीता (9.29) में भगवान स्पष्ट कहते हैं—

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।

"मैं सभी प्राणियों में समभाव रखता हूँ। न कोई मेरा शत्रु है, न कोई विशेष प्रिय।"

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार आत्मा केवल एक जन्म तक सीमित नहीं रहती। वह अनेक जन्म लेती है और प्रत्येक जन्म के कर्मों का संस्कार साथ लेकर आगे बढ़ती है।

इसी कारण दो बच्चों का जन्म एक ही समय पर होने पर भी उनके जीवन की परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं। यह ईश्वर की मनमानी नहीं, बल्कि कर्मों का न्याय है।

जैसे न्यायाधीश किसी को दण्ड और किसी को पुरस्कार देता है, पर वह पक्षपाती नहीं कहलाता क्योंकि उसका निर्णय कर्मों पर आधारित होता है। उसी प्रकार ईश्वर भी कर्मों के अनुसार फल देते हैं।

हिन्दू दर्शन भाग्यवाद नहीं सिखाता। वर्तमान के सत्कर्म, भक्ति, सेवा, ज्ञान और साधना से मनुष्य अपने भविष्य को श्रेष्ठ बना सकता है।

गीता (2.47) में कहा गया है—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

"तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।"

यदि केवल एक ही जन्म माना जाए, तो जन्म से मिलने वाली असमानताएँ अन्याय प्रतीत हो सकती हैं। परन्तु हिन्दू दर्शन के अनुसार आत्मा अनादि है, कर्म निरंतर चलते हैं और ईश्वर निष्पक्ष न्यायाधीश हैं। इसलिए जन्म से मिलने वाला सुख-दुःख ईश्वर के पक्षपात का नहीं, बल्कि कर्मों के न्यायपूर्ण फल का परिणाम माना जाता है।

इस दृष्टि से ईश्वर सबके प्रति समान हैं अंतर केवल जीवों के कर्मों का है। यही कारण है कि हिन्दू शास्त्र ईश्वर को "समदर्शी,निष्पक्ष और न्यायकारी" कहते हैं।
~ॐ हरि~
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अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन

सत्य ही नारायण है, सत्य ही परमात्मा है .....हम साधना करते हैं, मंत्रजाप करते हैं, पर हमें सिद्धि नहीं मिलती, इसका मुख्य ...
30/08/2026

सत्य ही नारायण है, सत्य ही परमात्मा है .....

हम साधना करते हैं, मंत्रजाप करते हैं, पर हमें सिद्धि नहीं मिलती, इसका मुख्य कारण है.... "असत्यवादन"| झूठ बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है और किसी भी स्तर पर दग्धवाणी से किये गए मन्त्रजाप का फल नहीं मिलता| इस कारण कोई साधना सफल नहीं हो पाती| यदि वाणी दूषित, कलुषित, दग्ध स्थिति में हो तो उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र भी जल जायेंगे| तब जप, स्तवन, पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट सत्परिणाम उपलब्ध न हो सकेगा| परिष्कृत जिह्वा में ही वह शक्ति है जो हमारे जप को सिद्ध कर सकती है|
सत्य बोलो पर अप्रिय सत्य से मौन अच्छा है| प्राणरक्षा और धर्मरक्षा के लिए बोला गया असत्य भी सत्य है, और जिस से किसी की प्राणहानि और धर्म की ग्लानि हो वह सत्य भी असत्य है| जिस की हम निंदा करते हैं उसके भी अवगुण हमारे में आ जाते हैं|
जो लोग झूठे होते हैं, चोरी करते हैं, और दुराचारी होते हैं, वे चाहे जितना मंत्रजाप करें, और चाहे जितनी साधना या पूजा-पाठ करें, उन्हें कभी कोई सिद्धि नहीं मिल सकती| सत्य ही परमात्मा है| सत्य से दूर जाकर परमात्मा का बोध नहीं हो सकता|

पुनश्चः :--
“नहि सत्यात्परो धर्मो न पापामनृतात परम, तस्मात् सर्वात्मना मर्त्यःसत्मेकं समाश्रेयत|
सत्यहीना वृथा पूजा सत्यहीनो वृथा जपः, सत्यहीनं तपो व्यर्थमूषरे वपनं यथा”||
सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं है, न ही झूठ से बडा कोई पाप| इसलिये मनुष्य को सदा एकमात्र सत्य का आश्रय लेना चाहिये| सत्यहीन की पूजा व्यर्थ है| सत्यहीन का जप व्यर्थ है| सत्यहीन तपस्या वैसे ही व्यर्थ है जैसे ऊसर भूमि में बीज बोना|
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अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन

लाइक फॉलो शेयर 🙏
28/08/2026

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बहुत बहुत शुभकामनाएं
28/08/2026

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जनेऊ क्या है और इसकी क्या महत्वता है?भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा क...
27/08/2026

जनेऊ क्या है और इसकी क्या महत्वता है?

