19/05/2020
श्री पार्श्वनाथाय: नमः
50 दिनों के एक लंबा अंतराल बीत गया, दादा के भक्तो की सुबह भी घर मे बैठे बैठे निकली, शाम भी...रात भी, दोपहर भी..!!
गृह मंदिर में दादा का पक्षाल करते करते अचानक आंखे दादा से सवाल करने लगती, कभी कभी दीपक की ज्योति में भेरूबाबा की छवि ढूंढने लगती....
कभी कभी मन मे डर लगता, डर से घबराने लगता तो दादा के भजन गुनगुनाता, ओर भेरूबाबा की तस्वीर के पीछे से आवाज गूंज उठती.. #मैं_हूँ_ना
ऐसे ही एक रविवार की सुबह नींद जगी तो खुद को पूजा के वस्त्र पहने हुए, नाकोड़ा तीर्थ के बाहर, बड़े से दरवाजे के पास खुद को खड़ा हुआ पाया, मेरा चेहरा नाकोड़ा के जगप्रसिद्ध मंदिर के सामने था, ओर पीछे समवशरण मंदिर के पीछे की पहाड़ी से धूल भरी मद्धम हवा बहती हुई आ रही थी..
मैं लंबे कदम भरते हुए आगे बढ़ा, मंदिर के सामने गलियारे के पास ऊंचे पेड़ो से ठंडी हवा के साथ चिड़ियों के चहचहाने की आवाज आकर्षित कर रही थी, मंदिर के पीछे से सूर्यदेव मंदिर की ध्वजा के साथ नजर आ रहे थे, मैंने नमो जिणांणं कह ध्वज को नमन करते हुए निहारा, ओर मंदिर की नवनिर्मित चौड़ी सीढियां चढ़ने लगा..निसिहि निसिहि निसिहि कह में मंदिर प्रांगण में था..
सीढियां चढ़ते ही एक विशाल अहाता दिखा, इसी चौक में कभी सेंकडो भक्त माला-जाप करते बैठे रहते थे, आज ये चौक सुना सुना लगा, प्रकृति कभी कभी खुद को सहेजती है तो सबको सहयोग देना पड़ता है, मैं चौक से आगे बढ़ा सामने चंदन घिसने की शिला दिखी, मैंने श्लोक सुमिरन करते हुए चंदन घिसा, चांदी की छोटी सी वाटिका में चंदन रखते हुए, खुद को सौभाग्यशाली समझते हुए आगे बढ़ा...
सफेद संगमरमर से सजाई जमीन, जिसपर महीन कारीगरी से कलाकृतियो से सजाया हुआ फर्श, पीले पत्थरो से बनी अहाते की छत, पीतल के छोटे खम्बो से बनी रेलिंग से होते हुए, 3 सीढियां चढ़ कर मैं मुख्य गंभारे के सामने था, गंभारे की दहलीज को छू कर, तीन बार निसिहि का उच्चारण करते हुए मैं गंभारे में अंदर पहुंचा, चिरपरिचित शांति, अत्यंत आल्हादित कर देने वाली खुश्बू, परम शांति के साथ जलते हुए दीपक की लौ में दैदीप्यमान #श्री_नाकोड़ा_पार्श्वनाथ_भगवान की मनमोहक प्रतिमा के दर्शन हुये...
अभी अभी पक्षाल हुआ था, दादा के सामने हाथ जोड़कर कुछ समय बस उन्हें निहारता रहा.. प्रभु के कमल-नयनो ने मुझ जैसे चरणसेवक को देखा तो मानो जीवन सफल हो गया, प्रभु सन्निधि में कभी आंखे मूंद कर प्रभु को निहारा, कभी आंखे खोल कर करुणानिधान को निहारा, कभी हाथ जुड़े, कभी पलके जुड़ी, कभी भावो के आलम्बन से प्रभु-शरण को स्वीकार किया.. सुगंधित चंदन से प्रभु की नव-अंग पुजा की.. औऱ सुंगंधित ग़ुलाब के पुष्पों से प्रभु की पुष्प पुजा करते हुए प्रभु का श्रृंगार किया...तत्पश्चात
गंभारे मे विराजमान... #श्री_जगवल्लाभ_पार्श्वनाथ_प्रभु औऱ #श्री_चिंतामणी_पार्श्वनाथ_प्रभु* की प्रतिमाओं की पूजा कर, जी भर के निहार के, में दूसरे दरवाजे से बाहर निकल आया..
बाहर निकलते ही मेरे सामने पीले पत्थरो से बने आलिये में आराध्य देव #श्री_नाकोड़ा_भैरव_देव विराजमान थे, रौबीली मूंछो के बीच से मुस्कुराते हुए भैरवबाबा ने मेरी आँखों मे झांका, मानो पूरा शरीर प्रफुल्लित हो गया, भेरूबाबा मोटी एकल भौंहों में अप्रीतम नैनो से अपने अदने से भक्त को देख रहे थे.. दादा के मस्तक पर निज अंगूठे से तिलक लगाकर चंदन पूजा करते समय मन में हुए हर्षोल्लास को शब्दों के मोतियों में पिरोना असंभव सा है.. भेरूबाबा को श्रृंगार धराया गया, मोतियों की झालर से सजाई आंगी, बड़े मनकों की माला, माणिक्य झडा हुआ मुकुट, ओर लाल फूलो से बाबा को सजाने का सौभाग्य मिला...
में अब शांत खड़ा मेरे भेरू बाबा को निहार रहा था, वो बाबा जिन्होंने मुझे हर वो पुरुस्कार दिया जिसे में सपने में कभी सोच भी नही सकता था..भेरूबाबा मुझे अपने आशीर्वाद की वर्षा से भिगोते रहे, में उनके समक्ष खड़ा आंसू बहाता रहा, भेरूबाबा को निहारते, देखते, दादा को मेरा हाल सुनाते सुनाते मेने आंखे मुंद ली...
अचानक से एक घण्टी की आवाज सुनाई दी, मेने धीरे से आंखे खोली, मैं मेरे घरमन्दिर के सामने खड़ा था, इस कोविड19 के लोकडाउन में मेरी #नाकोड़ा_भाव_यात्रा सम्पूर्ण हो चुकी थी...!!
#दादा के दरबार से भरी हुई आंखों से लिखी
लोकेश चौरड़िया (खारघर-मुम्बई)
#संस्मरण
#नाकोड़ाजी_द_जैन_तीर्थ_पेज
#जिनाज्ञा विरुद्ध लिखने में आया हो तो मिच्छामि दुक्कडम🙏