19/08/2026
जाति-विमर्श की समाजशास्त्रीय त्रुटि: Jati, Varna और Caste का पुनर्पाठ तथा अवर्णीकरण का सिद्धांत
प्रस्तावना
भारतीय समाज को समझने के आधुनिक प्रयासों में “जाति” शायद सबसे अधिक प्रयुक्त अवधारणाओं में से एक है। भारतीय और विदेशी समाजशास्त्रियों, मानवशास्त्रियों तथा इतिहासकारों ने जाति की उत्पत्ति, अंतर्विवाह, पेशागत संरचना, शुद्धता-अशुद्धता, सामाजिक गतिशीलता, अस्पृश्यता, सत्ता, वर्ग और राजनीति पर विशाल साहित्य निर्मित किया है। डॉ. बी. आर. आंबेडकर से लेकर एम. एन. श्रीनिवास, जी. एस. घुर्ये, लुई द्यूमों, आंद्रे बेतेइय, सुसान बेली और निकोलस डर्क्स तक अलग-अलग दृष्टियों से भारतीय सामाजिक संरचना की व्याख्या की गई है।
फिर भी एक बुनियादी conceptual problem पर्याप्त रूप से केंद्र में नहीं आ पाई:
क्या जाति (Jati), वर्ण (Varna) और अंग्रेजी की “Caste” वास्तव में एक ही सामाजिक प्रत्यय हैं?
यदि नहीं, तो संभव है कि भारतीय समाजशास्त्र ने जिस चीज को समस्या माना, उसके भीतर कई अलग ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को एक ही category में मिला दिया।
यह निबंध इसी distinction से एक वैकल्पिक hypothesis प्रस्तुत करता है:
भारतीय समाज की मूल समस्या केवल जातीय विविधता नहीं, बल्कि उस विविधता का वर्णीय श्रेणीकरण—अर्थात् Varnization—है। इसलिए सामाजिक लोकतंत्र की परियोजना केवल “Annihilation of Caste” की भाषा तक सीमित न रहकर “De-Varnization of Society” तथा “Democratization of Inter-Jati Relations” की दिशा में भी विकसित की जानी चाहिए।
यह आंबेडकर अथवा मौजूदा जाति-अध्ययनों का निषेध नहीं, बल्कि उनके द्वारा पहचानी गई graded inequality के स्रोत, reproduction और समाधान का एक अतिरिक्त analytical framework प्रस्तुत करने का प्रयास है।
1. पहली पद्धतिगत समस्या: Jati, Varna और Caste को एक समझना
भारतीय भाषाओं में जाति और वर्ण दो अलग शब्द हैं। उनकी अवधारणात्मक histories भी पूरी तरह समान नहीं हैं।
वर्ण का शास्त्रीय ढाँचा चार व्यापक categories प्रस्तुत करता है—
ब्राह्मण – क्षत्रिय – वैश्य – शूद्र,
जबकि वास्तविक भारतीय समाज हजारों जातियों, उपजातियों, कबीलों, पेशागत समुदायों, क्षेत्रीय समूहों और kinship networks में संगठित रहा है। अनेक समुदाय ऐतिहासिक रूप से चार-वर्णीय classification में आसानी से समाहित भी नहीं होते।
इसलिए पहला प्रश्न होना चाहिए:
यदि चार वर्ण हैं और हजारों जातियाँ हैं, तो दोनों को एक ही सामाजिक इकाई कैसे माना जा सकता है?