भए कुमार जबहिं सब भ्राता।
दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥

जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है।

यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है।यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं।

पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

वैदिक धर्म में प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। प्रत्येक आर्य को जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए।

चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

जनेऊ के नियम :
1.यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।

2.यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित यज्ञोपवीत शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

4.यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करें ।

5.मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।

कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है।

जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है।
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अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
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एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि  ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?"इस प्रश्न ...
26/08/2026

एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?"

इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया।

आखिर में राजा भोज ने राज पंडित से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सात दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है,वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।

छः दिन बीत चुके थे।राज पंडित को जबाव नहीं मिला था।निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई।

गड़रिए ने पूछा -" आप तो राजपंडित हैं, राजा के दुलारे हो फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों?

यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा?सोचकर पंडित ने कुछ नहीं कहा।

इसपर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा -" पंडित जी हम भी सत्संगी हैं,हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए।"

राज पंडित ने प्रश्न बता दिया और कहा कि अगर कलतक प्रश्न का जवाब नहीं मिला तो राजा नगर से निकाल देगा।

गड़रिया बोला -" मेरे पास पारस है उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे घूमेंगेl

बस,पारस देने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी कि तुझे मेरा चेला बनना पड़ेगा।"

राज पंडित के अंदर पहले तो अहंकार जागा कि दो कौड़ी के गड़रिए का चेला बनूं? लेकिन स्वार्थ पूर्ति हेतु चेला बनने के लिए तैयार हो गया।

गड़रिया बोला -" पहले भेड़ का दूध पीओ फिर चेले बनो। राजपंडित ने कहा कि यदि ब्राह्मण भेड़ का दूध पीयेगा तो उसकी बुद्धि मारी जायेगी। मैं दूध नहीं पीऊंगा। तो जाओ, मैं पारस नहीं दूंगा - गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" ठीक है,दूध पीने को तैयार हूं,आगे क्या करना है?"

गड़रिया बोला-" अब तो पहले मैं दूध को झूठा करूंगा फिर तुम्हें पीना पड़ेगा।"

राजपंडित ने कहा -" तू तो हद करता है! ब्राह्मण को झूठा पिलायेगा?" तो जाओ, गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" मैं तैयार हूं झूठा दूध पीने को ।"

गड़रिया बोला-" वह बात गयी।अब तो सामने जो मरे हुए इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूंगा,उसको झूठा करूंगा, कुत्ते को चटवाऊंगा फिर तुम्हें पिलाऊंगा।तब मिलेगा पारस।
नहीं तो अपना रास्ता लीजिए।"

राजपंडित ने खूब विचार कर कहा-" है तो बड़ा कठिन लेकिन मैं तैयार हूं।

गड़रिया बोला-" मिल गया जवाब। यही तो कुआं है!लोभ का, तृष्णा का जिसमें आदमी गिरता जाता है और फिर कभी नहीं निकलता। जैसे कि तुम पारस को पाने के लिए इस लोभ रूपी कुएं में गिरते चले गए।

हम सभी इस सांसारिक मायाजाल में ऐसे लिप्त हैं कि जीवन का उद्देश्य भूल कर बस इतना और, इतना और, के लोभ में फसें हुए हैं
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अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
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क्यों कहते हैं कि "काशी भूमि पर नहीं है, वह शिवजी के त्रिशूल के ऊपर है ?"क्योंकि काशी एक यंत्र है एक असाधारण यंत्र!!मानव...
25/08/2026

क्यों कहते हैं कि "काशी भूमि पर नहीं है, वह शिवजी के त्रिशूल के ऊपर है ?"

क्योंकि काशी एक यंत्र है एक असाधारण यंत्र!!

मानव शरीर में जैसे नाभि का स्थान है, वैसे ही पृथ्वी पर काशी का स्थान है.. शिवजी ने साक्षात इसे धारण कर रखा है!

शरीर के प्रत्येक अंग का सम्बन्ध नाभि से जुड़ा है और पृथ्वी के समस्त स्थान का सम्बन्ध भी वाराणसी से जुड़ा है।
धरती पर यह एकमात्र ऐसा यंत्र है!!

