Lord Vasudev Shree Krishna

Lord Vasudev Shree Krishna Here you will get the Bhagvad Geeta sloks, inspiration quotes of Swami Vivekananda, Lord Krishna. These content would be in Hindi or English

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.19*नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छत...
24/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.19*
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १४.१९ ॥
Translation
जब कोई यह अच्छी तरह जान लेता है कि समस्त कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई कर्ता नहीं है और जब वह परमेश्र्वर को जान लेता है, जो इन तीनों गुणों से परे है, तो वह मेरे दिव्य स्वभाव को प्राप्त होता है |

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.18*ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति त...
23/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.18*
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १४.१८ ॥
Translation
सतोगुणी व्यक्ति क्रमशः उच्च लोकों को ऊपर जाते हैं,रजोगुणी इसी पृथ्वीलोक में रह जाते हैं, और जो अत्यन्त गर्हित तमोगुण में स्थित हैं, वे नीचे नरक लोकों को जाते हैं ।

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.17*सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १४.१७ ॥Trans...
22/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.17*
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १४.१७ ॥
Translation
सतोगुण से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है और तमोगुण से अज्ञान, प्रमाद और मोह उत्पन्न होता हैं |

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.16*कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १४.१...
21/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.16*
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १४.१६ ॥
Translation
पुण्यकर्म का फल शुद्ध होता है और सात्त्विक कहलाता है । लेकिन रजोगुण में सम्पन्न कर्म का फल दुख होता है और तमोगुण में किये गये कर्म मूर्खता में प्रतिफलित होते हैं ।

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.15*रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १४.१५ ॥Transl...
20/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.15*
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १४.१५ ॥
Translation
जब कोई रजोगुण में मरता है, तो वह सकाम कर्मियों के बीच जन्म ग्रहण करता है और जब कोई तमोगुण में मरता है, तो वह पशुयोनि में जन्म धारण करता है |

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.14*यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४...
19/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.14*
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४.१४ ॥
Translation
जब कोई सतोगुण में मरता है, तो उसे महर्षियों के विशुद्ध उच्चतर लोकों की प्राप्ति होती है |

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.13*अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १४.१३...
18/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.13*
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १४.१३ ॥
Translation
जब तमोगुण में वृद्धि हो जाती है, तो हे कुरुपुत्र! अँधेरा, जड़ता, प्रमत्तता तथा मोह का प्राकट्य होता है

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.12*लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १४.१२ ...
17/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.12*
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १४.१२ ॥
Translation
हे भरतवंशियों में प्रमुख! जब रजोगुण में वृद्धि हो जाती है, तो अत्यधिक आसक्ति, सकाम कर्म, गहन उद्यम तथा अनियन्त्रित इच्छा एवं लालसा के लक्षण प्रकट होते हैं

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.11*सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत...
16/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.11*
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ १४.११ ॥
Translation
सतोगुण की अभीव्यक्ति को तभी अनुभव किया जा सकता है, जब शरीर के सारे द्वार ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं |

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.10*रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १४.१० ॥T...
15/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.10*
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १४.१० ॥
Translation
हे भरतपुत्र! कभी-कभी सतोगुण रजोगुण तथा तमोगुण को परास्त करके प्रधान बन जाता है तो कभी रजोगुण सतो तथा तमोगुणों को परास्त कर देता है और कभी ऐसा होता है कि तमोगुण सतो तथा रजोगुणों को परास्त कर देता है | इस प्रकार श्रेष्ठता के लिए निरन्तर स्पर्धा चलती रहती है |

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.9*सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ १४.९ ॥Tra...
14/05/2026

"*श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता यथारूप 14.9*
सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ १४.९ ॥
Translation
हे भरतपुत्र! सतोगुण मनुष्य को सुख से बाँधता है, रजोगुण सकाम कर्म से बाँधता है और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढक कर उसे पागलपन से बाँधता है |

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