Padmanabh Samarendra ने M. N. Srinivas के संदर्भ में इसी conceptual difficulty की ओर ध्यान दिलाया है कि varna और jati जैसी अलग भारतीय categories का अंग्रेजी में एक ही शब्द “caste” से अनुवाद समाजशास्त्रीय अस्पष्टता उत्पन्न करता है।
यहीं से एक मूल distinction आवश्यक हो जाती है:
Jati ≠ Varna ≠ Caste
तीनों के बीच संबंध हो सकते हैं, लेकिन संबंध होना समानता नहीं है।
2. जाति को पहले “community formation” की तरह भी पढ़ना होगा
जातियों के निर्माण की कोई एक सार्वभौमिक प्रक्रिया मानना कठिन है।
भारतीय समाज में समुदाय अनेक आधारों पर विकसित हुए—
पेशा, कृषि, शिल्प, व्यापार, पशुपालन, सैन्य सेवा, क्षेत्र, भाषा, migration, kinship, वंश, स्थानीय राजनीति और सांस्कृतिक परंपरा।
इनमें से अनेक समूहों ने अपनी सामाजिक संस्थाएँ विकसित कीं। प्राचीन भारत की श्रेणियाँ (śreṇi) इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। शिल्पकारों और व्यापारियों के संगठन उत्पादन और व्यापार के साथ-साथ कुछ परिस्थितियों में पूँजी और वित्तीय गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
इसलिए यह समीकरण ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध है:
निम्न वर्ण = निर्धन पेशागत समुदाय।
अधिक उचित होगा:
Economic Status ≠ Ritual/Varna Status
यदि कोई शिल्पकार अथवा व्यापारी समुदाय आर्थिक रूप से संपन्न था, लेकिन उसकी ritual-social ranking अलग थी, तो यह स्वयं प्रमाण है कि आर्थिक वर्ग और वर्णीय प्रतिष्ठा एक ही mechanism से निर्धारित नहीं होते।
3. सामाजिक विभेदीकरण और सामाजिक असमानता
यहीं भारतीय सामाजिक अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण distinction आवश्यक है:
Social Differentiation और Social Hierarchy एक नहीं हैं।
एक समाज में किसान, कुम्हार, लोहार, बुनकर, पशुपालक, व्यापारी, शिक्षक और पुरोहित होना division of functions हो सकता है।
लेकिन इससे logically यह नहीं निकलता कि—
पुरोहित किसान से श्रेष्ठ है,
किसान शिल्पकार से श्रेष्ठ है,
और कोई अन्य समुदाय इतना निम्न है कि उसका स्पर्श भी अशुद्ध माना जाए।
अर्थात्:
Difference ≠ Inequality
और विशेष रूप से:
Occupational Difference ≠ Hereditary Human Ranking
इसीलिए भारतीय समाज के अध्ययन में दो स्वतंत्र प्रश्न पूछने चाहिए:
पहला: अलग-अलग जातियाँ और समुदाय कैसे बने?
दूसरा: इन समुदायों को ऊँचा और नीचा समझने की वैचारिक व्यवस्था कैसे बनी?
यदि दोनों प्रश्नों को “caste system” कहकर एक ही category में डाल दिया जाए, तो संभव है कि दूसरे प्रश्न की स्वतंत्र historical investigation ही कमजोर पड़ जाए।
4. वर्ण: एक Hierarchical Social Grammar
यहीं वर्ण की स्वतंत्र analytical भूमिका सामने आती है।
वर्ण को केवल चार social boxes की सूची मानना पर्याप्त नहीं है। उसे एक hierarchical social grammar के रूप में भी पढ़ा जाना चाहिए।
इस दृष्टि से—
जातियाँ सामाजिक शब्द थीं; वर्ण ने उन शब्दों को ऊँच-नीच के वाक्य में व्यवस्थित करने की grammar उपलब्ध कराई।
ब्राह्मणीय धर्मसूत्रों, स्मृतियों और उनकी व्याख्या-परंपराओं में अलग-अलग वर्णों के धर्म, अधिकार, संस्कार, विवाह, पेशे, सामाजिक संबंध और दंड आदि पर विस्तार से विचार मिलता है।
इसलिए इन ग्रंथों को केवल तत्कालीन समाज का photographic description मानना गलत होगा। वे अनेक प्रसंगों में normative texts हैं—समाज जैसा था केवल उसका विवरण नहीं, बल्कि समाज कैसा होना चाहिए इसका भी विधान प्रस्तुत करते हैं।
यहाँ से एक महत्वपूर्ण research hypothesis निकलती है:
क्या भारत में विभिन्न ऐतिहासिक समुदाय पहले विकसित हुए और बाद में अलग-अलग समय तथा क्षेत्रों में उन्हें एक व्यापक वर्णीय prestige hierarchy में समझने, रखने और वैध ठहराने की प्रक्रिया विकसित हुई?
इस प्रक्रिया को हम वर्णीकरण—Varnization कह सकते हैं।
5. वर्णीकरण क्या है?