काशी की रचना सौरमंडल की तरह की गई है।

इस यंत्र का निर्माण एक ऐसे विशाल और भव्य मानव शरीर को बनाने के लिए किया गया।

जिसमें भौतिकता को अपने साथ लेकर चलने की विवशता न हो और जो सारी आध्यात्मिक प्रक्रिया को अपने आप में समा ले।

आपके अपने भीतर ११४ चक्रों में से ११२ आपके भौतिक शरीर में हैं। लेकिन जब कुछ करने की बात आती है तो केवल १०८ चक्रों का ही प्रयोग आप कर सकते हैं।

इसमें एक विशेष प्रकार से मंथन हो रहा है। यह घड़ा अर्थात मानव शरीर इसी मंथन से निकल कर आया है।

अतएव मानव शरीर सौरमंडल से जुड़ा हुआ है और ऐसा ही मंथन इस मानव शरीर में भी चल रहा है।

सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुनी है। आपके अपने भीतर 114 चक्रों में से 112 आपके भौतिक शरीर में हैं। लेकिन जब कुछ करने की बात आती है तो केवल 108 चक्रों का ही प्रयोग आप कर सकते हैं।

अगर आप इन 108 चक्रों को विकसित कर लेंगे तो शेष चार चक्र स्वतः ही विकसित हो जाएंगे। हम उन चक्रों पर काम नहीं करते।

शरीर के 108 चक्रों को सक्रिय बनाने के लिए 108 तरह की योग प्रणालियां हैं।

पूरे काशी अर्थात बनारस शहर की रचना इसी तरह की गई थी।

यह पांच तत्वों से बना है और बहुधा ऐसा माना जाता है कि शिवजी के योगी और भूतेश्वर होने से उनका विशेष अंक पाँच है।

अतएव इस स्थान की परिधि पाँच कोश है। इसी तरह से उन्होंने सकेंद्रित कई सतहें बनाईं।

यह आपको काशी की मूलभूत ज्यामिति संरचना प्रदर्शित करता है।

गंगा के किनारे यह प्रारम्भ होता है और ये सकेंद्रित वृत्त परिक्रमा की व्याख्या दिखा रहे हैं।

सबसे बाहरी परिक्रमा की माप 168 मील है।

यह शहर इसी तरह बना है और विश्वनाथ मंदिर इसी का एक छोटा सा स्वरूप है।

मूल मंदिर की संरचना ऐसी ही है। यह बेहद जटिल है। इसका मूल रूप तो अब रहा ही नहीं है।

वाराणसी को मानव शरीर की तरह बनाया गया था। यहाँ 72 हजार शक्ति स्थलों अर्थात मंदिरों का निर्माण किया गया।

एक मानव के शरीर में नाड़ियों की संख्या भी इतनी ही होती है।

अतएव उन लोगों ने मंदिर बनाये और आस-पास बहुत सारे कोने बनाये जिससे कि वे सब जुड़कर 72,000 हो जाएं।

यहां 468 मंदिर बने क्योंकि चंद्र कैलेंडर के अनुसार साल में 13 महीने होते हैं।

13 महीने और 9 ग्रह, 4 दिशाएं - इस तरह से तेरह, नौ और चार के गुणनफल के बराबर 468 मंदिर बनाए गए। तो यह नाड़ियों की संख्या के बराबर है।

यह पूरी प्रक्रिया एक विशाल मानव शरीर के निर्माण की तरह थी।

इस विशाल मानव शरीर का निर्माण ब्रह्मांड से सम्पर्क करने के लिए किया गया था।

इस शहर के निर्माण की पूरी प्रक्रिया ऐसी है मानो एक विशाल मानव शरीर एक वृहत ब्रह्मांडीय शरीर के सम्पर्क में आ रहा हो।

काशी संरचना की दृष्टि से सूक्ष्म और व्यापक जगत के मिलन का एक उत्कृष्ट प्रदर्शन है।

कुल मिलाकर, एक शहर के रूप में एक यंत्र की रचना की गई है।

प्रकाश का एक दुर्ग बनाने के लिए और ब्रह्मांड की संरचना से संपर्क के लिए यहाँ एक सूक्ष्म ब्रह्मांड की रचना की गई।

ब्रह्मांड और इस काशी रूपी सूक्ष्म ब्रह्मांड इन दोनों को आपस में जोड़ने के लिए 468 मंदिरों की स्थापना की गई।

मूल मंदिरों में 54 शिव के हैं, और 54 शक्ति या देवी के हैं। अगर मानव शरीर को भी हम देंखें तो उसमें आधा हिस्सा पिंगला है और आधा हिस्सा इड़ा।

दायाँ भाग पुरुष का है और बायाँ भाग नारी का है।

यही कारण है कि शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में भी दर्शाया जाता है। आधा भाग नारी का और आधा पुरुष का।

आपके स्थूल शरीर का 72% हिस्सा पानी है, 12% पृथ्वी है, 6%वायु है और 4%अग्नि। बाकी का 6% आकाश है।

सभी यौगिक प्रक्रियाओं का जन्म एक विशेष विज्ञान से हुआ है जिसे भूत शुद्धि कहते हैं।

