07/09/2021
सिर्फ श्रद्धा की
जानो महत्ता
बेशक
नहीं सीखा होता
ए बी सी धर्म का
नहीं याद किया होता
णमोकार मंत्र भी
और श्रद्धा के बल पर
कैसे अंजन चोर
तिर गया संसार सागर से ,,,,
धर्म मार्ग में
कार्यकारी होती सिर्फ श्रद्धा
अरे श्रद्धा ही तो है ये
जो पाषाण में भी
भगवान की कर लेते स्थापना
श्रद्धा को अपनी
कैसे प्रगाढ़ बनायें रखें ?
इसकी दे दो कुछ टिप्स हमें ,,,,,
श्रद्धा को अपनी
प्रगाढ़ बनाये रखने के लिए
करना होता इतना सा उद्यम तुम्हें
रूचि हो या न भी हो
तो भी धर्म श्रवण
करो शास्त्र सभा में बैठ के
गुरुओं के प्रवचनों में
धर्म सभा में बैठ के
मंदिर जी में
नहीं मन लग रहा होता
पूजा / पाठ / अभिषेक में
तो भी बैठकर वहां
कर रहे होते
वो सभी क्रियाएं वहां
नहीं रूचि होते हुए भी
पुण्य कार्यों में / परमार्थ के कार्यों में
फिर भी उत्साह बना कर के
लगे होते उन कार्यों में
इस प्रकार जो करता
उसकी श्रद्धा
प्रगाढ़ बनी रहती
धर्म में ,,,,,
बेशक वो न सीखे
तत्वज्ञान को
जाने धर्म के मर्म को
फिर भी उसका
कल्याण का मार्ग
प्रशस्त बना ही रहता ,,,,,
क्षमा करना गुरुवर !
भावना सिर्फ रहती इतनी मेरी
जो भी विषय आता
चिंतन में / बुद्धि में
पढ़कर / सुनकर / अनुभव से
उसको अपनी सरल भाषा में
यहाँ प्रस्तुत कर देता
गुरु कृपा से
ज्ञानीजनो का जब मुझे
समर्थन मिल जाता
तो उसे गुरुकृपा का ही
प्रसाद मानता
नहीं इसमें मेरा कुछ होता ,,,,
मम गुरुवर आचार्यश्री विद्यासागर जी के
चरणों में कोटि कोटि नमन !!!!
मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी को
त्रिकाल वंदन !!!!
समस्त संघ के चरणों में
त्रियोग वंदन !!!
अनिल जैन "राजधानी"
श्रुत संवर्धक
६-९-२०२१