वर्णीकरण से आशय केवल किसी जाति को “शूद्र” अथवा “क्षत्रिय” कहना नहीं है।
यह उससे व्यापक प्रक्रिया है:
Community Identity
↓
Varna Classification
↓
Hereditary Status
↓
Religious/Social Legitimation
↓
Purity–Pollution and Social Distance
↓
Inter-generational Reproduction
↓
Graded Inequality
यह प्रक्रिया पूरे भारत में किसी एक दिन अथवा किसी एक राजा के आदेश से लागू हुई—ऐसा दावा ऐतिहासिक प्रमाणों से स्थापित करना कठिन है।
अधिक सम्भावित historical model बहुदिशात्मक है:
स्थानीय समुदाय ↔ आर्थिक शक्ति ↔ राजसत्ता ↔ ब्राह्मणीय धर्मशास्त्रीय ideology ↔ धार्मिक संस्थाएँ ↔ समुदायों की status aspirations
इसलिए वर्णीकरण को एक दीर्घकालीन historical process की तरह जांचना चाहिए।
6. आंबेडकर: Graded Inequality की महान खोज, लेकिन नया प्रश्न संभव
डॉ. आंबेडकर ने जाति व्यवस्था को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण concepts दिए।
उनका graded inequality का विश्लेषण विशेष रूप से शक्तिशाली है।
भारतीय सामाजिक hierarchy केवल दो वर्ग नहीं बनाती—
शोषक बनाम शोषित।
बल्कि अनेक स्तर पैदा करती है। कोई समुदाय किसी से ऊपर और किसी दूसरे से नीचे समझा जा सकता है।
इसी कारण समान आर्थिक हित वाले समुदाय भी आवश्यक रूप से स्वतः संगठित नहीं होते।
आंबेडकर का दूसरा महत्वपूर्ण हस्तक्षेप endogamy था। उन्होंने जाति के reproduction में अंतर्विवाह की केंद्रीय भूमिका देखी।
लेकिन यहाँ एक अतिरिक्त प्रश्न पूछा जा सकता है:
क्या endogamy स्वयं graded hierarchy उत्पन्न करती है, अथवा वह पहले से निर्मित community boundaries को reproduce करने का mechanism है?
दो समुदाय अपने भीतर विवाह करते हुए भी theoretically एक-दूसरे को समान मान सकते हैं।
इसलिए:
Endogamy → Social Closure
हो सकता है;
लेकिन
Endogamy → आवश्यक रूप से Vertical Human Ranking
सिद्ध नहीं होता।
यहीं अवर्णीकरण का framework आंबेडकर से एक संवाद शुरू करता है।
वह आंबेडकर की graded inequality की diagnosis स्वीकार करते हुए पूछता है—
इस grading की ideological grammar कहाँ से आती है?
7. Louis Dumont: hierarchy को केंद्र में लाने का महत्वपूर्ण प्रयास
Louis Dumont की Homo Hierarchicus इस विमर्श में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने caste को मुख्यतः hierarchy तथा purity–pollution के सिद्धांत के माध्यम से समझने का प्रयास किया।
इस अर्थ में Dumont उस प्रश्न के काफी निकट आते हैं जिसे अवर्णीकरण का सिद्धांत उठा रहा है:
भारतीय सामाजिक व्यवस्था की distinctive characteristic केवल community difference नहीं बल्कि hierarchy है।
लेकिन Dumont hierarchy को caste system के भीतर केंद्रीय organizing principle के रूप में देखते हैं।
अवर्णीकरण उनसे एक कदम पीछे जाकर पूछता है:
क्या जातियाँ स्वयं hierarchy हैं, या जातियों के ऊपर एक hierarchical ideological order आरोपित/विकसित हुआ?
यही distinction आगे की research की मांग करती है।
8. M. N. Srinivas: सामाजिक गतिशीलता दिखाई, लेकिन प्रश्न शेष रहा
M. N. Srinivas ने Sanskritization और Dominant Caste जैसी अवधारणाओं के माध्यम से भारतीय समाजशास्त्र को महत्वपूर्ण उपकरण दिए।
Sanskritization विशेष रूप से दिलचस्प है।
यदि कोई जाति अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए उच्च समझे जाने वाले समुदायों के रीति-रिवाज, खान-पान, धार्मिक व्यवहार अथवा जीवन-पद्धति अपनाती है, तो इसका अर्थ है कि जातियाँ पूरी तरह स्थिर नहीं थीं।
लेकिन यहाँ एक नया प्रश्न निकलता है:
जाति ऊपर क्यों जाना चाहती है?
यदि सभी communities horizontal और equal हों, तो “ऊपर” जाने का अर्थ ही क्या होगा?
इस दृष्टि से Sanskritization स्वयं hierarchical field के अस्तित्व का प्रमाण बन सकती है।
इसलिए Srinivas के प्रश्न—
“जाति अपनी स्थिति कैसे बदलती है?”