इसका अर्थ है अपने भीतर मौजूद तत्वों को शुद्ध करना।

अगर आप अपने मूल तत्वों पर कुछ अधिकार प्राप्त कर लें, तो अचानक से आपके साथ अद्भुत चीजें घटित होने लगेंगी।

यहां एक के बाद एक 468 मंदिरों में सप्तऋषि पूजा हुआ करती थी और इससे इतनी अपार ऊर्जा पैदा होती थी कि हर कोई इस स्थान पर आने की इच्छा रखता था।

यह स्थान केवल आध्यात्मिकता का ही नहीं अपितु संगीत, कला और शिल्प के अलावा व्यापार और शिक्षा का केंद्र भी बना।

इस देश के महानतम ज्ञानी काशी के हैं।
शहर ने देश को कई प्रखर बुद्धि और ज्ञान के धनी लोग दिए हैं।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, "पश्चिमी और आधुनिक विज्ञान भारतीय गणित के आधार के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता था।"

यह गणित बनारस से ही आया। इस गणित का आधार यहाँ है।

जिस प्रकार से इस शहर रूपी यंत्र का निर्माण किया गया, वह बहुत सटीक था।

ज्यामितीय संरचना और गणित की दृष्टि से यह अपने आप में इतना संपूर्ण है, कि हर व्यक्ति इस शहर में आना चाहता था।

क्योंकि यह शहर अपने अन्दर अद्भुत ऊर्जा पैदा करता था।

इसीलिए आज भी यह कहा जाता है कि "काशी भूमि पर नहीं है। वह शिवजी के त्रिशूल के ऊपर है।"

जय बाबा विश्वनाथ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
#सनातन बंधु मंडल चैरिटेबल फाउंडेशन

🔱 पशुपतिनाथ नाम क्यों पड़ा? — मृगरूप में महादेव की अद्भुत कथा 🙏एक समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ काठमांडू की पवित्र भ...
24/08/2026

🔱 पशुपतिनाथ नाम क्यों पड़ा? — मृगरूप में महादेव की अद्भुत कथा 🙏

एक समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ काठमांडू की पवित्र भूमि में स्थित श्लेष्मांतक वन में पहुँचे। वन की शांति और सुंदरता से मोहित होकर महादेव ने हिरण का रूप धारण कर लिया और माता पार्वती ने हिरणी का।

दोनों उसी वन में हिरणों के झुंड के साथ रहने लगे।

उधर कैलाश पर जब देवताओं को पता चला कि महादेव अपने धाम में नहीं हैं, तो वे उन्हें खोजने निकल पड़े। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र तीनों देवताओं ने अनेक स्थानों पर खोज की, लेकिन महादेव का कोई पता नहीं चला।

अंततः वे बागमती नदी के किनारे उसी वन में पहुँचे।

वहाँ हजारों हिरणों के बीच उन्होंने एक अद्भुत हिरण को देखा।

उस हिरण की तीन आँखें थीं, शरीर स्वर्ण के समान चमक रहा था और उसके सिर पर केवल एक सींग था।

देवता समझ गए—
यह कोई साधारण हिरण नहीं, स्वयं महादेव हैं।

उन्होंने महादेव को रोकने का प्रयास किया। लेकिन मृगरूप धारण किए महादेव वहाँ से छलांग लगाकर आगे बढ़ने लगे।

तभी ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र ने उस मृग के सींग को पकड़ लिया।

लेकिन महादेव को रोक पाना इतना सरल कहाँ था!

जैसे ही महादेव ने जोर से छलांग लगाई, उनके सींग का स्पर्श होते ही वह चार खंडों में टूट गया।

कहा जाता है कि सींग के वे चार खंड अलग-अलग पवित्र स्थानों से जुड़े और महादेव के दिव्य स्वरूप की स्मृति बन गए।

देवताओं ने महादेव से प्रार्थना की कि वे अपना दिव्य स्वरूप धारण करके उनके साथ लौट चलें।

लेकिन महादेव ने कहा कि वे इस पवित्र वन को छोड़ेंगे नहीं।

वे इसी भूमि पर पशुओं के स्वामी—“पशुपति” के रूप में विराजमान रहेंगे।

और तभी से बागमती के तट पर महादेव का यह दिव्य स्वरूप पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कहा जाता है, जिस स्थान पर महादेव ने मृगरूप धारण किया था, वही भूमि आगे चलकर उनके महान धाम के रूप में प्रसिद्ध हुई।

आज भी जब भक्त पशुपतिनाथ के सामने सिर झुकाते हैं, तो उन्हें उस अद्भुत लीला की याद आती है—

जहाँ स्वयं महादेव ने मृग का रूप धारण किया था, वहीं वे युगों-युगों तक “पशुपतिनाथ” बनकर भक्तों की रक्षा करते रहे।

🚩ॐ पशुपतिनाथाय नमः🚩
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अश्विनी कुमार शुक्ल
अध्यक्ष
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