से पहले एक और प्रश्न रखा जा सकता है—
“वह vertical prestige scale कैसे बना जिस पर जाति ऊपर चढ़ना चाहती है?”
यही वर्णीकरण का प्रश्न है।
9. André Béteille: Caste, Class और Power का विभाजन
André Béteille का कार्य इस विमर्श में इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने caste, class और power को अलग analytical dimensions के रूप में देखा।
इससे एक महत्वपूर्ण बात स्थापित होती है:
सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक शक्ति और राजनीतिक सत्ता हमेशा एक ही जगह केंद्रित नहीं होती।
कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न हो सकता है लेकिन उसका inherited social status अलग हो सकता है।
कोई समुदाय संख्या और राजनीति में शक्तिशाली हो सकता है लेकिन ritual hierarchy में उसका स्थान अलग हो सकता है।
इसलिए भारतीय inequality को केवल economic class में reduce करना पर्याप्त नहीं।
यह अवर्णीकरण के आधारभूत proposition को मजबूती देता है:
Economic inequality और Varna hierarchy को अलग-अलग समझना होगा।
10. Susan Bayly: इतिहास में बनती-बिगड़ती caste
Susan Bayly का historical approach इस विमर्श को महत्वपूर्ण सुधार प्रदान करता है।
वह caste को timeless और पूरे भारत में हमेशा एक जैसी व्यवस्था नहीं मानतीं। विभिन्न क्षेत्रों, राज्यों, राजनीतिक व्यवस्थाओं और ऐतिहासिक कालों में caste तथा Brahmanical ideals का प्रभाव अलग-अलग रूपों में विकसित हुआ।
यह अवर्णीकरण सिद्धांत के लिए महत्वपूर्ण सावधानी है।
हम यह नहीं कह सकते कि पहले भारत में बिल्कुल horizontal communities थीं और फिर किसी एक समय वर्ण उन पर आरोपित कर दिया गया।
इतिहास अधिक जटिल रहा होगा।
इसलिए hypothesis होनी चाहिए:
वर्णीकरण अलग-अलग क्षेत्रों में अलग गति, अलग intensity और स्थानीय सत्ता-संबंधों के साथ विकसित हुई ऐतिहासिक प्रक्रिया थी।
इससे theory अधिक falsifiable और ऐतिहासिक रूप से मजबूत बनती है।
11. Nicholas Dirks: Colonial “Caste” का प्रश्न
Nicholas Dirks ने एक तीसरी महत्वपूर्ण समस्या उठाई।
औपनिवेशिक शासन ने भारत की अनेक fluid और overlapping social identities को census, ethnography और administrative classification के माध्यम से अधिक स्थिर categories में व्यवस्थित किया।
इससे हमारे सामने तीन अलग historical layers दिखाई देने लगती हैं:
Jati → Varna/Varnization → Colonial Caste Classification
इन तीनों को एक ही “caste system” कह देना शायद ऐतिहासिक processes को अत्यधिक सरल बना देता है।
इसलिए भारतीय समाजशास्त्र को केवल caste studies नहीं बल्कि इन तीनों के interaction का इतिहास लिखना चाहिए।
12. भारतीय समाजशास्त्र की संभावित Category Error
यहीं इस निबंध की केंद्रीय आलोचना सामने आती है।
यदि हम कहते हैं—
“जाति ही hierarchy है”
तो hierarchy का स्वतंत्र origin पूछने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
लेकिन यदि कहा जाए—
जाति = community formation
और
वर्ण = hierarchical classification
तो बिल्कुल नया research programme खुलता है।
तब प्रश्न होंगे:
जातियाँ कैसे बनीं?
उनकी मूल economic functions क्या थीं?
उनके बीच वास्तविक आर्थिक inequality कितनी थी?
किस काल में कौन-सी जाति किस वर्ण से जोड़ी गई?
क्या एक ही जाति अलग क्षेत्रों में अलग वर्णीय status रखती थी?
किसने यह classification स्वीकार किया?
किसने इसका विरोध किया?
राजसत्ता की क्या भूमिका थी?
धर्मशास्त्र की क्या भूमिका थी?
स्थानीय पुरोहितीय institutions की क्या भूमिका थी?
समुदाय स्वयं उच्च वर्णीय status क्यों claim करते थे?
Colonial census ने इस प्रक्रिया को कैसे बदला?
यानी “caste studies” अब history of social ranking में परिवर्तित होने लगती है।
13. तीन अलग प्रत्यय: जाति, जातिवाद और वर्णवाद
इस framework में कम-से-कम तीन concepts को स्पष्ट रूप से अलग करना आवश्यक होगा।
जाति — Jati
ऐतिहासिक social community जिसका निर्माण kinship, occupation, locality, migration, culture अथवा अन्य प्रक्रियाओं से हो सकता है।
जातिवाद — Casteism/Jati Chauvinism
अपनी जातीय पहचान के आधार पर favoritism, exclusion, political monopoly अथवा दूसरे समुदाय के प्रति discrimination।
वर्णवाद — Varnism
जन्मगत समुदायों को intrinsically superior/inferior मानने वाला hierarchical ideological principle।
इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है:
जाति का अस्तित्व, जातिवाद और वर्णवाद तीन अलग सामाजिक phenomena हैं।
किसी व्यक्ति की community identity हो सकती है लेकिन वह जातिवादी न हो।
और कोई व्यक्ति वर्णीय superiority को अस्वीकार करते हुए भी अपनी ऐतिहासिक community identity रख सकता है।
14. समाधान: Annihilation से आगे De-Varnization
यदि diagnosis बदलती है तो solution भी बदलता है।
परंपरागत प्रश्न है:
जाति कैसे समाप्त होगी?
अवर्णीकरण पूछता है:
जन्मगत ऊँच-नीच कैसे समाप्त होगी?
दोनों में बड़ा अंतर है।
अवर्णीकरण का अर्थ होगा—
जाति से वर्णीय prestige निकालना।
अर्थात्:
Jati – Varna Hierarchy = Democratic Community
इसका लक्ष्य होगा:
Vertical Caste Order → Horizontal Community Relations
कोई समुदाय अपने इतिहास, संस्कृति, संगठन और social-support network को बनाए रख सकता है, लेकिन उससे दूसरे समुदाय पर श्रेष्ठता का कोई अधिकार पैदा नहीं होगा।
15. अवर्णीकरण और भारतीय संविधान
यह विचार भारतीय संविधान से स्वाभाविक रूप से जुड़ता है।
संविधान नागरिक को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के रूप में नागरिक अधिकार नहीं देता।
उसकी मूल इकाई है—
नागरिक।
इसलिए संविधान का राजनीतिक सिद्धांत fundamentally horizontal है:
One Citizen = One Equal Constitutional Person
लेकिन सामाजिक मानस में vertical ranking बची रह सकती है।
यहीं राजनीतिक लोकतंत्र और सामाजिक लोकतंत्र के बीच दूरी पैदा होती है।
अवर्णीकरण का उद्देश्य संविधान के horizontal citizen को समाज के horizontal human relationship में बदलना है।
16. जातीय संबंधों का लोकतंत्रीकरण
इस theory का दूसरा स्तंभ है:
Democratization of Inter-Jati Relations
इसका अर्थ होगा—
जातियाँ एक-दूसरे को समान मानें;
सार्वजनिक संस्थाओं में सभी को बराबर अवसर मिले;
किसी समुदाय का किसी पद पर जन्मगत दावा न हो;
जातीय संगठन दूसरे समुदायों के विरुद्ध श्रेष्ठताबोध न फैलाएँ;
व्यक्ति को अपने समुदाय से बाहर पेशा, शिक्षा, मित्रता, राजनीति और विवाह चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता मिले;
और विभिन्न समुदाय साझा राजनीतिक-सामाजिक संस्थाओं में मिलकर नेतृत्व करना सीखें।
यही horizontalization of Indian society होगा।
17. सामाजिक लोकतंत्र का नया सूत्र
भारतीय लोकतंत्र ने राजनीतिक क्षेत्र में सिद्धांत स्थापित किया:
One Person, One Vote.
सामाजिक लोकतंत्र को इसे आगे बढ़ाना होगा:
One Person, One Equal Human Worth.
अर्थात्—
अलग पहचान — समान प्रतिष्ठा।
अलग इतिहास — समान नागरिकता।
अलग पेशा — समान मानवीय गरिमा।
अलग समुदाय — समान राजनीतिक अधिकार।
यह diversity के विरुद्ध democracy नहीं बल्कि democratization of diversity है।
18. नया समाजशास्त्रीय Research Programme
इस अवधारणा को केवल राजनीतिक दर्शन न रहने देकर empirical research programme में परिवर्तित किया जाना चाहिए।
इसके लिए पाँच प्रकार के अध्ययन विशेष रूप से आवश्यक होंगे।
पहला—History of Jati Formation:
अलग-अलग समुदायों की वास्तविक ऐतिहासिक उत्पत्ति।
दूसरा—History of Varnization:
कौन-से समुदाय कब और कैसे किसी वर्णीय status से जोड़े गए।
तीसरा—Economic History of Jatis:
क्या ritual ranking वास्तव में economic ranking से मेल खाती थी?
चौथा—Regional Comparative Studies:
एक ही जाति का अलग-अलग राज्यों में अलग सामाजिक status क्यों रहा?
पाँचवाँ—De-Varnization Index:
आधुनिक भारत में किन क्षेत्रों और समुदायों में जन्मगत superiority/inferiority की मानसिकता कितनी बची है?
इससे पहली बार यह empirically मापा जा सकेगा कि जाति की पहचान और वर्णीय hierarchy वास्तव में कितनी अलग या जुड़ी हुई हैं।
19. इस सिद्धांत की falsifiability भी आवश्यक है
किसी नई theory की विश्वसनीयता तभी होगी जब वह स्वयं को गलत सिद्ध किए जाने की संभावना स्वीकार करे।
इसलिए अवर्णीकरण theory को पहले से यह नहीं मान लेना चाहिए कि सारी जातियाँ मूलतः समान horizontal guilds थीं।
शोध को स्वतंत्र रूप से जांचना चाहिए कि—
क्या वर्ण से स्वतंत्र स्थानीय hierarchies थीं?
क्या भूमि और राजनीतिक सत्ता ने स्वतन्त्र graded inequality पैदा की?
क्या endogamy ने स्वयं status closure पैदा किया?
क्या कुछ जातीय hierarchies Brahmanical texts से स्वतंत्र विकसित हुईं?
और क्या वर्णीय ideology ने अलग-अलग क्षेत्रों में अलग प्रभाव डाला?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर theory में संशोधन मांगते हैं, तो संशोधन किया जाना चाहिए।
यही इसे ideological assertion के बजाय social-scientific theory बनाएगा।
निष्कर्ष: जाति से आगे hierarchy का अध्ययन
भारतीय समाजशास्त्र ने जाति का विशाल अध्ययन किया है। यह उसका महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन अगला चरण शायद जाति का अध्ययन करने के साथ-साथ जातियों की ranking के स्वतंत्र इतिहास का अध्ययन होना चाहिए।
मुख्य प्रश्न बदलना होगा।
केवल यह नहीं—
“जाति क्यों है?”
बल्कि—
“जाति ऊँची या नीची क्यों है?”
और उससे भी महत्वपूर्ण—
“किस सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया ने अलग-अलग समुदायों को जन्मगत prestige hierarchy में व्यवस्थित किया?”
इसी प्रश्न के लिए वर्णीकरण एक उपयोगी analytical concept हो सकता है।
और आधुनिक भारत के लिए उसका उल्टा सामाजिक कार्यक्रम होगा—
अवर्णीकरण।
अवर्णीकरण का लक्ष्य सामाजिक विविधता का विनाश नहीं बल्कि सामाजिक विविधता से जन्मगत hierarchy निकाल देना है।
इसका लोकतांत्रिक समीकरण होगा:
Jati Diversity – Varna Hierarchy = Democratic Social Diversity
और इसकी राजनीतिक-सामाजिक यात्रा होगी:
Varnization → De-Varnization → Democratization of Jati Relations → Social Democracy
इस दृष्टि से भारत को आवश्यक रूप से एक ऐसे समाज की प्रतीक्षा नहीं करनी होगी जिसमें कोई जातीय पहचान ही न रहे। वह अभी से ऐसा समाज निर्मित कर सकता है जिसमें किसी जाति का होना किसी मनुष्य को न ऊँचा बनाए, न नीचा।
इस पूरी अवधारणा को एक वाक्य में कहा जा सकता है:
“भारतीय सामाजिक लोकतंत्र का लक्ष्य विविध समुदायों का उन्मूलन नहीं, जन्मगत ऊँच-नीच का उन्मूलन होना चाहिए; जातीय विविधता को वर्णीय hierarchy से मुक्त करके समान नागरिक गरिमा पर आधारित क्षैतिज लोकतांत्रिक संबंधों में बदलने की प्रक्रिया ही अवर्णीकरण है।”
और संभवतः यही भारतीय सामाजिक विमर्श में आवश्यक conceptual shift है—
जाति से समुदाय की ओर,
वर्ण से अवर्णीकरण की ओर,
ऊँच-नीच से समान गरिमा की ओर,
और सामाजिक विविधता से लोकतांत्रिक विविधता की ओर।